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Full text of "Gandhi Ji Par Vitchar"

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"७ ए 
:.. लेखिका 
शीलावती मुंशी 


किताब महल 


इलाहाबाद 


 अयम संस्करण यह 
“४६५२८ 
. ननुवादक 
शिवचंद्र ं नागर एस० ए० 
संशोधक 
सत्यनारायर व्यास 
आवरण चित्र: 
हरिदास चाटुय्य 
अकाशक 
किताब महल 
रलाहाबाद 
सुद्रक 
2 डब्ल्यू० आर० प्रेस, इलाहाबाद 


मेरे जीवन में 
पिता जैसा प्रेम 
रखनेवाले 
ओर 
रस लेनेवाले 
मु० लख्लु काका को 


निवेदन 
निवेदन 

मिन्न-मिन्न समय पर लिखे हुए रेखाचित्रों का यह संग्रह भाई जीवन- 
लाल के प्रयास से इस समय इस रुप में प्रकाशित हो रहा है। इन 
रेखाचित्रों के विपय में एक बात स्पष्ट रूप से कह देना आवश्यक हो 
जाता है | जब-जब ये रेखाचित्र लिखे गये तब ओर आज के बीच काफी 
समय का अंतर पड़ गया है | जिनके विषय में ये लिखे गये ये, उनमें 
से अनेकों के जीवन में भी परिध्तन--कितने ही व्यक्तियों के विपय में 
तो महान्‌ परिवर्तत--हुए हैं। फिर धारा समा में दो दिन! जैसे उड़ते 
चित्र तथा घटनाएँ देखने का शीशा भी हमने बदल दिया है। बहुत सी 
घटनाओं और लोगों के विषय में जो उस समग्र कहा गया वह आज 
नहीं कहा जा सकता | पर उसके दो कारण हैं। एक तो ऊपर बताया 
मेरा--हम सत्र का--ध्यक्तियों तथा धट्नाओं को ओर देखने का दर्पण 
बदल गया है और दूसरे मनुष्य की जैसे वय बढ़ती है और शरीर के 
अवयवों की रेखाओं में घट बढ़ होती है उसी प्रकार इसमें चित्रित 
व्यक्तियों की रेखाओं के विषय में मी हुआ होगा--हुआ है। बहुतों की 
रेखाओं में, यदि में आज लिखूँ. तो बहुत फेरफार करनी पढ़े, ऐसा मुझे 
लगता है । पर मैंने इन मूल लेखों में परिवर्तन नहीं किया; क्योंकि जिस 
समग्र ये लिखे गये ये उस समय की रेखाओं का प्रतित्रिंतर ये ठीक प्रकार 
से व्यक्त करते है, यह मेरी धारणा है। उस समग्र की रेखायें ग्रहण 
करने की मेरी शक्ति-मर्यादा का भी इसमें पता लगता है। यह बात 
स्पष्ट करने के लिये ठीक समयानुसार विभाग भी इसीलिये किये गये हैं | 

तदुपरांत लेखों की मापा में निहित त्रुटियों, उस-ठस समय की मेरी 
भाषा के प्रतिचिंत्र रूप हैं और वे भी मैंने ज्यों के त्यों सीमा-चिद्ध के रुप 


(5 ०) 


में रहने दिये हैँ | फिर में लिखूँ तो मेरी भाषा की उन्नति या अवनति 
की माप इन्हीं से आत्म-परीक्षण के लिए निकाल सकूँ, ऐसी धारणा इसमें 
समाहित है । 

ये तथा और दूसरी जो त्रुवियाँ दिखाई दें उसके लिए पाठक सदभाव- 
पूर्वक छ्मा करेंगे, ऐसी आशा रखती हूँ । 


--लीलावती मुन्शी 


विषय सूची 
प्रथम भाग 

विषय 

१, सूर० अमृतलाल पढ़ियार 

२ श्री नानालाल कवि 

३, श्री चन्द्रशंकर पंड्या 

४, कन्हैयालाल मुन्शी 

४, काका साहब ( श्री कालेलकर) 

६, श्री महादेव 

७, श्री इंद्रलाल याशिक 

८, बाबू द्षितिमोहन सेन 

६. श्री करणशंकर मास्टर 
१०, श्री बल्लम भाई पटेल 
११, अध्यायक आनंदशंकर अभ्ू व 
१२ श्ररदेशर खबरदार 
१३, कसर वा गांधी 

१४, श्रीमती सरोजिनी नायडू 

१५, सोौ० सरला देवी अंवालाल सारा भाई 
१६, श्रीमती श्रतिया वेगम 

१७ सौ० विजयगौरी कानुगा 

१८ श्रीमती अ्नसूया बहिन 


१६ सौ० विद्यागौरी नीलकंठ और सौ० शारदा बहिन मेहता 


| दसरा भाग 
२०, पार्वती 
२१, पश्चिनी थ७ 


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६. 5, ) 


२२ जोन ऑफ आके 

२१, मिसेज मारगरेट एस्वीय 
२४, जीजी माँ 
२५. गांधीजी का साहित्य में स्थान 
२६, श्री आन दर्शकर भाई 

२७, गुजरात के दो विद्रोही 


जीवन चित्र 


२८, द्रीपदी 

२६ मीरावाई : एक दृष्टि 

३०, मीराबाई 

३१, एस्पेशिया : स्त्रियों में एक वसंतावतार 
३२ कविवर शेली 

३३, अनातोल फ्रांस 

३४, -कवि दुलपततराम डाह्मा भाई 

डहे४, कवि नर्मंद्‌ 

. ३६, धारा समा में दो दिन 


तीसरा भाग 


3७ सर चिमनलाल सीतलवाड़ 
इ८ श्री एम० आर० जयकर 
३६ श्री मुहम्मदअली जिन्ना 
४० सर प्रमाशंकर पट्णी 

४१ पंडित मोतीलाल नेहरू , . 
आर, भूलाभाई देसाई... 
४३. श्री नरसिंहराव भोलानाथ 
४४. भ्री खशाल शाह 


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सत्र ० असृतलाल पढ़िआर 





बचपन में पढ़िय्ार के कितने ही स्वर्ग! पढ़े ये और तभी अनेक 
कलपनायें की थीं कि इन लर्गों? का स्रश कैसा होगा ! पर जब चोर- 
बाड़ गाँव में अतिथियों के लिए विस्तर का प्रवन्ध करने के लिए हाथ 
में लालटेन लेकर इधर-उधर फिरते हुए बद्ध को देखा, उस समय दो 
यह तनिक भी न सूका कि यही पढ़िआर होंगे, बल्कि उस बृद्ध को 
देखकर अपने दादा के यहाँ बचपन में देखे हुए छेटेलाल मुनीम याद 
आये । इस यूख्री हुई देह में बसी हुई सुद्धर आत्मा से परिचय प्राप्त 
करने का सौभाग्य तो फिर ग्राप्त हुआ । 
चोरवाइ में हम चार दिन तक श्री नानालाल कवि के मधुर आतिथ्य 
का अनुमव करते रहे, पर इस मीठी मेहमानदारी में यदि हमने वाद्यजी 
की सुन्दर बातें तथा ४४” की ध्वनि न सुनी होती तो ऋहुत कुछ खो 
दिया होता । 
-. इनमें एक वृद्ध का विवेक और वैराग्य, युवा की रसिक बृत्ति और 
बल; बालक का-सा उत्साह ओर आनन्द छुलके पड़ते थे। चीरबाट़ 
की पान की वेलों में उलकाते, कुएँ और तालाबों में नहलाने, बड़ की 
लग्कती हुई शाखों पर कुदाते बगीचे में घुमाते हुए, पूर्णिमा की राज्ि में 
समुद्र के रसगीत सुनाते ओर छुत पर कवि ललित के भवनों का रस 
चलाने वाले के संपारी होने पर भी असंसारी के संत्मरण बहुत समय 
तक बने रहेंगे। सुन्दरता इनके प्रत्येक शब्द से छुलकी पड़ती थी # 
इनका जीवन ही सौंदर्यमव था। मुझे ऐसा लगा, इनमें कभी उदासीन 
वृत्ति आती होगी ! 


ननन 4 जलन 


रेखाचित्र 


प्राचीन होने पर भी प्राचीन को नवीन स्वरूप में ये देख सकते. थे 
रुढ़िदेवी को दूर से ही नमस्कार करना इन्हें आता था। लोकमत का 
सम्मान करते हुए. भी ये उसके उपासक नहीं थे। इस बात के समर्थन 
में जूतागढ़ में एक मित्र के यहाँ भोजन करने गये, उस समय का 
एक प्रसंग याद आ जाता है, तो सच्ची बात को ब्रिना किसी हिच- 
किचाहट के कह डालने की इनकी अपूर्व शक्ति.का सहज ही ध्यान हो 
आता है । 

रृत्यु से पहले ये अहमदाबाद आये थे। वहाँ एक दिन मेरे साथ 
घूमने गये । वह प्रसंग भी भुलाया नहीं . जा सकता | पश्चिम की भाषा 
के संस्कार इन्हें छुए तक न थे, पर फिर भी वहाँ के सुधरे हुए विचारों 
को ये सहज ही पचा सकते थे | ग्रेज्युएट हो जानेवाले विद्यार्थी मी जरा- 
जरा-सी बातों से भड़क जाते हैं और यह मनुष्य इन्हीं विचारों को इस 
प्रकार अहण करे और इसमें भी श्रधिक साहसिक विचारों को शान्ति 
से व्यक्त करे यह देखकर मुझे आश्चर्य ही हुआ | , 

परन्तु ऐसे आनन्दी हृदय को भी कभी-कभी उदासीन डृत्तियाँ 
(६ 20008 ) घेर लेती थीं। बनिता-विश्राम में भाषण देने के बाद 
अंतिम बार ये घर पर मिलने आये तब मैंने देखा, किसी अकथनीय उदा- 
सीनता से उनका हृदय अमिभूत हो उठा था। ऐसी मावनाओं से सभी - 
का मन असित होता है, परन्तु आत्मबल के परिमाणानुसार इनका प्रभाव 
किसी पर कम तो किसी पर अधिक होता है, केवल इतना ही । 

निराश व्यक्ति को प्रोत्साहन देनेवाले, जन-स्वभाव के पारखी, अनेक 
प्रकार की वनस्तियों का रस जानने और चखानेवाले, 5४ शब्द कीः 
ध्यनिं करने ओर सौंदर्यानन्द की संष्टि करनेव्राले उस साधु का चित्र 
अंतर के चित्रपट पर उज्ज्बलः रंगों से सदा ही चित्रित रहेगा। 

किसी ने कहा है, सोराष्ट्र 'साधु-रहित होता जा रहा है ।?. कितना: 
कटु और दुःखद सत्य है ! 

ल्‍++२--- 


'श्री नानालाल कवि 





बहुत समय पहले "नाना नाना. रास, इंदुकुमार' तथा 'जयाजय॑त? 
पढ़े थे । उस समय इस शब्दसूपी फूलों की माला गूँयनेवालें उस चबुर 
माली करे प्रति बढ़ा आकर्षण उत्न्न हुआ । गुजराती के श्रतिरिक्त उस 
समय मुझे किसी दृसरे साहित्य का ज्ञान न था। पहले दस-बारह व५ 
की उम्र में श्री नरसिंदरात्र की द्वय बीणा' में आकर्षण उद्चन्न हुआ 
था, उसके बाद कवि की पुस्तकों जैसी दूसरी पुस्तकें आकर्षक नहीं 
लगीं। उन दिनों निर्णय करने की शक्ति न थी; प्रकाश से चॉमिया 
जानेवाले बालक की-सी बृत्ति ही थी । 

यात्रा से लौटते समय्र हम सत्र राजकोट गये । कबरि से पुरानी मित्रता 
की याद आई तो उनसे मिलने का निश्चय किया। मुझे बड़ी जिशसा थी। 
कवि उस समय राजकोट में अकेले ही थे। परिवार कहीं बादर गाँव गया था । 

साधारणुतया जच्र पुरुष पुरुषों से मिलने जाते हैं तो स्लियों को साथ 
ले जाने का रिवाज अपने हिन्दू-जगत्‌ में नहीं है। पर जिसकी पुस्तकों 
ने मुके आश्व् चकित कर दिया था, एक वार उसके दर्शनों का अवसर 
ग्राव् हो तो क्यों न उसका लाम उठाया जाब, यह सोचकर सत्र के 
साथ में भी गई | 

राजकोट में कवि के यहाँ जो गये होंगे वे देहली में प्रवेश फरते ही 
दाहिने हायवाली कोटरी से अवश्य परिवित होंगे। मेज के पास गंभीरता 
से बैग हुआ व्यक्ति वही श्री नानालाल कि हैं। 

कितनी ही पुरानी बात याद आने पर दोच में / इंडुकुमार'! का दूसस 


35. 


भाग कब्र , प्रकाशित हो रहा है १” जब मेंने यह पूछ लिया तो मेरी 


गर पा 


“नर 


५४ 


रेखाचिन्र 


पुस्तकों में रस लेनेवाला भी कोई है? यह तो कवि ने सोचा ही होगा, 
क्योंकि उसके बाद कवि मुझसे और अधिक रस से बातें करने लगे। 
यह था कवि से मेरा प्रथम परिचय | इसके बाद तो मुझे कवि से भेंट 
करने के कई अवसर मिले, उनके विषय में बहुत कुछ अच्छा-बुरा सुनने 
को मिला । उठते-उठते कवि ने उषा? दी, ( जो उन दिलों प्रेस में थी 
और कहा कि इस पुस्तक में मुझे औरों से अधिक रस मिलेगा | 

कवि में कल्पना ओर शब्द-योजना बड़ी सरस है। स्वभाव विनोदी 
है, आँखों में एक प्रकार का उम्र तेज है। साथी की तरह यह अच्छे 
लगें, ऐसे हैं, परन्तु मित्र की तरह ८४४८०४४)? अधिक हैं। आग्रह--- 
हठ या दुराग्रह जितना कहा जा सके, इनमें अधिक है ओर क्रोधित 
होने में बहुत कम समय लेते हैं। प्रतिस्पर्धी की ओर उदार भाव से 
नहीं देख सकते और अनुयात्रियों तथा आश्रितों से घिरे रहना इन्हें 
अच्छा लगता है--दयालु हैं ओर गर्बीले भी । वह स्वयं नहीं जान सकते 
हों, फिर भी उनमें 'अहं? है । 

इनके प्रति मेरे हृदय में अधिक श्रद्धा थी और अब भीः है***“** 
इनके कितने ही संकीर्ण जिचारों के कारण काठियावाड़ में अधिक समय 
तक रहना तो हानिकर नहीं हो सकता १ 

इनमें भावना-प्रधान प्रकृति अधिक है। अतिथि-सत्कार कवि का 


- विशेष गुण है। मैंने किसी से इनके यह-संसार को अतिथि-सत्कार के 


लिए, तपोत्रन से उपमा देते हुए सुना है। 
गहस्थ के रूप में--मित्रों और प्रवृत्तियों के कारण परिवार के प्रति 


: झपने कर्तव्यों को घड़ी मर के लिए मुला भी सकते हैँ | कवि के रूप में-- 


इनमें कल्पना है, रस है, भात्र है, शब्द-सौंदर्य है, कवित्व भी है। परन्तु 


सत्र जगह कविता नहीं जान पड़ती | इनमें कोई कमी है, कौन-सी यह 


समम में नहीं आता । 
इनके मानसिक निम्मर से प्रल्वित प्रवाह का अपव्यय अधिक होता 


नि 


श्री नानालाल कवि 


है। जल का प्रवाह है, गति है; पर कूलों का वन्धन नहीं | आखिर कवि 
जो ठहरे ! 

कृषि में आनन्द का सजन करने की अद्भुत शक्ति है। आनन्द के 
कई प्रसंगों के लिए में इनकी बहुत ऋणी हूँ। जब अहमदाझद श्राते 
तो हमारे हॉल में एकत्र हुईं मंडली में आनन्द छा जाता। चोरबाड़ का 
आतिथ्य, गिरनार की मुल्ाकार्ते, डा० खाँडाबाला के यहाँ का चपल- 
प्रकरण और ऐसे ही दूसरे प्रसंगों में प्रदर्शित इनकी गम्भीर सद्भावनाएँ: 
>>ये इनके परिचय की इतनी विविधताएँ हैं कि आनन्द और आभार 
के साथ बिना याद किये नहीं रहा जा सकता। 


श्री चंद्रशंकर पण्ड्या 





श्री चन्द्रशंकरजी से मेरा परिचय ग्रत्यक्ष की अपेक्षा परोक्ष अंधिक 
है | इनसे भेंट के अवसरों पर - मैंने जितना अवलोकन किया है उससे 
अधिक इनके विषय में मित्रों द्वारा सुना है। इनकी वास्तविक प्रसिद्धि 
के दिनों में तो मैंने इन्हें देखा भी न था, इसलिए कदाचित्‌ अधूरा या 
एकदेशीय ही इनके विषय में कहा जा सके, यह स्वाभाविक है। 
श्री चन्द्रशंकर पंडया सो० वसंत वा के पति के रूप में सर्वप्रथम मेरे 
ध्यान में आये होंगे । इनकी एक छोटी सी कविता पहले-पहल मैंने कहीं पढ़ी 
थी, तब महात्वाकांछ्ी पत्नी का अनुकरण करते हुए. अथवा अपने को 
उसके योग्य बनाने का प्रयास करते हुए. पति का मुझे ध्यान आया। 
वेचारे चन्द्रशंकर ! 
यह तो हुईं बहुत वर्ष पहले की बात ! इसके बाद श्री चन्द्रशंकरजी 
की छोटी-छोटी कविताएँ और भी दृष्टि में पड़ने लगीं। उनकी 'स्यइल? 
( शैली ) के विषय में भी सुना । उस समय आज की अ्रपेज्षा मेरे विचार 
संकुचित बहुत थे। चन्द्रशंकर की कुछ कविताएँ ही मुझे कबिता की 
:. तरह अच्छी लगतीं। इनके लेख मुझे अधिक अच्छे लगतें। आज भी 
इनकी कविताओं के विषय में मेरे मन में थोड़ा-सा ही परिवर्तन हुआ 
है। एक बार तो इनकी कविताओं पर आलोचना भी लिखी थी, पर 
परमेश्वर से दूसरा नम्बर कदाचित्‌ श्री चन्द्रशंकर का है यह बात 
ओऔ रमणीयराम के मन में हो इस कारण से अथवा 'समालोचक? में 
ओ चन्द्रशेकर पर आलोचना लिखने की धृष्टता करने का अवसर किसी 


---६-- 


श्री चंद्रशंकर परडया 


को न दिया जाय इस कारण से या किसी दूसरे कारण से यह आलो- 
चना रमणीयराम नहीं छाप सफे। इसमें उन्हें व्यक्तिगत तत्व अधिक 
लगा, यह उन्होंने मुझे बताया । इनकी सम्मति के प्रति संपृर्ग सम्मान 
होने पर भी आज तक मुझे ऐसा लगा नहीं | 

शी चन्द्रशंकर स्वभाव से स्नेहशील हँ। इन्हें स्नेह चाहिए भी 
अधिक । गुण-दोप-परीक्षा ये अच्छी कर सकते हैं। स्वभाव से हो ये एक 
अच्छे विवेचक हैं। चन्द्रशंकर के सभी मित्रों को इनकी मोप्ठी और 
उसमें चलनेवाली विविध प्रकार की विवेचनाएँ, गुग-दोप-परीक्षाएँ, 
व्याख्यान और इन सबके साथ होनेवाले मीठे विनोद , साथ ही हृदय 
के भावपूर्ण सत्कार तथा उदारता अ्रवश्य याद होंगे | 

इनमें नांगरपन तो नहीं पर नागरिकता है। आत्म-सम्मान श्रधिक 
है। स्त्रियों को इनकी मित्रता अ्रधिक श्रच्छी लगती है--ऐसा इनक्रे विषय 
में कहा जाता है। लाड़ इन्हें आवश्यकता से अधिक मिला है । लाढले 
कहे जा सकते हैं या नहीं, यह मालूम नहीं | 

हमारी ब्लियाँ गीतों में गाती हैं उसके अनुसार किसी दिन थे छेला 
रहे होंगे | भले ही ये एक नन्‍्हें से तारे हों पर विशाल ब्योम में उनके 
लिए स्थान है अवश्य ! 





श्री कन्हेयालाल मुन्शी - 


अधिकतर मेरा परिचय लेखकों की अपेक्षा उनकी कृतियों से पहले 
रहता है श्री मुन्शी के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ । 

गुजराती? के दीग़वली अंक में प्रकाशित हुई 'कोकिला?, उसमें 
प्रत्येक सतन्ताह प्रकाशित होनेवाला विरनी वसुलातः ओर उसके बाद 
'मेरी कमला, तथा दूसरी कहानियाँ?, 'पाठन की प्रभुता! और 'गरुजरात का 
नाथ! एक के बाद एक पढ़ने में आये तब गुजरात के साहित्याकाश में 
एक नवीन ग्रह चमचमाने लगा है, ऐसा मुझे सहज अनुभव था। लेखक 
रूप में तो श्री म॒न्शी ने बहुतों को मोहित किया है। 

उसके बाद दो मंहीने एक ही त्रिल्डिंग में रहने का सुयोग मिला 

न्हें अधिक समीप से देखने का अवसर मिला। 

मुन्शी देखने में कोमल ओर नम्र हैं। मेरी भाषा में छोटे आदमी 

हैं। अन्नदेव के साथ इनकी अधिक मित्रता नहीं है, पर पैसा कमाने के 
के लिए ये सबेरे से शाम तक खूब परिश्रम कर सकते हैं। अपना लेखन- 
कार्य इस समय में से बड़ी उदारतापूबंक निकाली हुई कुछ मिनयों में ही 
करते हैं। 

मनुष्य-सवमाव परखने की इनमें अद्भु त शक्ति है । बुद्धि का 
चमत्कार इनमें चमकता है, पर साथ ही अहं की चमक भी उतनी ही है । 
बुद्धि के शिखर पर से ही संसार पर दृष्टि डालते हैं। इनके पात्रों में 
अकड़ बहुत है, किसी ने ऐसा कहा है | इनके विषय में भी यही कहा जा 
सकता है | विज्ञाशाज्री की तरह ये जनता के साथ सामझञ्जस्य स्थापित 

निकल न 


॥ 
न्‍्स्‍ 


श्री कन्हैयालाल मुन्शी 


करते हँ---बह मी प्रथक्करण करने के लिए । स्वभाव के सभी तलों 
का ये अध्ययन करते हैं ओर निर्दबी की तरह उनका वर्गीकरण । और 
में यह कर सकता हूँ यह भी मली भाँति समझ सकते हैं । 

ऐसे मतुप्य की बुद्धि को संसार नमत्कार करता है पर प्रेम नहीं कर 
सकता । आत्मसम्मान और भी अधिक है | दूसरों की ओर तिरस्कार- 
पूर्वक देखने की प्रवृत्ति भी कुछ-कुछ है । रहन-सहन और व्यवहार सम्य 
तथा सुसंस्कृत है | एक प्रकार की छुट्व भी है । 

संतार के प्रति ये उदासीन हैं। इन्होंने संसार से कुछ मोगा था पर 
मिला नहीं ऐसा लगता है। ग के कारण उसके लिए ये किसी से शिकायत 
नहीं करते, परन्द॒तिरस्कार करते हैं और अपने अंतर में ही नि्दयी 
की तरह उसके टुकड्रे-टुकड़े कर डालने में आनन्द का अनुभव करते हैं। 
इन्हें सहानुभूति अच्छी नहीं लगती, क्योंकि उसके मिलने पर गौरव 
भंग हो जायगा ऐसी इनकी धारणा है |% 

परन्तु कदानित्‌ इस वाद्य बुद्धि की कठिन चद्यन के नीचे दृदयन्कूप 
में से भावनाओं का मीठा सोत बहता होगा। किसी ने उस जल का पान 
किया होगा, परन्तु यह जल दुलेम है अवश्य । 

छृदय का उपयोग करने पर ही उसका मूल्य बढ़ता है। 


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गाते छाप 2 वेलाएमए व दधंपटहाहु शव प्टवयएएु 7६70 छॉ<९ए८५ 
फर्शगिल गांड परधाप् 2ए९,.. जिर ठं065 0०६ सीएड इजाएशधीए- फै्टनए:० 
छ6 फप्र5 ६ 0एटाक गांड पींएधांप, 


' श्री ललित 





. श्री ललित के काच्यों में भाव की अपेक्षा शब्द-माधुर्य॑ अधिक है। 
ओर ललित यथाशक्ति सबके अनुकूल होने का प्रयल्त करते हैं। पर जो 
सबको प्रसन्न करना चाहता है वह किसी को भी नहीं कर पाता यही नियम 
इन पर भी लागू होता है। संसार इनको हमेशा श्रन्यायी - लगा: होगा 
और लगेगा | ह ह ह 

श्री ललित मजीरों के साथ भजनों का आनन्दः सदैव लेते आये हैं। 
जो इनके परिचित हैं वे इनके मजीरों को मी अच्छी तरह जानते होंगे। 
मजीरों के साथ इनकी मित्रता यावच्चंद्रदिवाकरो?! तक की है। 

चन्द्र-सूय के मोह में दुनिया जिस प्रकार ण्हदीपक को भुला देती है 
उसी प्रकार बहुत से लोग महाकवियों की छोज में, सुन्द्रियों के रास में 
तथा बालकों की क्लास. में गाये जा सकें ऐसे श्री ललित के गीतों को घुला 
देते हैं। 

ब्लेंकवर्स! लिखने का मोह इन्हें अभी नहीं हुआ । श्री :ललित, केवल 

कविता ही नहीं करते, वरन्‌ उपदेश भी देते हैं, माषण भी देते हैं ओर 
समाज-सेवा में यथाशक्ति अपना सहयोग देने से भी नहीं चूकते | 

इनमें सखजन शक्ति की अपेक्षा शब्द-चयन अधिक है। इन्होंने कितने 
ही नवीन लेखक रूपी साहित्य-प्रांगण के निम्तत आम्रकुंजों में शब्दों रूपी. 
कोकिला की मीठी कुहु-कुद्ु कुहुका दी है। 

इनके मजीरों की कंकार, ओर धोविन के गीत की लय कभी-कभी 
खय॑ ही याद आकर श्री ललित के संस्मरण जगा देती है । 

इनकी भावनाओं के अनुरूप ही परिस्थितियाँ यदि मिली होतीं तो 
ललित न मालूम क्या-क्या करते ! * 


->न-१०-- 


काका साहब (श्री कालेलकर) 





अंधेरी रात में भर नींद से जागने पर सहसा-हृप्टि किसी की 
खोज करती हो, इस प्रकार आकाश-पट पर घूमती हुई किसी एक तेजस्वी 
तारक मणि को चमकता देखकर वहॉँ ठहर जाय, उसी प्रकार गुजरात के 
छोटे-बड़े सभी विचारकों तथा शिक्षा-शात्त्रियों में विचरण करती हुई 
इृष्टि काका साहब पर ठहर जाती है। भारत भूमि के गम में अनेकों 
चहुमूल्य रत्न हैं, पर इनकी चमक केवल इनके अपने स्थान को ही दीप 
करती है। गुजरात के सौभाग्य से पूज्य गांधीजी सदश रत्परीक्षक इन्हें 
मिले और परिणामस्वरूप कितने ही रक्नों को पहिचानने का सीभाग्य गुजरात 
को प्राप्त हुआ । इन रक्षों में से एक महामूल्यवान्‌'रत्ष हँ--काका साहब | 

ज्ञान को सभी दिशाश्रों से श्र जितनी विस्तृतता से देखा जा सक्रे 
उतना अध्ययन करना तथा उसे ग्रहण करना, चुद्धि के गहन तत्वों का 
विश्लेषण करना, यह काका साहब की जीवन-साधना है। पर यह इतने 
से ही समाप्त नहीं हो जाता । संसार को ये शिक्षा-शात्री की दृष्टि से देखने 
हैं, पर इनकी दृष्टि वहीं ही नहीं रुक जाती । बुद्धि इनका साथ नहीं छोड़ती, 
परन्तु भावना तथा आदर्श मी इन पर शासन करते हैं | बालक की-सी कौत॒क 
जृत्ति इनमें है। युवक की-सी गति और बृद्ध का-सा संयम भी है। झोर 
सर्वत्र अपना मामिक विनोदी रस भर देते हैं) 

बुद्धिमान्‌ पुरुषों का पारिवारिक जीवन वास्तव में बड़ा शुप्क होता 
है। उपकार कहिये या दया, ये अपने अशिक्षित कुद्धम्बियों फो निभा लेते 
हैं। पर काका साहब विद्वानों की साधारण मिट्टी से नहों बने । काझी से 
अस्पश्य बुद्धि के शिखर पर विचरण करते हुए भी ये उनकी साधारण 
सी बातों का ज़रा भी ऊबे ब्रिना, रस लेते हुए मुन लेते होगे। पुत्र के 
अति इनका प्रेम, इनके विश्वप्रेम का केन्द्र होगा, और संसार के छोटे 


 रेखाचित्र .. 

बढ़े सभी बालकों के प्रति भी उनका चैये तथा आकर्षण कुछ कम नहीं है। 

संसार को इन्होंने खूब देखा ओर अनुभव किया है और वह भी 
द्रष्य के कौतुक भरे हास्थ से या प्रेत्ञक के अइ्हास से नहीं, बल्कि संसार 
में प्रवेश कर तथा उसका एक सदस्य बनकर--फिर भी प्रेज्ञषक का-सा ' 
दूरत्व रखकर | 

आदत--यह इनके लिए पैदा नहीं हुई है| बंधन मानते हैं, पर यह 
बंधन इन्हें बाधक नहीं होने | अपने शिंष्यों के ये थ्रिय गुरु हैं, मित्रों के ये 
मार्ग-दर्शक सखा हैं, साक्षरों के ये समवयस्क साथी' हैं । 

सागर का-सा ज्वार-माय इनमें नहीं, गंभीर सरोवर का अच्षुब्ध जल 
इनमें भरा है। ये चत्चुओं को आकर्षित करने वाले चंद्रमा नहीं, पर हृदय 
में छिपे हुए शुक्र तारे का-सा तीखा प्रकाश है। 

संसार के ये मित्र हैं, पर संसार के कोलाहल से दूर रहते हैं। 
आत्मा के ये उपासक हैं, पर साथ ही स्थूल के चिकित्सक । कर्मयोग 
इन्होंने अहण किया है, फिर भी योगी का-सा वैराग्य इन्हें अधिक प्रिय है । है 
राजयोगी के प्रताप की अपेक्षा तपस्वी का तप इनमें अधिक हे । 

अधिकतर सभी को निर्जी< लगनेवाली वस्तुओं में ये अद्ू तता का 
दशन करते हैं और उन्हें अद्धू तता अर्पित भी करते हैं। मनुप्यों की 
बालइत्ति इनमें एक मुस्कराहड के अतिरिक्त दूसरी, भावना को कदाचित्‌ 
ही जागत करती हो । शुष्क तलज्ञान में ये कल्पना के रंगों का एक 
अपूर्व मिश्रण कर देते हैं। 
विषयों का विवेचन करते समय इनके जैसे सुन्दर दृष्यन्त कोई नहीं 

दे सकता | महाराष्ट्री होने पर भी गुजराती भाप्रा पर इनका अधिकार 

गुजरातियों को भी लजा देनेवाला है। कला की सूकछ्म परख इनमें है। 

किसी रत पुरुष ने कड्टा है कि सत्संग जितना किया जा सके, करना 
चाहिए । परन्तु सत्पुरुषों का समागम जीवन-पथ पर कितन विरल है ! ह 


श्री महादेवभाई 





पिछली नागपुर-कांग्रेस के अवसर पर हम विपय-विचारिणी समिति 
में दर्शक की तरह गये थे | वहाँ महादेवभाई भी आये ये। महादेवभाई 
को देखने पर में पहिचान लेती थी पर इनके प्रति. अधिक जिशसा 
वृत्ति तो तभी से हुई | किस प्रकार हुई यह बताती हूँ। 

विपय-विचारिंणी समिति में मेरी एक सखी ने महादेवभाई के विप्य 
में मुझसे पूछा, ये कोन हैं ?? मेंने कहा, गांधीजी के सेक्रेट्री--महादेव- 
भाई देसाई हैं ।! अच्छा ! में तो समझती थी कि महादेवभाई बूढ़े, 
गंभीर ओर रूखे होंगे ।! उनके कहने में 'ज़रा कुरूप! होंगे यह भाव भी 
था। यों, बहुत अच्छे लगते हैँ ? तेरा विवाह करने का मन हो तो 
कुछ विचार करें|! ( दुर्गा बहिन उस समय ध्यान में न थीं, वे यदि इसे 
पढ़े' तो क्षमा करेंगी, ऐसी आशा है )। 

गांधीजी के सेक्रेटरी का नाम सुने तो पहले कुछ दूसरा ही विचार 
मस्तिप्क में आयेगा और फिर जो महादेवभाई को पहली बार देखे 
उसे तो आश्चर्य ही होगा । 

महादेवभाई कद में ऊँचे हैं। हम उन्हें पतला-दुबता नहीं कह 
सकते | उनके सहन गोर शरीर ओर भाव-दर्शक मुख-मुद्रा में आकर्षण 
है। ये रूखे स्वभाव के नहीं बह तुरन्त ही कहा जा सकता है । ये बुद्धि-प्रधान 
होंगे या भावना-परधान यह कठिन प्रश्न है, पर न गांधीशी का शिप्य केबल 
चुद्धि-प्रधान मनुष्य ही हो सकता है। शुप्क दुद्धि की कठोर छाप ने 
इन्हें विकृत नहीं किया ओर इनकी भावना अनुभव करने की शक्ति 
को बुद्धि ने कुठित नहीं किया । 


. रेखाचित्र 


गांधीजी की पूजा की जा सकती है, पर भहादेवभाई तो मित्र हो 
जायें तभी अच्छा लगे । 

ये 5८7४४४ए७ ( भावुक ) बहुत हैं। स्मरण-शक्ति इनकी सरस 
है ज्ञान के'लिए ये अथक परिश्रम कर सकते हैं | इनके साहित्य-सजन ९ 
में एक प्रकार की मोहकता है, पर अधिकतर ऐसा लगता है, ये शअ्रमीर | 
बनने के लिए पैदा हुए हों । 

अपनी रसिकता पर ये विरक्ति का अवशुठन डालने का खूब अयत्न' 
करते हैं। महादेवभाई शुष्क तत्वशानी हों इसकी अपेक्षा ऐसे ही रहें, 
क्या यह अधिक अच्छा नहीं १ 

देश के लिए इनकी आत्मा सदेव जलती रहती *“है। परिस्थिति केः 
अनुकूल अपने को मोड़ देने को तथा कार्य करने की शक्ति इनमें है । 

श्री मशिलाल नभ्रुभाई के उपन्यास के पात्र शुलाबसिंह से ये कुछ- 
कुछ मिलते हैं। संभव है, यह समता बहुत दूर की हो। ये मत्त्वेन्द्र होः 
सके तो इन्हें लाभ होगा--संसार को क्या ! इनके विनोद में शांति अधिक 4 
है। योगी होना इनका आदर्श होगा । गांधीजी की तरह ये बिलकुल तटस्थ 
नहीं हैं | विश्व के प्रति जिस प्रकार विचार करते हूँ उसी प्रकार अपने. 
प्रति भी सोचते हैं । इनमें सुरुचि है। रस, भाव और मावनाएँ मी हैं। 
सुन्दरता की परख करनेवाला मन और दृष्टि भी है । 

इनके चरित्र में एक प्रकार का गौरव है। .अंतरात्मा की ये रक्षा 
कर सकते हैं। यदि ये जीवन के मोह में पड़े होते तो विजय इनको अवश्य 
खोजती हुई आती । 

देश-यजञ्ञ की बलिवेदी पर भारत माँ के ऐसे कितने ही सुपुत्र पढ़े हैँ | 
क्त्तीस लक्षणों से युक्त पुरुषों के बिना बलिदान सफल नहीं होता। स्वतं- 
बता देवी का खप्पर जत्र ऐसे लक्ष॑णवाले पुरुषों - से भरा जायगा तव भी: 
क्या वह ग्रसन्नः नहीं होगी ? । 


बल, 


श्री इंदुलाल यांज्ञिक 


4० मामा... 





इंदुभाई से परिचित हुए. तो वर्षों हो गये। बहुत नहीं, थोढ़े ही; 
पर ये थोड़े मी थोड़े नहीं लगते । 
इंदुभाई श्रर्थात्‌ ट्रेन की गति, इंदुभाई अ्र्यात्‌ बालक की डच्छ 
खलता, इंदुभाई अर्थात्‌ फ़ीज का सिपाही | 
इंदुमाई में ऋषि-मुनियों का-सा संयम नहीं पर थोद्ा का-सा निम्नह 
है | इनकी शक्तिशाली देह में बालक की आत्मा निवास करती है और 
बालक की-सी निर्दोपता भी है। त्रालक ही इनके प्रिय मित्र हैं। अलक 
की तरह इन्हें भी नवीन कार्य तथा नये-नये मनुष्यों के साथ मिलने-जुलने 
के अवसर पाना श्रच्छा लगता है। बालक की-सी अ्रत्यिरता भी इनमें 
है। ये भी तो अनन्त के प्रांगण में खेलते हए बालक ही हैं न ? 
देश-सेवा का असिधाराजत इन्होंने ले लिया है। हनुमान की तरह 
नके हृदय के आन्तरिक भाग में देश शब्द ही खुदा होगा। देश-कार्य 
के लिए. इनका सा अ्रयक परिश्रम थोड़े ही लोग कर सकते हैं । य्ः 
लिए इन्होंने फकीरी स्वीकार कर ली है। काम करते समय मे ये भूख, 
प्यास ओर आराम की ओर नहीं देखते । कितनी ही बार इनकी कप- 
कती हुई पलकों ने निद्रा छुन्दरी की प्राय ना भी डुकरा दी होगी। 
ये लेखक हैं, पर इनकी लेखन-्ृत्ति को दूसरे कामों के सामने जितना 
चाहिए. उतना अवकाश नहीं मिलता । कल्पना के पंख्ों पर थे दूर उद़ 
परन्तु बहत-सी समितियों तथा दफ्तरों की फाइलें इन्हें द््नहीं 
पर्याय 


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देती | फिर भी कार्य के पिंजरे में बंद इनकी रसबृत्ति बहों भी पंस्ा ५ 
फड़ाकर अपना अस्तित्व प्रदर्शित किये पिना नहीं रहती। 


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रेखाचित्र 


किन्तु इन्हें व्यवहार-कुशल नहीं कहा जा सकता। व्यवहार की बात ये 
जानते ही नहीं, यह भी कहें तो कुछ अंशों में ठीक है। कभी-कमी ये 
शिक्षचार की आवश्यकता स्वीकार नहीं करते | व्यवहार में इनका रूखा- 
पन कइयों को बुरा लगता होगा। 
केवल स्वार्थ-त्याग और देश-सेवा मानव को जन-समाज की सामान्य भूमि 
से बहुत ऊपर ले जाती है, पर महान्‌ बनना हो तो इतना ही कस नहीं । 
जिस देश और समाज का जो मनुष्य कार्य करता हो उसके शिशचार 
का वह पालन न करे अथवा उसकी उपेक्षा करे, तो उसकी सेवा प्रभावो- 
च्यादक नहीं होती । उसके शुद्ध हेतुओं पर भी संसार विश्वास नहीं करता। 


मित्र के दुव्यंवहार पर यदि प्रमाव डालना हो दा उसकी भूलों की कठोर ' 


आलोचना करते हुए भी दूसरी सत्र बातों में उसके अनुकूल ही रहना 
चाहिए | इस रीति से मनुष्य जितना प्रभाव डाल सकता है उतना किसी 
दूसरी तरह से नहीं | समाज पर भी यही नियम लायू होता है। 
स्वजनों के बन्‍्धन तो इन्होंने कब के तोड़ डाले हैं। स्नेह के वन्‍्धन 
भी अजिक नहीं रखते | परिहार ओर स्लियों का सहवास यदि इन्हें 
पिला होता तो इनके स्वभाव में बहुत से सुन्दर तत्त्वों का विकास हो 
सकता था । 
ह्लित्रें से चिढ़कर ये भागते नहीं | बहुत कुछ अंशों में ज्त्रियों में ये 
मतृभात्र की प्रतिष्ठा करते हैं | लड़कियों से बहिन का सम्बन्ध पाकर 
अपने को कृतार्थ सममते हैं । पर रखते हैं सब से दूर का ही सम्बन्ध | 
| स्नेहमयी माँ का स्नेह इनमें ज्वार ला देता, वहिल की. ग्रेममरी बातें इनमें 
उत्साह प्रेरित करती, पत्नी की सहृदयता और प्रेम इनके छूृदय-सागर 
से अमृत की सृष्टि करता ओर इनके अंतर के तृफान को शांत कर देता | 
बना स्तलियों के इनके जीवन में तथा कारये में अमाव ही रहेगा । 


बाबू ज्षितिमोहन सेन 





अहमदाबाद की साहित्य-परिंपद में कविवर टेगोर के साथ आये हुए 
शांति निकेतन के दो अध्यापकों को उस परिपद में उपस्थित बहुत से 
व्यक्ति जानते होंगे। घुँघराजे, बंगाली फैशन के बाल और आवश्यकता 
से अ्रधिक स्थूल शरीर वाले, उनमें से एक थ्रे--बायू ज्षितिमोइन सेन | 

बाबू ज्षित्िमोहन से मेरा परिचय श्री करुणाशंकर जो की कृपा से ' 
छुआ । वे फिर जब दूसरी बार अहमदाआाद आये तब भी-मिल्ले । इतने 
संक्षिम परिचय में भी इनके स्वभाव की एक से अधिक ज्ातों के अध्ययन 
करने का सोमाग्य मुझे आ्राज प्राप्त हुआ | 

इनके विषय में मेरे स्मरण-पठ पर इनका एक चित्र बहुत सुन्दर 
है | इसमें इनके अत्यन्त विनोदी और आनंदी स्वभाव का सरस दिग्दर्शन 
मिलता है। कथानकों द्वारा विनोद से भरपूर उपदेशों का पात्र ये हमारे 
सामने रख देते हैं और हम इच्छा करें कि इससे पहले ही पी लिया 
जाता है। इस समय इनका व्यक्तित्व प्रभावशाली की अपेन्षा आकर्षक 
अधिक लगता है | 

परन्तु इन्होंने ही कहा था उसके अनुसार ये एक अह के बहुत समीप 
पहुँच गये हैं। ओर इसी कारण ये दूसरे तेजस्दी अहों का तेज उनके 
पूर्ण स्वरूप में नहीं देख सकते । इनकी मात, इनके विचार, इनके उदा- 
हरण ये सब टेगोरमय हैं। कविवर टैगोर ने ऐसी कितनी आउवृत्तियाँ 
उत्पन्न की होंगी ! 

अहमदाबाद में भी बाबू ज्षिप्तमोइन ने कितने ही भक्त-मंडल बना 

अीजमलथ 4 छ--- 


रेखाचित्र 


लिये थे। इनकी बातचीत करने की शक्ति संस्कारी तथा सम्य मनुष्य 
को आकर्षित करनेवाली थी तथा इनके योग्य थी। ज्यापार-कुशल 
अहमदाबाद में कुशल वार्तालाप करनेवालों का तो अ्माव है ही। दूसरे 
प्रान्तों में जितने सरस वातोलाप करनेवालों से मिलने का अवसर मिलता - 
है वैसा अहमदाबाद में कदाचित्‌ ही मिलता हो। दूसरे प्रान्तों में ऐसे 
मनुष्य अपवाद-स्वरूप या अपूर्व नहीं समके जाते, परन्तु राजनगर के 
लिए नवीन ही हैं । 

इनकी सुकोमल छृदय-इत्ति को आवश्यकता से कुछ अधिक दाइटा 
किये हुए सितार के तार सदश कह्द सकते हैं । 

सबसे सुन्दर चित्रों को ही अपने संग्रह-स्थान में सुरक्षित रखा जाता 
है। बहुत से चित्र कला की दृश्टि से पूर्ण होने पर भी वे हमें अच्छे नहीं 
लगते । मानब-स्वभात्र भी ऐसा ही है। इसमें विविधता के दर्शन किये 
जा सकते हैँ । क्षिति बाबू का परिचत्र बहुत सक्षिम होने के कारण इनके 
विष्रय में सुन्द्र संस्मरण भी बहुत थोड़े ही हैं। फिर इनके साथ न्याय ,: 
“तो किस प्रकार किया जा सकता है १ 


श्री करुणाशंकर मास्टर 





श्री करणाशंकरजी की उपमा प्रथ्वी के अन्दर बहती हुई सरस्वती 
या शुत्र गंगा से दी जा सकती है। इनका प्रवाह, इनकी गति दाहर दिखाई 
नहीं देती, पर प्रवाह होता है तथा प्रथ्वी के हृदय में समाक्र उसे रस- 
मयी बना देता है । 

श्री कर्णाशंकर भी अपने बहत से मि्न के अन्तर मे प्रवेश 
उनके हृदय को रप्तमब बना देते होंगे। इनकी छोटी-छोटी दिखाई 
वाली मौन सेवाओं ने बहुतों की अन्तरात्मा को शान्ति पहुँचाई होगी । 

श्री कस्णाशंकर गुणग्रादी अधिक हई और सत्पुरु्ण का समागम 
इन्हें अत्यन्त श्िय है । इनकी गुणग्राहक्ता और ओर सत्संग की लालसा 
के कारण ही ये बहुत से साक्षर ओर सत्पुरपों के मित्र बन गये ह। 
भर्त हरि ने कहा दे वैसे ही ये दूसरे के गुणों को पर्वत के समान सममते 
हैं। उनके दोओं को ये राई से भी यक्त्म बनाकर देखते हैं। हमारी 
व्यवहार-बुद्धि को इनमें संतुलन का आभास नहीं हो सकता, पर इनके 
पास ऐसी व्यवहार-बुद्धि का कोई हिसात्र ही नहीं | 

इनकी स्थिति तथा संबोगों की अपेन्षा इनकी भावना बहुत ऊँची 
है | कुटम्ब-वत्सलता इनमें खूत्र हे । सेवा इनका जीवन-मंत्र है। अपने 
हृदय में ये बहतों की समा सकते हैं। 

इनके जेसे शिक्षुक शुजरात म॑ थोड़े ही हूँ । शिक्षण को इन्हनि जीवन 
में औत-प्रोत कर लिया है। शिक्षक होने के लिये ही दनका सजन हुआा 
या, पर गुजरात अभी शिक्षक्रों को पहचानती दी छहों ४ ? एऐसे 

ाक३ कु 


2५ 


रेखाचित्र 


के सुयोग का लाभ उठाने की इसमें तत्यरता ही कहां है ! परिणाम- 
स्वरूप श्री करुणाशंकरजी के पूरे जीवन में उनके शिक्षण का फल: केवल 
भारती? की संस्थापना में ही समाप्त हो जायगा। 


इनके विद्वान मित्रों के समागम में रहनेवाली इनकी मित्रमंडली, खास 


ध्यान देने योग्य है। मुझे तो यह भक्त-मंडली सी अधिक लगती है। 


करुणशंकरजी इनके हृदय-मंदिर में जिन प्रतिमाश्नों की स्थापना करें 
उन सब्रकी उपासना का लाभ इस मंडली को पूरी तरह मिल सकता है। 

बालकों के प्रति इनकी ममता स्वाभाविक ही है। शिक्षण के विषय 
में ये नवीनतम गवेबणा से परिचित होने का सदैव ही प्रयक्ष करते रहते 
हैं। इन्हें थोड़ा लनाशील कहा जा सकता है। समाज की नथोन रचना 
में शिक्षकों का स्थान कहाँ है ! 


का 


श्री वल्लभभाई पटेल 





कोई जन्म से महान्‌ होते हैं तो क्रिसी को परित्यितियाँ महान्‌ इना 
देती हैं।आज के बहुत से नेताश्रों के सम्बन्ध में क्‍या नहीं कहा जा 
सकता ? 

श्रो वल्लमभाई पटेल गुजरात के आधुनिक नेता हैं। महात्मा गांधी 
गुजरात में आये तब्र ये इनके विरोधी थे, ऐसा कहा जाता है | परन्तु 
कुछ कर डालना चाहिए, ऐसा विचार तो बहुत से मनुष्यों के जीवन में 
कभी न कभी आता ही है ओर म्तवत्‌ प्रजा में प्राए-संचार करने वाले 
का विरोध नहीं करना ऐसी भावना इनके दृदय में भी जाशत हुई होगी | 
जब विरोध बृत्ति अधिक ज्ोरदार नहीं होते वो (हिप्नोटिज्म” कान्सा 
असर होता है--गांधीडी का शक्तिशाली आकर्षण इनको इस स्थिति में 
आकर्षित किये बिना नहीं रहा। हो सकता है, उस समय इस काम के 
लिए जीवन अरपंण करने का इनका उद्देश्य न रहा हो | 

बहुधा भले मनुष्यों को जच श्रेष्ठ शिप्प मिल जाते है तो उनका 
कार्य जितना वास्तव भ॑ होता है. उससे कहीं अधिक चमक उठता है। 
परन्तु श्रेष्ठ मनुप्यों को भले शिप्य मिलने से उनका कार्य अच्छा होता 
है पर चमक नहीं सकता | महात्मा गांधी को दूसरी तरह का कहूँ तो थी 
वल्लमभाई क्षमा करेंगे ? 

महात्मा गांधी दोओं की अपेक्षा गुणों को अधिक देखते और परिणाम- 

खरूप उन्होंने दोररेंका परिमाण ठीक-ठीक नहीं देखा। श्री वल्लमभाई 
गुणों की अपेक्षा दोगों के प्रति अधिक सावधान रहते है। पारझाम- 


रेख़ाचित्र 


खरूप इन्हें गुण कम दिखाई देते हैं | इन-दोनों व्यक्तियों का साथ रहा, 
तब तक ठीक-ठीक संतुलन भी बना रहा। महात्माडी के कारावास में 
जाने पर श्री वल्लमभाई ने यह संतुलन खो दिया तब यह कमी इन्हें 
अधिक खटकती होगी। 

इनकी भाषा सीधी, तीखी ओर कयक्षयूर्ण है। पर सुसंस्कृत नहीं ॥ 
कही जा सकती | चाहे कोई इन्हें क्रोधी कहे पर ये विचक्षुण विनोदी 
ही हैं। 

इनमें उद्धतपन है | यह इनका जाति शुण है यही कहा जा सकता 
है। परन्तु इनकी सुनिष्ठा के प्रति शंका नहीं की जा सकती । 

महात्मा गांधी के तेज से ये तेजखी हुए. । महात्माजी के चरण-चिह्ों 
पर चलने से ये नेता हुए । गुजरात के पथ-प्रदर्शक की कुजी अब इनके 
हाथ .में है। किस प्रकार पथ-प्रदर्शन करेंगे यह तो भविष्य ही 
चतायेगा । 

महात्माजी बिना सूना गुजरात इनके बिना और भी सूना हो सकता ड़ 
है। जनता में इनका स्थान इनके प्रति श्रद्धा और अश्द्धा के बीच कूलता 
रहता है। 

अपनी शक्ति के परिमाणानुसार ये काम करने में कभी मी पीछे 
नहीं रहते | पर संसार को किसने जीता है जो ये जीतते ! 

अपने एक साक्षर मित्र के अभिप्राय का यहाँ उल्लेख करती हूँ--- 
बचुत& 48 700 (6 7880 77 >पघ ६76 68 2ए479|6 
70977, ये सर्वोत्तम व्यक्ति नहीं हैं पर इस समय दिखाई पड़ने वाले 
व्यक्तियों में सर्वोत्तम हैं। यह अमिमाय कदाचित्‌ बहुतों को अधिक प्रिय 
न लगे; पर है यथाथे यह कोन नहीं कहदेगा ! 


"05५ 


अध्यापक आनंदरशंकर धुव'. 





यदि हिममुकुण से आच्छादित शिखरों वाले पर्वतराजन हिमालय की 
वाणी होतो, तो विश्व का कोई बालक उससे प्रश्न पूछुने अवश्य जाता-- 
धपर्वतराज ! तुम्हारे शिखरों पर दिन-प्रति-दिन हिम के पतं चढ़ते जाते 
हैं और हिम पिघल कर सरिताओं के रूप में बहता है, तब इस हिम 
का स्वभाव कैसा है ? पिघलता है तो फिर बढ़ता कैसे है! और 
पित्रलता है फिर भी बढ़ता तो है ही |? वालक पर भी गंभीरता के पतन 
' इतने चढ़े होते हैँ कि प्रश्न में निहित मूर्लता को यह नहीं समझता और 
६ देंढ तथा तपस्वी पर्वतराज भी गंभीरता से गर्दन हिलाकर कह दे कि 
. दोनों बातें सत्य हैं। हिममय होना और पिघलना ये दोनों ही प्रकृत सत्य 
हैं| हिम के पं किस प्रकार बनते हैं, इस चर्चा में उस बालक के साथ 
उलमने का या तो पर्ववराज को अवकाश नहीं रहता अथवा उस विषय 
को समझ सके इतनी शक्ति का विकास उस बालक में उन्हें दिखाई नहीं 
देता | वेचारा वालक पर्व॑तराज की अस्पष्टता की अथवा दूध और दही 
में पैर रखनेवाली नीति की फूरियाद करता चला जाता है। पर्वतराज 
बाज्ञक की मूर्गता पर मंद स्मित कर शांत हो जाता है। कुछ ऐसी ही 
स्थिति आनंद्शंकरभाई और जन-समाज की है। 
श्री आनंदभाई की विद्धत्ता ने उन्हें गुजरात में तथा गुजरात के बाहर 
. एक आदरणीय स्थान दिलाया है। विद्यार्थियों के ये पूज्य गुरु हैं । केवल 
हिमालय और बालक जैसे प्रसंगों से बहुत से इन्हें नहीं समक सकते 
यह स्वाभाविक ही है | परस्पर विरोधी मतों पर समान निर्णय देने की 


रेखाचित्र 


इनकी दत्ति पर कितने ही शंका की दृष्टि से देखते होंगे। आधुनिक युग 
प्रचक्षराद का अधिक है। पर अब इनके .लेखों में पहले की अपेक्षा 
अधिक स्पष्टता आने लगी है। 

इनके बातचीत करने का दंग सरस और आकर्षक है, और इसमें 
विविधता अधिक होती है । एक दर्शनशासत्री की-सी निर्विकार दृष्टि से 
देखने की आदत इनमें अधिक है। जीवन के गंभीरतम भावों के मर्म से 
ये पूर्णतया परिचित हैं। पर ऐसे भाव इनमें पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं होते | 

पुस्तकें इनकी प्रिय मित्र हैं--उत्तमलालमाई और नरतसिंहराव तो 
विशेषतय्ा | साधारणतः ये जनता के साथ बहुत अंतर रखते हैं। इनमें 
भावावेश की अपेक्षा प्रभाव अधिक है। इसकी छाप ये मानव हृदय पर 
तुरन्त लगा देते हैं। 

इनकी युस्तकों और लेखों की संपत्ति गुजरात के लिए बहुमूल्य है ॥ 
पर इनसे गुजरात को जो आशा थी वह अ्रभी पूर्ण नहीं हुईं। गुजरात 
को ये इतने भोजन से ही तृप्त नहीं कर सकते | हो, भिन्न-भिन्न प्रकार 
की मिठाइयों का स्वाद इन्होंने खूब चखाया है ! 

सच तो यह है कि ये मध्यस्थ अधिक रहते हैं । इनकी विनोद- 
प्रिववा की कलक बातचीत में आये बिना नहीं रहती । गुजरात में तो 
इनकी अ्रंणी के विद्वान्‌ थोड़े ही हैं । 


ब्््न्न्ब ऐे ककन- 


श्री अरदेशुर खबरदार 





प्रभात का तपस्वी” जब साहित्य? के अंक में पढ़ा तो उसका लिखने 
वाला कौन होगा इस विषय में अपनी छोटी सी मंडली में हमने पुष्कल 
चर्चा की थी । कभी नरसिंहराव तो कभी व० क० ठाकोर ही होंगे, इस 
निर्णय पर हम पहुँचे थे | कितने ही नदीन लेखकों के नाम भी से ये । 
कवि के प्रति पक्तुगत होने के कारण लेखक के जितने भी दोप हो 
सकते थे, .निकाले; पर फिर भी यह कृति बहुत ही अच्छी लगी | परन्तु 
खबरदार का नाम तो यूका ही नहीं | 

इसके बाद फिर शुअर” के कॉंटे चुसे। मद्रास जाने का विचार 
कर रही थी कि एक पत्र में भाई मास्टर ने शुअर” के लुकाहछिपी 
खेलनेवाले लेखक से मिलने की सूचना दी। मैंने फिर उनसे लिखकर 
पूछा कि तुम्हारी राय में 'थुअ्ऋर' का लेखक कौन है ! उन्होंने मेरे अशन 
पर कुछ आश्चर्य प्रदर्शित किया था, यह मुझे याद है | उस कृति का 
यश खबरदार को मिल रहा है, यह समाचार उन्होंने मुझे दिया। 

श्री खबरदार के 'विलासिका? इत्यादि काव्य पद वर्षों हो गये थे । 
कैसी सुन्दर गुजराती लिखते हूँ, पारसी होने पर भी !” यह विकार ऋण 
भर के लिए मन में आया था | फिर भूल मी गई थी। परन्तु प्रमात का 
तपस्वी? और थुअर” कैसे भुलाई जा सकती थी ! 

: इसके बाद दक्षिण से लौट्मे पर नवम्बर मास में मद्रास गई। मैं 
गोविंदभाई के यहाँ ठहरी थी। और गोविंदभाई श्री खबरदार के 
मित्र ठहरे, अतः मिलने-में अधिक प्रयास न करना पड़ा । 

#मरेप्रेललक हक 


रेखाचित्र 


इनको देखने से पहले मैंने इनका एक चित्र अपने मन में बना 
रखा था। एक आनंदी चेद्ध अधिक स्थूल नहीं ऐसा शरीर, गंगा- 
यमुनी बाल और चश्मे के अंदर से दिखाई देते गंभीर, तीखे पर सौजन्य- 
पूर्ण वाले नेत्र | खबरदार तो ऐसे ही हो सकते हैं। खबरदार की मूर्ति 
इसके अतिरिक्त कोई दूसरी मस्तिष्क में आती ही न थी । हु 

एक दिन सवेरे हम इनके यहाँ मिलने गए। थी खबरदार के 
कल्पित चित्र के स्थान पर जब एक उऊँची-पूरी प्रचंड कही जा सके 
ऐसी--इदव्ब के एक भी चिह्न से रहित श्राकृति देखी तो क्षण भर के 
लियें में दरवाजे पर ही ठिठक गई | श्री खबरदार से मिलने की कितनी 
तैयारी की थी ! गोविंदभाई के पास से साहित्य” के वे अंक निक- 
लवाकर एक वार फिर पढ़ गई थी, थुअर' को फिर एक बार देख लिया 
था, और गोविंद भाई के साथ इनके विषय में चर्चा भी कर ली थी) 
भारत की ८ कार! जो पहले नहीं पढ़ी थी वह भी तुरन्त पूरी कर डाली | 
पर यह सव खबरदार के लिए. नहीं। ये तैयारियाँ तो किसी दूसरे 
व्यक्ति को सामने रखकर ही हुई थीं । 

ज्ञोभ अधिक देर नहीं टिक सका | परन्तु उसका प्रभाव कुछ-कुछ बना 
अवश्य रहा । साहित्य” में निकलनेवाली कवि की समालोचना मैंने नहीं 
पढ़ी थी, अतः नये-पुराने, अधिकतर इनकी आलोचना में आये हुए 
प्रश्न पूछुकर उन्हें थकाया | बड़े पेय के साथ उन्होंने वात की । गुजराती 
समालोचकों का छिछुलापन, विरोधी काव्य-साहित्य, अंग्रेजी कवियों का 
- अमिप्राय, नानालाल और नरसिंहराब, ताल और थाप, तथा ऐसे ही 
५ और दूसरे विषयों पर उन्होंने प्रकाश डाला | गोविंदभाई को जल्दी होने 
5 के कारण अंत में हमने विदा ली--संघ्या को घूमने चलने का 
निश्चय करके। - | 

मेरी वार्तालाप करने की शक्ति से कदांचित्‌ ही कोई मोहित हो और 
उसमें भी आज ! “उन वेचारों ने पता नहीं कैसे (000077र्श 7गंणत की 


श्री अरदेशर खबरंदार 


आशा रखी होगे १” में मन ही मन हँसी । 

शाम को हम फिर गये | खबरदार को सामुद्रिक शास््र का भी अच्छा 
शान है | इस विषय में भी वहुत सी बातें हुई । काव्य-चर्चा में साम॒द्रिक 
प्रश्न पूछनेवालों के विषय में उन्होंने क्या सोचा होगा ! अपने कितने ही 
अप्रकाशित सुन्दर काव्य भी उन्होंने पढ़े | 

दूसरे दिन में वहों से जानेवाली थी। खबरदार उस दिन मिलने 
आये | लगभग तीन तंटे बैठे होंगे। उनकी अंग्रेजी कविताएँ. उनके मुख 
से सुनीं। उनकी चर्चा थी तो बहुत सुन्दर पर अभी सक्‍करणपारे बनाने 
हैँ, यह भाव क्षण क्षण में हो जाता था। 

यह था श्री खबरदार के साथ मेरा परिचय ! इन जैसे व्यक्ति के 
विषय में केवल इतने से परिचय से ही कुछ लिखना क्या साहस नहीं है ! 

» खबरदार की आकृति को ग्राम्य विशेषण दूँ तो--दैत्याकार कह 
सकती हूँ। पर यह विशेषण देते ही तुरन्त ख्याल आता है कि उनमें 
इतनी उम्रता नहीं है । उनके विशाल नेत्र कदाचित्‌ अंतर में जलते हों 
ऐसा हमें लगता है और उनमें मानव स्वभाव का अध्ययन तथा 
मानवता--दोनों के दशन होते हैं। उनके भव्य ललाद पर चिंतन की 
छाप है। 

उनकी स्मरणशक्ति बहुत तीक्षण है | उनका अध्ययन विस्तृत और 
विविध है। उनकी कविता उनकी भावनाओं का सहज परिणाम है। 
उन्हें इसमें श्रम नहीं करना पड़ता और उसमें निहित सहानुभूति 
स्पष्ट दिखाई दे जाती है। 
.. उनके साथ वार्तालाप करते समय कुछ अस्वस्थता सी जान पड़ती 
है | उसमें मी जब दुबारा प्रश्न करना पड़े तब तो और भी । 

सामृद्रिक शास्त्र में ये पारंगत माने जाते हैं। योगविद्या से उन्हें 
प्रेम है और पहले जब ये दमण में थे तो मानसिक वल से रोग अच्छे 
करते थे । 

रे ४---- 


र्ईः 


रेखांचित्र - 


अपने निजी अभिप्रायों पर ये बहुत जोर देते हैं। इनमें अहंभाव 
आवश्यकता से अधिक है। परन्तु मानव स्वभाव का यह एक विशेष 
गुण है। कुछ अंशों में यह क्षम्य भी कहा जा सकता है। 

इन्होंने गुजरात की सेवा की हैं। पर इनकी शक्तियाँ के परिमाणा- 
नुसार वह कुछ कम ही है। इस प्रकार इन्होंने गुजरात के साथ अथवा 
अपने साथ अन्याय ही किया है क्या यह नहीं कहा जा सकता १ कदाचित्‌ 
गुजरात की कलह-प्रियता से दूर मद्रास के शांत जीवन में गुजरात कम 
याद आता हो ! 


कस्तुर वा गांधी 





रामावण की सीता की और मद्यभारत की द्रीयदी की कथा भारतवर्ष 
के एक छोर से दूसरे छोर तक किस आर्य रह में शत न होगी ! गौरी 
और सावित्री का त्ृत रखनेवाली कन्यायें बचपन से ही इन्हें जानती हैं। 
सुख-दुःख में पति के साथ सह्धर्माचार के सूत्र मंत्र रूप में वालाझों के 
कानों में फँक़ दिये जाते हैं। त्व० करतुर वा का जीवन ऐसे ही सह- 
धर्माचार के साक्षी रूप में हमारे सामने है । 

. करत वा में ज्ञान का आईवर या वाकपढ॒ता नहीं थी। विद्वत्ता 
ग्रस्त करने का कभी इन्होंने प्रयल नहीं किया । महात्माजी के पत्नी पद का 
गये इनके मुख पर कमी भी आमासित नहीं हुआ | गांधीजी के जयनाद 
सुनते-सुनते भी ये सीधी-सादी कर्तुर वा ही रहीं। प्रतिकूल परिस्थितियों 
में भी इनकी पति-भक्ति विचलित नहीं हुईं। उनकी विजय तथा गौरव 
में इन्होंगे आधा हिस्सा कभी भी नहीं माँगा । गांधीजी की महानुभावता 
इनकी समम में न आने पर भी इन्होंने केवल अचल श्रद्धा से ही उनका 
अनुसरण किया है। फरियादों की गर्म उसाँसों से इन्होंने अपने पति को 
कभी भी नहीं कुलसाया । 

बिना विद्धत्ता के ही इन्होंने बापू का जीवन-कार्य समझ लिया था, 
और बापू केजेल में रहने पर भी से सरल माव से इनके ृदय में जो 
कुछ था करती रही हैं । 

कस्तुर वा ने आज तक कुछ कम त्याग नहीं किया । वचपन सेद्दी 
इढ्‌ हुई कितनी ही धारणाओं को तिलांजलि देते हुए इन्हें बड़ा भारी 


७.७ ८ 


रेखाचित्र 


मानसिक कष्ट सहन करना पड़ा होगा। दक्षिण अफ्रीका के महान युद्ध में 
सर्वस्व होम करते हुए भी इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। भारतवर्ष में 
चलनेवाले आधुनिक महान्‌ आंदोलन में पति और पुत्रों को जेल में विदा 
करते हुए भी इन्होंने अपार पैय॑ रखा है। 

कस्तुर वा अर्थात्‌ सौम्पता की मूर्ति | बापू के संन्यास आश्रए सहश 
गृहस्थ संसार का भार इन्होंने अत्यन्त घेर से उठाया | ग्रह संसार के छोटे- 
मोटे काम करते हुए इन्होंने श्रम को तनिक मी नहीं गिना। इनकी 
सादगी के लिए तो क्या कहेँ। सीधी-सादी मिसेज गांधी की पदों से तो 
रानियाँ भी ईर्ष्या कर सकती हैं। वापू की तरह कर्तुरघा की ओर मी 
लोगों ने सदैव पूज्य भाव ही प्रदर्शित किया है। वह इनकी विद्या या 
ज्ञान पर मुग्ध होकर या इनके कार्य शक्ति पर मोहित होकर नहीं, बल्कि 
स्वामी की छाया सदश पत्नी की अविचल श्रद्धा तथा आत्म-समर्पण के 
कारण ही। 


केवल एक ही शुण की सफलता से जीवन कितना महान हो श्‌ 


सकता है। 


>> रद के ज+ 


श्रीमती सरोजनी नायडू 





भारतवर्ष के शिक्षित वर्ग में श्रोमती सरोजिनी देवी का नाम न 
सुना हो ऐसे बहुत थोड़े व्यक्ति होंगे । पूज्य गांधी जी ने इनको बुलबुल” 
की उपाधि दी | स्वयं घारण किये हुए उपनाम में तो ये मोहन की बौँसुरी 
बनी हैं। मीराबाई होने से भी ये नहीं चूकीं। इनके कंठ से निकलती 
हुई अस्खलित वाग्यारा पर जनता सुम्प हो गई थी। भारत में किसी भी 
भारतीय नारी ने इनका सा स्थान प्राप्त नहीं किया | 

इनके ग्रहों के सुप्रोग से इनकी गिनती सदैव भारत के बड़े 
आदमियों के साथ होती है। गोखले युग में ये उनकी मित्र थीं। जिन्ना 
युग में ये उनकी भी परम मित्र थीं, गांधी युग में गांधीजी की भी हो 
सकी हैं। सभी थुगों के नक्षत्र मंडल में इनका स्थान सदेव अन्षुएण रहा 
है। और बौंसुरी सहश मधुर स्वर से ये देश-कार्य में अपना सहयोग 
देती रहीं । ह 

कलापी के पंखों के चित्र-विचित्र रंगों सदश ये आकर्षक थीं। सत्य 
के समय अतीव मनोहर लगने वाली कलापी की कला की तरह मुग्ध 
कर देती | इनका विनोद परिस्थितियों के अनुकूल नवीन खरूप धारण 
कर लेता था | अपनी चाल-दाल में, रहन-सहन में इन्होंने कवित्वमय 
होने का अधिक प्रयक्ञ किया | 

देवी सरोजिनी सत्री कवि यी और कविता सुन्दर लिख सकती थीं।' 
अंग्रेज़ी भाग पर इनका अधिकार सबको चकित कर देता था | देश- 
सेवा के सामने इन्होंने पारिवारिक सुख की लालसा नहीं रखी। इनके: 

नजरें 


रेखाचित्र 


व्यवहार से, इनका स्थान कहाँ है यह ये जानती थीं, यह तुरन्त जाना 
जा सकता है | न 
दर्य-यूजा की इनमें तीज्र उत्कंठा थी और शोभा के प्रति रुचि ! 

बहुमतवाद की समय क होने पर भी इनमें अमीरों की-सी अहंभावना 
पूर्ण रूप से थी। मनुष्यों के सामान्य विकारों से इन्हें रहित नहीं कहा जा 
सकता। जिस प्रकार स्थूल शरीर के अवयव भी स्थूल होते हैं, उसी प्रकार 
क्या बड़े आइमियों के ढुगुण या सदूशुण भी बड़े नहीं हो सकते ! 

जहाँ शिशचार की परख होती हो वहाँ ये सुन्दर और सरस शिश्- 
चार प्रदर्शित करतीं । जहाँ छुय की परख हो वहाँ छेयदार बनकर रहतीं, 
परन्तु अंधे के आगे दर्पण की तरह उनका व्यर्थ उपयोग नहीं 
करतो थीं। 

ये व्यवहार-दक्ष और कार्य-निपुरा थीं | चात्॒य का उपयोग क्षण॒-क्ण 
में करतीं | लोक-भाषा में कहें दो “पहुँची हुई? थीं। ह ह 

दूर मंदिर में बजते हुए घंगें की ध्वनि की तरह इनके कंठ की खर- 
लहरी ने तथा साथ-साथ बहते हुए इनफे शब्द-प्रवाह ने बहुठों को मुग्ध 
किया होगा। परन्तु अब इनका स्वर पहले जैसा मधुर नहीं रह गया था | 

इनके प्रत्यक्ष और परोक्ष उिचारों में महान्‌ अंतर था। कभी-कभी 
निर्जीव बातचीत में विचार भी निर्जीअ ही आते होंगे। 


कि 


सो० सरला देवी अंबालाल साराभाई 





आये जगत्‌ में स्ली-जीवन का आदर्श णहिणी है| कुमारिका सरखती 
या संन्यातिती मीरा का कीर्ति-गान संसार करता अवश्य है, पर अपवाद 
रूप में । इस आदर्श की सिद्धि के लिए हिंदू-संसार की प्रयोगशाला मं 
नित्य नये प्रयोग होते आये हैँ ओर होते रहते हैँ । उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व 
का ध्यान हमारे संसार को नहीं है यह बात नहीं, परन्तु गोंण रूप मं 
है, इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा। इनके सहचार का लोभ आर्य 
संसार न ओर मी अधिक रखा है | 
सरला बहिन इस आदश के बहुत पास दिखाई देती हैँ । श्री अंबालाल 
भाई को बग्रहसंसार के चलाने में और वाह्य जयत्‌ की उपाधियों को 
तुच्छु बनाने म॑ सरला वहिन जैसी पत्नी की मदद उनके भाग्य की 
उत्कर्पता का ही सूचक है। अपने भर्ता की ये प्रियतमा भार्या हैं, अपने 
बालकों की ये प्यारी मीठी माँ हैं और अपने मित्रों के जीवन में रस 
उड़ेलनेवाली ये आदर्श आर्या हैं। 
हमारे यहां बालकों के जीवन के प्रति अपने कर्तव्य का पूर्ण रूप से व्यान 
रखनेवाले सरला बहिन और अंब्रालालमाई जैसे थोड़े ही माता-पिता 
होंगे । इनके सुशील, निरोगी और सुन्दर बालक किसी को भी मुग्ध 
कर लें, ऐसे हैँ । धनी लोग तो बहुत हैं परन्ठ उनके बालकों को 
मध्यम वर्ग के बालकों जितनी भी शिक्षा नहीं मिल पाती | उन्हें सभ्य और 
सुसंस्क्ृत चनाना अधिक महत्वपूर्ण बात नहीं मानी जाती । धन-वैमब में 
पले हुए ये संस्कारहीन बालक जंगल के पौधों की तरह बढ़ते हैं और 


न्प्पे 


रेखाचित्र 


सूख जाते हैं। सरला बहिन के बालक अपनी माँ के श्रम और पिता की 
सावधानी के सुन्दर परिणाम है | 

सरला बहिन इनके गृह राज्य की सम्राजी हैँ। इनकी सुब्यवस्था 
करने की तथा रक्षा करने की शक्ति, मित्रों के प्रति ममता, अपरिचित 
व्यक्ियों के साथ स्नेहमय व्यवहार किसीको भी आकर्षित करने जैसे 
शुण हैं। इनके मीठे--अम्गत वर्षा करनेवाले--नेन्र इनके प्रति सहज में 
सम्मानभावना उत्पन्न कर देते हैं | व्यवस्था की रचना करनेवाले, शांति 
की स्थापना करने वाले और सुवास का प्रसार करनेत्ञाले न्ली-जीवन का 
आदशी इन्होंने वहुत अंशों में सिद्ध कर दिया है। अ्रृव तारा की तरह 
इनका जीवन बहुतों को दिशासचक वन सकता है | 


+. ना >हफ वकथना 


>+३ै४+-- 


श्रीमती अतिया बेगम 





गाढ़ रात्रि में विद्य तू की चम्क कितनी प्रिय लगती है | उसकी 
क्षशक चमक विस्मग्र पैदा करनेवाली होती है, परन्तु वह रजनी के 
अंधकार को और भी प्रगाढ बना देती है| 

श्रीमती अतिया बेगम श्रर्थात्‌ चमकती हुई एक विद्य तू-रेखा ! इनकी 
आँखों में चमक, इनकी वाणी में चमक, इनके व्यवहार में भी चमक 
है | इस चमक में क्षुण भर की कोमलता भी अवश्य हे । 

अतिया वेगम वाग्जाल का प्रसार बढ़े सुन्दर ढंग से करती हैं। 

* लोग इनके वचनाम्रत-प्रवाह को विस्मय्रपूर्वक देखते रह जाते हैं। इस 

प्रवाह में दूर-दूर की बहुत सी वस्तुएँ तैरती चली आती हैं । 

अपने मस्तिप्क के संग्रह स्थान में ये वहुत से विस्मयों को एकत्रित 
करती रहती हैं ओर अवसर पर प्रसंगानुकूल उनका प्रदर्शन भी खूब 
आउम्बरपूर्वक करती हँ। संगीत इनका प्रिय विप्रय है। साहित्य में भी 
इनकी प्रवीणता का पार नहीं। दर्शनशास्त्र मं तो ये अपने को अहितोय 
ही समझती होंगी। प्रजा-जीबन में ( जब ये माग लेती थीं तब ) अपने 
को आधार रूप ही मानती होंगी । 

एक ही मुख से ये अनेक प्रकार के सूक्त पद सकती हैं। इनकी 
सोंदर्य-प्रितता इनकी सादगी के आउडम्बर से हँक नहीं पाती अवसर- 
अवसर पर ये देशी, विदेशी तथा स्वदेशी इस प्रकार अनेक रूपों से 
चहुरूपी दिखाई देदी हैं। इनके व्यंग्य से कदाचित्‌ ही कोई बच पाता हो | 

संसार में सदैव छोटे आदमियों के कार्या से बड़े आदमी यश पाते 


रखाचित्र 


हैं और पायेंगे | समुद्र की मत्स्य-सष्टि अथवा वायुमंडल में जीवित जन्तु- 
स॒ष्टि से हम मनुष्य भी किसी प्रकार कम नहीं हैं। अ्रन्तर केवल 
प्रमाण का है। 

इनके नाम ने इनके कार्यों तथा गुणों को और भी महान्‌ कर दिया 
है| किसी राज में या राजतंत्र में यदि ये होतीं तो इन्हें वहाँ इनके 
अनुकूल ज्ञेत्र मिलता । इस क्षेत्र में इनकी अधिक ग्रतिष् होती और 
उसमें ये बहुत उन्नति कर सकती थीं, यह निस्संदेह है। इन्होंने केवल 
एक ही भूल की हे--सीघे मत॒ष्य की सीधी लड़ाई में भाग लेने की । 

केवल श्र,भंग या स्मित से ही कार्य सिद्ध करने की शक्ति इनमें है | 
मुख से भाव-परिवर्तन में भी इनकी कुशलता छिंपी नहीं रहती । इनके 
विषय में कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि ये महत्वा- 
कांछ्षिशी हैं । 

इनमें स्फूर्ति है | इनसे कुछ मी किये बिना शांति से बैठा नहीं जाता । 
इनके साथ वार्तालाप करते हुए, किसी को बोलने का भ्रवसर बहुत ही - 
कम मिल पाता है। सब विययों में निष्णात होने का इनका दावा है। 
अपने अतिरिक्त दूसरे की बुद्धि में इन्हें अधिक श्रद्धा नहीं होती | इनके 
देशाय्न ने इनकी बुद्धि को और भी चमका दिया है । 

इब्सन की “४८एछ ए०गराक्मा” भी पूर्णतया इनके जैसी नहीं है !. 


आम ठ्े छ स्व 


सो० विजयागोरी कानुगा 





देश-कार्य में उलभे हुए कितने ही स्त्री-पुरुष आजकल बहुत सुन्दर 
कार्य कर रहे हूँ | यदि इन्हें अवसर न मिला होता तो ये जहाँ ये वहाँ 
से एक पग भी आगे न बढ़ सकते थे। जंगल में खिल कर मुर्का जाने 
याले सुगंधित पुप्पों की तरह उनकी सुगंधि से संसार अनभमिन्न ही रह 
जाता। कितनी सरिताओं का जल व्यर्थ वह जाता है। कितनी स्त्रियों 
के जीवन उनके घर की संकुचित दीवारों के बीच समाप्त हो जाते ह। 
केवल उन्हें अवसर ही मिला होता ! 

सौ० नन्दुब॒हिन आज इसी प्रकार के उदाहरण रूप मं हमारे सामने 
हैं। एक समय अहमदाबाद की 'बरघुसनी ग्रहिणी! की उपमा इनमें 
साथ क होती होगी। व्यवहार में इनकी कुशलता के विपय में दो मत 
नहीं हो सकते। आज ये देश-कार्य में संलम् हो अपनी व्यवध्या-शक्ति 
का लाभ अहमदाबाद के ऋ्ली-मंडल की संस्थापना करने में दे रही हैं । 
एक वार कार्य आरम्भ करने पर उसे पार उतारने की लगन इनमें त्रहुत 
है।ये आरम्म शूरा' नहीं। इनकी शक्तियाँ मर्यादित हो सकती हूं, 
यह माना, परन्तु एक वार आरम्भ करने पर ये कदाचित्‌ ही थकती हों | 

कितने ही कामों में दूल्हे की बुआ वनकर फिरनेवाली कितनी ही 
बहिनों जैसा अविवेक या अविनय इनमें नहीं है | "मैंने बहुत कुछ कर 
दिया है? यह सोच कर ये कभी फूल नहीं उठती | 

इनकी कार्य-तत्यरता, इनकी सेवा-परायणता और चेयशीलता तीज 
प्रभाव डालनेवाली हैं। अपने कार्या से ही इन्होंने अपना सिक्का जमा 
लिया है । 


बन ्ृ ध--- 


श्रीमती अनसूया बहिन 





भारतवर्त्र क राजकीय प्रकरण में संलम .सभी व्यक्ति मजदरों की 
माता! समफी जानेवाली अनसया बहिन के नाम से कदाचित्‌ ही 
अपरिचित होंगे। इनकी एक संक्षित रुप-रेखा यहाँ देना अनुचित 
न होगा | 

श्रीमती अनसूया वहिन एक धनी परिवार की पृत्री हैं । देखने में 
जाज्वल्यमान तथा धनाब्यता के सभी गुणों से युक्त हैं । 

इनके प्रारंभिक जीवन में त्री-जीवन की पराधीनता इन्हें बहुत खली 
होगी | इनकी उम्र औ्ोर स्वतंत्र प्रकृति को चाहे सोने का भी क्‍यों न हो, 
पर पिंजरे में बंद पक्की का-्सा जीवन बहुत नहीं रुचा होगा ।श्रव तो 
इन्होंने सेवा की »ड्ुला खीकार कर ली है। 

किसी समय डाक्टरी का अध्ययन करने ये यूरोप गई थीं, पर 
दुर्भाग्यवश उसे समाप्त नहीं कर सकी । परत्तु वहाँ दो वर्ष रहने से वहां 
की स्त्रियों की कार्य-शक्ति का ग्रमाव इन पर पड़ा | 

अनयूया बहिन में इच्छा-शक्ति को अपेक्षा व्यवस्था-शक्ति कम है। 
परन्तु इनके मित्र इनकी इस अपूर्णता को प्रकद नहीं होने देते । इन्द्रधनुष 
सहश अनेक कार्य ल्‍पी रज्लों से रक्षित इनका जीवन बहुत आकर्षक है| 
बहत से कामों में ये रस लेने का प्रयत्ल करती हैं | परन्तु इनका उत्साह 
चिरस्थायी नहीं होता | ये अपने चमत्कार से चकार्चोंध कर सकती हैं; पर 
स्थिर नहीं रह सकतीं । 

स्री-हृदय के स्वाभाविक भाव भी इनमें होंगे पर इनका वाह्य दर्शन 
कभी-कभी होता होगा | इनके पास साधन हैं ओर साधनों के परिणाम- 

>++-हैप्प-+- 


मर्द 





श्रीमती अनसूया बहिन 


स्वरूप शक्ति है। इनमें ह्ली के गुणों की अपेक्षा पुरुष के गुण अधिक 
हैं। मित्र रूप में कदाचित्‌ ये अधिक कोमल हो सकती होंगी, पर स््ियों 
के साथ इनकी मैत्री भाग्य से ही हो पाती है। स्लरी-जीवन में ये उतनी ही 
रुचि रखती हैं जितनी इनके कार्य को अपेद्धित हो । 

महाध्माजी की प्रयम स्त्री-अनुयायी की पदवी ने इन्हें दो वस्तुएँ दी 
इ---प्रतिष्ठा तथा कुछ अंश में स्थिरता । इनका साहस सराहनीय है। 

गुजराती स्त्री वर्ग में से राजनीति की ओर झ्ुुकने वाली ये सर्वप्रथम 
महिला थीं | इससे पहले इस दिशा में स्त्रियों के प्रयथल अवकाश का 
सठुपयोग या प्रकाश में आने के साधन रूप ही थे। परन्तु इन्होंने जितना 
और जो कुछ किया है उसके लिए हमें उपकार मानना ही चाहिए, | 

गुजराती स्लियों को यदि साधन मिलें और उनकी महत्वाकांक्षाओं 
को पोषित किया जाय तो गुजरात कितनी खतन्त्र स्त्रियों को उत्पन्न कर 


से 


सकता है 


'सो० विद्यागोरी नीलकंठ 
ओर 
-सो० शारदा बहिन मेहता 








+ 


कितने ही व्यक्तियों को देखकर अपनी पुरानी कहावत याद झा जाती 
ह-- इसने तो परमेश्वर को पाँचों उँगलियों से पूजा है|? सौ० विद्या 
भहिन या सों० शारदा बहिन को जब देखती हूँ तो ऐसा ही लगता है । 
इनका पहला सदभाग्य तो यह है कि ये नागर जाति में पैदा हुई । 
दूसरा सदभाग्व सुधारक पिता की पुत्री होने का है। इसी कारण इन्हें 
सुयोग मिले। तीसरी विशेष महत्थ की बात यह है कि ये महिलाएँ 
गुजरात की प्रथम '्रेजुएट! थीं। इसके निना इनका विशेष प्रभाव नहीं 
पड़ता । चौथी विशेषता है अनुकूल ओर उदार भावनाओं वाले पतियों 
की पत्नी होना | अ्रमी तो इनके बहुत से सदभाग्य गिनाये जा सकते हैं, 
परन्तु इतने भी कुछ कम नहीं | 
एक से संयोग मिलने पर भी दोनों बहिनों का एक से तलों से ही 
: निर्माण नहीं हुआ | विद्या बढिन को महत्वाकांछी, बुद्धिमान, व्यवहार- 
कुशल कहा जा सकता है ओर शारदा वहिन मधुर, सेहशील तथा 
भावना-प्रधान अधिक हैं। विद्या बहिन की आँखों में सोजन्य के साथ 
कठोरता का मिश्रण है ओर शारदा बढिन के नेत्र अमृत वर्षा करते हैं । 
' परन्तु इनका उपयोग ये चठुराई से करती हैं | यदि आपको यह अमृत 
जादिए तो पहले उसे प्रा्त करने की बोखता आ्रावको विद्व करनी होगी । 


नई 9-०० 


83० | :> अली ०० इमरान काप 5 अल लक 0 
हि ७०4० ००म१क ५ बषधवा पिफफ रा 55: :: पट व एप्टडश एप: 





26 सर शज पी टन: हक 


स्ों० विद्यागोरी नीलकंठ और शारदा बहिन मेहता 


च्या आप लेखक या कवि हैं ? क्‍या आपकी कविता ने जनता के हृदय 
को हिला दिया है ? अथवा आप संस्कारी रसज्ञता का दावा करने बाली 
सम्पन्नता के अधिकारी हैं ! यदि आप प्रथम पंक्ति के हैं, तो बहुत अच्छा 
है । दूसरी पंक्ति के हों तो भी ठीक है ओर यदि कुछ भी नहीं हैं तो 
इनके काये के प्रति आपकी सहानुभूति है--ऐसा प्रतीत हो--तो भी काम 
चल सकता हैं | 

विद्या बहिन में कार्य-शक्ति ओर चपलता अश्रिक होगी तो शारदा 
चहिन की गति धीमी पर कभी ने थकनेवाली होगी । आ्राज की तरह 
जब त्लियाँ बाहर काम करने न आती थीं तब विद्या वहिन के कार्यो से 
गुजरात परिचित था | लिडीज क्लब? की संचालिका को में जानती हूँ, तत्र 
से ये" थीं और हैं। वार फंड के लिए, इनका किया हुआ श्रम कौन नहीं 
जानता ? अहमदाबाद में ज्ियों की कॉसिल इनकी ही ऋगणी है। स्त्ियों 
के लिए भाषण-माला की व्यवस्था करने में इन्हें बहुत आनंद आता है। 
छोटी-मोटी सभी प्रवृत्तियों में इनका प्रमुख स्थान है। 

शारदा बहिन की सवाध्रों से भी गुजरात अ्नभिन्न नहीं। महिला 
पाठशाला की अ्रविष्ठात्री की निष्काम सेवा, भगिनी समाज की प्रमुख और 
गोधरा की समाज सुधार परिव्द के प्रमुख का नाम गुजरात का शिक्षित 
बर्ग अवश्य जानता हैं। देश के कार्य में थे हमेशा रस लेती आई हैं; 
और बडुत सी प्रवृत्तियों को इन्होंने पाला-पोसा हे और इन्होंने जितना किया 
है उतना गुजरात ने इनका उपकार सी अवश्य माना है | 

समाज-सुधार तो बहुत अंशों में इन्हीं के परिवार द्वारा पोषित होता 
आया है । और ऐसा लगता है जैसे इस पर इनका पेतृक अधिकार हो। 
इनके परिवार के सदस्यों के बिना समाज-सुधार-परिप्रद्‌ कदाचित्‌ ही 
होती हो । इनके बिना समाज-सुधार इस दशा को कदाचित ही प्रात्त 
होता | साधारण मनुष्यों को इनमें अयने परिवार के सदस्यों की-सी 


अनुभूति हो यह स्वाभाविक ही है । 
ने 4 उ्ेनन्‍«ं० 


रेखाचित्र 


विद्या बहिन और शारदा बहिन के खमाव में रईसीपन अधिक है। 
संसार में इस समग्र प्रजातंत्र की दुदुभी बज रही है कर इसके साथ 
सामञ्ञस्प रखने की ये दोनों सदा से प्रयत्न करती आई हैं। अंग्रेजी में 
एक नारी के प्रति कहा हुआ वाक्य यहाँ उद्धृत करती हूँ---५9॥6 $ 
0677 इ8छड27007. ६३8 236६ कैट, ईवपाँ६, ॥। शा 70०: 9८ 
76492८0.? (वृह जान्म से ही उत्कृष्ट है, इसमें उसका दोप नहीं और 
इसका कुछ उपाग्र भी नहीं |) विद्या बहिन और शारदा बिन भी हम से 
उच्च स्तरसार की भज्ञे ही हों, फिर भी हमारी नम्न आत्मा वही चाहती है 
कि बर्दि ये हममें से ही एक होतीं तो अधिक अच्छा होता | 

विद्या चदिन की जनता के प्रति उदासीनता कौन दूर कर सकता 
है ? जनता को भी इनकी यह उदासीनता अच्छी नहीं लगती, फिर भी 
बहुत सी वस्तुएँ निरुपाय होने पर भी निभानी पड़ती हैं। 

विद्या बहिन में प्रभाव अधिक है और उसीसे ये प्रमावशाली 
लगती हैं। शारदा बहिन में आकर्षण अधिक है इसलिए दुरन्त ध्यान 
आकर्षित कर लेती हैं । अपनी मीठी ममता के कारण ये बहुतों की विश्राम 
स्थल बन गई हैं । 

मेरे एक मित्र ने इनके विषय में एक बार कहा था, “विद्या बहिन 
झौर शारदा बहिन दोनों एक साथ ही ध्यान में आती ई--एक बीज के 
दो टुकड़े होने पर भी दोनों एक दूसरे से बिलकुल मिन्न हैं। परन्तु 
विभिन्नता होने पर भी एक दूसरे की पूरक हैं ।! 


ज्ब्ल्ल् हे २ हक भस्म: 


भाग दूसरा 


पावंती 





नगराज हिमालय की पुत्री पाती आर्य-जीवन में एक महत्वपूर्ण 
स्थान रखती हैं। वालिकाएँ जब वड़ी होने लगती हैं तभी से सुन्दर 
वर और अखण्ड सौभाग्य के लिए पार्बती माता की प्राथेना करने लगती 
हूँ | शिव-भक्त भोलानाथ की स्ठ॒ुति करते हुए उमा को भी प्रसन्न करने से 
नहीं चूकते । संस्कृत कवि नाटक लिखते हुए---रूडठी हुई पार्वती को 
मनानेबाले महादेव हमारी रक्षा करें---यह कहे बिना नाठक आरंभ 
नहीं करते । कमी इनकी कल्पना अ्रधिक ऊँची उठ गई तो जयनिवासिनी 
गंगा के विपय में बार-बार पूछती हुई पावेती का चित्र चित्रित करते हैं ।# 
छोटे बालकों को कहानियाँ सुनायी जाती हैं तो उनमें पाव॑ती जी किसी 
दीन ब्राह्मण का उपकार करने के लिए. हठ करती हैं और फिर उन्हें 
शिक्षा देते हुए शिवजी की बात आये बिना नहीं रहती । आशीर्वाद देते 
हुए, 'शंकर-पार्वती की-सी अखंड जोड़ी बनी रहे !? मातामहियों के 
इन वचनों से किस पोती ने अपने कान पवित्र न किये होंगे ? सूष्ठि- 
प्रलय के अधिष्ठाता पिनाकपाणि को वश में रखनेवाली सीधी-सादी, 
भोली-भाली पावती की भीलनी के रूप में या कैलाश पर बिहार करती 
हुई पार्वती की कल्पना करना कवि-हृदय का एक अनोखा आहाद है। 
इनके आस-पास भव्यता है ओर सादगी है; अपूर्वता हे ओर एक आर्या 
की-सी निर्मेलता | पार्वती इतनी पूजी जाती हैं, क्‍यों ? इसलिए कि 
आरय॑ ज्जी के सभी माव पूर्णतया तथा पूर्ण रूप से इनमें दिखाई देते हैं । 

गले में सर्प और माथे पर भस्म मलनेवाले, श्मशान में रहने वाले ' 
# पिशालदत का मुद्राराक्मस” नाटक इसी प्रकार आरंभ होता है| 


++ ४“ 


रेखाचित्र 


और भूतों से घिरे हुए महादेवजी की अनन्य भाव से पति-भक्ति करने 
वाली गौरी में, चाहे जैसे पति में देवत्व की कल्पना करने वाली हमारी 
आय॑-भावना के पूर्ण रूप से दशशन होते हैँं। दक्ष प्रजापति के यहाँ यज्ञ 
में जाते समय हठ करनेवाली उ्ता में क्या हमारी स्त्रियों जैसी ही पीहर 
जाने की उत्सुकता के .दर्शन नहीं होते ? पिता द्वारा पति का अपमान 
सहन न करनेवाली देवी में पातित्रत का सात्विक क्रोध पूर्शरूप से प्रकट 
होता है। प्रेम के सूत्र में बंधे हुए. भगवान्‌ रुद्र से छोटी-छोटी बातों पर 
हठ*'करनेवाली मगवती पति की बाह्य महत्ता से अजान होने पर भी 
जीवन समर्पण कर निर्मबता और साहचर्य का अधिकार प्राप्त की हुई 
आय ललना की महान्‌ प्रतिमा-सी लगती हैं। भील-कन्या के रूप सें 
थोगी के खित्त मे निवास करनेवाली रसिकता की साक्षात्‌ मूर्ति के समान 
लगती हैं। कठोर छुदयी पुरुष सहृश रुद्र को कोमल बनानेवाली पावती 
शक्ति का अवतार हैं। कठोरता में कोमलता की सध्टि करने वाली नारी 
शक्ति पर ही संसार का अस्तित्व है। पार्बती की इस शक्ति का उपयोग 
संसार जिस दिन भुला देगा उसी दिन प्रलयकाल सममिये | 
परन्तु कहीं भी पावंती शिवजी की शक्तियों के आविर्भाव रूप में 
नहीं दिखाई देतीं वरन्‌ सदेव प्रेरक के रूप में ही दिखाई देती हैं। 
इसमें भी हमारी एक मान्यता का सूचन है। पत्नी पति पर शासन करने 
वाली नहीं, वरन्‌ अदृश्य रूप से अपनी शक्ति का अदर्शन किये विना 
ही प्रेरणा देनेवाली हो सकती दै। इसी मान्यता पर आर्य सृष्टि का 
५ सिर्माय हुआ है। और यदि नारियों का प्रेरणा-बल समास हो जाव तो 
कदाचित्‌ ही टिक सके। 
पार्वती का एक चित्र कुमारसंभव में है। जिसे महिषासुर-र्दिनी 
के दर्शन करने हों, जिसे चएडी की कल्पना करनी हो, जिसे शक्ति 
. , में इनके दर्शन करने हों, उनके लिए यहाँ खोज का स्थान 
है| वहाँ ये तीनों मुवनों की माता या तेजंःस्फुलिंग विकीर्ण करने 
>+-४प६--- 


€्‌ 


पावंती 


वाली नहीं हैं, वहों तो ये एक सरल और मोली बालिका हैं | निर्दोग्न तथा 
सुकुमार सुखा हैं। वहाँ ये प्रेयसी हैं, नवोदा हैं, यहिणी हँ। पदित्रता 
हं। अनुकूल पत्नी हेँ। वहाँ ये प्रताप-प्रसारिणी नहीं। योगी की अधोंगना 
अनन्ने योग्य कठोरता इसमें नहीं है । इनका आर्य-कुल की अधिगादी 
का पद हम अपने पूर्व संस्कारों के कारण ही वहाँ नहीं भूल पाते। ये 
तप करती हैं, वहाँ भी उम्र ओर दृढ़ तपस्विनी की अपेक्षा ज्त करने वाली 
गहिणी ही अधिक लगती हैँ। और यदि अधिक साहसपूवंक कहे तो 
कहा जा सकता है कि जिन्हें, संस्क्रत कवि भीरे उपनाम देते हैं बहों 
थे मनोहर सुन्दरी लगती हैं । 

जाने क्यों, कुमारसंभव पढ़ते "हुए ऐसा लगने लगता है कि इसमें 
कबि कालिदास ने पावती को कोई विशिष्ट घचुश नहीं दिये। वहाँ ये 
सुन्दर तो हैं ही परन्तु यह सुन्दरता कवियों के निर्मित शब्दों में समाई 
जा सके ऐसी ही है--कीर जैसी नासिका ओर हरिण जैसे नेत्रों बाली 
ही पाव॑ती हैं, यह कहें तो अनुचित नहोगा। संस्कृत साहित्य की यह 
विशेषता है। इस साहित्य में नाथिकाओं के अपने व्यक्तित्व का विकास 
कदाचित्‌ ही पाया जाता है। नाथिका होने का प्रथम लक्षण सौंदर्य है, 
पर यह सौंदर्य कैसा भी हो यह नहीं हो सकता। जो इनकी बंधी हुई 
उपमाश्रों में न समा सके उसे सुन्दर कहने का अधिकार संस्कृत कवि दे 
सकेंगे या नहीं यह एक विचारणीय प्रश्न है। 

संस्कृत कवियों की कल्पनाओं में तथा प्रसंगों में सत्र एक सी बात 
ही पायी जाती है | संभव है, कदाचित्‌ इसी कारण से महाकवि को 
पार्वती में कोई विशेवता न लगती हो। संस्कृत नाव्कों में नाथिकाओं 
का वर्णन, दंपति का प्रसंग, क्रीड़ाओं के वन लगभग समी जगह एक से 
ही हैँ | उपमाएँ मी बहुधा परंपरा के अनुसार ही दो जाती हैं। नाविकाओं 
के वर्णुन में, विरहावस्था, केलिप्रसंग .तथा मिलन आदि के प्रसंग बहुत 
आते हैँ | कभमी-करी संशय होने लगता दे कि खस्तियों को इन भार्षा के 

2 


रेखाचित्र 


अतिरिक्त दूसरे भावों के अनुमव करने का अधिकार भी या या नहीं ! 
संस्कृत नाय्कों की विरल ही कोई ज्रीतेजसखी तथा प्रतापमथी दिखाई 
देती है । रसिक कवियों को जो प्रसंग अच्छे लगे उन्हीं पर लेखनी 
उठाई हो इस कारण से, अ्रथवा उस समग्र की बह्षियों के खमाव का 
दूसरी दिशय में विकास ही न हुआ हो इस कारण से, स्री-घभाव के इतने 
ही तत्व अमर हो पाये हँ। मालविका हो वा सागरिका, मालती हो या 
ताप्ती य॒ साक्षात्‌ पावृंती देओ हों, परन्तु इन सत्र में ख्लील तो एक ही 
प्रकार का पाया जाता है | कवियों की देवी ओर मानविय्रों के बीच कुछ 
अधिक अंतर दिखाई नहीं देता | अच्छे कवि भी इस विशेष दोप से मुक्त 
नहीं हैं । 

परन्तु संभव हैं, कुमारसंभव कवि कालिदास का प्रथम काव्य हो 
और इसीलिए कदाचित्‌ परंपरागत प्रणाली से कविवर मुक्त न हो 
पाये हों | सरिता में नवीन जल की वाद थ्रा जाय॒तो वह गतिम्गन होने 
पर भी गैँदला होता है | उसी प्रकार इसमें भी कवि-कल्पना की नवीन 
बाद का जल निखरा नहीं है। इसमें एक अनुभवी कलाकार का हाथ 
नहीं है, वरनू आशाजनक उच्छुड्डलता की छाप है। उस्ताद के यहाँ 
सीखकर निकले हुए. एक नौतिजिये गवैये में जिस प्रकार अपने निजी 
व्यक्तित्व की अपेक्षा उस्ताद की छाप अधिक होती है, उसी प्रकार प्राचीन 
कवियों के अम्यासी कविवर की रचना, कल्पना तथा कथन की शैली 
में अ्रपनी छाप की अपेज्ञा दूसरों की अधिक दिखाई देतो हे । 

यदि पात्ती का चित्र निर्माण करना है तो जैसा चित्र इन कवियों 
ने चित्रित किया है वैसा हम नहीं कर सकेंगे। कवियों के लिए तो यह 
एक मनोहर काव्य का विषय हैं और हमारे लिए यह आरयों के गौरव 
को प्रेरणा देने तथा उसकी रक्ता करनेवाली देवी हैं। शक्ति जप में य 
संपूर्ण संसार में व्यात हैं। पत्नी-माव की ये साझ्ात्‌ मूर्ति हैं।असुरु 
इनसे कॉपते हैँ | योगी इनसे बल प्राप्त करते हैं। 

पलक अमर 


पावंती 


इनका ऐश्वर्य सबसे निराला है; इसलिए इनकी ठलना किसीसे 
नहीं को जा सकती। योगी की विभूति इनका अंगराग है। सपोँ के साथ 

. ये खेलती ई। प्रियतम के मस्तक पर विराजमान चन्द्रलेखा इनके मुख 

# की कांति में और भी वृद्धि कर देती है। जगतवन्ध मंदाकिनी इनके 

स्वस्म से लजा कर जय में ही छिपी रहती हैं। अवधुत के चित्त पर 

इनका एकाथिकार है। 

पाव॑ती अर्थात्‌ बुद्धि के स्तर पर विचरण करने. वाली सखी नहीं, 
पर भावनाओं द्वारा राज्य करने वाली पत्नी हैं। ये तक नहीं 
जानती | बुद्धि की संकीर्ण वीथिकाओं में ये कमी उतरती नहीं। संसार 
के आदि से अंत तक ये केवल एक पति के नाम का जप करती हैं। 
पति द्वारा अथवा पति के लिए ये सभी वस्तुओं में रस लेती हैँ। इनके 
ध्यान में इतनी एकाग्रता है कि वे इसके बल पर बहुत सी दुर्लभ वस्तुएँ 
सुसाध्य बना लेनी हैँ । 

3. पाती अर्थात्‌ मूर्तिमाव आय स्त्री। भाखवानों के धर में पार्वती 
का अंश सदा से अवतार लेता आया है। एक लता की तरह ये वेष्ठित 
हो जाती हैं । श्रद्धा का प्रभाव डाल कर स्थान दृढ़ करती हैं) इनकी 
नम्नता ही इन्हें रक्मा और पूजा का पात्र बना देती है। इनके छोटे तप 
मिलकर योगियों के त्प से कुछ कम नहीं होते । 

ज्थियों के विप्य में जब बातें होती हैं तो उनके सौंदर्य के विपय में 
भी विचार आये बिना नहीं रहता । फिर चाहे वह देवी हों या मानदी । 
मेधा की तीखी तलवार से पुरुष सुशोमित होता है। और ख्रियाँ सौंदर्य 
प्रदेश की साम्रारी हैं। बदि सौंदर्य को सौंदर्य की तरह देखा जाय तो 
इसके हाय मानव दिव्य दर्शन कर सकता है। हमें सॉदर्य की अपेद्धा है : 
उसके ग्रमाव से हम सुक्त नहीं हो सकते; फिर भी इस भावना में हमने 
आध्यात्मिक बल नहीं दिया। जड़ जगत्‌ के सौंदर्य में मनुष्य संकोच- 
रहित होकर आनन्द ले सकता है; किन्तु चेतन के सॉदर्य-दर्शन में हमें 

+>>ड६घि++ 


रखाचित्र 


अधथःपतन दिखाई देता हैं । देवताओं के आकार-प्रकार की हमने सुन्दर 
कल्पान की है फिर भी इनकी मूर्ति में हम वह सुन्दरता प्रतिविबित नहीं 
कर पाये | कभी-कभी छऋणुमर के लिए मैं सोचने लगती हूँ कि सौंदर्य- 
दशन की इस दुबत्लता ने हमें निरोगी नहीं रहने दिया । 

परन्तु जिन आयों ने जड़ तत्वों म॑ं मी भव्यता और देवत्व की 
कल्पना की ओर उसमें से निर्मारित सौंदर्य-जल का पान किया है, उनकी 
दृष्टि चेतन के सांदर्य-दर्शन में क्यों उलभूती होगी ? 

सौंदर्य के बिना भव्यता कहाँ पाई जा सकती है?! आकाश भव्य 
लगता हैं, क्योंकि विविध रंगी सौंदर्य का अस्तित्व वहाँ है । प्रकृति भव्य 
लगती है, क्योंकि वहुरंगी सोंदर्य वहाँ चारों ओर बिग्वरा पड़ा है। 
रात्रि भव्य लगती है, क्योंकि सॉंदर्य की दीत रश्मियों से यह देदीप्यमान 
बनी हुई है| गिरीकंदराएँ भव्य लगती हैं, क्योंकि निरी सुन्दर उनमें 


प्रत्यक्ष रूप में मूतिमान है। इस सुन्दरता को प्रूणता भी कहने हैं। 


परन्तु नाम बदलने से इसका स्वरूप नहीं बदलता | 

देव वा मानव के आदर्शों की स्थापना करनी हो तो उन्हें आकार- 
प्रकार दिये बिना काम नहीं चलता । आत्मा की सुन्दरता के प्रमाण में 
देह की सुन्दर कल्पना करने लगते हैं, यह एक मानव स्वभाव है इस 
नियम का अनुकरण करते हुए हम पार्वती के सौंदर्य की कल्पना कर 
सकते हैं । 

पार्वती का गौरव लक्ष्मी से मिन्न प्रकार का लगता है | जन्म- 
जाँत श्रीमंत और अपने गुणों से उन्नत स्थान पर पहुँचे हुए महापुरुषों की 
पक्षियों में जो अंतर होता है वेंसा ही अंतर इन दो महादेवियों के दीच 
भी लगता है। लक्ष्मीजी का विचार करते हुए उन्हें वदि मातुपी रूप 
दें तो छुन्दर और मितमायिणी, आचीन वंश में पैदा हुई, स्वाभाविक 
संस्कारिता का प्रदर्शन करती हुई, वीमी पद्ात में मी स्वाभाविक लालित्य 
का भास कराती हुई, जिसे अंग्रेज्य में (700? कहते है, ऐसे किसी प्रकार 

->+-+४०--- 


जिप्मिअमिय + २५ ५ - ल् ल्््स्स्ल्ल्ल्ल्स्ल्नल्ल्ललनजल जम खषनयलटचाच 


अि 


पावती 


के कृत्रिम प्रदर्शश से रहित होने पर भी अपने गर्वले वैभव का बड़ी 
सुन्दरता से प्रदर्शन करती हुईं, सादगी के अबशु ठन में शोमा का भा 
कराती हुई, थाह्य जगत्‌ के दुःख की अज्ञानता से संतोषी और छुखी 
दिखाई देती हुई किसी श्रीमंत की पत्नी का चित्र आँखों के सामने 
खड़ा हो जाता है। पार्वती का चित्र इनसे भिन्न दे। दरिद्रता और 
दुःख जिसने देखे हों ऐसे महापुरुष की ये पत्नी हैं। संत्तार जिनसे 
थरथर काँपे ऐसे महायोगी की थे अधीगिनी हैं। वाल्यावस्था में 
ओमंत पिता के यहाँ इन्होंने सुख भोगा हे, इसलिए ये इससे त्रिलकुल 
अनभिन्न नहीं। स्त्री-सुलम रसिकता का अनुभव ये कैलाश के शिखरों 
पर विचरण करते सम अवश्य करती हॉगी । इनकी गर्बरहित 
सुन्दरता में एक प्रकार की अमिनवता तथा प्रफुल्लता भी अवश्य 
होगी। परन्तु इन्हें देखकर मतुप्य मुख्थ ही नहीं होता, वरन्‌ सम्मान अर्पित 
करने की इच्छा भी करता हे । इनकी उन्दरता प्रमावित करती है, परन्ठ 
पास आने को प्रेरित नहीं करती। लक्ष्मी की-सी सुन्दरता दूर नहीं 
जाने देती | पाव॑ंती में लक्ष्मी-ती तड़क-मड़क न हो, पर उदारता तथा 
अंतर की सुधा तो अवश्य ही अधिक प्रमाण में होगे | 

आर्य हृदय में पाबंती का स्थान किसी भी देवता से न्यून नहीं है| 


जप 4 ननजनन 


चंद्रमोजि के तमस्तेज की तरह आये ललनाओं का हृदय-तेज भी 
संसार का संरंज्षए करने के लिए है और जब सात्विक क्रोध जाग उठे तब 
संहार करते के लिए है। आये स्त्रियों का चारिव्य-बल शअ्रम्मि की तरह 
प्रतनजित होता है। उसकी गर्मी से विश्व में जीवन संचार होता है। 
उसे कोई छेड़ दे तो दावानल की तरह उसकी प्रचंड शक्ति आहुति 
माँगती है--अपना तथा दूसरे का--दोनों का विध्वंस कर डालती है। 
सती शब्द में निहित आदर्श, आर्य-जीवन का दूर का ध्येय नहीं पर 
प्रतिदिन के जीवन-क्रम की एक आवश्यक वस्तु है। सतीत्य आयों के 
* लिए, जीवन जितना ही पत्रित्र उससे भी बहुमूल्य तथा अमूल्य है। 
सतीत के उपवन की रक्ा के लिए बॉबी गई बाड़ों में काड़-मंखाड़ बढ़ 
गये हूँ यह सच है, परन्त वन्य पशुओ्रों से जितना संरक्षण श्ार्य-संसार 
में हुआ है उतना प्रृथ्वी की दूसरी जातियों में सुरक्षा के रूप में भी 
नहीं हुआ । 
कितने ही देशों में कला का विकास स्थूल उपभोगों की सामग्री बढ़ाने 
के लिए होता है। भारतीय जीवन में वह विकास मानव जीवन के 
 अंतस्तल में निहित यूछ्म सत्य का साज्षात्कार करने के लिए होता हे 
' कुछ देशों में सुन्दरियों का सौंदर्य संसार की महत्वाकांज्षाओं को प्रेरित 
करनेवाला या उन तक पहुँचने का साधन मात्र होता है। हमारे देश में 
इसी सॉदर्य की ज्योति अखंड ओर सुरक्षित रखने के उत्साह में पराक्रम 
: और खारब॑ण-शिक्षा की पाठशाला वन जाती है। कहीं-कहीं सौंदर्य उपभोग 


पञ्मिनी 

की वस्दु माना जाता है। हमारे यहाँ यह सौंदर्य वस्तु-मात्र नहीं, वरन्‌ 
विभृति है। 

चित्तौड़ की वीरांगना पद्मिनी की जीवन-कथा इन दो आदर्श या 
दृष्टिकोणों के पारम्परिक कलह की कथा है। एक जाति में सौंदर्य 
स्वामित्व की वस्तु था और उसे उपभोग के लिए प्राप्त करना पुरुपत्व का 
जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता था ओर दूसरी जाति में प्र के दिये 
हुए प्रसाद रूप इस सौंदर्य की उज्ज्वलता में कहीं धव्या से लगे इसके 
लिए प्राणारपण करना ही आदर्श था। प्राण-रक्षा करना नहीं, परसन्दु 
प्राणवान्‌ होना ही अधिक महत्वपूर्ण था। इसकी गौरब-गाया प्राणवान्‌ 
होने की तत्परता से ही अमर हो गई है। 

असामान्यता किसी भी प्रिशिष्ट गुण क्रे साथ जुड़ी होती है। आदर्श 
के लिए मिट जाना या मिश्र देना यह प्रत्येक ओजस्वी आत्मा का संकल्य 
होता है | सतियों के सत्पत्रत और वीरों के देह-विसर्जन, इन दोनों के 
, पीछे एक सी ही मनोदशा बहुत कुछ अंशों में पाई जाती है | पत्चिनी भी 
एक ऐसी ही अप्ृर्व॑ स्त्री थी। वहाँ के वीरों का पुरुषार्थ भी अक्तव था | 
वसुन्धरा में एकत्र हुए सभी सौंदर्यां का सार रूप मुकुमार ओर अद्भू त 
देहलता को अग्नि में विसर्जन करते हुए वह कॉपी नहीं । समृद्धशाली 
चित्तौंड़ को श्मशान बनाते हुए वहाँ के किसी दीर की आत्मा विचवलित 
नहीं हुई थी। 

सौंदर्य और सतीत्व का संगम त्रिरल होता हें। और इसीलिए 
इनकी यशोगाथाएँ काल-प्रवाह जितनी भी पुरानी होने पर भी सदा 
नवीन ही रहती हैं। राष्ट्र के भविष्व का निर्माण भी इस नृतनता के 
अत्तित्व पर ही ग्राधारित है | पद्चिनी की कथा को सुगंधि आज भी हमें 
आकर्षित करती है, क्योंकि यह भी सोंदय और सत्तीत्य के संगम की 
विरल कथा है । 

इस अपूर्व सुन्दरी का चित्र चित्रित करते समय श्राज- भी हम प्रमत्त 


नह 22 3 


रेखाचित्र 


हो जाते हैं। हजारों योद्वाओं में मृत्यु का मोह जागत करने वाली बह 
मनोरम रूपवती योगमाया आज भी हमें विस्मित कर देती है। 

वह कैसी होगी ? भगवान्‌ शंकर की चंद्रकला सहश नम्न फिर भी 
भ्प्राप्प या बाल सूर्य जैसी कोमल होने पर भी तेजस्ी थी? पुष्प के 
पराग सदृश मृदु तथा मत्त बना देनेवाली या वनस्पति-सी मादक और 
उत्तेजित करनेवाली थी ? वीणा का-सा उसका खर आत्मा में प्रवेश कर 
कुछ रिव्य-भाव जगा दे, ऐसा था अथवा रणवाद्यों का-सा उसका 
नाद वीरों को युद्ध में उतरने की प्रेरणा देनेवाला ? केवल सौंदय और 
संयोग से अमर होनेवाली यह कोई अवला थी अथवा बीरों के हृदय को 
पा देनेवाली कोई शक्ति थी ? 

अत्याचार करने के लिए तत्पर हुए मदमत्त दुराचारी को भ्रम में 
डाल देनेवाली योजना की विधायक यही थी। श्राशा के अंतिम पलों 
तक हृढ़ता से राह देखनेवाली तथा परिणाम की विधात्री भी यही थी। 
विजेता को पराजय की-सी लब्जा और शिथिलता का अनुभव कराने // 
वाल इसीकी ग्रतापी चिता के अवशेष थे ! जीते जी तथा मृत्यु पर्यत भी 
यह अजेय ही रही ! 

वह केवल निर्बेल ओर असहाय होने पर भी सौंदर्य के कारण ही 
पूजी गई प्रतिमा हो यह मानने से कल्पना इन्कार करती हैं। केवल 
सॉदर्य प्रेरणा देता है पर त्थिरता प्रदान नहीं करता । सौंदर्य की प्रतिमा 
की लोग रक्चा करते हैं पर अंतकाल तक उपासना करने के लिए तो 
जगदंचा की शरण में ही जाते हैं । अपना खप्पर भरने के लिए अवतरित 
हुई महामाया-सी वह अ्रधिक लगती है । 

. परन्तु इसे अपने सौंदर्य का गर्व होगा या नहीं ? अपनी शक्ति को 
मापने की आकांक्षा होगी या नहीं! अलाउद्दीन को दर्पण में दर्शन 
कराते समय उसने »ज्जार किया होगा या नहीं ? अलाउद्दीन को धोखा 
देकर भीमदेव को छुड़ाते हुए. उसे संतोष ओर अमिमान नहीं हुआ 


च 


पद्मिनी 


होगा ? सम्राद की अस्वीकृत रहने के लिये उत्तन्न हुई याचनाओं को 
देखकर वह आत्मसंतोप या सम्मानपूर्वक तिरस्कार की हँसी न हँसी 
होगी ? उन्मत्त प्रणयी विजेता बनकर जब्र उसे खोजने आयेगा तो चिता 
की राख से उसका गर्व किस प्रकार चूर-चूर हो जावगा इस विचार से 
इसकी ओंलें न चमकी होंगी ? 
खजन शक्ति से मानत्री में अमिमान की ब्ृद्धि होती हैं, उसी प्रकार 
नष्ट करने की भ्रथवा कराने की शक्ति से भी एक प्रकार का उन्माद 
उत्न्न होता है| इसके हृदय की महत्ता ने इस स्वंनाश के कारण रुप 
अयने को समझ कर खर्य पर थविक्‍कार की वर्षा की होंगी; 
परन्तु उसके एक कोने में इस सर््ननाश की अ्रधीश्वरी वह स्वयं है, इस 
विचार से प्रलय का स्मरण करानेवाल स्मित की रेखा मी दौड़ गई 
होगी । और उसी प्रकार इस नाश के ऐएश्वर्य का विचार करती हुई पल 
भर का विलंब किये तिना, दुःख का एक निःश्वास भी मुख से निकाले 
बिना यह प्रसन्नमुखी महामाया चिता पर चढ़ गई होगी और अनेकों को 
चढ़ने के लिए आमंत्रित किया होगा । 
जिस प्रकार का अभिमान आज गर्दित तथा तिरध्करणीय समझा 
जाता है, ऋषियों और आर्य पू्व॑जों ने उसी अमिमान को रुद्र रूप में 
प्रतित्रिधित कर दिया था। प्रलय म॑ भी तांडव दत्व करें यह रुद्र की 
शक्ति तथा माया है | उसके अंशाचतार मानव इस विनाश के विधाता 
बनते हैं, फिर भी उनका नेज क्षीस नहीं होता | 
कमलिनी सी सुकुमार होने पर भी उसके द्वुदय से सम्राट के वैभव 
की कथा तुवारतिदु की तरह दलक जाती थी। वह पवन की तरह 
मनलखिनी होगी इसीसे तो उसके छृदय पर आधिपत्व ध्यापित करना 
असंभव था । उसका कोकिल कंठ चित्तौड़ के अतिरिक्त दूसरे श्ाम्रोपवन 
में गुज्ञरित होना स्वीकार नहीं करता था। उसके खंजन जैसे नेत्रों की 
हु ४ ४---- 


रेखाचित्र 


चपलता को स्थिर करने .का. .सोमाग्य भीमदेव के रनवास को ही 
प्राप्त था। 

चित्तौड़ के दुर्ग पर से, कठोरता से बंद दिये हुए अधर दवाल पर 
लग्कते हुए मोती से सुशोमित, चिंतादुर होने पर भी गर्वीली, यवन- 
समूइ को दृष्टि के तीर से बींबनेवाली उस मानिनी के चित्र पर विचार 
करें तो क्या वह दृश्य आँखों के सामने खड़ा नहीं हो जाता ! उसके 
भरोखे की जाली से उसकी ननन्‍हीं सी देहलता के प्रताप की सुरक्षा के 
लिए सज्जित वीरों की बिदा को, धृग-पुष्पों से स्वागत करती हुई पश्चिनी 
का लावण्य अ्रव भी ज्यों का त्यों प्रफुल्ल हो, ऐसा लगता है। छुः 
शताब्दियों से अधिक बीत गई । दूसरी अनेक शताब्दियों का जल भी 
इसी प्रकार वह जायगा, पर पत्मिनी की यशोगाथा का गान सदैव होता 
रहेगा ओर उसकी भक्ति में अमर हुए गोरा-बादल के पराक्रमों से 
दूनी उत्साहित हुई चित्तौड़ की वीर राजपूत-सेना के पराक्रम भी उतने ही 
चिरंजीदी रहेंगे ! | 


जोन ऑफ आरके 





अशतनी होने पर भी ज्ञानियों को मात देनेवाली, अहीर पृत्री होने 
पर भी देश के सर्वोत्तम पद को सुशोभित करनेवाली, अबला होने पर 
भी वलवानों का मान मर्दन करनेवाली कुमारिका जोन के नाम से किसका 
हृदय भावसिक्त न हो जाता होगा ! उसकी बिजय-गाथा से हृदय हिल 
उठता है। उसके जीवन के करुण अंत से आँखों में ऑँयू छुलछला आते 
हं। उसकी शिशु-सुलम सरलता अंतर को बशीभूत कर लेती है | राजनीतिशों 
को लमित कर देनेवाला उसका विवेक प्रशंसा की भावना उत्पन्न कर 
देता है । जोन का जीवन .उस अकेली का ही नहीं, वरन्‌ संसार भर का 
है| उसकी शिराओ्रों की धड़कन हममें भी कंपन ला देदी है । 

भेड़ों को चरानेवाली इस वनवाला ने सतन्रह वर्ष की आयु में फ्रांस 
के सेनापति का महान्‌ पद.सुशोमित किया। ओर शह६र्वे वर्ष म॑ मानवों 
की--इसके देशजनों की--कतम्नता और उनकी स्वार्थपरता के कारण इसकी 
की महत्ता न सममते हुए, उसके प्रतिपक्तियों की निर्देबता के परिणाम- 
स्वरूप, इस वाला के कोमल शरीर की आइहुति अभिदेव को अर्पित की 
गई | किन्तु उसकी अरडिंग आत्मा अडिंग ओर अ्विचल ही रही। संसार 
के अन्याय ओर बंधन जोन जैसी आत्मा को बॉधने के लिए कमी भी समर्थ 
नहीं हो सके । 

जोन खभाव से युद्धप्रिय न थी। शत्रु अथवा मित्र पक्ष के किसी 
बायल सैनिक को देखकर उसके ओंस उमड़ आते ओर वह उसकी सश्नपा 
करने लगती | सैनिकों के कुटुम्बियों का विचार--कोई निराधार माता, 
या प्रतीक्षा करती युवती शोर सुन्दर पर दीन ब्रालकों का विचार--5्से 

---४७--- 


रेखाचित्र 


ठरन्त ही आता था। यह उसकी दुर्बलता न थी।' कौन सी युक्ति अ्रथवा 
कौन सा वार शत्रु पक्त के लिये सचोट होगा, इसका विचार भी वह 
उतनी ही शीघ्रता से कर सकती थी। मंत्रियों की सभा में उसके शब्दों 
की ललकार अनेकों की शंका-निवारण के लिए पर्यातव थी। उसके 
सैनिकों में उसका उल्लास भरा शिशु सब्श मुखड़ा दर्शन मात्र से ही 
हजारों व्यक्तियों में श्रद्धा ओर उत्साह भरने में समर्थ था। उसके नाम 
मात्र से ही लोगों में आशा का संचार होता था। उसे देखना भी एक महान्‌ 
पुण्य माना जाता था और उसके साथ बात करना तो जीवन का एक परम 
सोभाग्य और एक स्मरणीय प्रसंग समका जाता था। और यह सब्र 
कुछ एक छोटी सी सत्र वर्ष की बाला के लिए ! इतिहास में जोन जैसी 
वाला अकेली है ओर अकेली ही रहेगी । 

धनी भित्रों के कोल्ाहल में उसने अयने भेड़ चरानेवाले साथियों को 
भी भुलापा न था। घोड़ों की हिनहिनाहट में भी उसे अपने भेड़ों का 
स्वर याद आ जाता था। उसका वचपन का साथी परियों का बृत्त, 
उसे सद्दा धर लो: जाने के लिए उत्केठित करता रहता। वैभव ने उसको 
भी आकर्षित ने किया । इन सभी प्रिय वस्तुओञ्ों में अति भय उसका 
देश था। इसी के लिए वह जीवित रही। परोक्ष उत्कंठाश्रों से उत्कंठित 
होने के समय अपने आह्ाादों की आहुति उसने देश-कार्य के लिए ही 
अर्पित की और शत्रु को भी रुला दे ऐसी भव्रानक मृत्यु से मरी, वह भी 
देश के जिए ही | ऐसी केवल एक जोन ही थी । 

मृत्यु को सम्मुख देखकर भी उसने अपनी खध्थता बनाये रखी 


- थी । यमदूतों के समान न्याय का ढोंग करनेवाले विद्वान राजनीतिश 


भी उस वाज्ञा की बाल-बुद्धि को चकित न कर सके। उसके अदल 

.. विश्वास को हिला देना मानव-सामर्थ्य के बाहर की बात थी। उसके 

:. उत्तरों की अदभुतता से शत्र मुख्य हो उठे थे। परन्तु जीन को उस 

न्याय के पार्खश से तब न्याय नहीं मिला। जोन ! श्राज जगत्‌ तेरी 
-+++ २० 


| 


जीन ऑफ आर्क 


बंदना करता है और संसार की महान्‌ विभूतियों में तुम्हारा अनन्य 
स्थान कभी का स्वीकार कर लिया गया है। २; 

संसार ने महान्‌ आत्माय्रों का द्रोह करने में कमी पीछे मुड़कर नहीं 
देखा | उन्हें दुखी करना यह तो संसार का कुछ नियम सा ही रहा है | 
उसका प्रायश्रवित उसे पंग-पग पर करना पड़ता है, तो भी वह अपनी 
प्राचीन परंपरा से मुक्त होने के लिए जरा भी तैयार नहीं ! महान्‌ 
आत्माश्नों का बलिदान परंपरा की प्रथा हो गई है। जोन का बलिदान 
हुआ--फ्रांस को खतंत्रता मिल गई। आज तो उसकी बशोगाथा के 
संध्मरण मात्र ही अवशेष रह गये हैं| 

महत्ता का प्रथम लक्षण देश के हृदय की नाड़ी-परीक्षा करना ही नहीं 
है, वरन्‌ उसे टीक दिशा-सूचन करना तथा वेग प्रदान करना भी है। 
जनता का हृदय परखनेवाज् अपने समय में महान्‌ हो जाते हैं, परन्तु 
अमरता प्राप्त नहीं कर पाते । जोन ने ऐसे मार्ग की ओर संकेत किया | 
फ्रांस की नस-नस में विजड़ित परतंत्रता के बंधनों को तोड़ने के लिए 
प्रजा आतुर हो उठी थी। परन्तु निर्बल राजा तथा विलासी कर्मचारी 
स्वतंत्रता के मार्ग की ओर ले जाने की शअ्रपेज्ञा उसके अन्तराय रूप 
अधिक थे | प्रजा ऊब. गई थी--कोई मार्ग नहीं सूकता था। खतंत्रता 
की ध्वजा फहराने के लिए जोन आई ओर लोगों ने उसे मुक्तिदायिनी देवी 
समझकर पूजा | नित्रंल राजा की निर्बलता उसने उतार फेंकी | हतोत्साह 
सैन्य में उसने उत्साह और व्यवस्था ला दी | विलासी अधिकारियों के विलास 
छुड़ा दिये । वर्षा से अंग्रेजों की अधीनता से निःसंत्व हुई प्रजा में उसने 
चेतना का संचार किया और यह सब इस अद्भुत लड़की ने केवल थोड़े 
से महीनों में ही कर दिखाया | 

उसकी आत्मा का ओज सदा ही अखंड रहा है। पशु सहृश सेनिकों 
के बीच रहकर उसकी पवित्रता किसी छोट से दोष से भी दूषित नहीं 


रेखाचित्र 


हुईं। सत्ता और विलास का सुरा-यात्र उस देवी को उन्मत्त बनाने के 
लिए असमर्थ सिद्द हआ। 
.. - है मधुर में मुरतम थी | सौंदर्य का वह अवतार थी। युद्ध-नीति 
मे वह पारंगत थी। श्रद्धालुओं की वह पूजा की पात्र थी। मित्रों में बह 
अनुपम थी | 

आदर योग्य पुरुषों का बह आदर करती, राज-काज में निपण 
व्यक्तियां की निपुणता से वह धोखे में न आ्राती। वह खर्य कपट से 
करती, पर दूसरे का कप तुरन्त जान लेती थी। वह रप्ट्र को बचाने 
के लिए ही आई थी। वह आयी, एक गढ़ेरियन की आ्रम्यता और 
घबराहट से युक्त नहीं, वरन्‌ विधाता की निश्चल सत्ता से | उसे अस्वीकार 
करना अथवा उसका मार्ग रोकना दोनों ही शक्ति के बाहर की बात 
थी। इस महान्‌ चक्र के सब आरे बन गये। उसकी अडिग इच्छा-शक्ति 
से फ्रांस जी उठा। ओरलीन्स की इस कुमारिका को फ्रांस आज भी 
कृतज्ञतापूर्वंक याद करता है। 

कल्पना देश के निरंक्ु॒श राज्य में जोन के समान दूसरी मूर्ति नहीं 
गढ़ी गई। स्ि की काव्य-पुस्तकों में जोन सहश जीवित काव्य थोड़े 
डी लिखे गये है | 

विश्व की रंगयूमि पर सत्ताधारी महारानियाँ तथा नयन वाण से 
वश में करनेवाली दृदय-रानियाँ बहुत पैदा हुई हैँ । पति में ही मुक्ति 
के दर्शन करनेवाली पतित्रताएँ सत्र देश तथा सब काल में दुलभ नहीं 
होतीं। समग्र आ पड़ने पर सिंहनियों की तरह गर्जना करती हुई 


: कत्राणियों के युद्ध में जूक जाने के उदाहरण भी अपरिचित नहीं। सब्र 


कलाओं में पारंगत हृदब-हारिणी मानिनी आज मी बहुत देखी जा 
सकती हैं। कल्पना भें उड़नेवाली किभ्रित्रियाँ तथा देवबालाएँ भी 
मिन्न सकती हैं। यदि नहीं देखी जा सकती तो केवल बालक होने पर 


' .ओी बलवान तथा ज्ञान न होने पर भी निपुण, एक जोन ! 


न है 


के. 


जोन ओफ आर्क 


उसने नयनों की डोर से पुरुष को नहीं नचाया। उसने सत्ता के 
रोब से किसी को पराजित नहीं किया और न शासन किया। स्वर्ग 
से उतर कर आई हुई देदी की तरह अपने पंखों के प्रकाश से उससे 
संसार को प्रकाशित कर दिया | 

ह्लियों के भाग्य में लिखे हुए पतिया पुत्रों से प्रसिद्ध होने का 
सौभाग्य जोन को नहीं मिला। वीर-पत्नी अथवा वीर-पुत्री कही जाने 
से भी वह मुक्त है। जोन की कीति-कथा तो केवल उसके कार्यों पर ही 
अवलंबित है| * 

उसकी निर्मल आत्मा में शत्रु के प्रति भी देव पैदा नहीं हुआ । लोहे 
की बेड़ियाँ तथा अभिज्वाला की श्रॉच भी उसकी आतन्‍्मा को डरा 
ने सकी । 

जोन भारत की ज्ली-रक्ों को पंक्ति को उज्ज्वल नहीं करती, पर 
फिर भी भारत के लिए किसी भी तरह कम्त आदरणीय नहीं है। जोन 
. जैसी आत्माएँ एक देश की या एक काल की नहीं होतीं, चरन्‌ सदैव 
ही इनमें से प्रेरणा के लोत बहते रहते हैं। भारत की सुनारियों यह 
प्रेरणा रूपी जल पीकर कितनी ऋइताथे हुईं होंगी ! 


६० 


मिसेज मारगोट एस्कवीथ 





अंग्रेजी साम्राज्य के शिक्षित वर्ग में कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति 
हो जो मि० एस्वीय को न जानता हो। स्व० ग्लैडव्न के शिष्य रूप में 
'पालियामेंट म॑ इन्होंने अपना कार्य आरम्म किया था। सर केम्पवेल 
वेनरमैन के समय में यह कोय मंत्री थे । मि० लाइड जाई के प्रधान पद 
पर आने से पहले दस वर्ष तक यह अंग्रेजी साम्राज्य के प्रधान मंत्री पद 
के लिए एक के वाद एक तीन बार सफल हो चुके थे। इस अत्यंत 
बुद्धिशाली, राजनीवि-निपुण तथा सबसे विशेष प्रभावशाली पुरुष ने 
आधुनिक युग के लित्रसल पक्कु के नेता ओर विगत युग के अंग्रेजी 
राजनीति के प्रतिनिधि रूप में प्रजा-जीबन को सुशोमित किया है । मि० 
एल्बीय की पत्नी मिसिज मारसोट एस्क्द्रीथ का स्थान भी अद्वितीय ही है । 
ओर इसी कारण से इनकी लिखी हुई आत्म-कथा की पुस्तक ने इंगलैंड के 
सिए वर्ग में खलब्रली मचा दी है। कुछ व्यक्ति इसे विवेक-बुद्धि से रहित 
पुस्तक सममते हैँ । गुप्त बातों तथा पत्तों के दुरुपयोग करने का इन पर 
आरोप लगाया जाता है | कुछ लोय यह भी कहते हैं कि बेर के प्रतिशोध 
के उदेश्य से इसकी रचना को गई है । ओर ऐसे कितने ही आरोप इन 
पर लगाये जाते है। ऐसे आरोपों की व्योरेवार लोन में उतरना व्यर्थ 
है, परन्ठ हमारी दृश्ि में इस पुस्तक का और इसकी रचना करनेवाले का 
क्या मूल्य हो सकता है, केवल इस पर विचार करेंगे | 

आज से पचास वर्ष पहले इंगलेंड में झ्लीत्थ की भावना के नवीन 
अंकुर कितने ही स्थानों पर फूटे थे, पर उन्होंने आज का-सा व्यवस्थित 


कट न्‍+द्‌ २--- 


मिसेज मारगो< एस्वीथ 


स्वहू्प उस समय्र घारण नहीं किया था | समाज-शोभा के रूप में स्ियाँ 
बाहर श्रातीं और समाज के ऑँगन को सुशोमित करती थीं, पर उससे 
विशेष ज्च्रियों के व्यक्तित्व को कोई विशेष आदर-सम्मान न मिलता था। 
इसी कारण मिसज एलछदीय का व्यक्तित्त आरम्म से ही प्रमावोत्पादक 
लगता है | 

मिसेज एस्कवीय वाल्यावस्था स ही “छाए? तथा तेरा? 
लगती हूँ | इनके वत्रपन को उच्छंडूलताशओं म॑ इंगलंड में उदित हुए 

ब-न्नीत्य के दशन होते हं। उनका उस समय का पारिवारिक जीवन 

बहुत अच्छा नहां कहा जा सकता। अपने व्यवसाय से सम्पन्न बने 
पिता में सभी वस्तुओं का हिसाव लगाने की आदत थी और कदाचित्‌ 
अपनी पुत्नियं में तथा अपनी पुत्रिषों के लिए. भी दिसात्र लगाया हो तो 
कुछ असंभव नहीं | मारगोट को माता मिसेज टनन्‍्ट में एक प्रकार की 
स्वार्थपरता और श्रपनी तड़क-भड़क प्रदर्शन करने की लालसा थी। 
मिसेज एललज्रोथ में भी इन दोनों के गुण कितने ही अंशों म॑ उतर आये 

बह बड़ी एिसात्री तथा चालाक हैं; सखाथेयरता तथा महत्व-मदशन 
का शोक भी रखती हैँ । पर इनके कितने ही श्रच्छे थुणों ने इन सब 
पर पाशिश चढ़ा दी है | ओर वह भी इस प्रकार कि देखते ही आश्चर्य 
चकित कर दे । 

मिसेज एसवबीय में साहसिकता तथा उत्साह बहुत है। उसकी 
साहसिक घुड़सवारी देखो या आधी रात की मुलाकातें देखो; इन सत्र में 
एक प्रकार का उद्वंड स्वभाव दिखाई देता है। उसके बात करने का ढंग 
डच्छुह्ुुल होने पर भी आकर्षक है। उनका विनोद भी ठुरन्त ही समात्त 
नहीं हो जाता | उसकी सफलता का एक कारण उसका विनोद भी है | 

यदि व्यक्तितत द्वेतब्र न हो तो उसकी बुद्धि मनुष्यों के गुण-दोप 
सदज ही परख लेती है ओर योग्य भाषा में सूक्ष्म रीति से उसका वर्णन 
भी कर देती हैँ । अपने मित्रों का चारित्र्य निरूपण करने में उसकी दडुद्धि की 


रेखाचित्र 


तीनता दिखाई दे जाती है । भाषा माग्राही तथा सीधी-सुनने 
वाले के अंतर में तुरन्त प्रवेश कर जाये, ऐसी है। शैली सूचक 
(5पह8८४7४८ ) है पर वोमिल (८४४५) नहीं । उसके साहित्य में 
साहित्यकार की प्ररक्रता भी बहुत कुछ अंशों में पाई जाती है। बात करने 
का ठेंग तो उसका अपना है। उसके 78727 (संक्षिम चुट्कले) 
मन प्रसन्न करें, ऐसी चतुरता से पूर्ण होते हैं । अपने छोटे-छोटे हास्यप्रद 
वर्णुनों में वह भ्रधिक रख भर सकती हैं | और इन सब के सम्मिश्रण से 
उसकी पुस्तकें बदि लोकप्रिव भी नहीं हुईं तो भी आठरतायूर्वक पढ़ी 
अवश्य जाती हैं | 

आरम्म से ही उसमें स्ोगरि रहने की आकांच्षा थोड़े चहुत अंशों में 
दिखाई देती हैं| जो सब करे उससे कुछु नवीन किया जाब यही इच्छा 
निरन्तर उसमें पाई जाती है । जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई बेसे ही इस इच्छा 
ने, प्रत्यक्ष हो जाय तथा दूसरों पर कदाचित्‌ आधात करे ऐसा स्वरूप 
पकड़ लिया हो, तो कुछु नवीनता नहीं ओर इस इच्छा के विरुद्ध आने 
वाले की ओर उसके रोडा की उम्रता उसकी शैली की मोइकता से छिप 
नहीं पाती | प्रसन्नता की तरह उसका द्वेप भी बहुत गहरा तथा सहज में 
न जीता जा सके ऐसा होता है । 

गुश-दोरों के संयोग से वह इंगलेंड के स््री वर्ग में भी कुछ: 
अनोखी ही समकी जाती है। एस्वीय के प्रधान पद की सफलता अधिक 
. अंशों में इस स्री के चातुर्य और मठ॒प्यों को उपयोग में लाने की कला 
की ऋणी है। उनके पतन का कारण भी वही होगा या नहीं यह भी एक 
_/ बहुत चर्चित और तिवादगस्त प्रश्न है | उसमें एक प्रकार की इत्रिमता 
दिखाई दिये त्िना नहीं रहती। उसका प्रत्येक कार्य स्वाभाविक्त होने की 
अपेक्षा किसी उद्देश्य से किया हुआ अधिक लगता है। पर इस जैसी स्त्री 
के सुप्रोगों पर विचार करे तब तो ये गुण देख कर आश्चय नहीं होता । 

परन्तु वह सत्र कुछ होने पर भी एस्क्‍वीथ के अति तथा उसके 

+-६४--- 





5 #&6 3... ..00>०+००्-ब०कममनककपडफपा उप िमकिसलचियपाखआपपगन्स्ग्म्य्ल्स्ल्ल्््ल् जज «..._तह+-त०..+-न 


मिसेज मारगोट एस्कवीय 


परिवार के प्रति उसका स्नेह तथा ममता ऋहुत अधिक दिखाई देती है । 
शेरनी की-सी चपलता से वह सब को सँमालती है तथा रक्ता करती है | 
और शत्रु की ओर कठोर दृष्टि से देखती है। दुश्मनों के आगे जब 
उसकी कुछ नहीं चल पाती तब उसके द्वेप और क्रोध अ्रसद्य हो जाते है । 
डसे और उसके परिवार को सर्वोच्च स्थान पर रखने के लिए वह कुछ 
भी कर सकती है | पर इस स्वोपरिता में यदि किसी ने शंका उठायी तो 
फिर उसकी ओर देखना भी वह पसंद नहीं करती ! 

उसके स्वभाव को जानने के बाद उसकी जीवन-कथा के दूसरे भाग 
में आये हुए लॉयड जार्ज के प्रति उसका देंष स्वाभाविक ही है । पुत्रहदीन 
विधवा राजयूतनी किसी दूसरे बंश से आये हुए, राजा के प्रति जो भात्र 
रखती है वैसा ही भाव कुछ-कुछ उसमें दिखाई देता है । 

परन्तु किर भी अंग्रेजी में जिसे (१७ पए ८८ए८४! कहते हैं, बह 
वैसी ही चपल है | सामनेवाले का अंतर बींधकर उसके गहरे भावों को 
यह जान सकती है । परित्यितियों तथा मनुप्यों का उपभोग करना भी 
उसे खूब आता है | 

वह मृदु दिखाई देने का प्रथल्त करती है पर उससें म्वाभाविकता 
नहीं लगती | बहुधा उसके कयक्ष तलवार से भी अधिक तेज होते हैं | 
इस प्रकार की छ्लियाँ पक्की की अपेक्षा मित्र अधिक अच्छी हो सकती हैं। 

उसे सत्ता ओर शोभा दोनों का शौक दै। कलावान होने की अपेत्ा 
कला-विशारद होने में उसकी मान्यता अधिक है । इस प्रकार की मानवता 
उदच्चपद पर विराजती हो तो अधिक अच्छी लगती है । 

ऐसी स्री की यदि वास्तब्रिक मित्रता मिल जाय, तो वह सहायक तथा 
साथी बन जाती है और विकट प्रसंगों में उसकी साहसिकता तथा आगे 
खींचने की शक्ति अवश्य ही बचा लेती है । शत्रु हो, तो उसका विचार 
करते ही हृदय काँप उठता है | उसके स्नेह और हेप दोनों शक्तिशाली 
होते हैं | 


दि, * 2 '्निधिकलिकी 


रेखाचित्र 


मेरे एक मित्र ने इंगलेंड की नवीन ज्रीत्व की भावना के परिणामस्वरूप 
हुईं दो स्तरियों का--एक मिसेज पेंकहर्श्ट और दूसरी मिसेज़ एस्वक्यीय 
“का नाम निर्देश कर पूछा, “प्रगति की भावनां के थे दो रूप हैं; 
तुम किसे पसंद करोमगी १? । 
इस प्रश्न का उत्तर कई तरह से दिया जा सकता है। समाज में 
जी ओर पुरुष के कार्यों तथा व्यक्तित्व का मापदंड न जाने क्यों 
अलग-अलग होता है और है। आदर्श के लिए पुरुष घर में रहकर 
स्वार्पण करे इसकी अपेक्षा बाहर जाकर करे तो उसका अधिक मल्यां- 
कन होता है। ज्ली का आदर्श इससे ठीक उलय है | बाहर जाकर काम 
करनेवाली ञ्री में तपश्चर्या अधिक होती है। आदशों के प्रति उसकी 
तीव्रता भी अधिक होती है, तो भी वह थोड़े से ही मनुष्यों को आकर्षित 
कर सकती हैं। घर में रहकर अपनी शक्ति का उपयोग करनेवाली 
स्री--इसमें कुछ आदर्श हो अ्रथवा न हो तो भी प्रशंसा की पात्र है ओर 
लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है | ह्लित्रों के गौरव के साथ धर 
का ख्याल भी सदेव मिला रहता है। ग्रहविह्ीन त्री में इस गौरव के 
अभाव की कल्पना करना--जान-बूककर नहीं या अन्याय करने के 
लिए भी नहीं--इस समाज के एक बहुत बड़े भाग की मनोदशा है। 
या तो संरक्षक भावना श्रति तीव हो, इसलिए था जोवन- 
संग्राम में स्पर्धा करनेवाली की अपेक्षा पेरणात्मक देवियों को अधिक 
आवश्यकता हो, इसलिए, जाने या अनजाने वाह्य क्षेत्र में काम करने- 
बाली ख्लित्रों की अवगणना नहीं, तो उन्हें गिरी हुई निगाह से तो अवश्य 
ही देखा जाता है| उस प्रश्न में इन सत्र बातों की ओर स्पष्ट संकेत था। 
मिसेज एल्बीय चठर ओर आश्र्यंचकित करने वाली ज्लीहें।मिसेज 
कहंस्ट--इसके कार्य से अनुमान करें तो--आवेशपूर्ण होने पर भी 
अपने आदशों के लिए सर्वस्व अपेण कर देनेवाली है। अपने समय में 
ये दोनों इतनी अधिक पास हैँ कि संतार को किसकी अविक आवश्यकता 


| “* और, 77९ 
>+-+325--- 
१ 


मिसेज मारगोट एस्क्‍वीय 


है इसका निर्णय इस समय नहीं हो सकता | 

मिसेज एस्क्दीय के विषय में थोड़े वाक्यों में इस प्रकार कहा जा 
सकता है: पत्नी रुप में इन्होंने पति के कार्या में सामझस्व स्थापित कर 
दिया था । माता के रूप में इनके अपने ही बालक सर्वोत्तम हैं--यह मानने 
वाली गर्बाली माता थीं | विविधता से युक्त तथा उत्साह-संचार करें ऐसी 
ये मित्र थीं। ये संध्कारी तथा सम्य थीं, पर कहीं-कहीं इनकी कटुता 
तथा अभिमान से इनकी संध्कारिता में त्रिेकृति आ गई हो ऐसा लगता 
है । मित्र बनाने की कला म॑ यह खूब निपुण थीं। प्रसंगानुकूल विवेक 
तथा व्यवहार-कुशलता दोनों का इनमें सम्मिश्रण था। इनको साहसि- 
कता तथा निडरता ने इनके व्यक्तित्व में सुन्दर रंग पूर दिये हैं 

इनको पढ़ने के बाद ऐसा लगता हैं कि क्‍या ऐसी स्त्रियों के 
अवतार से संसार का उद्धार होगा ? 


_- 5 ७-+- 


जीजी माँ. 


:.. कई लाख वर्ष पहले सूर्य से टूट कर एक ठुकड़ा अलग जा पढ़ा, 
वही चन्रमा कहलाया। सुधा बरसानेवाला शीतल तथा आह्वादक। वह 
सूर्य का तीव्र तेज ग्रहण करता है और उसे अपने दृदय में समाकर 
पृथ्वी पर भेजता है। वही है उसकी शांतिमयी ज्योत्स्ना | जीजी माँ अर्थात्‌ 
ऐसे ही एक चन्ध का अ्भीवषेण | इन्होंने मुनशियों की उम्रता अपने 
में अहण की, पर परिवार में प्रसार किया केवल एकमात्र मधुरता का ही। 

जब्र ये पैदा हुई तो नवीन संस्कृति की बाढ़ नहीं आईं थी। जब 
इन्होंने संसार में प्रवेश किया तब प्राचीन संध्कृति का प्रभाव गुजरात पर 
ज्यों का त्वों था। इनकी युवावस्था का समय अज्ञान और म्रम से पोवित 
प्रजा का समय था। प्राचीन संस्कृति मी उस समय तो कंदाचित्‌ ही कहीं- 
कहीं दिखाई देती । जीवन में खतंत्रता नहीं थी, कला नहीं थी, आनंद 
नहीं था। थे केवल रूढ़ि के बंबन या छोटी जाति के झगड़े। जाति 
में लड्डू जिमाने के सिवाय किसी दूसरी प्रकार की उदारता के भी 
कदाचित्‌ ही दशन होते । 
उस समय की इस दशा का विचार करें तब तो जीजी माँ का जीवन 
और कला-प्रेम को एक आकस्मिक सुग्रोग कहने का ही मन होता है । 
आम्रगक्षु जिस प्रकार पृथ्वी में से मिठास ग्रहण कर लेते हैं. उसी प्रकार 
इन्होंने प्राचीन संध्कृति के सुन्दर तत्व अपना लिये थे। उस समय के 
. गंभीर रोग--धर्मींघता--ने इन्हें जरा भी स्पर्श न किया था ओर भ्रम 
! भरे हुए इस युग का एक भी भ्रम इनके हृदय पर अपना शासन 
स्थापित न कर सका था। 
अपने समत्त जीवन में इन्होंने कुद्धम्ब्र भावना के आदर्श की उपासना 
की है । बालक जब कुछु समझने लगता है तभी से पिता के प्रति श्रद्धा 
भक्ति रखना सीख जाता है। माता के प्रेम और भय से वह उशील 
लिनाप्िष्प-+ 


जीजी माँ 


बनता है। कुड्म्बियों के प्रेम ओर भावना के बंधन से बैंध जाता है--- 
इन समस्त स्नेह-सूत्रों से ही इन्होंने यह-जीवन का निर्माण किया है। 
परिवार में प्राचीनता और नबीनता का अपूर्व मिश्रण इन्होंने ला दिया है 
जिससे सवंत्र उच्ुद्डलतारहित, निर्मीक वातावरण असारित हुआ है । 
सबके लिये जीजी मो श्र्थात्‌ जिनकी धाक से कॉपने लगें ऐसी बढ़ी- 
बूढ़ी नहीं, वरन्‌ जिनके स्नेह ओर सौंजन्य ने सबको बिना तंतुओं के ही 
बाँध खखा है, ऐसी कौन है? केवल जीजी माँ। इनके लिए जीजी 
माँ शब्द ही यथा है । 

प्रत्येक के विचारों ओर आकांक्षाओं की ये सहानुभूति से समझती 
हैं । इसी कारण परिवार म॑ बच्चों स लेकर बढ़े तक सत्र इनके पास 
अपनी कठिनाइयाँ उपस्थित कर सहानुभूति की याचना करने आते हैं। 
बालकों के खिलौने खो जायें या कनुभाई बाहर किसी से लड़ शआवें तब 
हर समय ये प्रत्येक के दुःख में, सबके स्तर पर उतर कर सबका हृदय 
सममने का अयज्ञ करती हैं और बहुत अंशों में सबको सांत्वना भी दे 
सकती हैं | नवीन विचारों को, उनसे दूरन भाग कर सहज में ही 
ग्रहण कर लेती हैं ओर नवीन सृष्टि के विकास में अब भी ये बहुत 
अधिक रस लेती हैं। आजकल के नवीन विचार इनके लिए. कुछ 
नवीन नहीं । बहुत सी बातों में तो ये खय॑ ही नवीन विचारों का समर्थन 
करती हैं और उनमें इनके अनुभव-शञान का इतना अच्छा मिश्रण होता 
है कि जिन प्रश्नों का हत्न नवीन विचारों म॑ं आसानी से नहीं मिलता 
उनका निराकरण सहज ही इनके द्वारा हो जाता है । 

इतने वर्ष से अभी भी जीजी माँ जीवन में झंचि रखती हैं। काम 
करने से ये कभी भी नहीं ऊबती | इनकी जीवन कभी भी मारस्रूप 
नहीं लगता और इनकी विनोददत्ति ज्यों को त्यों सतेज है| कोई 
अच्छी बात या अच्छा कयक्ष इन्हें प्रिय है| सब में माधुर्य . और शांति 
संचार करने की कला इन्हें ख् आती है। सुन्दर कार्य और सुन्दर 


-_ 


रेखाचित्र 


कला देख कर ये सदैव आनंदित होतीं और उत्साहित करती हैं | 

जीनी माँ कहानियाँ कहने की कला बड़ी सुन्दर जानती हैं और 
इनकी बातों में बालकों की कल्पना को उत्तेजित करनेवाले सभी तत्व 
होते हैँ । इसीलिए, परिवार में इनसे कहानी कहलवाने और उुनने का 
सभी का मन होता है। पर इनके इस गुण का पूर्ण विकास तो कनुभाई 
में ही हुआ है। इनके कला-ग्रेम से जड़ी विन चित्रकार हुईं, इनकी 
कहानियों के रस ने कनुभाई में कल्पना के तत्वों को पोडित किया। 
इस प्रकार के छोटे-मोटे अनेक लाभ हुए हैं; परन्तु गुजरात में 
सर्वोपरि कहानीकार ओर ब्रिय्रों में प्रथम पंक्ति के चित्रकार--इनके 
दो मुख्य फल हैं। बालक जीजी माँ के पीछे पागल की तरह पड़े रहते 
हैँ--वह इनकी इस कला के कारण | दूसरों की कहानिग्रों को ये रसपूर्वक 
सुन सकती हैं वह भी अपनी इस कला के कारण ही और आज भी 
बच्चों की तरह आनंद से कहानियाँ पढ़ने का इन्हें शीक है । 

जीजी माँ में काव्यम्ता भी है। यदि आज से सौ-डेढ़-सो वर्ष € 
पहले पैदा हुई होतीं तो ये इहत्‌ काव्य-लेखन में अमर हो गई होतीं, 
ओर इनके काव्यों को पुरीत्राीई और दीवालीबाई के काव्यों को जो 
स्थान मिल रहा है उससे भी अधिक उच्च स्थान मिलता । इनके काव्यों 
में वेराग्य और भक्ति प्रधान है ओर मन तथा ब्रह्म को लक्ष्य कर ही 
ये सब लिखे गये हैं। कुछ कल्पना के सुन्दर तत्व भी इनमें हैं | 

जीजी माँ में जितना तौंजन्य और सदमाव' है उतनी ही परिपक्षता 
तथा दूरदशिता भी है। इनको छुलना असंभव नहीं तो कठिन तो 
अवश्य ही है। व्यवहार बुद्धि का प्राधान्य इनमें बहुत अधिक है। कविता 
करने की अपेत्षा दिसात्र लगाने में इन्हें अधिक आनंद आता है। प्रत्येक 
बस्तु में ये अत्यधिक सावधान हैं. और सावधान रहने के लिए कहती 
हैं| इनकी दृश्टि से कदाबित्‌ ही कोई वस्तु बच जाठी हो | 

काम करने से ये कभी नहीं यकर्ती, साथ ही इनका कर्मेयोग शुप्क 


>++>३०- 


जीजी माँ 


भी नहीं हैं| इनमें कतंत्र की कठोरता के दर्शन नहीं होते पर काम 
करने की सहज प्रसन्नता दिखाई देती है। यक्षमदर्शिता .तथा कार्य- 
कुशज्ञता इनमें है और दूसरों में हो तो इन्हें अच्छी लगती है | मितब्ययता 
तथा सादगी का पाठ ये सब को सिखाती ह | 

जिस युग में ये पैदा हुई थीं उसके और आज के बीच तीन पीढ़ियाँ- 
ही गई है, परन्तु प्रत्येक पीढ़ी की प्रगति के साथ चलने में ये कभी पीछे 
नहीं रहीं | अपने झ्रुग में ये बहुत आगे रही होंगी। इसके बाद वाले 
युग में साथ-साथ रहों।| थ्राज के युग में प्रगति को भावपर्ण नेत्रों से 
देखती हैं ओर परिवार में इनके प्रतारित संध्कार के प्रताप से प्रगति 
करते हुए मी कोई भाग-दौड़ था संबर्प करता हो, ऐसा दिखाई नहीं देता । 

जब समाज मे निरक्षरता थी तब इन्होंने साक्षरता प्राप्त की | जब रस 
नहीं था तब इन्होंने काव्य रस का सुजन किवा। जब सॉड्य-दष्टि नहीं 
थी तब इन्होंने कला-प्रेम का विकास किया और यह सब्र इन्होंने अकेले 
बिना किसी की सहायता के ही किया । 

इन्होंने आदश गह-जीवन व्यतीत किया ओर संतान मे भी उसका 
बीजारोगश किया | थे से दुःख का काया निकालने का मंत्र वे जानती 
थीं। संस्कार, शांति और प्रेम का खोत उन्होंने परिवार में वहा दिया 
ओर स्वाश्रव से तथा साहस खोपे बिना जीवन रूपी नाव को बिना कहीं 
टकराये हुए किनारे पर ले आयी | 

अत इनके जीवन की संव्या है, सुरम्य ओर शांतियूर्ण। अपने 
विविध रंगी तेज से अ्रव भी ये सवके जीवन पर एक झुद्दर प्रकाश 
डालती हैं । सत्की कठिनाइयों को ये वथाशकि दूर करती हैँ और 
यथाशक्ति कर्म कर सबकी सहायता करने का प्रशक्ष करती हैँ । जीजी 
माँ नहीं होगी तब तो इनका स्थान सदेग ही रिक्त रहेगा। ह 

जीबी माँ अर्थात्‌ सफल जीवन की साकार प्रतिमा वह कोन नहीं 


ऋटेगा ! 
++>७9१-०+ 


गांधीजी का साहित्य में स्थान 


शा 





ँ 
किसी ने कहा है कि गांधीजी का साहित्य में कहाँ स्थान है, इस 
विषय में एक भाषण भी है। मेंने कहा, 'केवल साहित्य में ही गांधीजी 
का स्थान क्यों हो ! उनकी सर्वव्यावकता देखते हुए, तो उनका स्थान 
एक-दो नहीं बहुत-सी वस्तुओं में निश्चिः करना है। साहित्य तो इन 
बहुत सी वस्तुओं म॑ं से एक है ओर वह भी मुख्य नहीं, वरन्‌ 
ग्राकश्मिक है। 
वास्‍्तव में गांधीजी का स्थान किसमें है यह निश्चय करने की अपे्धा 
किसमें नहीं है यह निश्चय करना भी कठिन है। वे क्या-क्या हैं इसका 
एक यूचिपत्र ही तैयार करें तो कम से कम एकाध प्रृष्ठ तो भर ही 
जायगा। वे एक महान्‌ संत पुरुष हैँ; सत्याग्रह के उपदेशक तथा 
प्रचारक हैं। देश का भविष्य इनके एक शब्द की तराजू में तोला 
जा सके ये ऐसे राजनेतिक या राजनीतिज्न (दोनों में से जो शब्द 
सबको अच्छा लगे ) हैं। ये हिंसक और अहिसक दोनों हैँ | ये बहुत 
बढ़े सिद्धान्तों की स्थापना करते हैं और इसी प्रकार उससे बड़े सिद्धान्तों 
“ का खण्डन भी करते हैं। 
तदुपरान्त ये आज्ञापालक पुत्र हैं आर पत्नी, पुत्रों तथा शिष्यों से भी 
कठोर श्राश्ञपालन चाहनेवाले पति, पिता और गुरु हैं । अपने प्रयोग 
.. की कसौरी पर किसी को भी चढ़ाने से ये किककते नहीं और डाक्टरी 
' से लगाकर भोजन बनाने की कला तक ये सभी में निष्णात माने जाते 
हैं। एक बड़े अत्याचारी भी हैं ओर आश्रम-वासियों के आहार, निद्रा 
++>७२०-- 


गांधीजी का साहित्य में स्थान 


इत्यादि से लगा कर तकली कातने तक के सन्न नियम ये स्वयं बनाते 
ओर सहृदय निर्दयतापूर्वक सत्रसे उनका पालन कराते हैं। शिक्षा के 
विधय में मी इनका अपना विशेष अध्ययन तथा अनुभवपूर्वक ग्रहण 
किये हुए विचार हैं और गीता, कुरान, वाइत्रिल इत्यादि सब घर्मशाल्रों 
का अध्ययन करते हैं। इन्हें रई कातना तथा रुई परखना आता है । 
ये कपड़े की जाति बता सकते हैं। कला के विषय में भी इनकी अपनी 
व्याख्या है और संगीत भी इन्हें अच्छा लगता है। संक्षेप में कहें तो 
इन्होंने जीवन के सभी प्रदेशों में विचरण किया है, उस विपय का 
अध्ययन किया है या .विचार “किया है। ऐसा सूर्य की तरह सर्वंविद 
मनुष्य साहित्य पर भी अपना प्रभाव डाले यह स्वाभाविक ही है | परन्तु 
सूर्य की तरह इनका ताप उम्र है और इसी कारण दूर से ये उष्णता देते 
हैं | पास जाते हुए. बहुत से कुलस जाते हैं। 

ऐसे गांदीजी को केवल एक सर्वविद्‌ का विशेषण ही पर्याध्ष नहीं | ये 
तो सर्वमान्य, सर्वभक्ची, सार्वजनिक इत्यादि और बहुत दूसरे विशेषणों के 
अधिकारी हैं और साहित्य में भी इस सर्वभक्ती महापुरुप का एक महान्‌ 
स्थान है| 

[३ ।] 

एक बात सबको माननी पड़ेगी कि गांधीजी के गुजरात में आने से 
पहले साहित्य साधारण मनुप्य के लिए विलकुल न या। इससे पहले जो 
अच्छा साहित्य लिखा जाता था उसे वास्तव में थोड़े से साक्षर-रत्न ही 
पढ़तें तथा समझते थे । साधारण मनुष्य तो केवल साधारण कथाएँ या 
कुछ उपन्यास ही पढ़ते थे । 

यह भी सच है कि उस समय के साहित्य में आज जसी विविधता 
न थी। गंभीर निर्ंध, अधिक अंशों में काव्य तथा एक दो उपन्यात्त 
और एक दो नायकों के अतिरिक्त उस समय का साहित्य दूसरे विषयों 
में माथा न मारता था। उस समय के साहित्य में आज का-सा पौरुष 


--७२०- 


रेखाचित्र 


न था, विविधता न थी, रस न था। जब से गांधीजी ने नव जीवन! 
द्वारा गुजराती में लिखना आरंभ किया तब से उनकी ओर समस्त 
जनता का ध्यान आकर्तित होने के कारण इनका साहित्य भी लोगों में 
खूब आदर पाने लगा । गांधीजी का उद्देश्य विद्वानों को प्रसन्न करमा कभी _ ५ 
भी नहीं रहा, बल्कि इन्होंने तो अडमदाबाद की सादित्य परिषद्‌ के समय ) 
'कहा था कि ये ऐसा सादित्य सूजन करना चाहते थे कि जिसे बैल हॉँकने 
बाला किसान भी समझ सके | इसलिए इनकी भाषा साधारण से साधारण 
है तथा उसमें शब्दों के घरेलु प्रयोगों को बहुत अंशों में स्थान मिला है । 
इस सबके पीछे विचार ओर भावनाओं का जोर होने से और विशेष- 
कर सरकार के विरुद्ध आंदोलन की तीत्रवेगी परिस्थिति का उसमे मिश्रण 
होने से सर्वत्र एक प्रकार की निर्मबता, तल ओर शक्ति के दर्शन 
होते हैं । 

ओर इससे एक लाभ हुआ । जिस साहित्य के श्रधिकारी श्रमी तक 
थोड़े से तरिद्वान ही समके जाते थे उसकी कृत्रिम मर्यादा भंग हुई ओर ८ 
जन-समाज का एं बड़ा वर्ग साहित्य में रस लेने लगा। माना कि इससे 
लाभ और हानि दोनों हुए हैं। धगश! जैसे कर्शंकढ़ शब्द-्ययोग की 
विरासत गांधीजी की है | जो साहित्य 722770८:४८ए के नाम पर खेत 
जोतनेवाले किसान पढ़े इसके बदले पानवाले की दूकान पर औीडी 
सुलगाते हुए पढ़ा जाय टैसे साहित्य के आज पोये के पोये लिखे जाते 
हैँ तथा पढ़े जाते हैं और इसमें भी घूम-फेरकर इसी प्रभाव को विक्वत 
खरूप में देखा जा सकता है। पर इससे मी लाभ हुआ है। गांधीनी 
के बार भात्रा अमिमान अधिक बढ़ गया है। लोककथा-साहित्य की 
खोज भी बाद में ही होते लगी है। इसमें भी 'फुहड़ की फजेती? जैसे 
हास्पास्पद और विवेकहीन काब्यों के संग्रह देखने में थाने लगे हैं। 
परन्तु इसमें से बहुत से संग्रह सुन्दर तथा उपयोगी हैं, वह हमें मानना 


पड़ेगा | 
>+-- 9 ---+ 


गाँधीजी का साहित्य में स्थान 


गांधीजी का प्रमाव शुद्ध साहित्व की अपेक्षा जर्नलीज््म पर तथा 
आंदोलन साहित्य पर अधिक जान पड़ता है | प्रत्रास-चर्णंन मी उसी शैली 
में लिखे जाते हैं, विचारों को सरल जाग द्वारा वेगभरी शैली में सरलता 
से रखने का. गुण भी गांधीजी के ग्रमाव का ही ऋणी है । 

परन्तु साहित्य गांधीजी का जीवन कार्य नहीं है| इनके राजनैतिक 
जीवन के साय-साथ आ पड़ा कार्य हे। अदम्॒त व्यक्तित्व वाले मठ॒प्यों 
के सीधे या टेढ़े समी तरह के कार्यों पर उनके व्यक्तित्व की छाप पढ़े 
बिना नहीं रहती यही आत यहाँ मी हुई । ओर जैसे-जैसे इन्हें वाणी के 
साधन को अधिक से अधिक प्रमावशाली बनाने की आवश्यकता पढ़ी 
चैसे-वैसे उसमें अधिक से अधिक गति भी आती गई। 

परन्तु एक बात यहाँ उल्लेखनीय हढै। गांबीझे के जेल जाने से 
पहले, उनके सुन्दर से मुन्दर लेख मूत्र रूप से यंग इंडिया? के लिए 
अंग्रेजी में लिखे गये थे और इन्हें ऐसी ही सुन्दर गुजराजी में रखने के 
लिए, स्वामी आनंद का मी का कुछ कम-नहीं। गांधीडो गुजराती की 
अपेक्षा अंग्रेजी में अधिक अच्छा लिख सकते दे और छोट-छोडे यद्ञात्मक 
वाक्यां द्वारा बहुत कुछ कह सकते है। 

गांधी-शैली के प्रधान अनुवाद अबवा इसका विकास करनवाले 
इस समय हमारी इृटि में चार व्यक्ति दे: काका कालेलकर, श्रध्यापक 
रामनाराबण, श्री महदेव भाई और किशोरीलाल मशब्वाला। इसके 
बाद लुगतराम दवे, रसिकलाल पारीश्व, नरहरी पारीख इस प्रकार बहुत 
से नाम गिनाये जा सकते हैं । 


६ 


20% 


है 


श्री आनंदशंकर भाई 





समत्त विरव मे एक धारणा फेली हुई है कि मारतवर्ष अर्थात्‌ सोने- 
चोंदी का संग्रह करनेबाला देश। भारतवर्ष की झ्लियाँ सोने-चॉदी से 
अपने शरीर का ऋज्ञर करती हैं। जब वर विवाह करने श्राये तो 
सुनहरी, उपहरी, जरकशी जामे से ससुराल वालों के मन हरने का 
प्रयक्ष करे और सातस्त दातौन के लिये भी जेँवाई को सोने की शलालें 
चबवाने की अमिलाथा रखे । जीवन की लगभग सभी बातों में सोना- 
चाँदी, स्वर्शिम या रजत बिना पूर्णंता नहीं आती वहाँ खर्ण और रजत 
महोत्सव का विदेशी व्रिचार भी अपने देश में पूर्णतया स्वदेशी रूप ही 
धारण कर लेता है और प्राचीन काल से यह परिवाटी हमारे यहाँ चली 
आती हो, ऐसा लगता है । 

ता० २२ दिसंबर को ऐसा ही एक रजतोत्सव “वसंत? के संपादक 
श्री आनंदशंकर भाई के लिए अहमदाबाद में मनाया गया। सुबर्ण 
महोत्सव का इस पीले युग में नम्न और छोस नाम रखने से इस रजतोत्सव 
का शुभ्र रंग अधिक आकर्षक तथा शुत्ति खरप वाला लगता है । 
हे आज से चार पाँच वर्ष पूर्व इस रजतोत्खव के अधिकारी महोदय का 

: रेखाचित्र देते हुए मेने लिखा था--- 

झा “यदि हिम-मुकुट से आच्छादित शिलरों वाला पर्वतराज हिमालव 
... बोलता होता तो संसार का कोई बालक उससे अवश्य प्रश्न पूछने जाता, 
“*पव॑तराज ! तुम्हारे शिखरों पर दिन ग्रति दिन हिम के पते चढ़ते जाते 
हैं और हिम पिधल पिघल कर सरिताओं में मी वहता रहता है तव इस 





श्री आमंदर्शंकर भाई 


हिम का खमाव कैसा है ! पिघ्रलता है तो फिर बढ़ता कैसे है ! और 
पित्रलता है फिर भी बढ़ता तो है हीं? बालक पर भी गंभीरता के 
पतं चढ़े होते है कि प्रश्न में निहित मुखेता को वह नहीं समझता और 
ब्ृद्ध तथा तपस्वी परवेतराज भी गंभीरता से गर्दन हिलाकर कह दे कि 
_ दोनों बातें सत्प हैं। हिममव होना और पिघलना--ये दोनों ही 
प्रकृत सत्य हैँ ।? उस बालक के साथ हिम के पर्त किस प्रकार बनते हैँ 
इस चर्चा में उलमने का या तो पर्व॑तराज को अवकाश नहीं रहता अ्रथवा 
उसे समझ सके इतनी शक्ति का बालक में आमास नहीं होता। बेचारा 
बालक पत्रंतराज की अस्पष्टता को अथवा दूध और दही में पेर रखने 
बाली नीति की फरियाद करता चला जाता हैँ। पर्ब॑तराज बालक की 
मूर्खता पर थोड़ा मुप्कराकर शांत हो जाता हे। कुछ ऐसी ही ब्रात आनंद- 
शंकर भाई और जनसा को है ।?? 

अब मी यह उपमा कदाचित्‌ ही गलत कही जा सके | हिम की ठंड 


45, 


से ठिठुसने के भय से गर्मी चाहनेवाला हमें से बहुतों का स्वभाव इन्हें 
दूर से ही नमस्कार करता है और इस अकार इनको एक व्यर्थ के त्रास 
से बचा देता है । परन्तु हिमाच्छादित पर्वतों की लॉधने का इस साहसिक 
जमाने में कोई उस टिम-सदश समझे जानेवाले व्यक्ति के पास जाने की 
चृष्टता करे तो उसके उस प्रथज्ञ का फल कभी भी निप्फल नहीं 
जा सकता । 

ओर बर्फ में जिस प्रकार गर्मी है उसी प्रकार इनकी शीतलता में भी 
उप्णुता है। वर्फ की तरह सर्य-किरणों के ताप से इनका दृदय भी 
पिधलनेवाला है । पर वह पिब्रलता हुआ दिखाई नहीं देता । बात यह है 
कि जहाँ तक हो सकता है, ऐसे गर्म प्रदेश में ये आने का प्रयत्न ही नहीं 
करते और सदैव शीवल अंतर के एकांत में ही बर्फ को तरह जम 
जायँ इस प्रकार अपनी सभी भावनाओं को संग्हीत रखते हैँ। परन्ठु च्न्फ 
में रदी सभी वस्तुएँ जिस प्रकार ताजी रहती दईं, विगड़ती नहीं, उसी प्रकार 

ध जाओ) ५ 


रेखाचित्र 


इनके भात्रों में भी सदैव ताजंगी ही रहती है। 
इसी उपमा को यदि आगे चलाये तो हिमालय से वसंत ऋतु 
से जिस अ्रकार विविध-तापहारिएणी येगाजी निकलती हैं उसी प्रकार वसंत 


में प्रवाहित इनकी साहित्य-सरिता बहुत से विद्या-रसिक जनों की तथा - 


बुकाती है और उनमें एक प्रकार की नदीन भाव स्फूर्ति का संचार 
करती है | परन्तु उसका वाध्तविक आनंद तो केवल अधिकारी पुरुष ही 
ले सकते हैं । 

आनंदशंकर भाई का जीवन एक प्रकार से स्थिर है, फिर भी 
बहुत सी प्रातियों और साहस के आनंद का आभास उसमें दिखाई देता 
है| साधारण मनुष्य को श्र्थ-प्राति में जितना आनंद आता है उतना ही' 
आनंद शन-प्राति में आनंदशंकर भाई भी लेते हैं। जिज्ञास की तरह 
इनकी तीव्र जिज्ञासा ज्ञान के नय्रे-नये प्रदेशों की खोज करती है और 
चमत्कृत कर देनेवाले नवीन इृष्टिकोशें के आगे प्रशंसा म॒ग्ध हृदय से 
ये थम जाती है | इन सभी चमत्कारों का वर्णन ये हमारे सामने नहीं 
करते, क्योंकि इनकी ऐसी धारणा है कि इसका आनन्द प्रत्येक को स्वयं 
ही लोनना चाहिए। परन्तु फिर भी हमारी जिज्ञासा-इत्ति को प्रोत्साहित 
करने और रप्त का संचार करने के लिए अपने थोड़े से अमृत बिंदुओं को 
चखा कर हमारी ज्ञान-गिपासा को सतेज कर देते हैं । 

प्रत्येक के दृशष्टिकोशों का अध्ययन करना तथा अत्येक बात के दो: 
पहलुओं की खोज करना यह गुण इनमें विशेष है| इनका उद्देश्य अत्येक 
के साथ न्‍्वाय करना होता है पर एक ही इशथिको ए से देखनेवाले हमारे 
संकुचित हृदय में उससे संदिग्धता का आभास होने लगता है| निर्णय न 
करने की शक्ति हमें असामझत्य में डाल देती है। परन्ठु इससे ये संकीरो 
बन जायें, ऐसा हम कमी न चाहेंगे । 

आनंदशंकर भाई अपने को सामान्य वर्ग का मानते हैं | परन्धु इनका 
विशेष वर्गीय खमाव जाने-अनजाने छिंतनि पर भी नहीं डिपता | उनकी 

>--59८६---- 


ओऔ आनंदर्शकरभाई 


रसदृत्ति उन्हें कोई भी साधारण वस्तु पसंद नहीं करने देती श्रीर इनका 
खत्व कैसा भी आवरण इन्हें न छ सके सदेव इसी की चिता रखता दे । 

बहुत कुछ अंशों म॑ महापुरुषं की तरह इन्हें मी अपनी शक्तियों के 
विकास का विशाल क्षेत्र परदेश में ही मिला हैं| गुनरात कलिज के एक 
प्रोफतर के रूप में विद्याथियों के स्मरण देश में वे सर्देव ही चिरंदीवी 
रहेंगे, तो भी इनका वास्तविक तथा महान संम्मरण तो हिन्दू यूनिवर्सिटी 
के. विशाल ज्ञान-मंदिर के ड्गमगाते आधार-त्तंभ को सुद्ढ़ बनाने 
में ही है। 

- इन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी हैँ ओर भी लिख सकते थे। इन्होंने 
अपने जीवन का बहुत बड़ा भाग छोटे-छोटे प्रथलों में ही व्यय किया हैं; 
एक बढ़े प्रयक्ष के लिए निश्रय ही उससे आधा भ्रम ही बस होता। निष्फलता 
के मार्ग से वे सदेत्र दूर ही रहे हैं, परंतु एकाथ निष्फलता उनके जीवन 
मे कदाचित्‌ ओर भी अधिक उत्साह ला देती | 

क्या रजत के समान श्वेत और निर्मेल प्रतोभनों से भर इस संसार 
में प्रकाश-एतंभ की तरह.रिथिर, ऊँचाई से प्रकाश फेंकता हुआ इनका 
जीवन बहुतों का मार्ग-दशेक बना होगा ? 


23... -९१०५०क०७ नमक ७भभ 42५५८ ०पमन+ रकम 3+०) ८००: : : फट. न व लधिि स्टाफ का चर... 


गुजरात के दो विद्रोही 





श्री मेघाणी की कहानियों के वाद गुजरात में विद्रोहियों के प्रति रुचि 
अढ़ी । मेघाणी के जिद्रोही हमने जीवित नहीं देखे, इसीलिए, उनके विषय में 
'उनकी तथा हमारी धारणा कल्नना के रंगीन चशमें से देखकर निर्धारित 
की हुई होती है। अत्याचारी को भंग करनेवाले, दुःखियों की सहायता 
करनेवाले, पापी का जिध्वंस कर सत्तियों को मुक्त करनेवाले और 
आवश्यकता पड़े तो किसी प्रकार का भेद-माव न रखते हुए, मार्ग में जाते 
हुए राहमीरों को लूटने तथा वर-बधू को कंगन तोड़नेवाले--ऐसे ये 
विद्नोडी हमारे श्रद्धू त रस को पोजित करते हैं और इनके कार्यो' की हम 
साशचर्य प्रशंसा भी करते हैं । 

श्री विद्चल माई और श्री वल्‍्लभ भाई को देखकर मेरी भी इन 
विद्रोहियों के प्रति कुछ-कुछ ऐसी ही कल्पना जगती है। ये दोनों भाई 
ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जिद्रोह करने पर तले हैं, यह कह डालना तो 
एक भिल्कुल साधारण-सी बात है। एक ने अपने पिद्रोह के लिए समस्त 
गुजरात का ज्षेत्र निश्चित किया हे और दूसरे ने धारा समा के स्पीकर? 
के० अल्युश्ये आसन पर बैठकर इस विद्रोह के यूत्र उन्चारण करने का 
कम बना रक्‍्खा हे अनुभव्यूर्ण और कुशल इन दोनों भाइयों की 

ड्ाएँ समरत श्रिय्श सरकार के हँसा रही हैं । 

दोनों भाई पूर्णतवा समय-साधक (07007:ए०7%/) हई यह कहें तो 
कदाचित्‌ इनके प्रति कुछु अन्याय न होगा। अवसर को परखना तथा 
उसका लाभ उठाना, सचमुच इन दोनों भाइयों को बहुत झुन्द्र ढंग से 
आता है। इनका मोदरा अभी तक एक भी दाँव नहीं चूका | चाहे इनका 


ब्व्न्् 0 चलन 


आती ७20०: के. 


$ 


गुजरात के दो विद्रोही 


लक्ष्य सरकार हो या कोई इनका प्रतिस्पर्धी । और ऐसे ही मर्दानगी के 
दाँव खेलने में इन दोनों भाइयों के जीवन की सार्थकता दिखाई देती है। 
दोनों की सत्तार्काज्षा सीमातीत है पर उसे व्यक्त करने की तथा साधने 
की रीति दोनों की अलग-अलग । छोटे माई शांति और मधुरता से 
हृदय को वश में करते हैं और सत्य और धर्म की शरण खोज कर उन 
पर राज्य करते हैं| बड़े भाई निर्दयता से शिकार को संडासी-चाल से 
पकड़ते हूँ और उसकी व्याकुलता में ही अपनी विजय मानकर प्रसन्न होते 
हैं| दोनों भाई किसी से भी दव नहीं सकते, वरन्‌ सब्र को दवा 
दें, ऐसे हैं और यदि भूल-चूक से खयं ही दब जाये तो उसका डंक धोने 
वाला एसिड विज्ञान द्वारा अभी तक किसी ने नहीं खोजा है | 

ओर 'साहसी” शब्द इन्हीं क्रे लिए उपयोग किया जा सकता है । इनकी 
हिम्मत गांधीजी की तरह थोग से प्राप्त नहीं हुईं और पंडित नेहरू की 
तरह चुद्धिजन्य भी नहीं है | इस साहस को लालाजी की तरह देशभक्ति 


* से प्रेरणा मिली है यह भी नहीं कहा जा सकता ओर न यही कहा जा 


सकता है कि डॉ० मुजे की तरह निर्मलता के दुःख से जन्मी है। 
इन दोनों भाइयों का साहस श्ञानतंठुओं की दृढ़ता के परिणामस्वरूप 
खभावजन्य ही है । 
अपार आत्म-बलिदान इन दोनों भाइयों ने किया है, पर उसे व्यर्थ 
ही नष्ट कर देने की नादानी इन्होंने नहीं की | प्रत्येक वस्तु के परिणाम पर 
अपनी दृष्टि रखते हँ और प्रत्येक बात का हिसाव वे पहले से ही लगा 
लेते हैं। अर्थ-साधन के समय व्यर्थ की आशंकाएँ अथवा संकल्प-विकल्प 
उन पर हात्री नहीं होते । योगियों की तरह जब संसार सोता रहता है 
तब भी वे जागते ही रहते हैँ और शत्रु के झक्रमण के समय हथियारों 
पर मुर्चा न लगा हो इसकी चिंता भी वे सदैव रखते हैं | 
-. इनका अमोब अख्न है व्यंग्य | प्रतिस्पर्धी को उलका कर ऐसी फजीहत 
करना कि वह नीचे से ऊपर न देख सके--यह इनकी प्रिय्र क्रीड़ा है । 
अप शिकटनल 


' रेखाचित्र - 


वारडोली में यह श्र ब्रहुत ,उपयोगी सिद्ध हुओ। बड़ी धारा सभा में 
प्रतिदिन इन पर सोना काय जाता है। विनोद में ये पत॑ंदार हल की 
फाली की तरह हैं--कठोर भूमि को उधेड़कर चूर-चूर कर देने की 


चछमता भी ही है और इस अकार जो भूमि जोती जायगी उसमें निहित- ३ 


बीजों को उगाने की कला में भी इन दोनों भाइयों ने - एक विशेष कौशल 
दिखाया है। 
: समय को परखना और तदनुसार रूप बदलना दोनों भाई जानते हैं । 
महत्ता को बढ़ाना ओर रक्षा करना भी आता है| 
सत्य और असत्य से दोनों अपने को परे मानते हुए भी छोटे भाई 
गांधीजी के सत्संग से असत्य बोलना भूल गये हैं। बड़े भाई केवल अच्छे: 
काम के लिए भ्ूठ बोलते हैं इसलिए यह दुगगुण सदशुण में परिवर्तित 
हो गया है | 
इन दोनों भाइयों को वास्तव में संर्कारी नहीं कहा जा सकता, फिर 


भी दोनों सुधरे हुए हैं, यह तो कहना ही पढड़ेगा। दोनों में किसानों , 


की-सी असंस्कारिता है--किसानों की-सी स्वार्थपरता भी उनमें लगभग 
वैसी ही है । दोनों की कीर्ति-ब्वजा इस समय भारत में चहुँ ओर फहरा 
रही है । और दोनों का नाम इस समय कांग्रेस के प्रमुख पद से भारत 
के वायसराय पद्‌ तक के लिए पुकारा जाता है। दोनों भले भी हैं और 
बुरे भी । एक के पीछे कुटम्तर का जंजाल है ही नहीं ओर दूसरे में कुठ्धम्ब 
के प्रति कोई ममता नहीं | फिर भी क्‍या दोनों भाई “बसुधेव कुटुम्बकम!? 
: में विश्वास रखनेवाले नहीं लगते ! गुजरात इनका देश है ओर उसके 
: ये दोनों भाई संरक्षक हैं। किसी का साहस नहीं जो इसमें अपना मेंह 
खोल सके। ह 
लोकप्रियता की सैकत थूमि पर दोनों व्यक्ति खड़े हैं, यदि यह 
फिसल जाय तो अपने को समालने जितना स्थास्थ्य इनमें है। बढ़े भाई 
प्रपंच करना जानते हैं और प्रपंच परखना भी। छोटे भाई प्रपंच परखते तो: 


इक 


गुजरात के दो विद्रोही 


हैँ पर.जब प्रपंच रचते हैं तो वह प्रप॑च प्रपंच रूप में नहीं रहता | 

कितने ही गुणों में दोनों भाई इस प्रकार एक-से लगते हैं फिर भी 
देखने में दोनों बिलकुल भिन्न हैं। विशाल ओँखें और बड़ी-बड़ी मल 
वल्‍लभभाई का चिह्न है ओर लम्बी दाढ़ी तथा चालाक ओऑर्जे विदल- 
भाई का विशेष चिह्न | विहलभाई धूतंता के अवतार हैं तो वल्लममाई 
सीधी तथा प्रभावपूर्ण रीति से बतंते हैं। छोटी-छोटी बातों में मित्रों 
ओर सम्बन्धियों को परेशान करने में तथा क्रर व्यंग्य करने में विहल- 
भाई को आनंद आता है । वललमभाई भी ऐसा करते हों, यह 
मालूम नहीं । 

वि्चलभाई अपने से अधिक प्रतापी को सहन नहीं कर सकते | 
वल्‍लभभाई अपने प्रताप के लिए नवीन क्षेत्र का ही निर्माण कर लेते 
हैँ । वल्लभमभाई माव जगा सकते हैं तो विद॒लमाई केवल भय प्रेरित 
कर सकते हैं । 

परन्तु ये दोनों भाई एक शक्तिशाली चट्टान की तरह दृढ़ हैं। ऐसे 
नहीं है कि अपने ऊपर लिये हुए. काम को पूर्णतया निभा देने में साहस 
खो बैठें | देशवासियों के दुःख दूर करने और विदेशी सरकार की नींव 
उखाड़ने के लिए ये दिन-रात प्रयक्षशील हैं। दोनों बहादुर हैं। निर्नलता, 
निस्सहायता अथवा दासत्व के कारण अपमान का एक घुट दोनों में से 
एक भी गले से नीचे नहीं उतार सकते। ये दोन होते तो गुजरात 
आज मर्दानगी के बहुत से पाठ बिना सीखे हुए. ही रह गया होता ! 


>ई+ 
हर 


नरम क ला बाय 


जीवन-चित्र 


प्रकीर्ण विभाग 





कर क्‍ 


औषदी 


हजारों वर्ष बीत गये पर आर्थावर्त में स्रीत्व के आदर्श की कल्पना 
चहुत कुछ अंशों में ज्यों की त्यों बनी हुई है। आर्यावर्त की आदर स्त्री 
अर्थात्‌ प्राचीन और निर्धारित हुई उपमाओ्रों में समा सके ऐसी सुन्दर, 
चाहे जैसे पति को भी देवता माननेवाली पतित्रता; युुगों से चली आयी 
मान्यताओं को आदर करनेवाली आर्या और उन नियमों के अनुसार 
आचरण करने में तत्पर यहिणी; दुःख सहने में बीर-सहचरी ओर 
पति को प्रसन्न करनेवाली पत्नी | थोड़े या बहुत अंशों में जिस स्त्री में 
इतने लक्षण हों वह आदरश सत्री कही जा सकती है। इससे अधिक गुणों 
की आवश्यकता स्त्रियों को नहीं है इस धारणा से अथवा ऐसी ह्त्रियों 
की ओर शंका की दृष्टि से देखा जाता होगा, इसलिए ज्वलंत और प्रतापी 
सत्रीत्व के उदाहरण केवल अपवाद रूप में ही पौराणिक साहित्य में 
मिलते हैं | 

द्रौपदी भी एक ऐसा ही अपवाद है । देवी सीता की देवी आत्मा में से 
सर्व॑स्व समर्पण करनेवाली भक्ति उमड़ती है | शझ्ुंतला के झूदु अंतर में 
से नम्नता और प्रेम करता है। उमा देवी के भीने हृदय में से मातृत्व 
का रस बहता है। परन्तु शक्ति और प्रेरणा की अधिएनी केबल) द्रोपदी 
ही है | सोलह हजार पटरानियों के खामी श्रीकृष्ण वातुदेव के सखीपद 
के थोग्य तो केवल द्रीपदी ही है । महामारत के युद्ध को जीतनेवाली तथा 
पांडवों के दृदय-बल की संरक्षिका केवल द्रौपदी ही है ! 

अग्नि सदश जाज्वल्यमान तथा प्रदीत् इस स्ली का जन्म अमभिकृंड 

+-+-८5४७४---- 


रेखाचित्र 


से हुआ, ऐसा माना जाता है। पांचाल देश के प्रतापी द्रुपदराज की पुत्री 
और कौरवों के राज-गुरु द्रोण का वध करने के लिए निर्मित धृष्् मर 
की बहिन थी। रूप में श्यामवर्ण होने पर भी अद्सुत रूपबती थी। 
कदाचित्‌ उसका खरूप दृष्टि को आकर्षित करे ऐसा नहीं, वरन्‌ जिस पर 
दृष्टि ठहर न सके ऐसा होगा । हा 

उसके संपूर्ण जीवन को अद्भुतता, असमान्यता और साहस की 
'परंपरा के रूप में ही देखा जा सकता है| अकस्मोत्‌ से अथवा वह स्वयं 
« आकस्मिक धटनाओं को प्रेरित करनेवाली हो इसलिए. पौराणिक सत्री- 
सृष्टि में उसका स्थान तथा उसका व्यक्तित्व सबसे निराला है'। प्राचीन 
आर्यावत में यह एक ही ञ्री ऐसी है कि जो अपने सदगुणों की अपेक्षा 
व्यक्तित्व के लिए अधिक सम्माननीय बनी है। इसमें भी सदगुण हैं तो 
सही, पर साधारण स्लियों की अपेज्षा इसकी शक्तियों के प्रसार का क्षेत्र 
विशाल था, इसीलिए. इसके सदृगुणों को रुढ़ियों के संकीर्ण बंधंन में 
बाँध देना शक््य न था | सदगुणों की व्याख्या हम जिस प्रकार आज 
करते हैं उतनी कठोर कंदाचित्‌ उस समय थी भी नहीं । 

हमने एक प्रकार की ऐसी धारणा बना ली है कि प्राचीन समय में 
सदगुण और समाज-व्यवस्था दोनों आज से अधिक सुन्दर ओर बढ़े-चढ़े 
थे।| प्राचीन काल की समाज-व्यवस्था में स्लियों का स्थान क्या था इसके 
काल्पनिक चित्र खींचने की अ्रपेत्ञा यदि हम मिलनेवाले साधनों तथा 
वास्तविकता का थोड़ा भी आधार लें तो.क्या ये चित्र इतने ही सुन्दर 
बन सकते हैं ! केवल महाभारत के ग्रंथ को ही श्रद्धा की अ्पेत्षा 
* ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक पढ़े और उसमें आनेवाली असंगत और 
विचित्र वातों में तनिक गहरे पेैठें तो क्‍या हमारी दृष्टि पर पढ़े हुए 
आवरण अधिक समय तक टिक सकेंगे ? उस समग्र के समाज में नीति- 
, व्याख्या हमारे समय से मिन्न थी यह सच है । फिर उसके बाद जैसे-जैसे, 
इस व्याख्या का सख़रूप बदलता गया वैसे-वैसे उसे अनुकूल बनाने के 

_- व्यप्-- 


द्रौपदी 


लिए इस शाल्लीय अंथ पर चहुत से प्रयोग हुए। इसमें निहित सच्ची 
घव्नाओं को तोड़-मरोड़ कर उनका खरूप बदल देने का प्रयक्ष किया 
गया | परिणाम यह हुआ कि न तो इसका मूल स्वरूप ही रहा ओर न 
नवीन खरूप ही बन सका, फिर भी इसके आस-पास उगी हुई नवीन 
लताओं को थोड़ा काय्ने-छॉव्ने का परिश्रम करें तो इसके मूल स्वरूप 
की कुछ मॉँकी हुए बिना नहीं रहती | 

द्रौपदी का विवाह भी एक विवादास्पद विपय है। एक स्त्री के पॉच 
पति होने पर भी वह सती कही जाय, क्यों ? और कही भी जा सके तो 
आजकल की नैतिक भावना के साथ क्या इसका सामझस्य हो सकता 
है? न भी हो फिर भी शास्त्कारों ने इसे सती माना ही है। इसका 
क्या तातय॑ है ? ऐसी अनेक प्रश्न-परंपरा इसके विप्रय में हुए बिना नहीं 
रह सकती | ु ह 

केवल शारीरिक पवित्रता के दृष्टिकोण से ही यह प्रश्न-परंपरा संपूर्ण 
नहीं कही जा सकती । हमारे यहाँ तो सतीत्व मनसा, वाचा, कर्मणा इन 
तीनों प्रकार से पालन करना होता है। भाव और भावनाश्रों को दूसरे 
सभी बिपयों से तीव्र रूप में अनुभव करनेवाली ऐसी छ्ली की अंतरात्मा 
हृदय श्रौर जीवन के ऐसे उत्कृष्ट प्रश्न के प्रति निर्लेप रह सकी होगी १ 
क्या उसके हृदय में ऐसे अलग-अलग खाने बने होंगे कि उसके 
विभिन्न अनुभवों का मिश्रण इनमें कमी भी न होता होगा ? महाब्राहु 
अजुन और शक्तिशाली भीम के साथ रुपवान नकुल और ज्योतिषी 
सहदेव क्या एक ही पंक्ति में खड़े रह सके होंगे ! सामर्थ्थ और शक्ति 
के सभी अवसरों पर उसे भीमाजु न ही याद थ्राते हैं यह क्या केवल एक 
अकस्मात्‌ ही कहा जा सकता है! मानस-शात्र इस समस्या को इस 
प्रकार नहीं सुलका पाता। और महामारतकार ने भी द्रौपदी के अपक्ष- 
पात के दृष्टांत देने की बहुत अधिक चिता नहीं की | 

किन्तु फिर भी द्रौपदी सती समझती जाती है, यह क्‍यों? रुढ़ि द्वारा 
57 


रेखाचित्र 


यह बात इसी तरह मान्य होने पर भी महाभारतकार को भी इसका 
बचाव करने की आवश्यकता अवश्य ही प्रतीत हुई है और इसीलिए 


तपखिनी रूप में उसके पूर्वजन्म की कथा तथा महादेव ने उसे बर दिया 


था यह बात उसके बचाव में ही कहनी पड़ी है | परन्तु इससे हमारी दृष्टि 
में उसका समाधान नहीं होता | 

उसका निराकरण केवल एक ही तरह हो सकता है | विवाह की 
पवित्रता की स्वीकृति ही सत्ीत्व का लक्षण है| विवाह जितनों के अथवा 
जिसके साथ हुआ हो उसके अतिरिक्त दूसरे का विचार न करना यही 
पचित्रता की मर्यादा है। उस समय ख्लियों का विवाह एक से अधिक 
पतियों से हो सकता था यह तो स्पष्ट ही है। आज भी हिमालय प्रदेश 
में और टेड आदि कितनी ही जातियों में यह प्रथा चालू है | पति के 
जीवित रहते अथवा पति न हो तथ पुत्रप्रात्ति के लिए भी स्त्रियों को कई 
प्रकार की सत्तंत्रता दी जाती थी । ऊुंती के पुत्र पांडव और विचिनत्रवीर्य 
की रानियों के पृत्र धृतराष्ट्र, पांड और विदुर इसके जीवित उदाहरण 
हैं| महाभारत के अ्रति महान्‌ पुरुषों के जन्म की कथाएँ उस समय की 
सीति का स्पष्ट चित्रण करती हैं । 


द्रीपदी को सती मानने का एक दूसरा: भी कारण है। आयी में 
स्त्रियों की महत्ता का मापदंड सती के अतिरिक्त और कुछ नहीं। सती न 
हो ऐसी रानी या वीरांगना या -विदुपी को हिंदू जन-समाज ने कभी 
सम्मान नहीं दिया | और जिस सत्री को उसके समय के नीति-नियमों के 
अनुसार सती कहने में घाघा न पड़ती हो उसकी अवशगणना न को जाय 
ऐसे व्यक्तित्व के साथ न्याय करने में शाखत्रकारों ने कोई संकोच नहीं 
किया। परन्तु इसके प्रति स्पष्ट निर्णय देने का प्रयत्ष, जैसे-जैसे नीति का 
आदर्श बदलता गया वैसे-वैसे बाद में किया गया हो, ऐसा लगता है। 
महामारत ग्रंथ आजकल जिस रूप में हमारे सामने है उसका मूल 
खरूप यह न था; इस बात के बहुत से प्रमाण मिलते हैं | समग्र के 


है ५ अब 


पट - 


द्रौपदी 

अनुसार परिवर्तन तथा मान्यताओं का उसमें समावेश कर दिया हो यह 
निस्संदेह है | 

इस महत्वपूर्ण प्रश्न के विषय में इस प्रकार अपने मन का समाधान 
करने के उपरान्त द्रौपदी के शक्तिशाली व्यक्तिव् को हम और अ्रधिक 
सरलता से समझ सकते हैं। उसके जीवन के प्रत्येक प्रसंग में कुछ न 
कुछ नूतनता अवश्य ही दिखाई देती है। और इन सब प्रसंगों में शक्ति 
के दर्शन उसके व्यक्तित्व की खास लाकज्षणिकता है। 

उसके र्लीत्व में मोहकता है और बुद्धि के ओज से वह चमचमाता 
है। सुख के दिनों में वह कृपा और अक्ृपा दोनों सुन्दर ढंग से दिखाना 
जानती है। वह गर्वमयी, मानिनी दुर्योवन के अज्ञान पर हँस सकती है, 
परन्तु कुंती की सेवा करते हुए कभी भी नम्नता का त्याग नहीं करती। 
विभिन्न तत्वों के प्रतिनिधि पाँचों पांडबों की वह प्रियतमा हो सकती है 
फिर भी भाइयों के ऐक्य में उसके कारण कभी भी विक्षञेप नहीं पढ़ता। 
वह सदेव उत्साह प्रेरित करती है और कभी भी निराश नहीं होती 
परन्तु बहुधा सब उसकी मोहकता की अपेक्षा शक्ति का अधिक सम्मान 
करते हों ऐसा लगता है। 


द्रौपदी के व्यक्तित्व को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखने पर इसमें 
विभिन्न प्रकार के प्रकाश की किरणें दिखाई देती हैं।हम इनको एक 
साथ न देखकर एक-एक की क्रमशः खोज करेंगे | 

सर्वप्रथम अपनी बुद्धि और शक्ति का प्रभाव दिखाती हुई कौरवों की 
राजसभा में हम उसे देखते हैं | पहले बह बुद्धि के प्रभाव से विजय प्राप्त 
करने का प्रयास करती है और जब प्रतिकामी दुर्योधन की आज्ञा से उसे 
सभा में लाया जाता है, वह प्रसंग मेधाविनी द्रोपदी के आत्मसम्मान का 
भान कराता है। समभापवें का एक छोय-सा अवतरण देना यहाँ अनुचित 
न होगा । 

प्रतिकामी जब उससे, युधिष्ठिर चत में हार गये हैं और दुर्योधन 


्च्टए क 5 


रेखाचित्र 


- वृम्हें दासी रूप में बुला रहा है ।! कहता है तो द्रोपदी उससे पूछ॒ुती है-- 
अरे प्रतिकामी ! इस प्रकार क्यों बोलता है ! ऐसा भी कोई राजपुत्र 
है जो अपनी स्त्री को दाँव पर रखकर पासा खेले ! द्यत के व्यसन से 
विवेकशूस्प ' राजा युधिष्ठिर मुझे हार बैठे तो कया : मेरे अतिरिक्त और 
कुछ रखने को न था ?? प्रतिकामी उत्तर में कहता है कि राजा युधिष्ठिर 
अपने भाइयों ओर स्वयं अपने को भी दाँव में हार गये और अंत में 
जब कुछ शेब न रहा तो तुम्हें भी दॉँव पर लगा कर हार गये हैं। तब 
आवेश में मरी हुईं द्रौपदी अपने मानसिक खास्थ्य को न खोकर फ़िर 
कहती है-- 

सूतपुत्र | तू पहले समा में जाकर राजा युधिष्ठिर से यह पूछ आ 

कि पहले वे अपने को हारे हैं या मुझे १? ( सभापव, अ० ६७ ) 
द्रौपदी के इस प्रश्न का उत्तर युधिष्टिर कुछ भी न दे सके और 
दुर्योधन द्वोपदी को फिर से सभा में बुलाने के लिए भेजता है। फिर 
वही प्रश्न द्रौपदी. सभा के महात्मा सभासदों से पुछवाती दे, परन्तु 
दुर्योधन के भय से कोई कुछ उत्तर नहीं देता है। अंत में दुरात्मा 
दुःशासन मर्यादा का उल्लंघ्रन कर उसे सभा में खींच लाता है, तो उसके 
क्रोध का पार ' नहीं रहता। दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि के 
अतिरिक्त और सब का अंतर इस दृश्य से विदीर्ण हो उठता है। 
ओर भीष्म पितामह कुछ सकुचाते हुए द्रौपदी के न्याययुक्त प्रश्न का गोल- 

मोल उत्तर देते हैं-- 

हे द्रौपदी ! खामी दास हो गया इसलिए, उसकी स्त्री दासी हुईं और 
/ युधिष्ठिर की परवशता देखकर तथा परवश और अशक्त बना हुआ 
स्वामी दूसरे के धन की बाजी लगाने में समर्थ नहीं, यह सब देखते हुए 
धर्म की वात बहुत सूक्ष्म है, इसलिए, तेरे उचित प्रश्न का ठीक-ठीक 
उत्तर नहीं दिया जा सकता। हे द्वॉपदी ! समृद्विशाली संपूर्ण प्रथ्वी को 
-राजा हार चुका परन्तु अपने धर्म को नहीं हारा है । ओर युविष्ठिर ने भ्ै 


द्रीपदी 


हार गया! ऐसा कहा है, इसलिए वह हार गये तो उनकी ल्री भी हार 
गई यह नहीं कहा जा सकता, अ्रतः तेरे प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर नहीं 
दिया जा सकता। और फिर द्य,त-कीड़ा में पारांगत शकुनि द्वारा पराजित 
युविष्ठिर उसकी धूतंता समझ नहीं सके । इससे भी तेरे प्रश्न का ठीक- 
ठीक उत्तर नहीं दिया जा सकता है|” यह सुनकर द्रौपदी बोली--- 
खेलने से प्रसन्न होनेवाले, नीच कमे करनेवाले मूर्ख, निरे बालक तथा 
दुष्ट मनवाले को बुलाकर अ्रम्यासरहित मेरे स्वामी के साथ खेलाया, 
इस कारण वह हार गये यह कैसे कहा जा सकता है १ कौरवों और 
पांडयों के प्रमुख और द्यूत से श्रनभित्ञ राजा को कपटी और दुए कर्म 
करनेवालों ने छुल से जीत लिया, बाद में कप किया इसलिए वह हारे 
हुए नहीं कह्े जा सकते | इस समा में बहुत से बेढे-पोतोंवाले वृद्ध कौरव 
बैठे हैं वे ऐसा अन्याय देखकर तथा भेरे वाक्य सुनकर उनका टीक-ठीक 
उत्तर दें !? ( समापर्र, अ० ६७ ) 

द्रौपदी की इस तेजस्त्री वाणी ने सारी सभा में खलबली मचा दी हो, 
ऐसा लगता है। भीमसेन भी द्रौपदी के इन शब्दों को सुनकर आवेश 
में आ जाता है और धृतराष्ट्र का पुत्र विकर्ण द्रीपदी का पक्ष लेकर 
संपूर्ण समा से न्याय की याचना करता है और वार-बार द्रौपदी जीती 
हुई समझी जानी चाहिये या नहीं, उसी प्रकार युधिष्ठिर के सर्वस्व हार 
जाने पर द्वौयदी को दाँव में रखने का अधिकार था या नहीं इस प्रश्न 
का उत्तर माँगता है। सभा में हलचल मच जाती है। उस समय 
कर्ण दुर्शोधन का पक्ष लेने के लिए. बोल उठता है और अपना 
विरोध इस प्रकार रखता है--ईश्वर ने त्री जाति के लिए एक ही 
पति का निर्माण किया है और इसके तो पॉच पति हैं।*“*"*इसलिए 
इस जैसी जी को सभा में लाना अनुचित नहीं है |! (समापव, अ० ६८) 
पिंजरे में बंद सिंहनी को यह अपमान कितना असह्य हुआ होगा १ 

परन्तु जो कार्य बुद्धि न कर सकी, वह द्रीपदी की आत्म-शक्ति ने 


रेखाचित्र 


किया | महात्मा और धम्मांत्मा पुरुषों की सभा में अबला के वस्त्र पर हाथ 
लगाते हुए, कुल-धर्म की मर्यादा, पुरुषत्व का विचार, निर्त्नल की रक्षा 
करने का ज्षात्र धर्म, या निराधार ज्री के धर्म और सम्मान की रक्षा का 
प्राचीन आचार यह कुछ भी काम नहीं आया, वहोँ असहाय दीखती .. 
द्रुपद पुत्री के पीछे यादवों के स्वामी ओर आर्यी के सब से समर्थ पुरुष 
की संपूर्ण शक्ति उसकी रक्षा करने के लिए. तत्पर थी। इस शक्ति ने 
कृष्णा की लाज रखी | वह्नहरण के प्रसंग में चमत्कार करनेवाले कृष्ण 
के नाम पर युद्ध की चुनौती देती हुई पांचाली के आत्मवल द्वारा ही इस 
भयंकर अपमान से उसकी रजत्चा हो सकी। अन्यायी ही सब्र से अधिक 
कायर हो सकते हैं । 

: जिस युग और समाज में जह्लीजाति का ऐसा भयंकर अपमान हो 
सकता है उसकी नीति की भावना के विषय में क्या केहा जाय ? द्रौपदी 
जैसी प्रतापी, शक्तिसम्पन्न स्री की जहाँ यह दशा हो सकती है वहाँ 
दूसरी निर्बल स्त्रियों की रक्णा किस प्रकार होती होगी इस विषय में भी 
क्या सोचें ! संस्कृति के केन्द्र स्थान कुरुबंश में जिन पूर्वजों को हिंदू- 
संसार आज तक पूजता आया है उनके सामने पांचाल देश की शक्तिशाली 
राजा की युत्री का यह अपमान, उस युग के सत्री-सम्मन की भावना का 
अनोखा चित्र सामने रख देता है और उस खर्ण युग में ज्ली-जाति की 
अत्यंत उत्तम मानी जानेवाली दशा का मान कराता है। 

' परन्चु अभी द्रौपदी के समा में हुए अपमान का अंत नहीं हुआ था । 
कायर भयभीत हो जाने पर भी--दव जाने पर भी--अपने सख्वमाव की 
- नीचता दिखाये बिना नहीं रहते | समा में खलबली मची रहती है और 

सूर्य-चन्द्र भी जिसे न देख सकते थे उस द्रौपदी को अगणित दृष्टिपात 
तथा अगशित व्यंग्यवाण सहने पड़ते हैँ। अंत में कपयी श्वतराष्ट्र सदेव की 
तरह द्रौपदी से वरदान माँगने के लिए. कहता: है और द्रौपदी इन 
वरदानों के द्वारा पांडवों को छुड़ा लेती है| धृतराष्ट्र पांडवों को राजपाद 


द्रौपदी 


लौय देता है--फिर से जुआ खेल कर छीन लेने के लिए। पांडवों का 
फिर से हार जाना, बारह वर्ष बन में तथा एक वर्ष गुप्तवास में रहना 
ऐसी शर्त स्वीकार करना और द्रौपदी का साथ में जाना यह सब कथा 
तो यहाँ अग्रासंगिक ही होगी | पर बृद्ध कुन्ती को मी द्रोपदी पांडवों के 
साथ है इस विचार से कुछ आश्वासन मिला हो, ऐसा लगता है। 

द्रोयदी का गरबीला खमाव इस अपमान से कितना दुखी होता 
है यह वनपर्व में कहे हुए. कितने ही अरसंगों में बहुत सुन्दर ढंग से वर्णित 
है । द्रीपदी के अपने ही शब्दों से ठीक-ठीक पता लग सकेगा । 

श्रीकृष्ण पांडवों को बन में गये हुए. जानकर वहाँ उनसे मिलने 
आते हैं। उस अवसर पर पहले श्रीकृष्ण की स्तुति करने के बाद द्रीपदी 
कहती है, “हे ईश्वर ! तुम सब मनुष्यों तथा स्वर्य में रहनेवाले देवताओं 
के रूप हो | इसलिए. में नम्रता से अपना दुःख“ कहती हूँ, वह सुनो ! हे 
श्रीकृष्ण ! पांडवों की पत्नी, तुम्हारी सख्ली और '्रृष्ठद्य म्न की बहिन हूँ 
उसे कोई स्पर्श नहीं सकता, पर कौरवों की सभा में, शरीर पर एक 
ही वस्र धारण किये हुए, थर-थर कॉपती तथा दुःख से व्याकुल 
मुझ रजस्वला को दुःशासन ने स्पशे किया--खींचा, फिर राजाशओं के 
समाज में पापयुक्त मनवाले ध्रृतराप्ट्र के पुत्र मुझे देखकर हँसे। हे 
मधुसूदन ! पाँचों पांडव, पुत्रों सहित पांचाल देश के राजा द्रपद तथा 
स्व ब्रष्णी कुल के जीवित रहते हुए भी कौरवों ने मुके दासी रूप में प्राप्त 
करने की इच्छा की और उन्होंने मुझे जो धर्म के अनुसार भीष्मपितामह 
तथा घ्वतराप्ट्र की पौत्रवधु और पुत्रवधू होती हूँ, बलपूर्वक दासी 
कहा । इसलिए हे जनाद॑न ! युद्ध करनेवाले पुरुषों में श्रेष्ठ और 
महाबलवान पांडवों की में निन्‍्दा करती हूँ; क्‍्योंकि'वे भी पातित्रत धर्म 
«ली और संसार में यशस्विनी मुझे कौरवों से दुःख पाती हुई देखते 
रहे । हे संह्ारकर्ता ! भीमसेन और अजुन ने अल्प पराक्रमी कौरवों द्वारा 
मुझे दिया गया दुःख सहन किया, इसीलिए मीमसेन के बल को 


- पतियों से मुझे जो पॉच युत्र उत्तन्न हुए हैं उन पर दृष्टि रखकर ही इन्हें .« 


० 


रेखाचित्र 


तथा अजु न के गांडीव को घिक्कार है |***«* हे श्रीकृष्ण । ये पांडव 
अपनी शरण में आये हुए प्रत्येक की रक्षा करते हैं, परन्तु मेरी रक्षा 
करने में इन्होंने अपनी दया नहीं दिखलाई। हे वाझुदेव ! इन पॉच 


मेरी रक्षा करमी थी। हे श्रीकृष्ण ! धनुर्धरों में श्रेष्ठ और युद्ध में शत्र 
से अजेय ये पांडव निर्बल धतंराष्ट्र-पुत्नों का अपराध क्‍यों सहन कर 

हूं! 

इस प्रकार के और ऐसे अनेक वचन द्रोपदी श्रीक्षष्ण ' से कहती है 
ओर अंत में उनको उपालंभ देते हुए कहती है, हे मघुसूदन ! पति, पुत्न, 
सगरे-संत्ंधी, भाई, पिता और तुम कोई मेरे नहीं हो, क्योंकि जब अल्प 
पराक्रम वाले कौरवों ने मेरा अपमान किया तब शोकहीन पुरुषों की तरह 
किसी ने भी मेरी सहायता नहीं की | उस समय कर्ण ने जो मेरा उपहास 
किया है वह दुःख कमी भी शांत नहीं हो सकता | हे केशव ! तुम्हें मेरी 
रक्षा संबंधभाव से या मैं अ्रभि-कुंड से उत्पन्न हुई हूँ इसलिए, अथवा सखा- 
भाव से या ईश्वरमाव से करनी थी।? ( वनपवे, अ० १० ) इन 
बचनों में कितना उग्र रोब छिपा है यह सहज प्रकट है। ओर श्रीक्षप्ण 
जो आश्वासन देते हैं उसमें भी द्वीयदी के प्रति उनका गंमीर स्नेह स्पष्ट 
दिखाई देता है । कभी यह प्रश्न भी मन में उठता है कि श्रीक्षष्ण पांडवों 
के अधिक मित्र थे या द्रौपदी के ! 

पांडब-कौरव की द्यूत-क्रीड़ा के समय श्रीक्षष्ण द्वारका' में न थे, 
सीम नगर के शाल्त्र राजा का नाश करने गये हुए ये, इसीलिए पांडव 


' ऐसा मूर्ख झत्य कर सके | युद्ध से लौय्ने पर सूचना मिलते ही श्रीक्षष्ण 


ठुरन्त हस्तिनापुर आ पहुँचे, पर तन्र तक तो बहुत विलम्ब हो चुका था 


- और पांडव भी वन को सिधार गये थे । श्रीकृष्ण वहाँ से तुरन्त ही पांडवों 


से मिलने आये और द्रौपदी सहित पांडंवों को आश्वासन दिया। 
वनपर्व का एक दूसरा प्रसंग भी यहाँ देना अनुचित न होगा | 


है 


द्रीपदी 


द्रीपदी के अनुसार बलवान ज्षृत्रियों का इस प्रकार का अपमान 
सहन करना निबंलता का ही सूचक था। और इसीलिए. उससे परिताप 
किये विना नहीं रहा जाता। धर्मराज को उपालंभ देते हुए पहले की और 
२ आज की स्थिति की तुलना किये जिना नहीं रहा जाता। उस जैसी 
अमिमानी ञ्ली को क्षण-त्रुण में अपनी हीनावस्था तथा शत्रओं का आनंद 
खलता है | युधिष्ठिर को वह खरी-खरी सुनाती है, “हे भरतकुल-श्रे४ ! 
वनवास के दु।खों से दुखी अपने भाइयों की देखकर आपको क्रोध नहीं 
आता इसीलिए में समझती हूँ. कि आप में क्रोध लेशमात्र भी नहीं है | 
है राजन ! जो ज्षत्रिय क्रोधित नहीं होता उसे संसार में यह जत्िव है? 
कोई नहीं कहता । उसी प्रकार आज मैं आपको भी ज्षृत्रियत्वरहित देखती 
हूँ। हे युधिष्ठिर | समय आने पर यदि क्षत्रिय अपना पराक्रम न दिखाये 
तो उसका सभी भूतप्राणी तिरस्कार करते है, अतः आपको शत्रु को छ्षमा 
नहीं करना चाहिये |? ( बनप्व॑, आ० २७ ) 

औ जब इन वचनों से युधिष्रिर उत्तेजित नहीं होते तो द्रौपदी चुद्धिवाद 
में उतर आती है,ओर पहले वलि-विरोचन का संवाद कहती है। 
बलिराज प्रश्न पूछता है, 'हे पितामह ! मनुष्य का कल्याण किससे होता 
है ? क्षमा रखने से या क्रोध करने से ? इस विपय में मुझे संदेह हुआ 
है !! तब प्रहद इसका उत्तर देता है, 'हे युत्र ! सदेव छ्षमा रखने से 
अथवा क्रोध करने से मनुष्य का कल्याण नहीं होता | समय-समय पर दोनों 
का उपयोग करने से कल्याण होता है, यह तू जान |? और क्रोध किस 
अवसर पर करना और क्षमा कब करना उचित है इस विपय में उपदेश 
देती है। उत्तर में युधिष्ठिर क्रोध के विरुद्ध अपनी वही पुरानी दलील 
कह सुनाते हैं ( बनपर्व, अ० र८ ) | तब द्रौयदी चिढ़कर कहती है, 
है युधिष्ठिर ! ईश्वर तथा पूर्व जन्म के कम जो आपको मोह प्रात्र करा रहे 
हैं उन्हें में नमस्कार करती हूँ | आपको तो अपने पिता और पितामह 
जो बलपूर्वक राज्य अऋहण करने में विश्वास रखते थे, की त्तरह ही 

“-+६ ७--- 


रेखाचित्र 


वर्ताव करना चाहिए था | परन्तु आपकी मति फिर गई है'**-*'आपको 
जीवन से भी धर्म ध्रिय है। तो उस धर्म का पालन करने के लिए मेरे 
सहित भीमसेन, अजुन, नकुल तथा सहदेव को मी त्याग दो | हे भरतबंश 
श्रेष्ठ | धर्म अपनी रक्ता करनेवाले राजा की रक्षा करता है, ऐसा मैंने... 
महापुरुषों से सुना है । पर वह आपकी रक्षा नहीं कर रहा है। आमने 
धर्म में निरंतर एकाग्र बुद्धि रखी है ! इसी कारण आप अपने समान या 
अपने से दीव पुरुषों का अपमान नहीं करते | तो फिर अमने से श्रेष्ठ 
व्यक्ति का तो करने ही क्यों लगे ? किसी का अपमान बिना अभिमान के 
नहीं होता और यह तो आपके राज्य का प्रश्न था तव भी आपसे नहीं 
हुआ' “ “ * परन्तु आपने सदेव धर्म का सेवन ही किया है तो अ्धर्म रूप 
थत-क्रीड़ा की बुद्धि आपको कहाँ से प्राप्त हुई ! जिस द्य॒त में आपने राज्य 
द्रव्य, आयुध अपने भाई तथा मुझे भी हार दिया | उनको तथा अपने को 
वनवास के महान्‌ दुःखों को सहन करते देखकर मुझे बड़ा क्लेश होता है। 
“हे राजन ! सभी प्राणी ईश्वर के वश में हैं, अपने वश में नहीं .. 
हे युधिष्ठिर | ईश्वर की माया का वल तो देखो कि जो ईश्वर माया 
द्वारा प्रसार कर लिंग 'रूप शरीरामिमानी जीव को जड़ रूप शरीर में 
आत्मज्नन कराकर परत्तर विश्यंस कराता है. ..जिस प्रकार माता-पिता 
अपनी संतान का हित करते हैं उस प्रकार ईश्वर हित नहीं करता, और 
क्रोव्व से दसरे मनुप्यों के द्वारा किसीको सुंख और किसीको दुख ग्रात 
कराता है, वह ईश्वर दयालु नहीं हो सकता और मुझे तो ऐसा लगता 
है कि धर्माचरण करनेवाले को ईश्वर दुःख देता है और अधर्मी को 
सुल्ष । ऐसे ही धर्माचरण करनेवाले आपको ऐसी आपत्ति में और अधर्मी 
दर्योधन की इस राज्य समृद्धि को देखती- हूँ, इसीलिये में उसकी (ईश्वर) 
की निंदा करती हूँ। हे श्रेष्ठ राजन ! धमशात्न की मग्रादा के विपरीत 
चलनेदाले, क्र, लोमी तथा अधर्मी दुर्योधन को समृद्धि दी इससे उसे 
बद्य फल प्राप्त हुआ - होगा ? हे युधिष्टिर! जीव को क्मोनुसार- फल 
नज--है पं 


द्रौपदी 


मिलता है ऐसा आपका कहना है, तो कर्म की प्रेरणा करनेवाला 
ईश्वर है, इसलिये उसको फल मिलना चाहिये, जीव को नहीं | जीव 
द्वारा प्रत्येक काम में किया हुआ पाप यदि उस कराने वाले ईश्वर को 
प्रात्ष नहीं होता तो उसमें ईश्वर की शक्ति ही कारण है | इसीलिए शक्ति- 
हीन प्राणियों के प्रति मुझे खेद होता है ।! ( वनपर्च, अ०३० ) कौन कह 
सकता है कि ऐसा कहनेवाली यह स्री आज से तीन हजार वर्ष पहले 
जन्मी थी ? 


परन्तु धर्मावतार युधिष्टिर को ऐसे नास्तिक वचन क्‍यों अच्छे लगने 
लगे ? उनके भतानुसार द्रौथदी के अज्ञान रूप बादल को हयने के लिए 
तुरन्त ही धर्म और कर्मफल का उपदेश आरम्म करते ह और फिर 
कभी ऐसी नास्तिक-बुद्धि प्रदर्शित न करे इसके लिए द्रोयदी से प्रार्थना 
करते हैं | द्रोयवदी को ठुरन्त ही ऐसा जान पड़ता है कि यह पासा ठीक 
नहीं पड़ा इसजिए ठुरन्त ही नम्नरता धारण कर युधिप्ठिर को विश्वास 
दिलाती है कि उसकी इच्छा धर्म की निंदा करने की न थी, परन्तु बन- 
बास के दुःलों ने ही इसे अकुला दिया था। फिर भी इतना कहकर वह 
शान्त नहीं हो जाती--साथ ही उद्योग का महात्म्य की बतल्लती है| बह 
कहती है, जिस प्रकार तिल में तेल, गायों में दूध और काठ में अभि 
रहती है परन्तु उद्योग किये विना वह हाथ में नहीं आती, उसी प्रकार 
कर्मफल पर आधार रखकर बैठने से गया हुआ राज्य पुनः प्रात्त नहीं 
हो सकता । और राज्य नहीं लौठे तो उसका श्रथे यह होगा कि हमारे भाग्य 
में राज्य है ही नहीं। किसान खेती करे और फिर वर्षा न हो तो बह 
देव का दोपय है, पर उसमें उद्योग न करने का असंतोग् तो नहीं रहता ? 
मैं उद्योग करूँ और फलत्षिद्धि न हो तो! इस विचार से पुरुपा्थियों 
को हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना अ्रच्छा नहीं है, क्योंकि उससे पुरुष 
को अपने पराक्रम का पता नहीं लगता | साम, दाम, दंड और भेद प्रत्येक 


रेखानित्र 


उपाय से अर्थसिद्धि करना यही पराक्रमी पुरुष का धर्म है। ( वनपर्व 
अ० ३१२ ) 
. ऐसे कितने ही अथयूर्ण वाक्य द्रीप़दी ने युधिष्ठिर से कहे | भीमसेन 
इन वाक्यों से अवश्य उत्तेजित हुआ और उसी आवेश में उसने अपने “* 
बड़े भाई' को खरीखोरी सुनाई | पहले तो युधिष्ठिर ने उसे धर्मब्रीध से 
शान्त करना चाहा, पर जब वह नहीं समका तो अन्त में दूसरा उपाय 
काम में लाये | त्रोले, 'भरतकुल-बंशन भीमसेन ! जो पुरुष साहस-पूर्वक 
पापकर्म करता है उसके लिए वह कर्म दुःखदायक सिद्ध होता है। इस- 
लिए मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो | मूरिश्रवा, शल्य, जरासंध, भीष्म 
द्रोण, कर्ण, अश्वत्यामा और दुर्योधनादि घ॒तराप्ट्र के पुत्र समी अश्वविद्यां 
मे कुशल ओर महान्‌ धनुर्धारी हैँ | जिन राजाओं को हमारे द्वारा क्लेश 
चा है वे सव कौरव का आश्रय लेंगे और दुर्योधन से स्नेह होते 
के कारण उसका हित सा्थेगे और ऐश्वर्यवान्‌ होने के कारण युद् 
सें पुश्कल द्वव्य व्यय करेंगे | दुर्योधन मी अनेक प्रकार की सुख-सामग्रियों ” 
द्वारा उनका खूब आदर-सत्कार करेगा ) युत्रों ओर' मंत्रियों' संहिंत वे युद्ध 
में प्राण त्याग करेंगे, यह निंःसन्देह है।ओऔर फिर भीष्म, द्रोंण ओर 
कृपाचार्य को कौरवों और हमारे प्रति समान स्नेह है; तो भी वे दुर्बो- 
थन का अन्न खाने के कारण उसकी ओर से युद्ध करके याण त्वाय 
करेंगे | भीमसेन ! वे सब अश्वविद्या में कुशल, सर्वश्री, स्वधमपरायण 
ओर देवता और दैत्मों को जीतनेवाले हैं। ओर उनमें महारथी, सर्व 
अस्नविद्या में कुशल, अपराजित और अगेद्य कवच का धारण करने वाला 
कर्ण है जो निरन्तर इसमें छेप रखता है। इसलिए इन सब्र को पराजित 
किये बिना तुमसे दुर्योधन का पराजब होना अत्यन्त कठिन है, इस विचार 
सात्र से मुझे रात में नींद नहीं आती |? ( वनपर्व, अ० ३६ ) धर्मराज 
के हृदय में, धर्म से अधिक गहराई में ऐसी शंकाशों का शल्य चुमा हुआ 
नहीं होगा ! ऐसी शंकाशं से दुखी युविष्ठिर महावाहु अजुन को अजेय 


>ौ+>5 ० ०--- 


द्रोपदी 


देखने की इच्छा करते हैं, उसे इन्द्र के पास दिव्यास्र प्रात्त करने के लिए. 
भेजते हैं| गांधीजी की तरह धर्मराज का धर्म भी उनकी व्यवहार-बुद्धि 
का पूर्ण सहायक लगता है ! ऐसा नास्तिक विचार कभी हमारे अ्रतःकरण 
में उच्चन्न होने पर मानव-दुर्बलता समककर क्षमा करने के योग्व है ! 

द्रौपदी की प्रीति अर्जुन पर सबसे अधिक थी यह बहुत स्थान पर 
स्पष्ट दिखाई देती है। दरोपदी के रसिक और वीर हृदय को संत॒ष्ट करे 
ऐसा केवल एक अजुन ही है, यह भी कुछ-कुछ समकत में आये बिना 
नहीं रहता | सहदेव और नकुल को द्रोपदी कभी भूलती नहीं, पर कहीं 
भी इनसे सीधी याचना करती हुई अथवा इनके पराक्रम में विशेष गयव॑ 
का अनुभव करती हुई दिखाई नहीं देती | मीमसेन के हुरन्त आविश में 
आ जानेवाले स्वभाव का बह प्रसंगानुसार उपयोग करती है और युवि- 
प्विर के शांत हृदय में भी गति ला देने की शक्ति तो केवल उसी में है । 
उसे धमकाना तथा मधुरता से समझाना भी आता है। आवश्यकता पड़ने 
: पर वह तक का भी आश्रय लेती है। वह स्त्री है पर सत्ताथारी होने के 
अधिक बोग्य है | कीचक को भ्रम में डालते हुए, या भीष्म को घोला 
देकर बरदान लेते हुए वह तनिक भी नहीं हिचकती ओर किर भी 
सत्यमामा को उपदेश देते हुए खत्रीधम की प्रणेता हो सकती है । 
नम्नता उसके स्वभाव में नहीं परन्तु उसका भी अभिनय करना हो तो वह 
सफलतापूर्वक्तक कर सकती है। वह मानवीय विकारों में नहीं फँसती, 
पर उनका प्रदर्शन अनुकूल समय पर अपनी कार्यसिद्धि के लिए करती 
है। अर्जुन जब सुभद्रा से विवाह कर लाते है तब सुभद्रा के पास जाओ !? 
यह कहती हुई वह अपूर्व ञ्ली केवल स्री-स्वभाव चुलभ इर्प्या का प्रदर्शन 
करती है या उसके द्वारा अर्जुन को अपनी ओर अधिक आकर्षित करती 
है, ऐसा कौन कह सकता है ! 

द्रौपदी के प्रति पांडवों का भाव ऐसा है जैसे वे उसे अपना 
एक पूज्य कुल-देवता मानते हों अथवा पाँचों इंद्रियों जैसे पॉँचों 

+-+- ० ६---- “५ 


रेखाचित्र 


पांडव की वंह आत्मा हो और वे उसके बशीभूत हो कार्य करते हों। 
प्रत्येक उससे स्नेह करते हुए भी उसके तेज से आक्रांत जान पढ़ते हैं। 
उसमें कुछ ऐसा आकर्षण है कि उसकी अतितेजखिता का वर्चस्व कभी 
खलता भी हो तो भी किसी का उससे दूर हटने का मन नहीं होता । 
माता की तरह वह उनकी सँमाल रखती है, पल्ली की तरह उन्‍हें प्रसन्न. 
रखती है। यदि उन्हें द्रोपदी की महत्वाकांच्षा को संतुष्ट न करना होता तो 
क्या इतने पराक्रम करते ! 

यह नहीं कहा जा सकता कि द्रौपदी में सुकुंमारता न थी। दुष्ख 
पड़ने पर उसके नेत्र ऑँसुओं से प्लावित हो उठते थे, परन्तु उसके ऑंसुश्रों 
का मूल्य बहुत महँगा चुकाना पड़ता था | बस इतना ही इसमें अंतर है | 
उसकी सुकोमल देह को दुःख होता तभी वह आँसू बहाती। उस शरीर 
में रहनेवाली बलवान आत्मा पर आधात होता तो निश्चय ही उसमें से 
प्रचंड ज्वालायं निकलने लगती | उस ज््री का या तो मित्र होकर रहा जा 
सकता था या शत्रु होकर । शज्रु या मित्र के अतिरिक्त संबंध रूप में कोई 
ओर दूसरी पदवी शक्य न थी। 

ओर फिर भी वह स्त्री महत्वाकांक्षिणी थी, पर साहस रहित आकांच्ा 
उसे संतोष नहीं दे सकती थी। गंधमादन बन से सहस्त दल कमल 
लेने के लिए. वह भीम को भेजती है, तब राक्त्सों से भरे वन में मीम 
को अकेला भेजते हुए. उसे जरा मी संकोच या घबराहट नहीं होती ओर 
बन में भी वह रानी की-सी शान से ही रहती है। जयद्गरथ द्वारा भेजे 
हुए कोटिक को उत्तर देते और जयद्रथ को सत्कार के लिए, निमंत्रित 
करते हुए वह बड़े घर की कुल-बधू अपने बड़प्पन के अनुकूल .ही उत्तर 
देती है और जयद्वथ का स्वागत करते समय भी साम्राशी का गोरव उसे 
नहीं छोड़ता | 

जयद्रथ द्रौपदी का हरण करता है उस समय भी द्रौपदी का प्रमाव 
छिंप नहीं पाता । वह अच्न॒ला और अकेली थी इससे उसका जोर कुछ 

कल 4 09 २--- 


अस्क ५. 


द्रीपदी 


चला नहीं यह सच है, परन्तु गव और प्रतिमा उस समय भी उसकी 
वाणी से प्रवाहमान है | उसके तिरस्कार में एक प्रकार की प्रचण्ड ज्याला 
है और जिस पर भी उसका प्रयोग हो गया उसे यह भस्म किये बिना 
नहीं रहती । 

य्रुधिद्विर के शांत और घीमे खमाव के कारण कई बार यह अपना 
मानसिक खाध्थ्य खो देती है, परन्तु जहों तक हो सकता उनके सम्मान 
को जरा भी हानि न पहुँचे, ध्यान रखने का प्रवक्ष करती हुई दिखाई 
देती हैं| जब युविप्ठिर जयद्रथ को नहीं मारने का आदेश देत हैं तो 
द्रीपदी, “यदि ठुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो जबद्रथ को मार बिना 
न छोड़ो ।” भीमाजुन से भी यह कहे विना नहीं रहती | वे जब उसको 
पकड़ लाते हैं और थुविष्ठटिर उसे छोड़ देने के लिए. कहते है तत्र भीम 
कहता है, “द्रोपदी कहे तो इसे छोड़ दें !” युव्िष्ठटिर फिर भीम से 
उसे छोड़ देने के लिए. कहते हैं और द्ोयदी भी युधिष्ठिर का मनोमाव 
जान कर बिना कहे आज्ञा दें देती है। इस अवसर पर चाहे कितना भी 
क्रोध क्यों न आया हो फिर भी युध्रिष्ठिर की महत्ता न घटे यह चिंता 
प्रदर्शित किये बिना नहीं रहतो। 

अज्ञातवास का समय अब पास आता जा रहा है। जन्म से जिसने 
कुछ भी काम नहीं किया ऐसी द्रोपदी कीन सा काम करने के लिए वैयार 
हो जायेगी इसकी पांडवों को बड़ी चिंता हुई, परन्तु समय को परखनेवाली 
यह मानिनी री सैरनन्‍्म्री का कार्य खीकार कर लेती दे और पांडव 
विराद नगर की ओर चल देते हैँ | रानी सुदेष्णा को द्वोपदी के देखने 
पर शंका हुई कि इसे देखकर राजा कदाचित्‌ इुके लाय नदे?! 
कौन कह सकता है कि श्रतुचित थी ? द्रोपदी चाहे ओर उसके शक्ति- 
पाश में न फँसे ऐसा पुरुष वसुधरया के छोर पर कोई न था। उसकी 
इच्छा न हो तो इन्द्र की भी सामथ्य नहीं कि उसे मोहित कर सके | 
पाँच गंधर्व मेरे पति हैं और मेरी रक्षा करते हं [! ऐसा कहक्कर 


अन्न , र्‌ 9 5; ०५४० 


रेखाचित्र 
द्रौपदी वहाँ रहने लगती है। रानी सुददेंष्णा भोलीं थी, इसलिए बह 
द्रौपदी को पहचान न सकी |. केक 
सुरक्षित सौंदर्य प्रेरणा देता है और अ्रक्षित सौंदर्य देखकर मानव 
की पाशव्षत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। अि-सदश सौंदर्य भी सुख-दुःख 
दोनों लाता है। जो सौंदये द्रोपदी को साम्राज्ञी रूप में और भी सुशोमित 
. करनेवाला था वह उसकी असहाय अवस्था में और दासी होने के कारण 
उसके क्ठों में वृद्धि करने का साधानभूत हो गया। चाहे जैसी बलबती 
क्यों न हो फिर भी ञ्री तो स्री ही है । उसके पीछे यदि किसी पुरुष का 
रक्बा-बल न दिखाई दे तो न जाने क्यों पुरुष जाति उसक। सम्मान करना 
भूल जाती है। असहाय और अरक्षित दिखाई देनेवाली द्रीयदी के साथ 
भी ऐसा ही हुआ | उसे देखकर कीचक की पशुद्तत्ति जाग उठी। रानीः 
सुदेष्णा ने भाई का पक्ष लेकर उसका दुःख निवारण करने के लिए 
द्रीयदी को मदिरा ले जाने के बहाने भेजी। द्रौपदी उसका तिरस्कार 
करके राज-सभा में फरियाद करने गई, परन्तु राजा के सामने ही कीचक- 
ने द्ीपदी के केश पकड़कर उसे पीय। द्रौपदी का क्रोध इस समय 
असझ्य हो गया | युधिष्टिर और भीम दोनों वहाँ हैं पर कुछ कर नहीं, 
सकते । राजा असहाय स्ली का पक्ष लेकर न्याव करने के बदले बलवान 
कीचक को कुछ भी कहने में असमर्थ हो जाता है। दास-दासियों के 
प्रति नीति-अनीति का मूल्यांकन तो आज भी कहाँ होता है ! इद्धप्रस्थ 
की महारानी इस अपमान को किस प्रकार सह सकी होगी वह तो उसको: 
अंतरात्मा ही जाने ! 
द्रौपदी को पांडवों की निर्बलता इस समय बहुत ही खलती है। वह 
जानती है कि शांति के अवतार युधिष्ठिर वा अवसरवादी अजुन इस 
सम्य आवेश में आकर उसकी सहायता करने अथवा वेर का प्रतिकार 
करने के लिए उद्यत नहीं होंगे ओर कीचक के जीवित रहते हुए उसकी; 
जलती हुई आत्मा को पल भर मी शांति मिलनेवाली नहीं । बेलवान 
++९ 0४---- 


द्रौपदी 


भीम के बल और खमाव पर श्रद्धा रखकर उसे और उसके सोये हुए. 
खमभाव को वह जगाती है। द्रौपदी की इस समय की वेदना वास्तव में 
हृदय को हिला देनेवाली है | 

भीम के द्वारा कीचक का वध कराने की कथा का सर्त्रंध द्रौपदी के 
किसी विशिष्ट गुश से नहीं, अतः इस विपय में हम अधिक आगे 
न जायेंगे | 

रानी सुदेष्णा के अंतःपुर में सेरंधत्री का स्थान सामान्य दासियों: 
से कुछ ऊँचा होना चाहिए। उत्तरकुमार 'सारथि के बिना युद्ध में 
कैसे जाय १? इस असमजस्प में है तव अजुन के कहने से द्रौपदी उसे 
वृहन्नला को सारथि बनाकर ले जाने की सलाह देती है। ऐसे भाग्य- 
निर्णय के समय पर जिसकी बात का कदाचित्‌ ही कोई मुल्य हो ऐसी 
दासी का परामर्श उत्तरकुमार मान लेता कया ! और वह भी वृहन्नला 
जैसे ग्रपरिच्िित गायक के लिए ? वृहन्नला का अजन रूप में परिचय 
तो उत्तरकुमार को फिर बाद में मिलता है। द्रीयदी के बातचीत करने 
के दंग में भी दासत्व का अंश दिखाई नहीं देता | 

इस प्रसंग के बाद द्रीपदी, उद्योग पर्व में जब श्रीकृष्ण संधि का संदेश 
ले जात॑ है, वहाँ दिखाई देती है | सहदेव के अतिरिक्त सभी पांडव--भीम 
ओर अजुन सहित--जहाँ तक हो सके, सुलह कराने का आग्रह श्रीक्षप्णु 
से करते हैं। भीम के निर्वलहीन वचन सुनकर श्रीकृष्ण को भी आश्चर्य 
होता है । केवल द्रीपदी ही युद्ध के लिए वास्तविक आतुरता दिखाती है |. 
इस प्रसंग से तो सचमुच ऐसा लगने लगता है कि यदि वह स्रीन होती 
तो महाभारत का युद्ध न होता और होता मी तो जीता न जाता | 
शोकामिभूत द्वीयदी मीमसेन को अत्यन्त शांत हुआ देख आँखों में ऑँसू 
भरकर श्रीक्ृषष्ण से कहती है, हे मघुसदन ! जिस प्रकार छुल करके 
अमात्य सहित घृतराष्ट्र के पुत्र ने पांडवों को राज्य-श्रट्ट किया है वह सच 
ठुम जानते हो" *“*'युधिप्टिर ने पॉँच गाँव हमें दो! यह दुर्योधन तथा 


कललन्‍्न्‍न्‍थ १ ७०५--- 


रेखाचित्र 


उसके संबंधियों से कहलवाया है, परन्तु हे श्रीकृष्ण ! संधि की इच्छा 
'करनेवालें युधिष्टिर के ऐसे वाक्य सुनकर भी दुर्योधन ने बैसा नहीं किया, 
ख्सलिए हे श्रीकृष्ण ! राज्य दिये त्रिना यदि दुर्यो धन संधि करना चाहे 
तो कभी न करनां। हे महाव्रहों ! संजयब-सहित पांडब क्रोधित तथा 


भयंकर दुर्योधन की सेना का सामना करने में समर्थ होंगे। इस विषय में * 


साम तथा दाम से कोई भी अर्थसिद्धि हो सके, यह बात नहीं है, अतः 
इस विषय में तुम्हें दया नहीं दिखानी है । जो शत्रु साम अथवा दाम से 
भी शांत न हो उसके लिए, तो दंड का ही उपयोग करना चाहिए |* * **** 
फिर कहती है, “हे केशव ! मुक जैसी स्त्री प्रथ्वी पर कौन है ! द्रपद 
की कन्या, यज्ञवेदी से उत्रन्न हुईं, धृष्ठद्म श्र की बहिन, तुम्हारी प्रिय 
सखी, आजमीढ़ के कुल में प्रात हुई, महात्मा पांडु की पुत्र-बंधू और पॉँच 
तेजस्वी इन्द्र के समान पाँचों पांडवों को पत्नी हूँ । उन पांडबों के देखते 
*र तुम्हारे विद्यमान होते हुए. मेरे केश खींचे गये और सभा के बीच 
मैं क्लेश को प्राप्त हुईं | पांचाल राजाओं, दृष्णियों और पांडवों के जीते 
जी, पापिष्टों की दासी होकर सभा में मैं खड़ी हुई-*“* 'हे कृष्ण ! भीम के 
बल और अजेन के धनुष धारण करने को धिवकार है। नहीं तो ऐसा 
कृत्य करके दुर्योधन दो घड़ी भी जीवित रह सकता था ! हे कृष्ण ! 
मैं तुम्हारा अनुग्ह प्राप्त करने के योग्य होऊँ और मेरे प्रति हुम्हें दया हो 
तो धृतराष्ट्र के पुओं पर तुम्हें पूर्ण क्रोथ करना है ।”? थोड़ी देर बाद फिर 
द्रौपदी अपने सुन्दर केश-पाश को हाथ में लेकर श्रीकृष्ण को दिखाते हुए, 
आँखों में आऑँपू लाकर कहती है, “पुडरीकाक्षु ! दुःशासन के हाथीं खींचा 
हुआ यह केशपाश तुम देखो | उसने कैसा खींचा है | संधि के इच्छित 
आपने सभी कार्यों के साथ इसे भी याद रखंना | हे श्रीकृष्ण ! सम्मव है 
' भीम और अजन कृपणता के कारण संधि की इच्छा रखते हां तो 
महारथी पुत्रों सहित मेरे बृद्ध पिता और अमिमन्यु को आगे कर मेरे 
महापराक्रमी पॉँचों पुत्र कौरवों से युद्ध करेंगे | हे कृष्ण ! जब तक पापी 


द्रौपदी 


छुःशासन का हाथ कय हुआ और रक्त से अच्छी तरह मरा हुआ में न 
देख लेँ तब तक मेरे हृदय को कैसे शांति मिल सकती है ! प्रज्वलित अ्रप्नि 
की तरह हृदय में क्रोध को धारण कर प्रतीज्ञा करते-करते मुझे तेरह 
वर्ष बीत गये | ठम इस निमित्त धर्म का विचार करने जा रहे हो परन्तु 
कारवों के वचन-वाणों से पीड़ित मेर। हृदय विदीण हुआ जा रहा है |! 

कायर के हृदय में मी वीरता जाग्त करनेवाले द्रौपदी के इस 
बचनों को सुनकर उसके प्रिय सखा श्रीकृष्ण के अंतर में क्या हुआ होगा ? 
इस प्रतापी स्त्री के आगे पांडब भी निरुत्साही से लगते हैं | केवल श्रीकृषप्ण 
'सहश पुरुषोत्तम ही उसे धैर्य दे सकते हैं। 

श्रीकृष्ण रोती हुई द्रौपदी से कहते हैं, “हे द्रौपदी ! कुछ समय में 
तू कौरवों की स्त्रियों को रोते हुए देखेगी | हे मीर ! जिन पर तू क्रोधित 
हुई है उनकी स्तरियाँ अपने बंधुओं की मृत्यु से जिस तरह वू रो रही है 
वैसे ही रोग्रेंगी | मैं स्वयं युधिष्ठिर की झ्ाज्ञा से भीम, अजेन, नकुल, 
सहदेव सहित यह कार्य करूँगा। कालवश हुए ध्षतराप्ट्र के पुत्रों ने 
यदि मेरे वचन नहीं सुने तो मृत्यु को प्राप्त हो प्रथ्यी पर शयन करेंगे ओर 
श्वान तथा गाल उनका भक्षुण करेंगे | हिमवान्‌ पर्वत चलायमान हो 
जाय, प्रथ्वी के! सी ठुकड़े हो जायें या नच्चत्रों सहित आकाश गिर पढ़े 
तो भी मेरा वचन मभिथ्या नहीं हो सकता। में यह सत्य प्रतिश करता 
हूँ, इसलिए तू रो मत ! थोड़े ही समय में तू अपने पति को शत्रुओं से 
रहित तथा राजलक्ष्मी से युक्त देखेगी |? ( उद्योग पर्ब, अ० ८२ ) 

श्रीकृष्ण के श्रतिरिक्त इतने विश्वासप्रर्वकक ऐसा आश्वासन दूसरा 
नहीं दे सकता और द्रौपदी के अतिरिक्त सलाभाव से इतना अधिकार 
किसी दूसरे का हो नहीं सकता था । 

ट्रीयदी और कृष्ण के बीच एक प्रकार की जिसे अंग्रेज़ी में ((-॥79- 
7202/ कहते हैं--ऐसी साहचर्य की भावना दे ओर उन दोनों में 
पुरुपत्व॒ तथा ख्रीवव--जिसे हम 'छि०एुथा ग्रोशा! आर '$घए७ए 

---१ ० ७४--- 


५5% 


(० रेखाचित्र 


ज07798 कहते हँ---वह लोकोत्तर है। साधुता और असाधुता मापने 
की नीति का सामान्य आदशे इन दोनों को मापने के लिए ब्यर्थ हो जाता 
है| ये दोनों किसी नीति या नियम से दँधे हुए नहीं, पर नीति और 
नियमों के बनानेवाले हैं। दोनों लोकमत के प्रवाह में नहीं बहते, पर 
उसे अपने अनुकूल बना लेते हैं। इन दोनों के व्यक्तित्व को सबसे प्रथम 
स्थान न मिले, ऐसी कोई भी स्थिति या पदवी अ्स्वीकार नहीं कर सकती | 
कक की सामान्य विशेषताओं से ही दोनों एक दूसरे को आकर्षित 
करते ह | 


गोपियों की भक्ति में श्रद्धा और प्रेम है पर समानता नहीं | द्रौपदी 

श्रौर श्रीकृष्ण के संबंध में साख्यमाव की समानता है। श्रीकृष्ण जैसे 
पुरुष का हृदय प्रियतमाओं के मनोरथ पूर्ण करने के लिए सदेव तत्पर 
रहता है, परन्तु आदेश तथा प्रेरणा की आकांछ्ा तो वह सदा द्रौपदी 
जैसे ज्वलंत स्लीत्व से ही करता है। पत्नियों की इच्छा पूरी करने में 
उनके पत्नियों को आनंद मिलता है, पर सखी का आदेश करने और 
उसके साथ खप्न-रचना करने की उनके हृदय की गंभीर अ्रमिलाणा 
स्पष्ट दिखाई देती है। बाह्य संसार के ग्रति स्नेह या सत्ता के पहने हुए. 
कवच उतार कर उसको उसके वास्तविक रूप में देखे और पहचाने, 
उसकी महाल्वाकांक्षाओरों को विजयब-गीत से उत्साह दे तथा उसको 
दुर्बलताओं से दुर्बलता के लिए ही प्रेम करे और मावभीने श्रांतरिक 
लेह से पोबित करे ऐसी सखी पाने की आकांक्षा किस पुरुष को न होती 

. होगी ! और कौन-सा वास्तविक ख्री-द्वदय ऐसे पुरुष की मैत्री पाने के 

-: लिए न तरसता होगा १ ह 
एक प्रश्न बहुत आश्चयंजनक न होने पर भी उठे तजिना नहीं रहता। 
द्रौपदी और श्रीकृष्ण का विवाह हो गया होता तो १ श्रीकृष्ण को महत्ता 
जितनी आज है कदाचित्‌ उससे अधिक न बढ़ती, पर दृष्णियों और 
कुरुकुल के विनाशक भविष्य के बदले महाभारत की कथा क्या दूसरी: 
लिन लक 5 ८-5 


द्रौपदी 


त्तरह ही न लिखी जाती १ इन दोनों विनाश के दूतों के बदले मारतवर्प 
को अधिक बलवाब तथा अधिक सुगठित छोड़ जाने में क्या वे शक्तिमान 
न होते ? होते तो? इस शब्द में संसार की कैसी अपूर्ब भावनाओं तथा 
परिस्थितियों की ध्वनि निहित है बह कौन कह सकता है ! 

पांडव द्वारा यह कुलनाशक युद्ध कराना योग्य.था या नहीं यह एक 
वूसरा प्रश्न है | कौरवों के अपमान का बदला लेने की इच्छा रखनेवाली 
पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री द्रोयदी थी । वह अपमानित पांडवों की 
पत्नी थी। साथ ही वह उस अपमान से आधात पाई हुईं सत्री थी। भारत- 
वर्ष के चक्रवर्तीयद की आकांच्ा रखनेवाले राजाओं को विजय न 
मिले ऐसी दृढ़ इच्छावाले, राजनीतिज्ञ तथा नीति-निपुणु श्रीकृष्ण की 
वह सखी थी | ओर जिसके स्वभाव में कायरता न थी ऐसी द्रौपदी युद्ध की 
इच्छा न करे तो किस वस्ठु की करे १ अपने जन्म, संस्कार और सभाव-- 
तीनों से वह युद्ध की देवी ही सष्टि में अवतरित हुई थी। उसके जैसी 
परिस्थितियों में उस जैसी ञ्लरी ओर: दूसरी सलाह दे ही क्‍या 
सकती थी ! 7 * । 


उसके बाद तो बहुत सी ध्रव्नाएँ हो जाती हैं। श्रीकृष्ण संधि का 
संदेश लेकर जाते हैं ओर अ्रसफल होकर लौट आते' हैँ ओर महाभारत 
के युद्ध की तैयारियाँ होने लगती हैं | अठारह दिन 'तक अविरत रूप से 
रक्त की नदियाँ कुरुक्षेत्र में बहीं। इन सब्र में द्रोपदी कहीं भी नहीं 
आती, फिर भी उसका व्यक्तित्व अदृश्य रूप से इन सबको चारों ओर से 
घेरे रहता हो, इसका भान सदेव बना रहता है। संपूर्ण महाभारत में 
श्रीकृष्ण और द्रोपदी ये दोनों ही ऐसी शक्तियाँ हैँ जिनकी इच्छाशक्ति 
, किसीसे भी और कभी भी थकती नहीं । अ्रपनी उच्श्यसिद्धि के लिए 
ये कैसे मी साधन ग्रहण करने में हिंचकते नहीं। ये दोनों केवल अपने 
ध्येय को ही देखते हँ। उस ध्येब को प्राप्त करने में इन्हें छोडे-मोटे 
नियमों-का उल्लंधन करना पड़े तो उसकी ये पर्वाह नहीं करते ओर 


2 
+-+१०६-- 6 


- रेखाचित्र 


साधन शुद्ध हो इसकी भी इन्हें चिंता नहीं । 

युद्ध के समय में द्रौपदी की अधिक उपस्थिति न दिखलाकर कवि ने 
एक प्रकार का आचित्य ही दिखाया है। चाहे जैसी सबल स्त्री क्यों न 
हो, पर युद्ध जैसे अमानुधी कार्य के बीच लाने - या साज्ञी-भूत बनाने से 7 
रसजत्ति का क्षय होता है। श्रजेय इच्छाशक्तिवाली द्रौपदी के अंतर का 
कोमल माग युद्ध को आवश्यक और धर्मयुद्ध मानता था, फिर भी इंस 
संहार को देखकर अ्रवश्य ही कॉप उठा होगा यह विचार हमारे मन में 
आये बिना नहीं रहता । 

युद्ध के बाद अश्वत्यामा द्वारा किये हुए. रात्ि-संहार के अवसर पर 
ही द्ोपदी इस नियम का भंग करती है--उसे देखे बिना नहीं रहा 
जाता । पुत्रों और कुद्म्व्रियों का ज्ञाजधर्म के विरुद्ध हुआ संहार देखकर 
उसकी अंतरात्मा व्यथित हो उठती है और अश्वत्यामा का वध हुए बिना 
अन्न न अहण करने की ग्रतिश् करती है और उसी आवेश में धर्मराज 
को कथोेक्ति सुनाये विना नहीं रहती--श्रव पुत्रों के त्रिना तुम राज्य- 
भोग कर सुखी होना !? इस समय - मीम ओर श्रीकृष्ण से प्रेरित अजन 
उसकी सहायता करता है और अश्वत्यामा के साथ धोर युद्ध कर उसके 
सिर से मणि ले आता है। इस सब में कृष्ण की एक विशेषता अवश्य 
दिखाई देदी है | द्रौपदी का प्रिय कार्य करना हो तो श्रीकृष्ण जहाँ तक: 
हो सकता है, अजन या भीम से ही कराते हैं अथवा कराने का डौल 
करते हैं| यदि इनसे नहीं बनता तो विवश होकर उ्त्यक्ष रूप से स्वयं 
. उस कार्य में अग्रसर होते हैं। ज्लीका मित्र बनने की इच्छा रखनेवाले 
.पुरुष को उस स्त्री के पति का मित्र बनने का ग्रवन्न पहले करना चाहिए 
इस सूत्र को कृष्ण जैसे चहुर नर कैसे भूल सकते थे ! यु 

युद्ध के बाद द्रीयदी का यूचन बहुत थोड़े प्रसंगों पर महाभारतकार 
ने कियां है | कर्य की मृत्यु से युधिष्ठिर को श्मशान वैराग्य हुआ और 
संन्यास लेने का निश्चय करते हैं तब सबके साथ द्वोयदी भी वैसा न 

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द्रीपदी 


करने की प्राथंना करती है| अश्वमेध यज्ञ करते समय पांडवों की सह- 
धर्मिणी रूप में और ऐश्वर्य का प्रदर्शन करती हुई द्रीपदी को हम देखते 
हैँ | तत्मश्वात्‌ उत्तर की गर्मरक्षा करने के लिए द्रॉपदी मधुयदन से 
प्राथना करती है। 

द्रीवदी के अंतिम दर्शन पांडवों के साथ दिमालव पर तप करने 
जाते समय होते हैं । अजुन प्र उसका विशेष प्रेम था यह बात महा- 
भारतकार को अंत तक खय्कती है ओर इस पाव के फलस्वरूप सब्रसे पहले 
उसी के शरीर का अन्त होता है, ऐसा धर्मराज युव्रिष्ठटिर, के मुख से 
कहलाया गया है | पुरुष हृदय की ईर्प्या का इसमें कुछ अंश होगा अवश्य ? 

इस अद्भुत स्ली का जन्म और मुत्यु-दोनों उसके बभ्यक्तित्व की 
तरह सबसे भिन्न प्रकार से हुआ | उसमें शौर्य था और शक्ति की अपेक्षा 
थी। उप्तमें बल था और बलवान को आकर्मित करने की शक्ति थी | 
उसमें मर्ब था ओर ग को संतुष्ट करने की सामर्थ्य थी। उसमें बुद्धि 
थी और उसका उपयोग करने का विवेक था । उसमें सौंदय था और 
उसे सजाने की कला उसमें थी । 

उतर समब पहचानना और समय की प्रतीक्षा करना आता था। 
उसे धीरन स्‍वना और प्रतिशोव लेना भी आता था। उसे स्वाश्रयी 
होता और परिस्थितियों को पहचानना आता था। उसे सेवा स्वीकार 
करना और उसकी रक्षा करना आता था। 

बस यही उसका महामंत्र था। तेजल्विता उसके स्वभाव में थी। 
शक्ति उसके हृदय में थी ओर अमिमान उसकी दृष्टि में था| 
महान्‌ पद के लिए. वह पैदा हुई थी। महापुरुषों से उसकी मिन्नता 
थी | उनके संत्रंत्न से महत्ता प्राप्त करती, उनकी रंगति से महत्ता की रक्षा 
करती थी। 

प्राचीन आर्यावत की ह्ली-सश्टि में, ज्योतिर्माला में सविता सहश, 
जाज्वल्यमान तथा तेजस्वीता से वह सदा ही प्रकाशमान रहेगी ! 

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श्प 


मीराबाई ; एक दंष्टि 





सुन्द्रियाँ सदेवु रसिकता की प्रत्यक्ष मूर्ति समझी गई हैं ओर कविता 
रसिकता की प्रत्यक्ष अमिव्यक्ति मानी जाती है। कवि के लिए सुन्द्री 
ओर कविता बहुत अंशों में समान प्रिय होती हैं | रसिक हृदय का आनंद 
कविता के स्फुरण में या सुन्दरी के दर्शन के समय एक ही प्रकार का 
होता है | सौंदर्य कविता का विषय है; कविता की सृष्टि सौंदर्य का सजन 
करने के लिए होती है अ्रथवा सौंदर्य-दर्शन में लोलुप रसबृत्ति का व्यक्त 
स्वरूप कविता है । और सर्वसौंदर्य का सार सुन्दरी ही है | कविता जहाँ 
सौंदर्य-पोयक सनातन | भावों का गान नहीं करती वहाँ कविता कविता 
नहीं रह जाती । 

कविता और सुन्दरी का इतना निकट संबंध होने पर भी कविता 
गानेवाली सुन्दरियों कौन जाने क्यों संसार में बहुत थोड़ी ही दिखाई देती 
हैं। अपने सौंदर्य का द्रश खर्य नहीं हुआ जाता कदाचित्‌ यही कारण 
तो न हो ? अपने में निहित सोंदर्य का अज्ञान तथा बाह्य सौंदर्य-दर्शन 
की आसक्ति इन दो कारणों ने ही वास्तव में कविता और सुन्दरी को 
ही दूर रखा है । सुन्दरियों के देखने-विचारने के संकुचित प्रदेश, संसार 
के बंधन या भोग्य दशा में निहित- परतंत्रता अथवा दूसरे के अनुकूल 
होने में खत्व-विकास का विनाश ये सब मी इस दशा के कारणमूत गिने 
जा सकते हैं। मनुष्य अपना व्यक्तित्व विकसित कर फिर उसका समर्पण 
करे ओर व्यक्तित्व के विकसित होने से पहले ही उसका दान कर दिया 
जाय इन दो स्थितियों के बीच बहुत अंतर है। एक में सोंदर्य-दर्शन की 

“६ ६२--- 


| 


ज 


मीराबाई ; एक दृष्टि 


शक्ति पराकाष्ठा को पहुँच जाती हे और उसी में मनुष्य खत्व खोकरं 
विलीन हो जाता है। दूसरे में सौंदर्य-दशन करने की शक्ति ही नहीं 
होती अथवा बीज रूप में हो तो स्वत्व खोने से इस शक्ति का भी विनाश 
हो जाता है| स्त्व के ज्ञान बिना सौंदर्य-दर्शन की शक्ति का विकास नहीं 
होता | देव-मन्दिर में चढ़ाये गये विकसित पुप्प सुवास और शोभा में वृद्धि 
करते हैं, उसी प्रकार विकसित व्यक्तित्व के समर्पण से भी सौंदर्य और रस 
के मरने फूट पड़ते हैँ और महत्ता का सजन होता है। पुष्प की औरब्यक्तित्व 
की अ्विकसित कलियों से कोन-सा.लाभ हो सकता है इसकी स्वप्न- 
रचना कोई कवि भले ही कर ले, पर उनमें छचित ही सत्य हो सकते है। 
कविता-गान करनेवाली सुन्दरियों का सजन बहुत कम होने का एक 
दूसरा कारण भी है। पहले संस्कारी होना जन-समाज में सामान्य 
अधिकार न था, केवल श्रीमंत ओर उच्च समझे जानेवाले कुलों में ही 
उसके लिए. व्यवस्था ओर समय था। सामान्य जन-समाज में पुरुष 
संस्कारी हो सकते थे क्योंकि ये लोग संस्कार की खोज में बाहर जा सकते 
थे, पर संस्कारी कुद्ध वों में भी स्त्रियों की संस्कार-मर्यादा घर की दीवारों 
तक ही थी । संस्कार बिना सौंदर्य-दर्शन नहीं होता और सौंदर्य-दर्शन को 
मर्यादित नहीं किया जा सकता। जहाँ-जहाँ झ्लियों के चारों ओर रचा 
हुआ यह प्राचीर हृदय है या उन्होंने स्त्रय॑ अपने हाथों से तोड़ा हे 
वहीं स्लरियाँ अपनी आत्मा का परिमज्-प्रसार करने में समर्थ हो सकी हैं। 
दीपदी ने यह प्राचीर तोड़ा और पुराणु-काल में वह अद्वितीय स्थान पर 
बिराज रही है। नूरजहों ने यह प्राचीर तोड़ा, भारत सें आज वह अद्वितीय, 
अपूर्य साम्राशी के रूप में सुशोमित है। मीरा ने तोड़ा और वह सदियों से 
जोक-हृदय के गंभीर-तन्दुओं को हिला देनेवाली प्रेरणा-मृर्ति चनी हुई है । 
मीरा का जीवन ओर कविता एक ऐसे ही महाप्रवक्ष का परिणाम 
है| बचपन से ही मीरा का मन संसार में अनुरक्त न था। अलन्त प्रेम- 
भाव के वेग से उसकी अंतर-बृत्ति रँंगी हुई थी। वह बृत्ति भक्त पित्तामह 
9 किट 


रेखाचित्र 


के यहाँ बचपन में पोषित हुई | वैधव्य ने इस बृत्ति को जीवन में ओत- 
गत करने का अवसर दिया। महारानी पद और राजकुल ने उसके संस्कारों 
को विकसित किया और प्रतिकूलताओं के विरुद्ध विद्रोह करने की शक्ति 


और निर्धारित आदशों को प्राप्त करने का उत्साह उसमें ला दिया और 


इन सब के परिणामस्वरूप इसके विकसित व्यक्तित्व ने आदर्श को आत्म- 
समर्पण कर चिरंतनता प्राप्त कर ली | । 

मीरा की कविता और जीवन को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा 
सकता । उसके जीवन रस के निझोर से ही उसकी कविता-धारा बही है; 
उसकी कविता रसप्रवाह से उसके जीवन का निर्माण हुआ ओर येदोनों-- 
उसका जीवन और उसकी कविता--एक दूसरे से इतने अभिन्न हैँ कि यदि 
इन्हें अलग कर दिया जाय तो फिर उनका कुछ भी महत्व न रह जायगा । 

शताब्दियाँ बीत गई , परन्तु इस क्ली का आकर्षण अब भी ज्यों का 
सथों है ओर जितनी कविताएँ उसने लिखी होंगी उससे कहीं अधिक उसके 
नाम से गायी जाती हैं । कोई भी कविता चाहे किसी की हो, पर उसके 
नाम से गाने में लोगों को आनंद आता है | मीरा की लोकग्रियता को नींव 
इतने गहरे कैसे जम गईं होगी ! 


उसकी लोकप्रियता के एक नहीं अनेकों कारण हैं। लोग स्वयं बहुत 
साधारण रीति से जीवन व्यतीत करते हैं, परन्ठ किसी के जीवन की 
अद्भुतता में उन्हें बहुत थ्रानंद आता है और उसमें यह तो र्ती 
जाति, राजकुल में पेदा हुई महारानी-पद्‌ पर पदासीन ऐसी स्त्री थी, फिर 
इसका जादू लोक हृदय पर क्यों. न चलता ! उसका प्रताप गिरघरलाल 
के साक्षात्कार के चमत्कार की मान्यता पर आधारित है। उसकी अग्ल 
श्रद्धा से उसका प्रभाव फैला है। दूसरे, प्रवास के कारण उसका 
भाषा-ज्ञान बढ़ा और बहुत सी भाषाओं में कविता रचने की उसको शक्ति 
ने उसे कई प्रान्तों से परिचित कराया । हजारों वर्षों से आय॑-छृदय 
को आकर्षित करनेवाले कृष्ण ओर उन्हीं के प्रति अपना सनातन प्रेम 

अल १% ८४४२ 


कि 


5 


| 


मीराबाई ; एक दृष्टि 


उसने प्रियतमा भाव से गाया और वह भी पांडित्य का प्रदर्शन करके नहीं, 
वरन्‌ लोगों के नित्यप्रति के जीवन के प्रसंगों में, रसिक हृदय का उत्साह 
भरकर | उसकी लोकग्रियता के ये सत्र कारण हैं, फिर भी मानव-हुदय की 
एक स्वाभाविक दुर्बलता--महापदवीधारी व्यक्ति के परिचय से प्राप्त 
होनेवाला संतोपष--यह भी एक कारण माना जा सकता है | 

हरि तथा लोगों की लाइली मीरा के काव्य को केवल काव्य के 
रूप में ही देखने से उनमें से बहुत से काव्य सामान्य हैं, यह कहने का 
साहस यदि कोई करे तो उसमें कोई ध्रृष्ठतता न होगी। मीरा की मूल 
कविताएँ कितनी हैं इसी का पूरा विश्वास अभी किसी को नहीं है । 
आजकल प्रकाशित कविताओं मे से मीरा की कितनी होंगी इस विपय में 
संशोधकों के विभिन्न मत हैं। मीरा की भिन्न-भिन्न कविताओं में प्रायः 
उसे एक ही वात कहने को होती है ओर उसके नाम से प्रचलित पदों में 
कहीं कहीं ग्रामीणता की कलक दिखाई दे जाती है | 

इन दोवों के प्रदर्शन से मीरा की कविता का मूल्य नहीं घद जाता। वह 
सर्वत्र एक ही बात कहती है और उसका ज्ञान भी परिमित है, इसी से उसकी 
कविताओं में विविधता की अपेक्षा लालित्य भर कोमलता अधिक आ गई है। 

परन्तु इसमें विविधता है ही नहीं वह तो नहीं कहा जा सकता | 
उसने संन्यास लिया पर »झद्भार गाया। उसने तपस्वचिनी होकर रस का 
पोषण किया । विराशिनी होते हुए भी प्रेम-राय की धुन उसने जगायी | 
संसार छाड़ा, पर सांसारी के सब भावों से उसने श्री गिरधरलाल को गाया 
ओर इन परस्पर विरोधाभासी मिश्रणों ने उसकी कविता में एक दूसरे 
प्रकार की ही प्रकल्लता और रस मर दिया है। मीरा की कविता में 


. विशालता नहीं--यह दोव उसके ज्ञान की संकीण सीमाओं के कारण आा 


गया है; उसके हृदय का नहीं | हृदय ने उसके भावों म॑ प्रचलता ला दी 

ज्ञान ने उसकी दिशाओं को मर्बादित कर दिया। मीरा ज्ञानी नहीं, छानी 

होने का दावा भी नहीं करती । अन्तःप्रेरणा से जितना दिखाई दे, उतने 
“६ १५४-- 


अधिक» अनणरकननप नाना मनन लि 3: :?::? एच व ७ हे 


: रेखाचित्र 


ज्ञान की स्फुरण उसमें स्त्रयं ही हो गया है। मीरा अर्थात्‌ विद्वत्ता नहीं, 
वह तो केवल भावनाओं की परंपरा है | 
मीरा अर्थात्‌ सत्ता नहीं वरन्‌ शोभा | मीरा में गहनता नहीं, वरन्‌ 


रपतिकता और भावना है | यौवन को उसके गीतों में उल्लास मिलता है, 


प्रीढ़ बच में वह रसबृत्ति को सजग रखती है। बृद्ध अंतर में उसके 
प्रभाव से अतिद्ृृद्धता का अनुभव नहीं होता | उसके स्वर में आनन्द और 
सनातन स्नेह की पुकार है | मीरा के भजन के स्वर में बुद्धि और स्थिति 
' का भेद सर्वदा लुप्त-सा हो गया है और बुद्धिमान या मूर्ख, गरीब या अमीर 
सब उसके भजन गाते हुए. रस-निमम्न हो जाते हैं । 
मुक्ति के सभी मार्गों में, वेष्णव-घर्म में मक्ति-्माग की महिमा अधिक 
गायी गई है ओर उसके परिणामस्वरूप साहित्य में और उसके द्वारा 
लोक-हृदयों मे भक्तों का साम्राज्य अधिक अंशों में प्रवर्तित है। हमारे 
यहाँ शानी चाहे कितने ही परिपक्व क्‍यों न हों उनमें से अधिकांश 
वितंडाबाद या दिग्विजय के मोह में शुद्ध ज्ञान के अखंड आनन्द को मूल 
जाते हैँ। लोगों को इनकी विद्वत्ता के आइंबर में कुछ समझ में नहीं: 
आता ओर इनके वाद-विवाद हस्ती-युद्ध जेसा आनन्द-स्थल हो जाता है | 
कवि ओर भक्त बहुधा समान अर्थी हैं अथवा भक्त वास्तव में कवि 
होता है | वैष्णब कबियों ने कृष्ण या राम को पूर्णतया न गाया हो 
ऐसा कत्रि कदाचित्‌ ही कोई मिल सकेगा । भक्ति ही आदर्श माना जाता 
था और उसके द्वारा श्रीकृष्ण-स्वरूप में लय होने की भक्तों की तीत्र इच्छा 
थी। इस विग्रहपूर्ण युग में ज्ञान द्वारा चली आती हुई तकं-परम्परा में 
उलमने की किसी को फुरसत या इच्छा न थी। ज्ञान ग्रात करने के. 
सावन भी त्रहुत कम थे, इसीलिए श्रद्धा से ग्रातर हो सके, ऐसी सहज 
मुक्ति का आकर्षण सबको बहुत अधिक था | 
मीया का आदर्श भी ऐसी प्रेम-लक्षणा भक्ति का ही है। अन्तःपुर 
के अन्धकार में और ऐसे अशांति तथा विग्रह के युग में ज्ञानमार्ग उसके. 
--११६-- 


लि | 
$ 


मीरावाई : एक दृष्टि 


लिए, शक्य न था । नैसर्गिक बुद्धि का चमत्कार तो उसके पदीं में जगह- 
जगह दिखाई देता है ओर वही उसकी सरल कविता का श्गार है । 

आदर्श भक्ति द्वारा मानव आत्मा का साक्षात्कार करता है और उत्तने 
ही अंशों में वह महत्ता प्रात्त कर लेता है। ऐसी महत्ता का मूल्यांकन भी आदर्श 
के प्रमाण से होता है । गिरधरलाल की पापाणमति से आदर्शप्रेमिनी मीरा 
अमभुत्व प्रात्त कर अमर हो गई | उसकी कविता का बल भी उसमें निहित 
शब्दों में नहीं, वरन्‌ इन शब्दों के पीछे दीप्त उसकी भक्ति-ज्योति में है । 

मीरा की कविता में और भी बहुत सी वातें हैँ | उसमें प्रणय-दीवानी 
स्त्री की धृष्टतता है ओर नवोढ़ा की-सी आठुरता। मोहन-बर का गान 
करती हुई वह आत्ममुग्ध हो जाती है। गिरघरलाल का वह गोपी-भाव 
से गान करती है | विरह की वेदना का तीम्र भान होने पर भी मिलने 
की आशा वह कभी नहीं खोती | परन्तु उसकी आशा तो नित्य परिचित 
भावों से भरी हो, ऐसा लगता है | मीरा के कृष्ण गोपियों के साथ रास 
करने वाले हैं; ब्ृदावन की गायों को चराने वाले हैं; मोर-म॒ुकुट धारण 
करने बलि हैं; दही-माखन के चोर हैँ; गोवर्धन भी उन्होंने धारण 
किया और पनिहारियों को तंग करनेवाले भी वही हैँ; वेणु चजानेवाले 
ओर मुग्धा त्रजनारियों की आशा पूर्ण करने वाले ह। वेमब ने उसे 
बहुत कष्ट दिया है, इसीलिए वह वेमवसम्पन्न श्रीकृष्ण को याद नहीं 
करती; विग्रहों के प्रति उसकी अ्रदचि है इसलिए महाभारत के महाबाहु 
श्रीकृष्ण रूप में उन्हें अपनाने का आकर्षण उसे नहीं होता । मीरा का मन 
कृष्ण के वेशुनाद ने मोह जिया हैं। श्रीकृष्ण के शात्त्र रूपी हात्य को वह 
उनमें स्वामीभाव होने के कारण ह्वी सह लेती है | 

सजी कवियों में प्रथम और अजोड़, इस भक्त-कवियिन्नी के गीतों की 
ध्वनि, शताब्दियों बीत गई पर अब भी सुनाई देती ह--अब भी बह 
विस्मृति के गम में विलीन नहीं हुई ओर कौन कह सकता है कि वह 
कभी विलीन होगी भी १ 

+-+ १ छ--+ 


मीराबाई 


सस७-. 2--3>>२»०.मव्लाकाकक गाथा, 


भक्त-कविं मीराबाई का जन्म मेड़ता के राब दूदाजी के छोटे पुत्र 
रजसिंह के यहाँ फुड़की गाँव में हुआ था। इनके जन्म-काल के संबंध में 
विविध मत प्रचलित हैं। मीरा सं० १६०० में विद्यमान. थीं और भोज- 
राज की पत्नी थीं, इस पर से कितने ही इनका जन्म सं० १५७३ बताते 
हैं| कितने ही १४५४ ओर १५६० के बीच मानते हैं और सं० १५७३ 
इनके विवाह का वर्ष बताते , हैं| यह मत अधिक. प्रचलित और मानने 
योग्य लगता है। 
मीराबाई की माता इनके वाल्यकाल में ही परलोकवासी हो गई 
थीं। इसलिए अपने दादा रात्र दूदाजी के पास ही इनका पालन-पोषण 
हुआ और बड़ी हुईं । इतिहास-प्रसिद्ध भक्तवीर राव जयमहल मीराबाई के 
काका का पुत्र था और उसका बाल्यकाल भी राव दूदाजी के पास द्दी 
व्यतीत हुआ था | राव दूदाजी वैष्णव और परम भक्त थे | उनके संस्कारों 
का प्रमाव वालकों पर भी पड़ा | 
मीरावाई का विवाह चित्तोड़ के सुप्रसिद्ध राणा साँगा के बड़े पुत्र भोज- 
राज के साथ हुआ था। ससुराल आ जाने के बाद कुलदेवी को पूजा न 
' करने के विषय में उनके सुसरालवालों में धर्म-मेद पैदा हो गया, यह 
' दंतकथा है किन्तु इस बात में सत्यांश कितना है यह बताना कठिन है । 
इतना तो सत्य है कि मीरावाई का वैवाहिक जीवन अधिक समय तक 
निभ सका हो, ऐसा नहीं लगता। मीराबाई के पति भोजराज युवराज 
अवस्था में ही परलोकवासी हो गये ये। ऐेतिहासिकों के अनुमान से 
यह समय सं० १४७३ से १४८३ के बीच होना चाहिए। 
हाई ८ 





मीरावाई 


मीराबाई का कुकाव बचपन से ही क्ृष्ण-भक्ति की ओर विशेष था 
ओर अकाल वैधब्य ने इस ब्त्ति को और भी उत्तेजना दी--इन 
परिस्थितियों में इस भावना का और भी पोषण हुआ जान पड़ता है| 
चित्तोड़ में भी इसी समय भयंकर विप्लव मचा हुआ था | सं० १४८३ में 
राणा सांगा वाबर से युद्ध में पराजित हुए। मीरात्राई के पिता रत्सिंह 
ओर काका रायमल्ल भी इसी युद्ध में मारे गये। राणा सोंगा की रुत्यु 
भी इसी वीच हुई और संवत्‌ श८४४ में राणा रक्सिंह चित्तोड़ की गद्दी 
पर बैठे परन्तु इनका देहांत संवत्‌ १४८८ में हो गया और उसके बाद 
राणा विक्रमादित्य गद्दी पर बैठे । मीराताई को जो उपद्रव सहने पड़े, वे 
राणा विक्रमादित्व की ओर से ही हुए. होंगे, यह सम्भव है | 

मीरावाई की भक्ति की धुन इसी समय अधिक बलवती हो गई 
होगी | वाह्य-विग्रहों में उलभे हुए परिवार के मुख्य सदस्यों का घर की 
छोटी-मोटी बातों पर ध्यान न देना स्वाभाविक ही है, परन्तु मीरा का भक्ति- 
प्रवाह इस बीच बहुत अधिक चढ़ने लगा था। अनेक साधु-संतों का उनके 
यहाँ जमाव जमता । राणा विक्रमादित्य का ध्यान गद्दी पर बैठते ही तुरन्त 
इस ओर गया। सर्व-चंद्र मी जिसके दर्शन न कर सकें ऐसी चित्तोड़ के 
महाराजा की कुलवधू साथु-संतों के बीच बैठकर गाये और नाचे-कूदे 
इसमें उनको कुल-मर्यादा का लोग होता हुआ लगा ओर तभी से 
मीराबाई को इस मार्ग से लॉयने के उपाय उन्होंने आरंभ कर दिये | 

राणा ने पहले तो चंपा ओर चमेली नाम की दो दासियाँ---साम 
द्वारा मीराबाई का मन बदलने के लिए नियुक्त की गई | मीरा के भक्ति 
रस के प्रमाव-बल के आगे दासियों का प्रभाव नहीं दिक सका ओर वे 
उस प्रवाह में बह गई ओर उनकी शिप्या बनीं। मीराशई की ननद 
ने भी मीरा को समकाने का वीड़ा उठाया, पर उसकी भी ऐसी ही 
दशा हुई, ऐसी कथा है। मीराबाई को सममभाने के समी प्रयत्ष व्यर्थ 


हु 
० पक प 


होते हुए देखकर राणा के क्रोध का पार न रहा और वह किसी भी 
“5१ ६उक 


रेखाचित्र 
तरह मीरा को नष्ट करने के उपाय सोचने लगा। उसने पुप्पहारों में 
विच्छु, सॉप इत्यादि विषैले जन्तु भेजे। कृष्णचरणाम्रत के नाम.से 
'हलांहल कापात्र भरकर भेजा। मीरा ने वह विष पी लिया। पर 
उसका कोई असर उन पर नहीं हुआ । ऐसे अनेक उपद्रवों से मीराबाई 
की श्रद्धा ओर भी बलवती हो गई । 
सीराबाई का इस विषपान से देहांत हो गया ऐसा कइयों का मत है, 
और मरते-मरते उस विष के लानेवाले वरणिक को मीरावाई ने शाप 
दिया कि तेरे कुल में संपत्ति ओर संतति साथ-साथ नहीं रहेगी। ऐसा 
कहा जाता है कि आज भी बीजवर्गी वैश्यों में इस शाप के कारण 
संपत्ति ओर संतति साथ-साथ नहीं होती | किन्तु मीराबाई का देहांत 
विष॒पान से हुआ, इस वात का कुछ आधार नहीं मिलता । 
राणाजी के ये प्रयल्त अधिक समय तक शुप्त नहीं रह सके श्र 
उनके प्रत्यक्ष होते ही मीराबाई को चित्तौड़ में और अधिक दिनों तक 
रहना ठीक नहीं लगा इसलिए तीर्थयात्रा के बहाने उन्होंने चित्तोड़ त्याग 
दिया | पहले अपने पीहर भेड़ता में राव बीरमजी के यहाँ जाकर रहीं । 
राव वीरमजी और उनके पुत्र जयमल्ल ने मीरावाई का सत्कार किया 
ओऔर आदरपूर्वक रखा। यहाँ भी मीयावाई के पास साधु-संत और भक्त 
आते थे। सम्मव है, यह ढंग राव वीरम जी को भी अच्छा न लगा हो, 
आर इसी कारण ऐसा लगता है कि मीरावाई मेड़ता में भी वहुत समय 
तक नहीं रही हों । वहाँ से वह मथुरा, इन्दावन इत्यादि स्थानों का पर्यटन 
: फर द्वारका जाकर रहने लगीं | 
ह मीराबाई का इतिहास संबत्‌ १६०० तक का मिलता है। संबत््‌ 
१६४ से १६१८ तक जब मेड़ता युद्ध में फँसा हुआ था, तब मीरा 
कहाँ थीं इसका ठीक-ठीक पता कहीं भी नहीं मिलता | पर इस समय 
ये संभवतः द्वारका में ही होंगी, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है| 
मुरीदान नामक एक भाद से, कथन से उनका देहांत १६०३ में हुआ | 
कि र्‌ २ 0--++> 


मीरावाई 


तानसेन, और तुलसीदास. के प्रसंग को यदि ठीक मार्में तो मीराबाई का 
देहावसान संवत्‌ १६२० से १६३६ के पहले नहीं हुआ यह मानने का 
कारण भी मिलता है। 

मीराबाई के चित्तौड़ त्याग के बाद चित्तौड़ में आंतरिक और वाह्य 


विग्रह बहुत बढ़ गये थे | मीरावाई जैसी भक्त को कष्ट देने का तथा 


चित्तोड़-त्याग का यह फल है, यह धारणा चित्तौड़ में अधिक और अधिक 
फैलती गई । संवत्‌ १५६२ में राणा विक्रमादित्य को मारकर बनवीर 
नाम के एक दास ने गदूदी पर अधिकार कर लिया था। कुमार उदय- 
सिंह उस समय बालक होने के कारण पन्ना नाम की एक धायमोंँ के पास 

--उसने उसे छिपा रखा था। उसने वयस्क होने पर बनवीर को मार 
कर राज्य पर अधिकार किया | परन्तु मुसलमानों के श्राक्ममण एक के 
बाद एक होते ही गये । मीराबाई जैसी भक्त के पदचिह्न चित्तौड़ की भूमि 
पर पड़े तो ये सव उपद्रव शांत हो जायेँ यह सत्र को लगने लगा और 


| इसीलिए मीराबाई को चित्तौड़ आने का निमंत्रण भेजा गया। मीराबाई 


के यह निमंत्रण स्वीकार न करने पर राणा ने फिर ब्राह्मणों को बुलाने 
भेजा | मीराबाई ने अंत में विलकुल अस्वीकार कर दिया | तब ब्राह्मणों 
ने उपवास करने आरम्भ किये | मीरावाई खिन्‍न हृदय से द्वारकानाथ 
की आशा लेने मंदिर में गई और--- 

“साजन सुध जौ जाने त्वोॉऊ लीजै हो--' यह पद गातें-गात अपने 
प्रियतम गिरघरलाल की मूर्ति में मीराबाई की मूर्ति समा गई । 

मीराबाई की इस प्रकार की मृत्यु की बात सत्य हैं या रूपक यह 
चर्चास्पद. विषय किसी भावी लेखक के लिए छोड़े देती 

मीराबाई के नाम से बहुत-सी दंत-कथाएँ प्रचलित हैं। उन्हें संच्तेप 
में नीचे देने का प्रयत्न किया है । बन्दावन में जीवगोत्वामी अथवा 
रूपगोस्वामी नाम के कोई चैतन्य संप्रदाय के वालब्रह्मचारी रहत थ। 
यात्रार्थ गई हुई मीराबाई को इनके दर्शन करने की इच्छा हुई और 

+--+१२३१-- 


* रेखाचित्र 


्् 


उन्हें कहला भेजा। उत्तर में उन्होंने कहा कि ये वालब्रह्मचारी हैं 
इसलिए ज्री-मुख-रशंन उनके लिए त्याज्य है। यह उत्तर सुनकर मीरा 
ने कहलवाया कि मैं तो आज तक यही जानती थी कि ब्रज में केवल 


श्रीकृष्ण ही पुरुष हें, आप एक दूसरे भी हैं यह मुझे आज ही मालूम, 
हुआ । स्वामी ने लज्जित होकर अपने प्रणु का त्याग किया और मीरात्राई. 


के साथ वार्तालाप का आनंद लिया। यह भी कहा जाता है कि 
मीरा आजा माँग कर उन्हींके आश्रम में रहने लगीं। गोस्वामी मीरा के 
शिष्य हो गये यह भी लोग मानने लगे; पर मीरा तो उनको अपने 
गुरु ही कहा करती थीं । 
एक दूसरी कथा इस प्रकार है--तानसेन और सम्राट अ्रकवर मीरा 

के यश से आकर्षित हुए--वेब बदल कर उनसे मिलने गये और मीरा के 
साथ संगीत और ज्ञान. की चर्चा कर बहुत प्रसन्न हुए. थे। सम्राद अ्रकवर 
का जन्म सं० १५६६ और राज्यामिषेक सं० १६१२ में हुआ था। यदि 
यह कथा सत्य है तो मीरा इस समय के वाद भी विद्यमान थीं यह मानने 
का कारण मिलता है। 

यही बात दसरी तरह से भी कही. जाती है कि संन्यासी वेष में आये हुए 
अकबर बादशाह ने प्रसन्न होकर मीरा को एक मृल्यवान हार दिया। 
भक्तों के लिए ऐसे मूल्यवान पदार्थ निरथ क हैं,, यह कह कर मीरा ने 
प्रश्न किया कि संन्‍्यासी के पास रज्नहार कहाँ से आया १ उत्तर मिला कि 
यमुना में स्नान करते हुए वह मिला है और भक्त के योग्य वह है 
भी, यह कह कर हार छोड़ कर चले आये | पर मीरा की इस विषय में 
बहुत निंदा हुईं और मूल्य जँचवाने पर वह बहुत मूल्यवान--दस लाख 
का--ठहरा और बादशाह के यहाँ वेचा गया । इससे यही निश्चित किया. 
गया कि स्वयं बादशाह ही वेष बदलकर आया था | 

चित्तौड़ में राणा ने मीरा को बहुत दुःख दिया तब मीरा 
तुलसीदास की सलाह लेने के लिए, पत्र लिखा ओर उनके गच्युत्तेर मे 
“4१२२-०८ 


-प 


; 
। 


मीरावाई 


दृढ़ता ग्राप्त कर चित्तोड़ छोड़ दिया था। परन्तु यह बात ठीक नहीं 
लगती | तुलसीदास ने रामायण का आरम्भ सं० १६३१ में किया और 
उनकी मृत्यु सं० १६८० में हुईं यह देखते हुए मीराबाई का और उनका 
समय एक नहीं था, ऐसा लगता है । 

विवाह के बाद ससुरालवालों की ओर से कुलदेवी का पूजन करने 
के लिए मीरा से कहा गया; पर मीराबाई ने गिरिध्रलाल के अ्रतिरिक्त 
किसी दसरे की पूजा न करने की प्रतिशञ प्रकट की । मीराबाई का ससुराल- 
वालों के साथ मतभेद तो उसी समग्र से प्रारंस हो गया आर राख ने 
क्रोधित होकर उन्हें भूतिया' महल में सत्रस अलग स्थान दिया। सह 
बात सत्य हो ऐसा नहीं लगता क्योंकि एक दूसरी कथा भी प्रचलित है | 
इस कथा के अनुसार मीरा राणा को इतनी अधिक श्रभ्रिव हा गई हा 
ऐसा नहीं जान पड़ता | किसी पंडित ने राणा को पत्र लिखा था, उसने 

सा” श्क्तर सिमरख से लिखा था। इसका क्या तावय हैं, यह राणा का 

कोई भी न बता सका | अंत में राणा ने यह पत्र मीराताई की दिखाने के 
लिए भेजा | मीराबाई ने तुरन्त ही उसका अथ बतावा कि लाल के साथ 
सा? मिलाकर 'लालसा? पढ़ो। लिखनेवाले ने इस प्रकार अपनी इल्डा 
च्यक्ष की थी । राणाजी मीरा की यह चत॒राई देखकर अन्त 
आनंदित हुए। 

मीराबाई की ननद भी मीराबाई की निंदा सुतकर उसे मनान गया 
पर बहोँ जाते ही वह खबं ही मक्ति-्यवाह में बह गई, ऐसी भी | 
कथा हैं | 

मीराबाई के चमत्कार की भी बहुत सी कथाएं लागा मं प्रचलित हैं । 
मीरावाई के भक्त मीरावाई को गिरिधरलाल साज्ञात्‌ मिलन हैं ऐसा मानते 
थे | मीरा बात करती हो इस प्रकार श्रपने मन के सभा मात्र माइर मे 
गिरिधरलाल के पास व्यक्त करती थीं इससे श्रथवा किसी दूसर कारन 
से, ऐसी कथा प्रचलित हो गई होंगी। एक बार राणा की भी ऐसी 

ज+र ९ 


रेखाचित्र ! 


शंका हुईं कि मीरा अपने आवास में किसी पुरुष के साथ बात करती 
है| राणा क्रोधित हो तुरन्त ही तलवार लेकर मीरा के महल-की ओर 
दौड़े और मीरा का अंतःपुर खोजने लगे पर उन्हें कोई भी दिखाई न 
दिया | राणा ने मीरा से पूछा--“अभी-अभी जिस पुरुष के साथ बातें 
कर रही थी वह कहाँ है !” मीरा ने कहा, "मेरे प्रभु गिरिघरलाल तो 
सर्वत्र ही हैं। ठुम्हारी दृष्टि के सामने भी हैं |? राणा ने चारों ओर दृष्टि 
दौड़ाई पर कोई भी दिखाई न दिया श्रतः तलवार लेकर मीरा को 
मारने दोड़े | उन्हें एक मीरा की जगह दो-चार मीरा दिखाई दीं, दूसरी 
तरफ पलंग पर नरसिंह रूप मगवान दिखाई दिये। राणा भवभीत होकर 
वहों से भागे | जाते-जाते कहते गये कि तेरे इश्देव तो बहुत भयानक 
हैं, हमारे कुलदेवता को वू क्‍यों नहीं पूजती ! 

राणा ने डिविया में शालिग्राम के बदले सर्प भेजा, पर वह मीरा के 
भक्ति-प्रभाव से शालिग्राम ही हो गया। चरणाम्रत के बदले विष भेजा, 
'पर वह भी अमृत रूप हो मीरा को पच गया | | 


बिक 


एक बार एक साधु ने मीराबाई के पास आकर कहां कि मुझे 
गिरधरलाल ने स्वप्न में तुम्हारे दुःल दूर करने की आज्ञा दी है| त॒म 
. उनकी दासी हो और में उनका दास हूँ, इसलिए मुमे स्वीकार करो। 
मीरा ने कहा कि प्रभु की आज्ञा मुझसे छिपी नहीं है, किन्तु ठुम पहले 
भोजनादि से निश्वत हो लो | मीरा ने उसे आहारादि से तृपष्त किया, फिर 
साधु-मंडली के बीच सब बैठे और उस साधु से मीरा ने कहा कि निःशंक 
होकर मेरे लिए आपकी जो आश हो कहो, तो साथ ने उन्हें एकांत में 
चलने के लिए कहा | मीरा ने कहा कि जहाँ मेरे मिरधरलाल न हों ऐसा 
एकांत स्थल मेरे लिए समस्त विश्व में भी नहीं, तो फिर ऐसा एकांत मैं 
कहाँ से लाऊँ ? साधु की विपयेच्छा ऐसे गर्मित उपदेश से नष्ट हो गई 
आर माता कहकर मीरा के चरणों में गिर पड़ा। भक्त-मंडली में आनंद 
छा गया और मीरा नें प्रेम-भक्ति की घुन में गाया, दरद न जाने कोय |? 
“-+* २४--- रु 


न्न्जिज ताल का ४: हल: 


मीराबाई 


मीरा के ऐसे आचरणों से दुखी होकर राणा ने उनसे देह त्याग 
करने के लिए. कहलवाया। इस अ्रपमान से दुखी होकर मीरा गाँव के 
बाहर एक नदी में मृत्यु की इच्छा से कूद पड़ीं, पर किसी देवदूत ने उन्हें 


निकाल लिया और कहा कि अभी तुम्हें संसार में बहुत से काम करने 


अर 


शेप हैं और भक्ति-महिमा का प्रसार करना है। चेतना लोण्ते ही मीरा 
ने अपने को यमुना-तथ पर पाया। मीरा वहाँ से रास्ता पूछती-पूछुती 
वृन्दावन पहुँची । 

मीराबाई के नाम पर ऐसी अनेकों कथाएँ प्रचलित हैं, परन्तु अपने: 
देश में भाग्य से ही कोई ऐसा संतजन या महापुरुष हो, जिसके कि आस- 
पास ऐसी कथाओं के तार न लिपटे हों | हमारा अधिकांश इतिहास ऐसी: 
ही लोक-कथाओं के रूप में मिलता है ओर ऐसी कथाओं में प्रत्येक 
मनुष्य को मूल बात में कुछ जोड़ देने अथवा उसमें से कुछ निकाल देने 
का लोभ हुए बिना नहीं रहता। परिणामस्वरूप इतिहास में इतिहास की. 
अपेक्षा दंत-कथाएँ अधिक हैं । 

राणा छुंभा की सुन्दर महारानी की प्रेम-भक्ति ओर संसार-त्याग में 
जितना अद्भुत रस है, उतना भोजराज की विधवा रानी के आत्म- 
समर्पण में बहुतों को न मिलेगा | विधवा के भाग्य में तो तप, ब्रत और 
भक्ति जिखी हुई ही है, ऐसी कई मान्यताएँ हमारे समाज में प्रचलित है 
परन्तु सारे भारतवर्ष मे अपने नाम का प्रसार करनेवाली इस ज्नी के 
जीवन में तथा व्यक्तित्व से अपूर्वता मिन्न-मिन्न कथाओं की छुलनी में से 
य्पके बिना नहीं रहती । और इसकी कविता का रस तो थोड़े या बहुत 
अंशों लोक-हृदय के लिए. एक संस्कार जितना ही महत्वपूर्ण हो गया 
है | कविता क्या है, यह समभ में आने लगता है, तभी से मीरा के 
नाम और पद का परिचय प्रारंभ हो जाता है ओर जीवन में अनेक बार 
उसके पद-रस के लालित्य में ड्रवकर मनुष्य आश्वासन और शांति की 
खोज करता है | उत्तर, पश्चिम और पूर्व में “मीरा के प्रभु गिरवर 

5 है २६००5 


रेखाचित्र 


' नागर” इस कड़ी की घुन जिसके कान में एक वार भी न॒पड़ी हो, क्या 
खेसी स्त्री वा पुरुष होगा ! 

मीराबाई-रखित ग्रंथों तथा पदों की सूची :--- 

१--नररसिंह का मायरा : नरसिंह महेता का मायरा विभिन्न राग- 
पदों में है। उसकी अथम पद की दूसरी पंक्ति में है कि “नरसिंह को 
मायरो मंगल गावे मीरा दासी? और उसकी पॉँचवीं कड़ी से पता लगता 
है कि वह भक्तिकथा उसकी मिथुला नाम की सल्थी ने भक्तों को 
सुनाई थी । 

२--जयदेब कृत गीतगोविंद की टीका ; यह टीका राणा कुंमा ने की 
है, यह भी कहा जाता है । उसके साथ मीरावाई का नाम भी जोडते हैं। 
इससे लगता है कि मीरा तथा राणा कुंभा का संबंध लोगों ने माना होगा 
'इसीसे यह भी प्रचलित हो गया होगा । 

३---राम गोविंद : पंडित गौरीशंकर मानते हैं कि यह काव्य-अन्य 
था ।यह अब प्राप्य नहीं है । , ;- 

४---फुटकर पद तथा भजन : कहा जाता है कि जोधपुर के दरबार” 
में मीरा के पद तथा भजनों का संभ्रह है । वही पद ओर भजन जो हमारे 
पढ़ने तथा सुनने में आते हैं, सब मीराकृत हैं; परन्तु उनमें कितने ही.क्षे पक 
भी हैं तथा ठुक-पियकर हिन्दी, मारवाड़ी ओर युजराती शब्दों से मिश्रित 
हो गये हैं|" 

१--भानुसुखराम निगुणराम मेहता के मीराचाई” में से यह सूची ली 


गई है। 


जे 


--१२६- 


एस्पेशिया ; ख्तरियों में एक वसंतावतार 
स्पाशया : खिया में एक पृ 


जिस नगर में बसंतोत्सव मनाया जाता है वहाँ वसंती रंग से रँगे हुए 
अंग तथा हृदव के दर्शन हो सकते हैं, जिस जगह का जनसमुदाय जीवन 
मर वसंत की प्रतीक्षा करता रहा हो वहाँ के लोगों के वर्सत के विषय में 
तथा वसंत की. भावना के विपय में क्या कहना ? किसी को बसंत में 
बिलास के दर्शन होते हैं, कोई वसंत-उत्सव मनाता है; कोई स्वयं वसंत पर 
विजय प्राप्त करता है या अपने पर वसंत को विजित होने देता है; कोई 
जीवन म॑ बसंत मानता है, तो किसी को सृष्टि पर व्ंत ला देने की 
अमिलापा होती है; किसी की आयु की वसंत-जयंती होती है तो किसी का 
हृदय सदा वसंत-रंगी होता हे--इस प्रकार सबके जीवन में किसी न 
किसी रूप में सदा ही बसंत रहता है और जीवन-प्रदेश में बसंत की 
वायु भीर-बीरे अपनी सुगंध विंखेरती हुई बहती है । 

ओर यह वसंत प्रत्येक देश का अलग होता है । प्रत्येक मानव समुदाय 

का अलग-अ्रलग होता है । प्रत्येक जगह वसंत का रंग . अनोखा होता है | 
किसी का बसंत लंबा, किसी का संज्षित, किसी का एक रंग वाला तो 
किसी का विविध रंगी और किसी का ज्षुण॒जीवी होता है | 

परन्तु वसंत का अर्थ तो समी जगह एक-सा है। सभी ने वसंत को 
यौवन माना है, सभी ने वसंत में नवजीवन की कल्पना की है, वसंत को 
आशा और उल्लास का अधिकारी माना है। इस प्रकार प्रकृति का और 
मानव-बर्ग का वसंत आता है तो नवीन पृष्प-पंखुरियों से तथा नवीन 
आदशों से उसका आगमन सूचित होता है और इसीलिए बसंत को ऋतु: 
राज की उपमा देते हैं। 

--१२७--- 


रेखाचित्र 


जीवन और बसंत का बहुत निकट का संबंध है। मानव की या 
मानव के किसी वर्ग की वसंत-सष्टि हो, तब्र सूंड्टि बसंत में नवंपल्‍लवित 
हो जाती है । उसी प्रकार उनके नित्य जीवन-क्रम में मी परिवर्तन हो जाता 
है और एक बार इस प्रकार प्रत्यकज्ञीयूत वसंत का पुनरागमन कभी न..« 
कभी हुए निना रहता नहीं | सृष्टि के बसंत की तरह प्रतिवर्ष तो नहीं, 
पर अनेक वार--बा रंबार--जन-वर्ग की एक ऐसी भाग्यशाली आत्मा में 
नये माव--नवीन आदश--फूलते-फलते हैं। इस फसल में गिरे हुए बीजों 
में से कोई रह जाता है, .कोई नष्ट हो जाता है, किसी पर मिद्दी चढ़ 
जाती है और कोई ध्थ्वी की दरार में घुसकर नष्ट हो जाता है| वसंत 
की तरह मानव-जीवन की भी ऐसी ही अनंत कहानी है । 


परन्तु हम इस सृष्टि की और मानवों के महाकुल की बात छोड़ देते 
हैं । हमें यहाँ मानवों के एक छोटे समझे जानेवाले; पर फिर मी बड़े वर्ग 
की--छ्ली वर्ग की--वसंत-बारता आरंभ करते हैं । नहीं, उनकी - 
भी पूर्णतया फूजी-फली, नवपल्‍लवित वसंत की नहीं वरन्‌ सुन्दर और * 
कोमल होने पर भी चिरस्मरणीय ऐसी बसंत की प्रथम कोपल की | इस 
कोपल रूप मैं--एक वसंतावतार सहश--आज से चौबीस सौ वर्ष पूर्व 
ग्रीस के स्वर्ण युग के नाम से परिचित युग के अधिडाता पैरीकलीस की 
पत्नी एंस्पेशिया से परिचित होंगे। 

कोई कहेगा कि भारतवर्ष का जन-वर्ग बंसतोत्सव मनाता है, वहाँ 
इस दूर देश के स्री के परिचय की क्या आवश्यकता है ! 

उत्तर देना भी कोई कठिन नहीं । वसंत पर जिस प्रकार एक ही देश 
का अधिकार नहीं उसी प्रकार मानव-कुल के वसंताबतार भी एक ही 
जुगह जन्म नहीं लेते। भारत का स्री वर्ग जब जीवन में थसंत ला रहा 
हो, तब पूर्व में सृष्टि के एक कोने में प्रगदित, इनके जैसी दशा और समय 
का आमास कराती हुई, प्राचीन बसंत को कथा अनुचित किस लिए कही. 

जयई २८ 





एस्पेशिया : सझ्लियों में एक वसंतावतार 


जा सकती है ? और किसी देश या जाति की वसंत-कथा के बदले ञ्ती 
वर्ग की वसंत-कथा तो इसलिए कह रही हूँ कि अपने वर्ग के प्रति किसे 
पक्तुपात नहीं होता ? 


एस्पेशिया का परिचय देने से पहले उसके स्थान ओर समय का 
ओर समाज में शिशिर की सी शीतलता सद्ृश स्थिति में रहती हुई उस 
समय की स्त्रियों की स्थिति का अध्ययन करना आवश्यक हे । 


एस्पेशिया का समय अर्थात्‌ ग्रीस का विशेषकर एशथेन्स की सत्ता का, 
संस्कृति का ओर कला का स्वर्ण युग था | 


इस स्वर्ण युग में भी स्लियों की स्थिति तो पैर की धूल के समान ही 
थी। जिस प्रकार थ्राज भारत में है उसी प्रकार उन दिनों एथन्स की 
स्रियोँ बाहर नहीं निकल सकती थीं | वे पर-पुरुष के साथ बात नहीं कर 
सकती थीं । वात नहीं कर सकती थीं इतना ही नहीं, पर उन्हें सह भी 
नहीं दिखा सकती थीं। उन्हें शिक्षा बिलकुल नहीं दी जाती थी। वे धर- 
ग्रहस्थी का काम करने ओर बच्चों का पालन-पोयण करने के अतिरिक्त 
बाहर की एक भी वस्तु में भाग नहीं लेती थीं | यह सब तो हीटीवरी? 
नाम से प्रख्यात आज को अ्रशिष्ठ समझी जानेवाली छ्लियां के समान पदवी 
द्वारा परिचित स्त्री वर्ग ही कर सकता था । 


ओर इस 'हीटीयरी? वर्ग में केवल अशिष्ट वर्ग की ही नहीं, वरन्‌ 

ऐशथेन्स में विवाहित होकर आई हुई विदेशी त्लियों का भी समावेश होता 

था| एसेन्स में उस समय एसा नियम था कि एथेन्सवासी का एथेन्स 

नगर के बाहर के किसी व्यक्ति के साथ, नियम-पूर्वक विवाह- 

संत्रंध नहीं हो सकता था | दूसरे किसी नगर या द्वीप की उत्तम वर्य की 
--१२६-- 


रेखाचित्र 


स्त्री मी एथेनियन को पति रूप में स्वीकार करे तो वह 'हीटीयरी” स्त्री में 
गिनी जाती थी | 

यह नियम एस्पेशिया से पहले, पेरीकलीस ने प्रचलित किया था | 
इस नियम के अनुसार एथेन्स में विवाहित होकर आई हुई कितनी ख्लियाँ 
“हीरीयरी” वर्ग में गिनी जाने लगीं; कितने ही घर बर्बाद हो गये और 
इस पाप का प्रायश्चित अपनी प्रियतमा पत्नी को इस अधम स्थिति में 
देखकर उसे जीवन मर करना पड़ा ६: 


#गुजरात के कितने ही गाँवों मं आज भी रिवाज है कि एक ही 
जाति के किसी दूसरे गाँव के आदमी से अपनी कन्या का विवाह कर दे 
तो उसे जाति बाहर कर दिया जाता है । एक ही गाँव में, एक ही धर्म 
के होने पर भी जाति के किसी दूसरे विभाग के साथ विवाह नहीं हो 
सकता | उदाहरणतः दसा ओर बीसा आचार-विचार और धर्म में समान 
, होने पर भी परस्पर विवाह नहीं कर सकते | 


3:इस सम्बन्ध में अंतिम खोज के सार रूप में श्री ट्रड स्थरव्न 


है ॥ ञे के 5५ 2 ४७, च 
“[॥6 40777076४ "४/४/7728०८? नामक अपनी पुस्तक में ऐतिहासिक 
टिप्पणी देते हुए लिखते हैं-- 


नुप्रट 2०0प्रटीए50705. छ पा0वैं5४7 5$८४0875, १ए70 [98ए8 ॥79062 
ला 502ंबी ४प४ाप5 वबााटए 0 लउपठाएट +2524#8टी 872. (765९ : 
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प्रटर 8 7200678 प्रएते67 (6 78 ७, 5॥86 ए85 707 088 छए 7706९5507. 
मुठ एठडंघेंठ्प ३5 ग्राएटोए ऐप्रट उल्याय6 45 पिक्ा 07 2 ॥707ट479व८ 
फाडि छा 2 एपंग्रएड ईंत हप्ा5८तुएडए0 धंशार$., 2006९ $व0जांत: 
इश्टा05 [0 98ए८ 5घंश्वे छोर चुण्टड009० ०ग्ष्ट 07 थे... 7 फ्री6 ा८2- 
2:58 07 पाल ८०पघांट 20605-+एां6 एटा श[0फ%९८० छा0ता6 (०८४९९ 
घीध्या 055 एट0ए छ/255---फ८४९ त7९८८८० फ़्पाए फैए धबप्टत 06 
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8779 पेट३95९प इ६ड छ009ॉत 9058९58 घा८ *एां7प्८४ 08६ छ०5, वध 


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बी 


एस्पेशिया ; स्त्रियों में एक वसंताव॒तार 


इन हीटीयरी? स्त्रियों को एक प्रकार का स्वातंत्ब और भी मिलता 
था । वे पढ़ती-लिखतीं, दृत्य, गान तथा चित्र इत्यादि कलाओों में पारंगत 
होतीं। उन्हें लिखना-पढ़ना आता, बिना परदे के घाहर जा सकती थीं; पुरु्ों 
के साथ स्वतंत्रतापू्वक मिल सकती थीं। एथेन्स के संस्कारी पुरुषों 
के घर का स््री-वर्ग अश्ञन से ऊब कर ऐसी ब्लियों की मित्रता खोजती | 

एस्पेशिया भी जन्म से एयेनियन नहीं थी। मीलेट्स नाम के थपू 
में जन्मी और एथेन्स में आकर रहने लगी थी। मीलेय्स की ह्लियाँ भी 
द्राज की स्त्रियों की तरह सभी मान मे स्वतन्त्र थीं। मीलेथ्स उस समय 
एशिया माइनर का सौंदर्य ओर कला में सर्वप्रथम गिना जानिवाला नगर 
था | एस्पेशिया वहाँ के प्रतिष्ठित निवासी एक्‍्सीश्ोक्स को पुत्री थी। 
ब्रहोँ उसे वफक्‍्तृत्व, गानकला ओर दूसरी अनेक प्रकार की कला सिखायी 
॥ई थीं। स्ल्रियों की कलाओं में वह एक ही थी। वाद-बिवाद में उसे 
योड़े ही व्यक्ति हरा सकते थे | तत्वज्ञन उसका प्रिय विपय था । 








7600678 ९5०९४ ऐ:९55 इद्घग8 <0ग्रांट 90208, 7900 गत >४९००॥०४ 
30९2 66 !॥6% ध्णांयि धार छुाटबाटछ४ 7259९८... 25. घी हांगए 
गत छा55घं82 ० 4घालाड वेच्लांप्र:त गरढा प्राष्य एा छुल्यांए$ घटा 
0780:0८०, ६0 9४ 7९5पा:८८ए८९ द्वाद्ए >ए पार रिठ्पावा5... ैशीट्प 
09६८7९५६ |# 0050 शु/्थ्व: 0.0, गाव्या।€०5, इटपौए0075 ए४एंएटते, 
$ एाटी |7 घीटार एबप07 शिटए) ०-९5, 3५७०३538 ६00 ४०७ सधायलशा- 
१९४८वें 400 ॥छितिातवठप5 ग्राणवे5 बए८९फ-ल्ते ांधित्पा वृष्टकाता प्रो 
3ए0प7ए [65 06 ए€ ९छ्गरांध ए0९5. शिणवाले: ७३४७ पीए ॥05 
72९5६ ठरटातेश,.. (00 ठग [9998० ९ उधार पीधा वा वीएप॑$८ 
ए45 जि 06 एठएपन्‍2 गब्ो078 - त 9प्र०तीरर धात्र रिटायंटौ2$ वाटए्टा 
20 ए€ ॥0056 007 #<पपषण्ढते 00 4६ ध्यंघपा0्पा पघंइशंपड परद्वा, जवींदो 
हाबिंपए वंधायं।नार$ पि॥7 जार व॒ए्टते घरधतेटा गरीं$ ॥00,. 47577 ६० 
'ड वपाइ्नह्ञाघव्त घोत्ा पाढ सिा5८ (तेशटए शाते पंघाण्ों एणैट ्॑ पैदव0- 
एबधंट +भपालत$ [एटएा भा70. बरड्छशावता 40086 ! | 5 बडा6 गांधी यह 
॥व छिए एफ्रटाएनजएपए ट्टापराए€5 इटी0ीवा$ 5०टण5 0 793ए6 पता: 
० पांगरचंपडु 07 फैथाइडएट5 एिद्ाट धां5ड स्याग्ोस्रुट ऋण 
785 ए0प्र८टाए८०. 

-र500776) २०0९5 0 एल प्रभा0 घर ेजिएए380- 


--१३१-- 


रेखातनित्र 


एस्पेशिया मिलेग्स छोड़कर एथेन्स में क्‍यों रहने आई इसकी ठीक- 
टीक जानकारी किसी को नहीं है। कदाचित्‌ कला, संस्कार और शौर्य 
के शिखर पर पहुँचे हुए नगर में अपनी बुद्धि और ज्ञान की परीक्षा 
करने के विचार से प्रेरित हुई हो; ग्रथवा एयेन्स के बड़े आदमियों तथा 
जिद्वानों की संगति में अपने विकास की इच्छा से. आई हो | युवा तथा 
आश्वर्यजनक वक्‍तृत्व कला के शिक्षुक के रूप में वहाँ आकर वह अपनी: 
बुद्धि का चमत्कार चारों ओर फेलाने लगी और यथेन्स के विद्वान तथा 
कलाविद्‌ उसके द्रवार को सुशोमित करने लगे । 


किक का] 


एथेन्स में उस समय पेरीक्लीस का सूर्य मध्याह् पर था | ग्रीस में 
अनेकों सदियों तक सत्ता भोग कर स्पार्ण निस्तेज हो गया था। पेरीकलीस. 
के मधुर-कंठ की वक्‍तृत्व छुटा, मुरली से प्रेरित सर्प की तरह एथेनियनों 
को नचा रही थी। अपनी राजनीतिज्ञता तथा भव्य दिखावे से यह देश, 
मे तथा दूर-दूर तक विदेशों में भी प्रसिद्ध हो गया था। ऐसा पुरुष जब 
एस्पेशिया की बुद्धि से आकर्षित हो, तो वह ज्री असाधारण होनी चाहिए, 
यह विचार मन में उठे बिना नहीं रहता । 


ओर एस्पेशिया की बुद्धि ने केवल पैरीकलीस को ही आशचर्यंचकित 
नहीं किया था; सुकरात जैसा वादविवाद में प्रवीण गंभीर तत्वशञनी भी 
उसका वार्तालाप सुनने के लिए आता था। एनाक्जागोरस सा तत्व- 
ज्ञानी उससे वादविवाद करता। फीडीआस जैसे अपूर्व कलाकार की. 
वह प्रेरणा-स्थान थी | साफोलीस और युरीपीडिस जैसे नाटककार उसके 
साथ अमिनय के आदर्श तथा उन नाटकों में आनेवाले ख्त्री पात्रों के 
विषय में चर्चा करतें। व्यूरनडाइडीस और हीरोशेद्स जैसे अपूर्व 
इतिहासकार सरस वार्तालाप से उसकी गोष्ठी को सुशोमित करते । तत्व- 
ज्ञानियों को विक्‍कारनेवाला एरिस्टोफेनीस तिरस्कार ओर व्यंग्य से 
संसार का उपहास करता था फिर भी वह वहाँ आये बिना 'न रहता शोर 

“-+९२२-- 


खि 


एस्पेशिया ; ब्लियों भ॑ एक बसंतावतार 


आल्सीबीश्राडीस जैसा सुन्दर बालक जिसे पेरीकलीस ने पाल-पोस कर 
चड़ा किया था, इधर-उधर की बातें कर इस मंडल की गहन प्रश्नावलियों 
में मान॒ुपरी तत्वों की स्थापना करता था | 

जब एस्पेशिया पेरीक्लीस ले मिली तो उसकी आयु पूरे पदच्यीस वर्ष 
की भी न थी | पेरीकलीस की आयु उस समय बहुत अधिक थी उससे 
लगमगण पंद्रह दीस व अधिक होगी। एथेन्स में उस समंब पेरीवलीस 
जैसा कोई मनुप्य न था ओर न एस्पेशिया जैसी कोई ज्लीही थी। दोनों 
में लोगों को आकर्षित तथा मसुग्ध करने की शक्ति थी। दोनों में 
महान्‌ आदर्श रखने और उन्हें पूरा करने का बल था। दोनों देश ओर 
काल की संकीण सीमाओं के पार देख सकते थे | 

फिर भी जो बाद एक में थी वह टूसर में न थी। परीकलीस कठोर 
ओर एकांतप्रिय था, एस्पेशिया मे कोमलता और आकर्षण था| इस 
प्रकार दोनों बहुत अंशों में समान और कुछ अंशों में भिन्न थे | पर यह 
समानता तथा भिन्नता एक दूसरे की पूरक थी | दोनों ने श्र कमजोरी 
देखी और एक दूसरे के समीप आये । 

एथेन्स के जिवाह के नियमानुसार, एस्पेशिया परदेशी होने के कारग 
ग्रीक न्री की पदवी नहीं लत सकती थी। फिर भी एसी दो कआाव्मादं को 
दूर रखने में उस नियम था समाज का बंधन समर्थ न ही सका । परीवलीस 
ने एस्पेशिया से विचाह कर लिया | 

कुछ वर्षों तक ये दोनों साथ-साथ रदे। शरीर, भावना ओर चुद्धि 
तीनों इस सहचार को समृद्ध करते रहे | पेरीक्‍लीस मत्यु को प्राप्त हुआ, 
तभी यह समृद्धि नष्ट हुई | 

एस्पेशिवा का प्रभाव पेरीकलीस के संपूर्ण जीवन में आर उसके 
कार्यों में व्यात रहा। उसके कार्यों में वह उत्साह नरती; उसके कठोर 
जीवन में कोमलता लाती और उसकी एकांतग्रियता के कारण दूर आर 


थ्थ् 
१ ३३-- 


रेखाचित्र 


दूर रहनेवाले जनवर्ग के साथ संबंध स्थापित कर दोनों के बीच श्रद्धुला 
रूप बनती | 
पेरीकलीस के भाषण तैयार करने सें भी वह मंदद करती थी। 


पेरीकलीस का एक प्रख्यात भाषण उसी का लिखा हुआ कहा जाता है।._ 


वह कहीं दूर देश थुद्ध करने गया हो तो वह उसके मंत्री का काम करती । 
वह यदि पास होता तो सूचनाओं तथा सम्मतियों द्वारा उसके कायों में 
पूंता लाती थी | 

एथन्स का इस समय का ऐड्वर्य अवर्शनीय था। संसार के इतिहास 
में इसर किसी देश ने कमी प्राप्त न की हो इतनी समृद्धि ओर संप्र्णता 
उसने इस समय में प्रात्त कर ली थी ओर शताब्दियों तक अमर रहे, ऐसी 
कज्ञा और संस्कारों की परिपकवता का सुजन वहाँ हो चुका था। विख्यात 
तल्शानी, अपूर्व नावककार, अछ्वितीय शिल्पी, वेजोड़ वक्ता, अ्रग्नतिम 
इतिहासकार, अ्रमर कवि, यह सत्र जैसे किसी देवी चमत्कार द्वारा हो 
रहा हो, इस प्रकार प्रथ्वी के इस छोटे से कोने में एक साथ॑ उतर पड़े 
थे | एथेना के--सरस्वती देवी के--इस नगर में उत्तन्न हुए संस्कार तथा 
साहित्य की अप्रवता को आज चोत्रीस सी वर्ष में भी संसार मलीन नहीं 
#र सका | 

ओर एथेन्स की सत्ता उस समय के संसार पर कोई ऐसी-वेसी न 


[8] 


थी | समस्त सम्ब संसार में उसक्की धाक थी । उसका समुद्री बड़ा ग्रीस 
की रक्षा में सदेव तत्वर रहता और इस सेवा के बदले म॑ एथेन्स, ग्रीस 
के दसरे राज्यों से कर बल करता था। सारी इुनिया के व्यापार का 


वह एक मुख्य केन्द्र था। ईरान के ग्रतापी राजाओं के हृदय नींद म॑ मी 


उसकी इर्प्या से अकुला उठते थे। उसकी सर्घा में सार्य आदि दूसरे 
औक राज्यों के हृदय जलते रहते थे। उसके सौंदर्य, शोर्य तथा समृद्धि 


की समता कोई भी न कर सकता था | ग्रीस की-श्थेन्स कौ-सत्ता 


>> २ ३४५४७- 


न 


रच 


एस्पीशया ; ज्यों म एक वसंतावतार 


रु 
हम 


आर सस्कात का वह वसत-काल था । 


इस समस्त समदध्ध का विधाता पेरीकलीस था। शब्रओ्ों के साथ 
संघि-विग्नह में जितना वह निपुण था, उतना युद्ध के अवसर पर सैन्य- 
संचालन करनेवाला चहुर सेनापति भी था। एथेन्स की आंतरिक- 
व्यवस्था में उसका बुद्धिकोशल भी उतना ही अपूर्व था ; उसने उद्योग 
को बढ़ाया, परदेशों के साथ व्यापार का विस्तार किया | उसने लोक- 
सत्ता को ओर भी व्यवस्थित किय्रा। उसने प्रत्येक व्यक्ति को सुल्लभ हो 
ऐसा न्याव का निर्यत्रण किया। उसके द्वारा कल्ला का संरक्षण हुआ । 
उसने एथेन्स के आस-पास दीवारें बॉँधी ओर उनको सुदृढ़ बनाया | 
उसने शिल्प तथा स्थापत्य के उत्तम नमूनों को प्रोत्साहन देकर नगर की 
भव्यता में ब्रद्धि की ।, 


५, 


एस्पेशिया उसके ऐसे समी कामों में ओतप्रोत दिखाई देती है | 

परन्तु जहाँ सुत्र होता है वहाँ सुल्ल को देखकर जलनेवाले भी 
होत हूँ । वेसे ही इस चुल्न की हरी-भरी वाड़ी को देखकर जलनेवाली 
ज्वालायें भी उस समय उत्पन्न हा चुकी थीं। जिस प्रकार एस्पशिवा के 
प्रशंसा करनेवाले महापुरुष बहाँ थे उसी प्रकार उसको निंदा करने, उसे 
हलके रूप में प्रदर्शित करनेवाले नाटककार--कोमिक पोख्ड्स--भी थे । 
एस्पेशिया की स्वतंत्रता उन्हें खलती थी। एथेन्स में कोई स्त्री इतनी 
स्वतंत्र रह सके, यह तो उनके लिए अशक्य था। ज्लियों पर-३नप को 
मेँह न दिखाने, बर के बाहर पर न रक्‍खें, ऐसा उत्त समब रिवाज 
था फिर भी एस्पेशिया को देखकर दूसरी बहुत सी स्वियोँ भी आगे आने 
लगी थीं | एस्पेशिया से मिलने और उसकी वात॑ सुनने के लिए. बहुत से 
पति अपनी पत्नियों को उसके पास ले आते थे | एस्पेशिवा का सत्रीमंडल 
भी कोई छोटा न था। चह ह्लियों को शिक्षा देती; उनके मल्तिप्क में 

--१३५-- 


का 


प्र 


हि मर 


/ रेखाचित्र 


7रोपणश करती, उनके मन में नवीन अमिलामायें उत्पन्न 


- रुपढ़ रचुक । यह किस प्रकार सह जा सकता था ? पेरीक्लीस की 
उत्तरोत्तर होती हुई उन्नति भी उसके दुश्मनों की आँख में चुभी। उन्होंने 
“कोमिक पोएड्स” द्वारा उस पर नीच आक्रमण करना आरंभ कर दिया। 

उस पर एक आरोप पेरीकलीस को संतुष्ट करने के लिए दूसरी स्त्रियों 
को फँसा कर लाने का था ।# दूसरा अधिक गंभीर समक्ता जानेवाला 
आरोप नास्तिकता का-देव-देवियों में श्रद्धान रखने का था। इस 





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कम 


एस्पेशिया ; स्रियों में एक वरंतावतार 


आरोप के मूल कारण एस्पेशिया के दरबार भें इफबद्ठे होनेवाले 


(न 


एनाकज़ागोरस इत्यादि ख्वतंन्न विचार के बहुत से तत्वक्ञनी थे। 
सामीयन और पेलोगोनिशीयन विग्रहों में परीकलीस ने एयेन्स को फँसावा 
यह भी उद्ी की प्रेरणा से हुआ, यह उस पर तीसरा आरोप था । 

ह पहले-पहल यह आरोय निंदकों की जिहाशों ने खोन निकाले और 
दूसरों पर धूल फैंककर जीनेवाले व्यंग लेखक, कवियों ने चित्रित किये | 
इनका प्राचल्य इन्होंने इतना बढ़ा दिया कि पेरीवलीस के शत्रओ्रों ने 
एस्पेशिया पर लादे गये आरोगों को प्रत्यक्ष रूप से न्यायासन के समक्ष र्‌ खरे । 

ऐसे आरोपों को खोज निकालना जितना सहज है, उतना ही उनको 
निर्मल सिद्ध करना कठिन है | मूठ बोलनेबाले को अपना मूठ सुन्दर 
ढंग से बनाकर, केबल उसका प्रचार करना होता ह और एक भ्ूठ चल 
जाये तो फिर दूसरे हजारों कूठ केवल मस्तिप्क से ही पढ़ा करने होने 
हैं। हानि तो केवल उनके विरुद्ध लड़नेवाले की होती है। यह झूठ का 
कीचड़ जितना अधिक मथा जाय उतने ही दाग अ्रच्छी था बुरी तरह 
केवल निर्दोष पर ही पड़ते हैं । 


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रेखाचित्र 


एस्पेशिया के प्रति पेरीवलीस का प्रेम इस समय खरी कसौटी पर 
कसा गया। उसे एस्पेशिया अपने जीवन जितनी ही--कदाचित्‌ उससे 
भी अधिक--प्रिय थी । उसने न्यायासन के आगे एस्पेशिया का पक्त 
लेकर वकालत की और उसे छुड़ा लिया । व 

परन्तु कितना मूल्य चुका कर ? जिस महापुरुष की मुख की रेखाएँ. 
शत्रुओं के साथ लड़ते हुए अपने प्रेमियों की मृत्यु के समब जरा भी न 
बदली थीं, जिसकी स्वस्थता देवाधिदेव जैसी ही अमेद्य समझी जाती थी ; 
जिसकी शांति कठु से कटठ्ठु प्रसंगों पर भी भंग न होती थी; उससे 
एस्पेशिया के लिए न्यायासन के आगे वकालत करते हुए आँखों से आँसू 
बहाये | गोरव और भव्यता की संयूर्णता में विश्वास रखनेवाले इस नगर 
में इन ऑँसुओं से एक तो क्या दस एस्पीशियाओं को अपराध से मुक्त 
कर दिया जाय तो श्रधिक अच्छा हो, ऐसा पेरीकलीस के शन्रुओ्रों को 
मी लगे बिना न रहा होगा | इतिहासकार थ्युसीडाइडीस, एस्पेशिया का 
प्रशंसक होने में हिचकता है, वह इसीलिए कि एस्पेशिया पेरीक्‍्लीस जैसे !' 
अप्नेद्य वीर की आँखों में ऑस लाने का कारण बनी । 


एथेन्स पर इसके वाद युद्ध के बादल घिर आये ; बहुत सी कठिन 
परिस्थितियों से गुजरना पड़ा; पर इस दंपति का आंतरिक जीवन उसके 
बाद शांति में बीता। पेरीकलीस की सत्ता अंत तक टिकी रही। मरते 
समय उसके सह पर एस्पेशिया! ओर एथेन्स? दो ही शब्द 

प्रो० केरोले ने इसी प्रसंग को बहुत सुन्दर शब्दों में नीचे लिखे 
अनुसार वर्शित किया हैं 

“इस मरते हुए राजनीतिश के विचारों में 'एयेन्सः और 'एस्पेशिया! 
दोनों मिले हुए थे | जिस प्रकार उसने पहले को महान्‌ बनाया उसी प्रकार 
उसने दूसरे को अमर बना दिया। यदि एस्पेशिया और पेरीक्‍लीस के 
जीवन का कल्याणकारी सुयोग न हुआ होता, यदि पेरीकलीस . का स्वभाव 

अब 54 ट्र्८-- 


एस्पेशिया : स्लियों में एक वर्संतावतार 


एस्पेशिया की मैत्री से मीठा न बना होता, यदि उसकी राजनीति, 
एस्पेशिया की कितने ही अंशों में बुद्धि तथा परामर्श से न गढ़ी गई होती; 
यदि उसकी रुचि एस्पेशिया के कलात्मक स्वभाव के सहवास से सच्ठम 
ओर संस्कारी न बनी होती, तो जिन कला-कृतियों से यह नगर आज 
मनुष्यों की भावना पर अपूर्व दंग से राज्य करता है, उन कृतियों से वह 
सुशोमित न होता। ज््री का प्रभाव जहाँ बहुत अधिक होता हे वहाँ बात्तव 
में बह मूक ही होती है और पुरुष द्वारा ही वह प्रभावोत्रादक बनती 
है | उस बायोलेट पुष्प के सुक्ुट से सुशेमित नगरः मे एस्पेशिया के कार्यों 
का परिणाम देखकर क्या वह फूल्माला का उपहार देने योग्य नहीं ?”? 


एस्पेशिया अ्थात्‌ झ्ियों के स्वातन्त्य तथा चुद्धिबल की प्रथम 
बसंत । चौत्रीस सौ वर्ष बाद जिस स्वतंत्रता का उपमोग ख्लियों आज कर 
सकती है उसका प्रथम बीजारोपणु करनेवाली एस्पेशिया थी | जिस युग में 
ग्रीस की संस्कृति का मधथ्याह काल होने पर भी स्लियों के जीवन में 
मध्य रात्रि का ही अंधकार था, उस युग में उसने न्लियों के लिए आशा 
की प्रथम किरण प्रस्फुट्ति की | ब्लियों में भी शक्ति है; अ्रवसर मिलने 
पर पुरुषों जितनी ही विद्या में, कला में, तत्वशज्ञान में, वाद-विद्या में वे 
भी निपुण हो सकतो हैं, इसका उदाहरण-रूप बनने के लिए यह नारी 
थी। पुरुषों के साथ समानता अथवा ओओी-पुरुष के समान अधिकार इस 
बात की पहली ध्वनि प्रक- करनेवाली बदि कोई थी तो वह एस्पेशिया | 


ग्रीक ने संसार को तीन ब्लियोँ दी हैं। विनाश का दावानल प्रकट 
करनेवाली सीटय-मर्ति हेलन: साहित्य में प्रथम योग देनेवाली, भाव भरे 
गीत गानेबाली कवियित्री सेफो आर स्वातंत्य तथा समानता का दावा 
करनेवाली एस्पेशिया | इन तीनों स्लियों को ख्याति एक दूसरे स भिन्न हं 
फिर भी इन तीनों लह्लियों के नाम विद्याम्यासियों की जिहा पर रहते ई । 


संसार के इतिहास में सेकड़ों वर्ष तक देश-विदेशों में जिनकी 
“-१३६-- 


रेखाचित्र 


स्पृतियाँ सजग रहेँगीं ऐसी स्त्रियों के नाम उँगुलियों पर गिने जा सकें 
इतने ही हैं । इजिप्ट ने क्लिओोपेट्रा के रूप में ज्वलंत वासना की चिंगारी 
संसार को दी | अदम्य अतृत्ति की अवतार सदश रशिया की महारानी 
केथेराइन ने अपने संस्मरण संसार भर में भेजे | फ्रान्स ने एक और. ८ 
अद्वितीय, वीरता की साक्षात्‌ मति जोन आफ आर्क को उत्पन्न किया। 
मारत ने सतीत्व का आदर्श सीता, प्रेरणा की ज्वलंत मृति द्रॉपदी 
काल्पनिक होने पर भी सत्य लगनेवाली मृदुल शकुन्तला ओर प्रणयव-मर्ति 
राधा--ये चार ज्लियाँ संसार के कीर्ति-मंदिर में भेजी | दूसरी छोटी-बड़ी 
अनेक प्रतापी सुन्दरियों के स्मारकों पर छोटे-मोटे, सोने-चाँदी के अनेक 
कीर्ति-कलश चढ़े हैं, ५रन्‍्तु कारण या अकारण से किसी का तेज इनके 
जितना सारे संसार में नहीं फैला । 

एस्पेशिया का स्थान इस प्रकार संसार की प्रख्यात स्त्रियों में है। 
उसकी यह ख्याति वह सुन्दर और मोहक थी इसलिए नहीं है । संसार 
में सुन्दर और मोहक ल्लियों की कमी कमी नहीं थी । वह बुद्धिशाली तथा * 
सरस वार्तालाप करनेवाली थी इसलिए. भी नहीं--ऐसी खस्तरियाँ एक या 
दूसरे रूप में समी जगह मिलती हैं--पर ख्री-जाति की महत्ता का भान 
करानेबाली वह पहली थी इसलिए, उसे ख्याति मिली है। आज की 
'क्रेजेड---मुवमेंट” का मूल भी इसी में दिखाई देता है | उसके सहे हुए 


5 डुःखों और निंदाओं का कारण मी इसमें मिलता है | इन झूठी निदाओों 


से प्लुशर्क जैसा लेखक भी उसे न्याय नहीं दे सका | चौबीस सदियों तक 
उसकी निमलता अंधकार में दवी रही। ह्न्रियों का व्यक्तित्व पहचाननेबाली 
इस जी का उस युग में मूल्यांकन हुआ और अंतिम गवेपणात्मक प्रमाणों 
द्वारा उसे स्वीकार किया गया। 

जब से सृष्टि का इतिहास मिलता है, तव से त्लियों की दशा 


पराधीन ही चित्रित की गई है | पुरुष स्री के लिए नियम बनाये, उनका 
>-++ ९ ५९४०--- 


* ०२७६ 


एस्पेशिया ; स्रियों मं एक वसंतावतार 


जीवन के दूसरे व्यावहारिक क्षेत्रों में बरहिप्कार कराये, उनकी रक्षा का 
मार अपने सिर पर लेकर उनको निर्त्ंल बनाये रखे ओर उससे समस्त 
स्री बर्ग का व्यक्तिल इतन कुम्हला जाय कि वर्षो और सर्दियों के अंघरकार 
के बाद अकस्मात्‌ ही कोई व्यक्तिचशाली ज्री कलक उठे। कितनी 
कम ब्ियाँ सतीत्व के एक सर्वमान्य गुण के अतिरिक्त और दूसरे क्षेत्रों. 
में अमर हुई हैं, इसका हिसात्र लगा तव ठीक-ठीक वस्तुस्थिति की 
तीत्रता का पता लगता है| 

ओर इस प्रकार दवी हुई--म्ुरमाई हुई--स्नी जाति का प्रभाव मानव 
जाति पर कम नहीं हैं। जियों ने इतिहास नहीं लिखा होगा, पर बहुत से 
स्थलों पर इतिहास की धव्नाओं का मार्ग निश्चित करनेवाली ख्रियाँ ही 
थीं। उन्होंने साहित्य सुजन न किया होगा, पर साहित्य के जन्म और 
प्रेरणा की कारण हुई, वे स्वय॑ कलाकार नहीं थीं, पर बहुत सी 
कलाशों कठद्देश ज्ली की विधिधता और भावों को ग्रहण करना तथा 
एक संपूर्ण ख्री के आदर्श को मूण्मिन करना था ! संगीत के स्वर सबसे 
पहले उनके मस्तिप्क में न आये हां, पर माधुर्य, कॉमलता तथा भाव- 
समृद्धि से उसे स्वर्गीय बनानेवाली तो ज्ियों ही थीं | 

ओर जीवन में भी पालन-पोपण करनेवाली ली ही है, उसको मधुर 
तथा मानवतामय बनाने वाली भी त्रीही है। उसमे विमलता तथा 
सात्विकता का संचार स्त्री के द्वारा ही हुआ। पुरुष के साहस तथा सोजन्य 
स्त्री के ही कारण विकास पा सके | 

जैसी एकनिप्ठा ञ्रीमें होती है, जिस मृदुता और नम्रता से वह 
दुः्खों को सह लेती है, जिस घैय से वह संसार चलातो हैँ, जिस श्रद्धा 
और स्नेह से वह अन्याय सहती है, जो आत्मबलिदान वह पग-पग पर 
करती हुई दिखाई देती है, जिस थे से जरा-जरा सी बातों और घटनाओं 
में वह अपना पूरा जीवनयापन कर देती है, जिस स्नेह और सहिप्णुता 

--१४१-- 


रेखाचित्र 


से संसार के सभी दुःखों को वह सह लेती है, और जीवन-पर्यत जिस 
तरह वह एक आदर्श पर दृढ़ रहती है--इतना और इस तरह तो केवल 
ख्रियों ही कर सकती हैं । 


एस्पेशिया की महत्ता का एक दूसरा कारण बताना शेष रह गया । «८ 

आरंभ काल से स्री और पुरुष का संबंध केवल शारीरिक सहानुभूति 
पर ही रचा गया था । पुरुष आत्मा के विकास के लिए, संसार पर्ययन 
करता, मानसिक सममभाव मित्रों में खोजता और. शारीरिक प्रवृत्तियों को 
संतुष्ट करने का विचार जब उसके मस्तिप्क में उठता है तो उसे घर याद 
आता ! प्राचीन काल में स्त्रियों के लिए सौंदर्य के अतिरिक्त--पुरुष की 
आँख को अच्छा लगने के अतिरिक्त--दूसरी कोई वस्तु विशेष आवश्यक 
नहीं मानी जाती थी। छुर्दर त्री के लिए पुरुष युद्ध करते, सुन्दर स्त्री 
की खोज में पुरुष विश्व-यात्रा आरंभ करते और अंत में आव्म-तृति की 
साधन-रूप एक सुन्दर ज्ली को लाकर अपने घर में, जहाँ किसी की दृष्टि 
न पड़े, वहाँ, छिपा कर रख देते थे । 9 

इस स्थिति से संसार कुछ आगे बढ़ा और ख््री-पुरुष के संबंध में 
भावनाओं का समभाव आया । सुख-दुःख की संवेदनाओं का जो साथ- 
... साथ अनुभव कर सके, सश्टि की छोटी-मोटी सुन्दरताओ्ं में जो साथ-साथ 
। रस ले सके, प्रेम या भक्ति के गान साथ-साथ गा सके; संसार और 
समाज के व्यवहारों को जो एक दृष्टि से देख सके ऐसी अनेक वस्तुओं पर 
इस समभाव की संष्टि हुई । और केवल शारीरिक स्पर्श से भिन्न होने 
पर भी हृदय को जो अधिक निकय्ता से जोड़ सके ऐसा संबंध स््री-पुरुष 
के बीच स्वापित हुआ । 

तीसरी और अंतिम स्थिति है, बुद्धि के साहचर्य पर निर्मित संबंध । 
वासनाओं और नावनाओं से परे केवल सत्य ओर सत्व के वातावरण में 
दो आत्मायें साथ-साथ विचरण.करें--हवा में पक्षियों का जोड़ा साथ साथ 

--१४२-- 


एस्पेशिया : स्त्रियों में एक वसंतावतार 


उड़ता है उस श्रकार--और दूर-दूर के प्रदेशों का सह्रम सौंदर्य विशाल 
अप, रे ०. प है. प 3 ३5 ८ ७० ०. 

दृष्ठि-मयादा के कारण देख सके ऐसा संबंध प्रथ्वी की मलिनताओं से दूर 

व्योम में विचरण करनेवाली दो आत्माश्रों के दीच स्थापित होता है । 


परन्तु विवाह अर्थात्‌ संसार और संसार अर्थात्‌ व्यवहार | बीमारी 
और मृत्यु, वाल्यावस्था और जरा, निर्ब॒लता और नियंत्रण, क्ुधा, तृषा, 
ओर निद्रा यह सत्र संसार व्यवहार के साथ विचरण करनेवाले मन॒प्य को 
जन्म से ही मिली दुई संपत्ति है और इस संसार में दूसरी सत्र बातें 
, भुलाकर केत्र॒ल, आटों प्रहर बुद्धि के साहबय॑ पर जीवन व्यतीत करना 
कंटिन ही नहीं, प्रायः असंमव है। बुद्धि के सहवोग की यह दशा 
आठों प्रहर की नहीं है, वरन्‌ बीच-बीच में आई हुई संवदन की एक दशा 
है | वास्तविक विवाह केवल प्रश्नत्ति ओर भावनाओं का पोषक नहीं, उसी 
प्रकार केवल बुद्धि पर भी नहीं नि सकता। परन्तु पत्रत्ति, भावना और बद्धि 
इन तीनों के अिगुणाव्मक प्रभावों पर ही ब्रिवाह का आदश माना जाता है ) 

संस्कारी समझे जानेवाले ग्रीस में आज के भारतवर्ष की तरह 
शारीरिक वित्राह करने की प्रथा उस समय थी | घर अर्थात्‌ शयन तथा 
भोजन करने का स्थान; पत्नी अर्थात्‌ वर चलानेवाली ओर संतान के 
लिए, लाई हुई स्त्री | पुरुष को सबसे कम बात करने का प्रसंग अपनी पत्नी 
से पड़ता | भावनाओं और चुद्धि का सहयोग केबल पुरुष मित्रों के साथ 
ही संभव समझा जाता था | उस समय के पुरुष अ्रपने से छोटी आयु के 
एक पुरुष भिन्न की खोज कर उस पर अपनी मावना ओर बुद्धि का जल 
उड़ेल देते | विवाह की अपेक्षा मेत्री उस समग्र प्रथम बस्छ समक्ती जाती 
थी | शरीर, भावना और बुद्धि इन तीनों की सहानुदृति पर आधारित 
विवाह, सर्वप्रथम संसार के इतिहास में एस्पेशिया और पेरीकलीम का ही है | 

इस प्रकार एस्पेशिया से पुरुष की इच्छा को पोषित करनवालो दासी 
भावना नश्ट होकर उसकी मित्र ओर सहायक होने की भावना च्री वर्ग में 


वर जद १ छः ड् लेक 


“४ एस्पेशिया ; स्त्रियों में एक वसंतावतार”? 


सर्वप्रथम जगी । और स्त्री-पुरुषों की विवाह-संबंधी भावना-परिवर्तन के 
वीज उसी के द्वारा रखे गये। तब से स्‍त्री दासी न रहकर, सुहृद बनी 
ओर सुहृद से इस समय साथी रूप में परिवर्तित हो गई है। 

ओर एथेन्स की उस समय की संस्कृति की घटना में एस्पेशिया की ५ « 
देन कुछ कम न थी। वास्तव में सत्री अपने कार्य-प्रदेशों की संकीर्ण 
सीमाओं के कारण, पुरुष द्वारा ही अपने आदर्शों को प्राप्त कर सकती है 
ओर उनकी रक्षा कर सकती है | एस्पेशिया ने मी ऐसा ही किया | परस्चु 
जो सत्री पेरीक्लीस जैसे पुरुष--उत्तम मनुष्य--की प्रिय पत्नी तथा सहायक 
हो; जिसे संसार आश्चर्य से देख रहा हो ऐसे पार्थिनोन के मंदिर के 
निर्माता फीडीयास जैसे अछितीय कलाकार की प्रेरक हो; जो 
एनाक्जोगोरस की प्रिय शिप्या तथा सुकरात की शुरू हो; अनेक कवि 
और नाटककार जिसके अभिप्राय को अमूल्य बताते हों और दूसरे 
समकालीन महापुरुष उसके परामश का ऋण सहर्ष स्वीकार करते हों और 
इतिहास में जो अमर हो गई हो--उस स्त्री का प्रभाव एथेन्स के उस ॥$ 
स्वर्ययुग की संस्थापना में बहुत अधिक होना चाहिए, यह निस्संदेह है । 

झ्लियों में प्रथम वसंत के समान एस्पेशिया के जीवन का यह आदर्श, 
आज के नारी वर्ग में ऐसे कितनेः बसंतों का आदर्श उद्चन्न करेगा ! 


न १ ४४५--- 


कविवर शेली 





पाठकों ! कविवर शेली के विपय में लिखने का साहस करूँ तो क्षमा 
करेंगे न ? सूर्य का परिचय देने के लिए दर्पण रखने जैसा ही प्रयक्ष तो 
यह न होगा ! जिसने शेली के सब काव्य पूरी तरह नहीं पढ़े, केबल 
उसमें चंचुपात कर उसका परिचय देने की घृष्टता कर रही है उसका 
अनधिकार सिद्ध करने के लिए तैयार तो न होंगे ? उत्तर देने का साहस 
कर यह पूछुती हूँ कि सरिता के जल की मधुरता परखने के लिए क्या 
केवल पात्रभर पानी ही पर्याप्त नहीं होता? अतृत्ति बनी रहे, पर 
स्वाद तो परखा ही जा सकता है। 

उसकी जीवन-कथा को करुणा-कथा कहूँ, तो अनुचित न होगा । 
आपके सम्मानित और दिव्य मौम में आपको ले जानेवाले कबि की कथा 
क्या करुण नहीं हो सकती ! उसके अकेले चाल-हृदव का एकान्त चाहे 
आप को सुन्दर लगे, फिर भी क्या दर्दभरा नहीं लगता ? उसके समस्त 
जीवन में ही हम क्या देखते हैं ! उसके छोट से जीवन की समानता 
शत्ि के सुन्दर पति के साथ भी नहीं हो सकती | पर वह तो हमार लिए 
ओर हमारे स्वार्थ के लिए है, उससे क्या उसकी वेदना कुछ फम हो गई ? 

संसार ने उसके साथ अन्याव किया। शानथात्री महापाठशाला को 
भी उसका विचार स्वातंत्रय हानिकारक और भयंकर लगा। अपनी 
परंपरा का जिसने अनुकरण नहीं किया ऐसी उदीयमान बुद्धि को 
तक किस संस्था अथवा समाज ने सभय नहीं देखा ? पर प्राचीन संस्क 
के नाम पर परंपरा की रक्षा करनेवालों का भी क्या कुछ दांव निकाल 
जा सकता है ? यह तो परंपरा से चला आनेबाला शाइबत निब्रम हैं | 

“-१४४-- 


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रेखाचित्र 


इस निवम का आक्रमण जिस पर हो उसकी वबुद्धि की प्रतिभा के विषय 
में विचार करता आवश्यक हो जाता है | संस्था वा समाज जिस विचार 
या व्यक्ति का क्‍लपूर्वक प्रतिकार करे उसी में उसके विजय के चिह्न 


छिपे रहते हैं | आकसफोड ने कहाँ ऐसा नहीं किया १ जिस नास्तिकता «« 


क पनवध क लए उस वहाँ से निकाल बाहर किया था वह आज शेली 
के स्म्रणावशेष रूप में द्विगुणित भक्तिभाव ओर गर्व से, धर्म-ग्रंथ जैसी 
सावधानी से--वह वहाँ लिखा गया था--इसको स्थृति में सुरक्तित र. 
है । ऐसे अन्याय चिरकाल तक ट्किते नहीं। कभी-कभी ऐसे अन्याय 
ओर भी बल प्रेरक हो जाते हैं, परन्तु ऐसे अन्याय सुनने में किसी को 
आनन्द आता है ? 

अच्छा, तो आपको उसके प्रथम विवाह की वात कहती हूँ | अ्रठारहवें 
या उन्नीसवें वर्ष में एक होय्लवाले की लड़को हेरीएट वेस्ट्त्रुक उससे 
स्नेह करने लगी | पिता के विचार से तंग आकर उसने शेली की मदद 
माँधी । कवि की कोमल आत्मा को उसके दुःख से आधात पहुँचा। उसने 


उसे वहाँ से मुक्त कराया ओर संरक्षुकशृत्ति वा उत्साह के आवेश में' 


उससे विवाह कर लिया | कुछ भी हो, उसने विवाह कर लिया | फिर 
संरक्षक३त्ति का नशा उतर जाने पर भावनाओं ओर हृदय का अंतर 
दृष्टि में आया--पत्नी ओर अपने बीच, उसने एक गहरी खाई देखी। बह 
क्यों ऐसा कल्पनाशील तथा मावनामगत्र हो गया था यह तो आप न पूछेंगे | 
» इसके जैसी आत्मा अधोंग के बिना कैसे काम चल। सकती ? अधूरी रहने 
से तुरन्त बूख जाती, किन्तु ऐसा नहीं हुआ, यह संसार का सद्माम्य हैं। 
ऐसी बातें करना क्या निंदा कही जायगी? उसने किया और हम 
कह | हमारे पास नीति का मापदंड है, परन्तु किसी ने हृदव को 
सी कमी मापदंड बनाया है?! ओर ऐसी सरस चत्रों पर अपना मत 
प्रकट किये बिना भी कैसे रहा जा सकता-है ? हम अपने से अधिक महान्‌ 
लगनेवात के प्रति कोई बात चछुमामाव दिखाते हुए और कुछ दी हुई 
सच्मबार दर हिई ०] री पयनक 


०5... 


कविवर शेल्री 


आवाज़ में कहा करते है; क्या इतनी नम्रता से कहना कुछु कम है ? 
परन्तु वहाँ चर्चा करने से पहले शेली की ही बात समाप्त करना 
चाहते हैँ | उसने इस विवाह से छुट्कारा पाने के लिए क्या किया ? उसने 
अपनी आत्मा का अ्रधोंग खोजा । व्यवहार-निपुण जहाँ सोचता ह्आ्ा ही 
रह जाय वहाँ यह अपनी अंतरात्मा की पुकार को सम्मान देकर अपनी 
प्रियतमा--मेरी गाइवीन--को ले भागा। अपनी शक्तियों को रोकने- 
वाली सभी बखुओं को पीछे छोड़, वह जीवन-सली को लेकर जीवन 
सफल करने के लिए निकल पड़ा | सारी दुनिया के विरुद्ध वकर लेकर 
उसने अपनी प्राणेश्वरी की संस्थापना अपने जादुई-राज्य में की | उसकी 
प्रेरणा से बल प्रात कर उसने ऐसी संथ्टि रची कि जहों दृश्य जगत की 
अपेक्षा, मनुष्य अधिक शांति पाते हैं | उसे कायर कौन कह सकता है ! 
दो वर्ष देरिएट दूसरे के साथ रही--उससे भी अलग हो गई ओर 
बहिन के त्रास से तंग आकर आत्महत्या कर ली। प्रभु प्रेममय है, फिर भी 
उसी की स॒श्टि में उसके रथ के चक्र के नीचे कितने ही पिस जात हैं । 
किनने द्वी परिणाम अनिवार्य होते हैं। ये परिणाम अवश्यम्भादी है वह 
जानते हुए भी अव्मा-संत्रेधी कितने ही धर्म छोड़े नहीं जाते; छ।इ * तो 
अधम ग्रधिक असह्य हो जाता है और परिणाम सुधर नहीं पान | 
इसके बाद बह थोड़े वर्ष तक ही जीवित रहा। मेरी के साथ 
उसका विवाह हुआ वह जीवित रहा ततर तक वह उसकी सखी, सहचरी 
रही । उसकी मृत्यु के वाद वह भक्त की सी एकाग्रता से उसके संस्मरणों 
की रक्ता करती रही। उसके काव्य-मंदार को बह प्रकाश में लाई--- 


उसका पुनरुद्वार किया । एक बार संसार से तिरस्कृत दोनों अमर प्रेमी 
आज ब्रिटिश पोरट्रोट गेलरी में विराजमान हैं और संसार भर के याद 
इन्हें ऋषध्य अर्पित कर कृतार्थ होते हैं । 


उसके समग्र में बहुत से लोगों ने उम्तकी गरुसा की तो ८ 


८5 5 क़श लकों हक ब्ड चने झ् 594 2 4 द्रां डे 
अधिक निंदा । आलोनकों की तीवी आझालोचनाओं ने उसके अंगन-ड 
अरब, 44 हुड-+-+- 





रेखाचित्र 


को जलाने का प्रयक्ष किया। जीवन-संग्राम की ऐसी कलहों का किसे 
सामना नहीं करना पड़ता !? 
महापुरुष अपने समय में नहीं पहचाने जाते । .समाज इनके गुणों की 


अपेक्षा इनके दोषों पर अधिक दृष्टि डालता है | इनके कार्यों की विपुलता -- « 
की अपेक्षा इनके दोषों का परिमाण अधिक बढ़ा हुआ लगने लगता है।'* 
किसी भी प्रकार की महत्ता की खोज करते हुए समकालीन टीकाकारों को * 


अपने शस्त्र अधिक धारदार बनाने में आनंद आता है। अपने लिए नवीन 
मार्ग बनानेयाले की तो इन सबसे बचना असंभव ही हो जाता है | 

ब्रहुत से लोग शेली को अ्रस्थिर मनवाला मानते हैं, क्योंकि उसके 
प्रेम का विषुल प्रवाह किसी एक संकीर्ण नहर में नहीं समा सकंता था। 
इसका परिणाम यह होता था कि वह उमड़ कर दूसरे खोतों में से बहने 
लगता था | यह जहाँ-जहाँ भी बहा वहीं-बहीं रस की सृष्टि करता गया । 
जहाँ उसे मार्ग नहीं मिला तो उमड़कर अपने प्रवाह में आस-पास की 
वस्तुओ्रों को मी बहाता ले गया। अधिकांशतः जन-समूह की भावनाओं 
का प्रवाह बहुत सूच्रम होता है--थोड़ी दूर नीचे जाकर पृथ्वी में समा 
जाता है अथवा सूर्य के ताप में सूख जाता है। अत्यंत वेगवाले महाप्रवाह 
की शक्ति के सामने यह कैसे टिक सकता है १ 

वाचकबृन्द ! शेली के विषय में संसार का अ्रमिप्राय आपने जान 
लिया । संसार की विराद समग्रता के साथ न्याय करने की मेरी अशक्ति 


:/ पर भी आप हँसे होंगे। मेरी अकेली अल्पता में यह कैसा लगा, आशा 


है, उसे सुनने का धीरज आप रखेंगे ही । 

शेली सौंदर्य-दरश्ा था, कम से कम यह तो उसके विपय में कहा ही 
जा सकता है | कितनी ही धन्य आत्माओश्रों ने सौंदर्योपासना में अपना 
समस्त जीवन खपा दिया है, परन्तु शेली का सौन्दर्य--साक्षात्कार का 
जादू--उनसे कुछ मिन्न ही लगता है । कितने ही कवियों की कविता में. 
केवल बृक्षावलि में से चादनी छुन-छुन कर ओर चछुँदरी जैसे फूल बनाती, 


+-+२ ई४प--- 


3 
४ 


कविवर शेली 


नई-नई लहरदार रेखायें चनाती, नई-नई रम्यताओं के दर्शन कराती है 
तो उस दृश्य में आकर्षणशक्ति अधिक होती है। कहीं छावा-परिषानों 
से शरीर दँकती हुई, कहीं चांदनी के मद में मस्त होकर सौंदर्य का 
साक्षात्कार कराती हुई गिरि-बधुओं की क्रीड़ा देखने को मिलती है, तो 
कहीं प्रकाश की पारदर्शी चाद्र में सुशोमित या अंधकार का दुपभ्म 
ओढ़े खिन्न भ्रमिसारिका की तरह खानें छिप-लिप कर आकर्षित करती हैं, 
सपाठ मैदान मे निरभ्र आकाश में मुस्करात हुए चोंद के निरंकुश 
साम्राज्य के दर्शन से दृष्टि उन्‍्मत्त हो उससे पहले बादलों के शीच से 
थोड़ी कॉकी दिखला कर ओकल होती हुई चंद्रिका को देखकर आठुरता 
जग उठती है। ऐसे सोॉंदर्य की विविधता के दर्शन शेली की काव्य- 
स्योत्स्ता के अतिरिक्त और कहाँ हो सकते हैं ! सोंदर्य की विविधता का 
दर्शन शेली के काव्य का विशेष लक्षण हे और इसीलिए बह सोंदर्यद्रष्टा 
कहा जा सकता है। 

विदेशी सुमनों जैसा केवल सौंदर्य ही उसमें नहीं है, बरन्‌ माधुर्य 
ओऔर गान उसके काव्य के प्रत्येक शब्द से प्रस्कुटित होता है। यदि 
उसके कल्पना विमान में चेटने का अधिकार मिला होता, दृष्टि-्मर्यादा की 
संकुचित सीमाश्रों के संकीर्ण बंधन ट्रट जाते और उसकी इन बसरूओं से 
दिव्य-चन् मिल गये होते, तो सोंदर्य के नवीन तत्वों का दशेन हो जाता । 

शेली की उड़ानों में भाग लेना यह जीवन का एक अदभुत आनंद 
है। दृष्टि को अग्रवरुद्ध करनेबाली पाथिवताओं से मानव ऊपर उठ जाता 
है ओर इन्द्र-धनुम के सुन्दर प्रकाशवाले प्रदेश म॑ खड़ा होकर नसुद्धर 
प्रदेशों तक देख सकता है; आकाश की महानदी में ताराशों के सैरते 
हुए दीपक देखकर, गंगाद्वार जैंसी लोकमान्यताओं की खोज वहाँ संकोच- 
रहित होकर की जा सकती है ; मेघरलण्डों के विविध रंगी पर्दों के शीच 
लुका-छिपी खेली जा सकती है ; चर्य-चल्ध के दर्षणों में प्रेमियों तथा 
अपने इच्छित स्वरुपों के दर्शन -किये जा सकते हैं; स्वर्गंगा के कमलों 

--+१४६-- 


रेखाचित्र 


को तोड़ने तथा उन्हें छितरा डालने का निषेध करनेवाले मालियों का 
वहाँ अभाव होता है; उप्रादेवी की ऊुंसुमी ओड़नी का छोर पकड़ कर 
उसे अपनी ओर लोग कर उसके मुस्करातें हुए मुख का दृष्टिषात प्राप्त 
करने जितना भाग्यशाली भी हुआ जा सकता है। ऐसे धन्यमाग्य का 


सहमभागी कविवर का क्या-क्या सम्मान किया जाय ! 
ड्ुल पक्षी के मधुर दिव्य स्वर की तरह शेली की कविता का 


सुदूर का स्व॒र भी हृदय को आह्याद से भरनेबाला और उन्नत प्रदेश में 
ले जानेवाला बन जाता है। शोक मिश्रित उल्लास से इस ध्वनि की 
हृदयहारिता में अपूर्वता आ जाती है| आकाश के गांभी्य में नादत्ह्म 
ध्वनित हो उसी प्रकार हृदय के गांमीर्य में शेली रस-ब्रह्म की सष्टि कर 
देता है | दूर-दूर उड़ते हुए पक्षी के मधुर कलकल सच्श वातावरण मे 
मधुरता ला देनेवाला उसका खर मधुर गशुजझ्ञन की लहर जगा देता 
वेदोब्चार सदश उसके रस-मंत्रों से हम समाज्रिस्थ हो जाते हैं | प्रभात की 
सुलकर समीरण जैसी शांति तथा नवजीवन उसकी आत्मा भें से बहता है 
ओर परितृष्त करता है | पर्वत की गोदी में करते हुए करने की तरह 
उसमें से भावनाओं के सोत वेगमय गति से बाहर पड़ते हैं ओर रस-पिपासु 
पथिक को तृति देते हैं| उसकी काव्यमत्र आत्मा से अमृत करता है और 
उसके पान करनेवाले की आत्मा की जरावस्था क्षण मर में समाप्त हो जातीनहे | 
प्रभात में ध्यान लगानेवाले ऋषियों की भव्य पवित्रता, मध्याह् के 
समय कर्मों में प्रवृत्त मुनियों की मानवता ओर संब्या को समाधि में 
निरत सब्चिदानंद के दर्शन करते हुए महर्षियों की अलौकिकता इन 
सबके एकत्र मात्रों का प्रदर्शन शेली की आत्मा से प्रकट होता है। तीनों 
काल की मृदुता, शांति, प्रखरता और शक्ति उसमें मृतिमान हो जाती 
है | कहों कूलों के वेंधन में सरल बहती हुई, कहीं इन चेधनों की 
वगणना कर वेग से उछुलती, कहीं चह्ानों से व्कराकर उिंन्र-मिन्र 


होती, कहीं भँवरों के रूप में रासमंडल खेलती, कहीं तीर पर खड़ी हुई 
सनक 3२५० नकद 


कविवर शेली 


वृक्षवनिताओं को दर्पण दिखाती हुई, कहीं मनस्व्री तया मस्त चाल से 
चलती हुई, भूमि को रसमब बनाती हुई, आकाश के विबिध रंगों से 
सुशोमित, प्रकृति के समी भावरों में एकता साथती हुई सीता की तरह, 
उसकी काव्य-सरिता के नये नये रूप हृदय को आच्छादित कर लेते है । 
अप्रत्याशित तथा अचित्य भाव-परिवतंन से वह तिस्मित कर देता है | 
उसके ज्ोत की प्रवलता हृदय को बलपूर्वक बहा ले जाती है । 

कवि रस का अधिपष्ठाता है | पुष्प से जिस प्रकार पराग का प्रसतवस 
होता है उसी प्रकार वह चाहे अथवा न चाहे, उसके अंतर से काव्य की 
निर्मेल धारा निकलती रहती है| स्वभाव से ही कवि हो तमी काव्यों 
का स्वंभू ओर सहज स्फुरण होता है । प्रत्येक पल वह प्रकृति को एक 
नवीन रूप में देखता है। अपने सत्र मानसिक दृश्यों को वह व्यक्त न कर 
सके तो उसमें उसका दोव नहीं, बरन्‌ भाषा और शरीर की मर्वादित 
स्थिति का है। जिस परिमाण में वह इन मर्थादाओं का टल्लंध्रम कर जाता 
है उतने ही परिमाण में उसकी महत्ता बढ़ जाती है । शेली को इस नियम 
की कसोरी पर चढ़ाने से उसकी महत्ता छे विषय में कोई भी संदेह नहीं 
रह जाता | उसकी कल्पनाओं का बाहुल्य, उसके शब्दों का लालित्य, 
उसके भावों की विविधता उसके काव्यों की गेयता, ओर इन सद्रके 
सम्मिश्रण से आनेबाली अ्रद्भुतता से वह कव्रिकुल में अद्वितीय स्पान का 
अधिकारी वन गया है । हि 

प्रकृति की तरह मानव भी यदि अपने स्वनाव मे निहित तम्वों का 
विकास करे या अस्तित्व सिद्ध कर तो खणश को भी थोड़ी देर के लिए 
अपनी सश्टि की ओर आश्वय से देखते रह जाना पड़ेगा | सामान्य जन की 
इसमे निहित किसी विशिष्ट तत्व का छान ही नहीं होता ओर इसी कारण 
ऐसे विरल तत्वों की ओर वह शंका की दृष्टि से देखता है। परन्तु जिनका 
युग समाप्त हो जाने पर भी उनके स्मरण नष्ट नहीं होते बह तो केवल 
किसी भी तत्य का प्रतिनिधित्व प्रदर्शित करनेवाले ब्यक्तियों का ही होता 


की अअ 
रे $ 


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रेखाचिनत्र _ 


है। उनकी शक्ति के प्रमाण में ही उनकी सफलता रची -जाती है। शेली 
ने प्रेमतत्व, सौंदर्यतत्व, काव्यतत्व और स्वातंत्य-तत्व अपनाये | यह अमर 
हो गया, केवल उन्हीं के कारण | अपने संक्षित जीवन के चिरकाल के 
संस्मरण अपने स्वभावतत्व के साथ सारुप्य देकर संसार में छोड़ गया | 


स्वातंत्य उसके जीवन का उद्देश्य था। उसके स्वातंत््य की व्याख्या 
शरीर तक ही सीमित न थी। आत्मा को बॉधनेवाले बंधन भी उसे 
खब्कते थे | वह जानता था कि यदि आत्मा स्वतंत्र हो तो देह के बंधन 
भी नहीं थ्किते | प्रोमीयीयस अनवाउंडः यह आत्मा के स्वातंत््य की कथा 
है| किसी नियमों का स्वरूप छीड़कर बंधनों का स्वरूप घारण करने 
लगते हैं तो व्यवस्था पालन का अपना उद्देश्य साधने के बदले वह कुचल 
डालनेवाले बन जाते हैं। कल्पना के बंधन से रहित प्रदेश में उड़नेवाले 
को मनुष्यक्षत नियमों के जड़-पिंजरों की शलाखें क्‍यों अच्छी लगने लगीं ! 

उसमे भी उदासीन बृत्तियों थीं--हमारी अपेक्षा अधिक होंगी । हममें 
हैं, पर उनकी अभिव्यक्ति के लिए. हमारे पास वाणी नहीं होती--उसने ' 
उन्हें शब्दों की अभिव्यक्ति देकर अमर बना दिया। मानव-हुदय के 
सनातन भावों का उसने विविध रूपों म॑ गान किया। हमारे हुदय में 
इनकी प्रतिध्वनि उठती है, यही कारण है कि उसकी महत्ता की माप 
हम निर्णय कर सकते हैं। कलाकार था कवि की कला की सार्थकता 
मानव-छृदय के अकथ्य भावों को मृत्त स्वरूप देने में ही है । 

मनुष्यों से अपना व्यक्तित्व व्यक्त किये बिना नहीं रहा जाता | 
जितने अ्ंशों में भावों की युक्षमता अधिक होगी उतने ही अंशों में उसे 
व्यक्त करने की आवश्यकता भी अधिक होगी, परन्तु उससे भी अधिक 
कठिनाई तो उसके व्यक्त करने का माध्यम खोजने में पड़ती है। मनुष्य 
अकेला जीवित नहीं रह सकता | कबि लिखता है तो इसी आशा से 


कि निरवधि-काल में कोई तो उसका सममनेवाला जन्म लेगा। यथा- 
--९४२-- 


कवबियवर शेली 


शक्ति सभी ऐसे भाव-प्रदर्शन करते हैं | आत्मा की अ्रभिव्यक्ति की कठोर 
प्रेरणा के कारण संसार को कितना अधिक मिला है ? 
< टु श्र 

मृत्युदेवता यदि इतना कठोर न हुआ होता तो ! समुद्र ने अपने 
लाइले वेटे को घर आने दिया होता तो १ उसकी बसंत ऋतु विकसित 
होने से पहले ही मुरकफा न गई होती तो १ शेली जीवित रहा होता तो ! 

इस महाकति की कब्र के दर्शन करने जाते हुए. और उस पर पढ़े 
हुए एक फूल को उसकी विभूति की प्रसादी रूप में उठाते हुए हृदय पर 
चित्रित भात्रीं को पाठकों ! आपको चताऊँ ? 

देललीशए्बर ने दीवाने खास! में खुदबाबया था कि (्रथ्वी पर 
स््र्ग है तो यहीं है, यहीं है [! शेली की कत्र के लिए भी अंतरिक्त 
यही लिखा होगा कि-- 

“दिव्य गायक, सौंदर्य का द्रश् और ख्ष्ठा, प्रणय का मिखारी 
अखंड शांति की गोदी में सोया हुआ यही है, यही है !! 

'सरस्वती का वरद पुत्र, स्वतंत्रता का ध्वजा-बाहक, प्रति तत्यों से 
पोधित और सागर सुन्दरी की गोद के अमिलापी शेली की देह-भस्म 
यहीं है, यहीं है ! 

सनातन भावों के जगानेवाले, बायु के पंखों पर उड़नेवाले, आकाश 
सदश कल्पना की सुनहरी कलक से आश्चर्यान्त्रिस कर देनेबाल कवि के 
देह की सुवास यहीं है, यहीं है ! 

शूरवीर ओर केवल स्वानुमब के उपासक, गान में रस लेनेबाले 
ओर रस लेने योग्य बनानेवाले, सद्ृदव मित्र और प्रेममथ के पथिक 
शेली की देह-गंध यहीं है, वहीं है !* 

पाठको | इसके कावध्य-शरीर के सहवास में यदि आपने दो पल भी 
स्वर के दर्शन किये हों, तो इस तर्पणु में दो बूँद आप भी अवश्य 
छोड़ देना ! 


३ 
दि 
मम 


बल रच 


अनातोल फ्रांस 





भ्ज्डा 


जिस प्रकार मलय पर्वत की वायु चंदन तस्झों की सुगंध ले आती 
है; इच्त दिखाई नहीं देते पर फिर भी चित्त प्रसन्न होता है तथा गंध परख 
ली जाती है, उसी प्रकार फ्रांस की सुदूर भूमि से आती हुई एक अपूर्व 
सुगंध से, साहित्य-वन में विचरण करनेवालों का हृदय सहसा विस्मित हो 
उठा ! यह सुवास कीमती तथा अनमोल है यह उसके उपभोगियों ने जाना, 
पर यह गंध कुछ अलग ही है ऐसी अनुभूति भी उन्हें हुए बिना न रही । 

फिर एक दिन खबर आयी कि इस गंध का प्रसार करनेवाला 
नोबेल प्राइज” जीत गया है, सो वे आनंद से नाच उठे। हमारे यहाँ ... 
कत्रिवर टैगोर ने यह इनाम जीतकर भारतवासियों के लिए महान्‌ साहित्य 
का एक आदर्श स्थापित कर दिया है। जो यह इनाम जीते उसकी 
साहित्यिकता में क्या कमी हो सकती है ? वर्तमान फ्रेंच लेखकों में से 
हम जिन दो लेखकों को जानते हैं वे गांधीजी के प्रशंसक रोमारोलों 
ओर 'नोवेल प्राइजः के विजेता अनातोल फ्रांस हैं | तव से भारतवर्ष में 
मो० अनातोल फ्रांस की पुस्तकें और अधिक पढ़ी जाने लगी है । 

शेक्सपीयर की तरह उत्तरोत्तर विकास पाती हुई कला, उसकी विजय 
तथा प्राप्तियों की कथा में ही इस महान्‌ साहित्यिक का जीवन-इतिहास 
रचा गया हैं। कबि और लेखक--जिन्‍्होंने कल्पनामय सृष्टि रची 
हो--ऐसे लेखकों---की जीवन-सष्डि में होनेवाले परिवर्तन तथा अद्भुतता 
से भरी हो ऐसे जन-समह की धारणा इनके जीवन में सच्ची नहीं 
उतरती । पर बाहर से अद्भु त दिखाई देनेवाली प्रकृति का अद्भुत त्रिकास 

+--१ ४ ४--- 


अनातोल फ्रांस 


तथा परिवर्तन इनके अंतर में भी हुए हैं अ/र परिणामस्वरूप इन्होंने एक 
नवीन सृष्टि का ही सूजन किया है । 

अनातोल फ्रांस १६वीं अग्रैल, सन्‌ १८४४ के दिन पैदा हुए। 
उनका पिता एक पुस्तक बेचने वाला था और उसकी दूकान पर सदा ही 
प्रसिद्ध विद्वानों तथा उदीयमान साहित्विकों की चर्चा चला करती थी । 
साहित्य संस्कार से रस में ड्रवा हुआ धर छोड़कर फ्रांस के स्कूल में 
गये और वहाँ थोड़ी बहुत शिक्षा प्रात्त कर, जवानी में साहित्य-संष्टि में 
स्थान प्राप्त करने का प्रयत्ञ करने लगे | 

उनका बचपन विलकुल स्वप्निल था। ओर उन्हें स्कूल में जाकर 
पाठ याद करने की अपेक्षा स्वप्न देखने का अधिक शोक था । उनकी 
पाठशाला की पोथी में अच्छा 'मार्का या अ्रच्छा 'रिमाक! तो कदाचित्‌ ही 
लिखा जाता । उनके पिता की ऐसे बालक के विपय में कुछ झँची सम्पत्ति 
न हो यह स्वाभाविक ही है । 

फ्रांस का स्वभाव इस समय कुछ लजीला तथा एकांतप्रिय था। 
प्रत्येक बात में उन्हें संकोच-सा लगता। स्कूल में दूसरे बालकों के साथ 
चहुत हेल-मेल या खेलना-कूदना उन्हें बहुत अच्छा न लगता | जब सब 
लोग चाहे जो करते हों, यह स्वप्न-द्रप्णप बालक 'सोफोवलीस” और 
थुरीपीडिस', आल्सीयस” ओर न्टीगोन! पढ़ता तथा इन्हें पढ़ते-पढ़ते 
वह दिव्य सुन्दरता के स्वप्न देखता । 

बालक फ्रांस पर पिता की अपेक्षा माता का प्रभाव अधिक पड़ा था। 
उसका पिता फ्रांकोइज नोएल थीदोल्ट--सरोमन कैथोलिक संप्रदाय का 
तथा बहुत आस्तिक था| पर उसे बहुत व्यावहारिक नहीं कहा जा 
सकता । अपनी पुस्तक वेचने की दृकान पर बैठकर अच्छा मुनाफा कमाने 
की अपेक्षा विरोधी पक्ष से बाद-विवाद करने से उस अधिक आनंद आता 
था । परन्तु उसकी व्यावहारिक बुद्धि की कमी मादाम थीतेल्ट पूरी कर 
देती | उनमें यूक्षम व्यवहास्तुद्धि तथा धार्मिकता थी। वह घर का 

“-+१४४--- 


रेखानित्र 


पालन करनेवाली गहिणी ओर स्नेहमबी संबंधिनी हो सके ऐसी थीं। 
सुन्दर होना--दिखाई देना---उन्हें अच्छा लगता था | बालक फ्रांस को 
बह खूब कहानी सुनातीं । उन्हें अपने पुत्र पर अद्ध त श्रद्धा थी । अनातोल 
फ्रांस को लेखक होने की प्रेरणा देनेवाली मी यही थीं | 

वाल्यावस्था म॑ पड़ी हुई छोटी से छोटी छाप भी महान्‌ फ्रांस ने 
अखंडित रूप से सुरक्षित राखी और नर्स से लगाकर दूर के संबंधियों के 
रेखाचित्र और अपनी वाल्यावस्था की छोटी-छोटी यृक्ष्म बातें उन्होंने अपनी 
पुस्तकों में अ्रत्यधिक सरस रंगों से चित्रित कर दीं । 

उनका यौवन शिक्षकों की व्यंग करने और शुप्क पद्धति पर दी 
जानेवाली शिक्षा के प्रति तिरस्कार ग्रहण करने में ही बीत गया। परन्तु 
उनकी वास्तविक शिक्षा ओर वास्तविक विकास का मुख्य साधन पेरिस 
नगर था । क्रांस फ्रॉचमेन थे और फ्रॉंचमेन की-सी पेरिस-भक्ति 
उनमें थी । 

& पेरिस नगर का फ्रांस देश में जो स्थान है वह किसी भी देश में +- 
उस देश की राजधानी का नहीं। पेरिस फ्रांस का हृदय है; फ्रेचमेन 
के जीवन का केन्द्र स्थान है। पेरिस के वाहर कुछ सीखने के लिए 
होता ही नहीं,” यह फ्रेंच लोगों का परंपरा से चला आनेवाला दृष्टिकोश 
है | सामान्य मनुष्य अपने पूर्वजों के निवास-स्थान की ओर जिस श्रद्धा 
ओर भक्ति से देखता है वेसी ही श्रद्धा से फ्रच अपनी राजधानी पेरिस 
को देखते हैं । 

वहाँ अर्वाचीन विज्ञान के विजयस्तंम हैं; वहाँ जगह-जगह ज्ञान के 

भंडार उनके लूटनेवालों की प्रतीक्षा में पड़े हैं| वहाँ अनेक रूप में अनेकों 

प्रकार के आनंद उछलतें हैँ | वहाँ संस्कार के पूर्णतया दर्शन होते हैं । 

वहाँ पग-पग पर शताब्दियों की ऐतिहासिक महत्ता के चिह्न अवाचीन 

गौरव को फ्रचीन गोरव से दीत कर रहे हैं । शालंमैन से माल फोश 

तक सब फ्रंचमेन जैसे संदेह हों इस प्रकार फ्रेंच जनता को प्रेरणा देते हैं 
-+१४६०-- 


अनातोल फ्रांस 


ओर जोन आफ आक तथा नेपोलियन--फ्रचों के आदर्श न्ज्ी और गुरुष 
--करच प्रजा को प्रोत्साहन देते ओर उनके जीवन का निर्माण करते हैं । 
इस स्मरण-समृद्ध तथा संस्कारी नगर में किसी भी कथाकार की 
>+ द्त्तियों सतेज हो और प्रीढ़ बने तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं। ओर यदि 
वह कथाकार फ्रेंच हो तो उसे उस नगर की अपेक्षा और दूसरी कौन- 
सी परिस्थिति चाहिये ! उसे तो वहाँ के प्रत्येक पत्थर मे सजन की 
कहानी दिखाई देती है, और मो० फ्रांस को भी ऐसा ही लगा | 
इस नगर में उन्होंने जीवन के विविध ज्षेत्रों के मनुष्यों की 
. निर्बलताओं का, दुःख का, वियोग का ओर सुत्र की चंचलता का दर्शन 
किया | मनुष्य म॑ रहनेवाले सनातन लगन का स्थायी और अस्थायी 
रूप में वहाँ उन्होंने साक्षात्कार किया और वहीं उन्हें श्रांतरिक सौंदर्य प्राप्त 
हुआ | अपने साहित्य में वह व्यंग करते हैँ, कक्ष फेंकत हैँ, तिरस्कार 
प्रदर्शित करते हैं, फिर मी उनमें मतभेद, दुःख, पतन तथा विवशता के 
7६ प्रति अपनी उदारता तथा अनुकंपा प्रदर्शित किये बिना नहीं रहते । 
स्कूल छोड़ने पर बहुत समव तक तो वह क्या व्यवसाय करें यह 
अनातोल फ्रांस की समझ में नहीं आया। पिता की इस बालक से कुछ 
अधिक थआ्राशा न यी। माता के लिए उसका पुत्र सर्वत्र प्रकाश करने के 
लिए ही पैदा हुआ था । पिता के व्यावहारिक स्वभाव को पुत्र को एकदम 
किसी जगह स्थित कर देने की जल्दी न थी । माता ने बहुत बढ़े कामों 
के लिए पेंदा हुए. पुत्र को एकदम किसी भी क्षेत्र में अग्रसर होने के 
लिए नहीं कहा | फलस्वरूप अव्ययन समाप्त करने के बाद, बिना किसी 
व्यवसाय के ही बहुत दिनों तक फ्रांस इधर-उधर घूमते रहे । 
परन्तु ये वर्ष उन्होंने व्यर्थ ही नहीं त्रिताये | साहित्य-रसिकों की 
भंडलियों में वह घूमते और बहुत से उदीयमान साहित्यिकों के समागम 
में दिन बिताते । उनके इस सम के बहुत से मित्र, बाद के अग्रगएव 
साहिलिकों में गिने गये हैं | उन्हें तभी से साहित्यन्ठेवा की घुन लगी। 
“--+६४७--- 


रेखाचिंत्र .. * 

कबि अलकफ्रोड द० वी० के जीवन की पहली प्रुस्तक १८६६ में उन्होंने 
लिखी | फ्रांस की शक्ति इस समय अधिक - 'विकसित नहीं थी। उन्होंने 
पत्रों में भी अपने लेख देने आरंभ कर दिये | बी० मार नाम के प्रकाशक 
के लिए बहुत-सी प्राचीन पुस्तकों की भूमिकाएँ भी लिखीं, परन्चु इतने < 
से जीवन निर्वाह करने योग्य कमा लेना असंभव था । 

इतने में सन्‌ १८७० का युद्ध आरंभ हो गया और फ्रांस ने कलम 
के बदले तलवार पकड़ी | गोलों की वर्षा के नीचे भी वह अपना प्रिय 
वर्जिल पढ़ने से न चूकते थे | इस समय शांति के उपासक इस मनुष्य ने 
युद्ध के बचाव में एक पुस्तक भी लिखी है। , 

- वहाँ से वापिंस आने पर फ्रांस फिर साहित्य के ज्ञेत्र में आ गये । 
पर उन्हें जो काम मिलता वह उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं 
कर सकता था। इसलिए उन्होंने १८७० में लग्जंबग की लाइब्रेरी में 
लाइब्रेरियन की जगह स्वीकार कर ली | इसी लाइब्रेरी में पहले से काम 
करनेवाले उनके तीन साथी थे । उनकी ग्रशंसा में! केवल इतना ही कहा / 
जा सकता है कि ये अपने विषय में एक ऊँचा विचार रखनेवाले लेखक 
थे; परन्तु एक दूसरे के प्रति तिरस्कार की भावना इनमें बहुत गहरी थी। 
ये तीनों एक विषय में एकमत थे। स्त्रयं कुछु काम न करते, अनातोल 
फ्रांस से ही सब काम कराया जाता था। अंत में पारस्परिक वैमनस्थ 
अधिक बढ़ता गया और अनातोल फ्रांस ने यहाँ से त्याग-पत्र दे दिया । 

मो० अनातोल फ्रांस इस समय में विद्वान , विनोदी, चठर, अ्रच्छे 
स्वभाव के और सुन्दर वार्तालाप करनेवाले समके जाते थे।.ये सच 
शुण, विद्वत्ता, संस्कारिता ओर सुन्दरता परश्चने को शक्ति, इस जीवन 
के बहुत अमूल्य सदगुण है। मस्तिष्क के शज्ञार की तरह ये सुन्दर भी 
लगते हैं | परन्तु पैसा कमाने के लिए तो काम ही करना चाहिये। मो० 
फ्रांस ने आमदनी बढ़ाने का एक दूसरा साधन--ला रुशे? के शब्दकोप 
के लिए काम करना--छोज निकाला, परन्तु इससे हर समय पैसा न 

-++(५८--- 








गअनातोल फ्रांस 


मिलता और भविष्य के इस महान्‌ लेखक को पाकशाञ्र की पुस्तक में 
लेख लिखकर पैसा कमाना पड़ता था | 
मो० अनातोल फ्रांस ने गद्य-रचना के साथ-साथ पद्मय-रचना भी की 
। उसके काव्यों में सुरुचि है, कविता है, कल्मना है और भाव भी 
| पर महान्‌ साहित्यिक का पद तो उन्हें गद्य लेखों ने ही दिलाया है । 
फ्रांस का पहला विवाह जीन गेरीन को भतीजी के साथ हुआ था 
इस बिवाह से उन्हें एक लड़की हुई। आरंभ में वह जोड़ी सुल्ली थी पर 
बहुत समय तक रह नहीं सकी | 'भाई फ्रेंड्स चुकः में इस शह-जीबन 
का एक सुन्दर चित्र क्रांस की कलम ने चित्रित किया है| पर इस 
जीवन की थोड़ी ही सुन्दरताएँ जिस पल अठुभव की यई होंगी उन पलों 
के बीत जाने पर वे इसी आकर्षण रूप में सुरक्षित रह गई हैं। 
इन वर्षों में क्रांस ने एक के बाद एक पुस्तक प्रकाशित करने का 
कार्य भी चालू रखा था। कदाचित्‌ एक भी वर्ष ऐसा नहीं गया जिसमें 
गई उनकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हुई हो। अत्र तक यह पूरी तरह 
बिख्यात हो चुके थे | मो० फ्रांस सन्‌ १८६६ के दिसंबर मास की २४वीं 
को फ्रांस की एकेडेमी के सदस्य चुने गये | 
मो० फ्रांस ने यात्रायें खन् की हैं स्पेन और इटली से तो बह अपने 
देश जैसे ही परिचित हैं। अमेरिका ओर इंग्लेंड में भी यह हो आये हैं । 
इंग्लैंड की मुलाकातों से उन्हें पृप्कल सम्मान मिला था। उन्हें सम्मान 
देनेवाली समा में मि० वर्नाईशा प्रमुख थे | इस समय घटी एक अपूर्च 
घटना का उल्लेख करना यहों अनावश्यक होगा :--- 
अनातोज फ्रांस का भाषण समाप्त होते ही एक विचित्र और 
अद्वितीव प्रसंग उपस्थित हो गया। सामान्यतः आनातोल फ्रांस और 
स्वाभाजिक स्रस्यता के दीच बारह कोस का झंतर समकका जाता भा; 
परन्तु इस ऐपसिहासिक यंग में तो उन्होंने सारे जीवन की शारीरिक 
शक्ति का एक ज्ञण में इस प्रकार उपयोग किया कि सत्र आाहचर्यंसक्तित 


२४१ /॥॥१ 


फट 
न्ज-> | 76 ---- 


रेखाचित्र 


हो गये | हाथ फैज्ञाकर इंग्लैंड के मोलिंश्रर' की ओर वह आगे बढ़े । 
और एकद्म उसके गले से लिपट कर उसके ( बर्नाईशा के ) लजा 
से लाल हुए गालों को एक-एक चुबन लिया कदाचित्‌ रंगभूमि पर 
इंद्र का बज गिरा होता तो भी इस रमणीय अवसर पर फेबीन्सो जितने... ” 
आश्चय-सुग्ध हुए. उतने न हुए. होते | 
मि० शा--लजीला और अस्पश्य॑ एक क्षुण के लिए धबराये | पर 
एक ही छण में उन्होंने स्वस्थ होकर वेधड़क तथा आनंदपूर्वक हर्ष की 
करतल-ध्वनि के बीच मो फ्रांस के आलिगनों का प्रत्युत्तर दिया । 

मार्क रूथफोर्ड के इतिहास प्रसिद्ध चुम्बन, इज़राइल के गले लिपय्ता 
जोसेफू, एफेसस पर पोल के गुरुनन की ओर से मिले चुम्बन: एकांत 
वातावरण को सशब्दित करते हुए रोमियो और जुलियट के चुम्बन ; 
अद्युत पराक्रम के बाद पेनीलोप ओर युलीसीस के हृतय-मिलन से 
एक भी स्टेनापोर में उच्न्न हुए. इंगलैंड के ज्योर्ज चौथे तथा फ्रांस की 
लुई अठारहवीं के हृदयालिगन जितना महत्वपूर्ण आलिगन नहीं समकका 
जाता परन्तु यदि वे बर्नाडशा ओर अनातोल फ्रांस के आलिगन देखने 
के भाग्यशाली हुए. होते तो अवश्य ही इसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान देते । 

इसके बाद अनातोल फ्रांस के जीवन की अन्तिम महत्तपूर्ण घटनाश्रों , 
में दो वस्तुएँ ही उल्लेखनीय हैं। १६२० में मेडेमोजेल एमाले प्रेवोट के 
साथ उनका विवाह ओर १६२१ में उन्हें मिला 'नोवेल प्राइज़' | एक 
दूसरी घटना भी उल्लेखनीय है । १६२२ की पतमड़ ऋतु में साहित्यिकों 
और बुद्धिमानों की दुनिया एक खबर सुनकर चौंक उठी कि अनातोल 
फ्रांस की सभी पुस्तकें रोमन कैथोलिक संग्रदाय की ओर से बहिप्कार की 
सूची में रख दी गई हैं | उसमें न तो सारा-प्रसार विवेक का ही उपयोग 
किया गया था और न उसमें कुछ दूरदर्शिता ही थी। अनातोल फ्रांस 
की पुस्तकों का इससे और भी प्रचार हुआ | इंगलेंड में सांप्रदायिक इस 
अकार के आज्ञापत्रों से कदाचित्‌ ही कुछ प्रभाव पड़ता हो | 


-१६०-- 


| 


थक कक मद अपन जन 





अनातोल फ्रांस 


मो० अनातोल फ्रांस युद्ध के विरुद्ध हैं और अंतिम महायुद्ध के समय 
उनके विचार बहुतों को विचित्र लगते ये। उन्होंने अपनी पुस्तकों में 
जितना अपना व्यक्तित्व चित्रित किया है उतना किसी भी महान्‌ लेखक 
ने नहीं किया और धातु के कीति-स्तंमों से मी अधिक स्थायी स्मरण-स्तंभ 
अपने लिए उसमें रच दिये हैं । हि 

अनातोल फ्रांस की पहली कहानी पुस्तक सन्‌ १८७६ में प्रकाशित 
हुईं | परन्तु उसने लोगों का ध्यान अधिक आकर्षित नहीं किया। लोगों 
ने तो उन्हें श्य्८१ में लिखी क्राइम श्आफ सील्वेस्टर बोनार्ड! नामक 
पुस्तक से ही पहचाना | इस समय अनातोल फ्रांस की उम्र १७ वर्ष की 
थी | उनकी दूसरी पुस्तकें माई फ्रं इस दुक', 'पीयर नोजीएर', लीव्ल 
पीएरे?, दी ब्छुम श्रॉफ लाइफ” वास्तव में थे सब उनके जीवन से 
संबंधित लिखी गई हैँ । 'थाइस? उन्होंने १८६० में लिखी। कोई दूसरी 
युस्तक न भी लिखी होती तो भी इसी पुस्तक से संसार के साहित्य-कोय 
में उन्हें अग्न स्थान मिलता | 

“र्‌डइ लीली?, यह भी उनकी अत्यन्त आकर्षक पुस्तक है | इसमें उस 
महान्‌ कलाकार का शब्दों तथा भावों पर कैसा अद्भुत अधिकार था यह 
प्रत्यक्ष हो जाता है । अनावोल फ्रांस ने दूसरी भी कई पुस्तकें लिखी हैं । 
इस छोटे से लेख में केवल उनका नाम निर्देश हो सकता है | इनमें से 
अधिकांश का अंग्रेजी में अनुवाद हो चुका है । 

उपरोक्त पुस्तकों के अतिरिक्त उनकी दूसरी सुप्रसिद्ध पुस्तकें इस 
प्रकार गिनाई जा सकती हैं ; मदर ओफ पले?, 'ऐट दी साइन ऑफ रेन 
पेदोक', दी ओपीनीयस ऑफ जेरोम कोईनाई!, दी एमेथीसटरिंग', 


८ 


'पैंगवीन आइलेंड', 'गोडइज आर एथर्स्ट', 'रीवोल्ट ऑफ एन्जल्स'ः और 

क्रिकनत्रिलः आदि | इनके अतिरिक्त भी उनकी लिखी दूसरी बहुत सी 

पुस्तकें हैं। साहित्य ओर साहित्यिकों की आलोचना करते हुए उनके 

शोन लाइफ एंड लेटर्स” के चार भाग . भूतकाल के साहित्पिकों में एक 
>++१६१-- 


११ 


रेखाचिन्न 


रड 


अपूर्व स्थान रखते हैं | 

मो० अनातोल फ्रांस की शैली विविध औरं कलात्मक है | परन्तु 
उनकी अधिकांश पुस्तकों में एक संपूर्ण बात होने की अपेक्षा, मिन्न-मिन्न 
घटनाश्रों की >छुला--अ्रलग-अलग फूलों की ग़ुँयी हुईं एक प्रुप्पमाला 
जैसी--वस्तु-रचना का अधिक ग्राधान्य है और वहुघा एक भाग को हानि 
न पहुँचे, इसलिए एक दूसरे से कुछ भी संत्रंध न रखनेवाले विभाग मी 
होते हैं ; जैसे एक-एक प्रकरण अलग-अलग कहानी हो, ऐसा लगने 
लगता है | 'रेड लीली? या 'थाइस? जैसी पुस्तकें इस तरह की नहीं कही 
जा सकतीं | इनमें से यदि एक भी वर्ठु निकाल लें तो सारी रचना ही 
विगड़ जाय । ऐसी अलग-अलग या एकत्र चाहे जैसी रचना में वह 
परिस्थिति का वर्णन और मनुप्य-स्थभाव के दर्शन अ्रदूमृुत रीति से 
कराते हैं। सूछ्म से यूहम बना में वह बड़ी खूबी से सुन्दर रंग भर देते 
हैँ | मानव-स्वभाव की सभी दुर्बलताओं का उन्हें अनुमव है, परन्ठ बालकों 
की भूलों को देखकर जिस प्रकार बड़े आदमी हँस देते हैं, उसी प्रकार 


शा 


कुछ विनोदी, कुछ सहानुभूति. भरे ढंग से, बिना चिढ़े सह लेते हुए उन्हें 


देखते रहते हैं | बाहर से वह विक्रमावी (८००४८) दिखाई देते हैं, परन्तु 
चतुर द्रष्य को तुरन्त ही उसके पीछे हृदय की धड़कन दिखाई दे जाती है । 

उनका विनोद सूछूम, सचोट और अचूक होता है, परन्तु स्वयं गंभीर 
दिखाई देते व्यंग करनेवालों की तरह अपनी गंभीरता का डौल दिखाना 


कर्मी नहीं छोड़ते | प्रत्येक वस्तु का--पवित्र और पूज्य समझी जानेवाली 


वस्तुओं से लगाकर जीवन की सामान्य बातों का--तब्रह उपहास करते हैं, 
कभी-कभी खटक जाय, ऐसी भव्यता और सरसता के लिए उनके हृदय में 
जो भाव हैं वैसे भावों का दावा थोड़े ही कलाकार कर सकते हैं। उनका 
परिहास जितना तीखा होता है उतना सहृदय भी होता है, परन्तु मित्र-माव 
से किया गया हो तमी । शत्रु-भाव से किये गये कक्ष में तीर से भी 
अधिक तीक्ष्णता होती है । 

३084 + 4 “डक 





छ् 


अनातोल फ्रांस 


ताइश्यता लाने की उनकी शक्ति अपूर्व कही जा सकती है। बाल 
से लगा कर बृद्ध के स्वभाव तक एक-एक यद्ष्मातियदृम भेदों से 
वह परिचित हैं। ह्ल्ियों का उन्होंने विशेष अध्ययन किया हो ऐसा 
लगता हँ--पर ज़रा क्रूरता से। प्रत्येक वर्ग और अत्येक अवस्था की 
ह्लियों उनकी जिज्ञासा का विपयव है ओर त्लियों का उनसे परिचय भी 
अधिक हो, ऐसा भी लगता है । 

मनुष्य के स्वभाव में निहित मनोमाव ओर इंद्रियननित प्रव्नत्तियों को 
छिपाने का प्रयक्ष नहीं करते, परन्तु प्रत्यक सृद्म भेद को भी ग्रहण करते और 
व्यक्त करत हैं | इंद्रिय इत्तियों को भी बहुवा प्रधान स्थान--ज्ञोम उस्यन्न 
करें इस प्रकार--देतें हैँ और इन सब में कभमी-क्रमी तो सहानुभूति रहित 
हों ऐसा लगे बिना नहीं रहता । इस शुद्धि के आडंबरवाले ([27००॥५)) 
स्वभाव के अतिरिक्त उनमें ज़रा भी दवा हो, ऐसा दिखाई नहीं देता । और 
फिर भी बहुधा सरसता तथा भव्यता के शिखर पर वह पहुँच जाते ई। 
चित्रकार को तरह नये-नये चित्रफलक जो सानंद आशचर्यान्त्रित कर दें 
इस प्रकार जल्दी-जल्दी ओंखों के सामने रखत चले जात हैं। इहथा 
निम्नकोरि की बात कहकर धत्ररा भी देते हैँ, पर उससे उनको मह॒ना 
के शिखर से पदच्युत करने का साहस किसी का नहीं हो सकता | 

अनातोल फ्रांस के मन कोई भी क्षुमा न कर सक्के ऐसा अपराध 
सरसता का द्रोह है ओर इस एक ही देवी कीः .उपासना में उन्होंने अपना 
संपूर्ण जीवन बिता दिया है। उनकी कला-परीक्षा और रसबत्ति के लिए 
दो मत हो ही नहीं सकते । 

मनुप्य की तरह ज़रा आत्माभिमानी, कदाचित्‌ शअहंकारी, अ्रच्छ 
स्वभाव के, अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्ववाल, ऐसे कुछ बिना देख ही ह्‌ 
उनकी कल्पना कर सकते हैं । 

ऐसे समर्थ साहित्यिक हमारे गुजरात में भी कत्र अवतार लेंगे ? 

जाए दि रेणाण 


कवि दलपतराम डाह्माभाई 


अशोकलपासक»नत-॒रलममब्पलन्‍तरक 





जिस प्रकार किसी प्रतिभाशाली मनुष्य के आगमन से युग आरंभ 
होता है उसी प्रकार ऐसे युग के द्वार बंद करने का कार्य मी बहुधा 
किसी ऐसे ही प्रतिभाशाली मनुष्य के हाथ से संपादित होता है । बहुधा 
इस समात्ष होते हुए युग की सभी शक्तियाँ इस मनुष्य में मूर्तिमान हो 
जाती हैं। ऐसे मनुष्य की दृष्टि मृतकाल से प्रेरणा लेती है| नबीन पीढ़ी 
की उन्मत्तता ऐसे व्यक्ति को बहुत अच्छी नहीं लगती | कबीश्वर दलपत- 
राम को भी हम इसी वर्ग में रख सकते हैं | 

इनका जन्म उन्नीसवीं शताब्दी के आरंम में--सन्‌ श्य२० में हुआ 
था और शताब्दी के अंत तक--श्य८६ तक ये जीवित रहे [ इस 
अठहत्तर वर्ष की लंदी जीवनावधि में बूँद-बूँद करके कालांतर में 
सरोवर हो जाय, इस प्रकार इन्होंने बहुत सी कविताएँ रची हैं और उस युग 
के उन्नति-क्रम में इन्होंने वधाशक्ति गति प्रदान करने का ग्रवत्ष किया है | 

कवि दलपतराम का समय प्राचीन और नवीन शक्तियों तथा प्राचीन 
ओर नवीन मतों के संधर्प का युग था| पश्चिम की नवीन शक्तियों तथा 
विचार-प्रवाहों का ग्राक्रमण उसी समय में हमारे देश में होना आरंभ 
हुआ था यह नवीन पवन किस तरह की वह रही है उससे अनमभिक्त 
प्राचीन मतवादियों ने संसार में ओर साहित्य में, आत्म-संरक्षण के 
प्रलोभन में पड़कर उसी समय पूरी तैयारी से विग्रह भी आरंभ कर 
दिया था | कवि दलपतराम ने प्राचीन साहित्य की सभी शक्तियों अपने 
में मृतिमान कर ली थीं। इनका उचित स्थान तो एक बार हमारे 

--१६४--- 


कवि दलपतराम 


अम्रुख महाशय ने किसी स्थान पर कहा था, उसके अनुसार प्राचीनों के 
अंतिम प्रतिनित्रि रूप में समका जा सकता है | 
परन्तु इन्होंने अपनी कविता का उपयोग वास्तव में नवीन शक्तियों 
» के पोपण में ही किया हैं। इनकी कबिता का विशेष उपयोग मनोरंजक 
होने पर भी उपदेशात्मक तथा शनै:-शनैः, पर दृढ़ता से अज्ञानता की जड़ 
कार दे, कुछ ऐसा ही है। 
यह तो सच है कि इनकी कविता का जितना विस्तार दे उतना 
गांभीये नहीं और उसमें आवेश--भावों के साथ पाठक को भी प्रवाह 
में बहाकर ले जाय, ऐसा आवेश नहीं है । इसका कारण यही कहा जा 
सकता है कि इनकी कविताएँ अंतर के आंदोलन के परिणामस्वरूप 
पैदा नहीं हुई, वल्कि गणितशाल्री की तरह व्यवस्थित मस्तिप्क से टीक- 
टीक व्यवस्थित रूप में बहार आई हैं | ऐसा जान पड़ता है इनको कविता 
का उद्दे श्य लोगों का अज्ञान नष्ट करना, भ्रम ओर दुष्ट ढढ़ियों के 
( विरुद्ध विद्रोह करना, चेतावनी देना, उपदेश देना और कदाचिन्‌ एक 
जबरदस्त प्रतिद्वन्दी के सामने व्कि रहने का भी था। इन्होंने 'सहसा 
परिवतंन? करने के बदले “भारे-धीरे छुधार करने का सार! बतला कर 
लोकजियता प्राप्त की | अयने इस उद्देश्य को इन्होंन जीवन भर खखा, 
और प्रतिष्ठा तथा लोकप्रियता दोनों प्रात की। इस कारण से इनकी 
कविता उड़ान न मर सकी, त्रल्कि लोक-रंजन करके ही संतुष्ट हो गई । 
ओर इस प्रकार इस उपयोगिता की दृष्टि से लिखी हुई कविताओं का रस 
भी जब इनकी उपयोगिता नष्ट हो गई, तो कम हो जाना स्वाभात्रिक हैं | 
कवि दलपतराम ने पिंगल ओर अलंकारशान्न का अच्छा अध्ययन 
किया था और इनकी कविता पिंगल के नियमों का अनुकरण करन 
वाली तथा अलंकारों की क्रीड़ा में आनंद माननेवाली है । इन्होंने ऋहुत से 
प्रबंधों का चौखदा बना कर भी विनोद करने ओर कराने का प्रबंध किया 
है। ऐसी क्रीड़ाओं में प्रतिभा नहीं होती और न हो सकती है। प्राचीन 
“१ ५४--- 


रेखाचित्र 


काल में कदाचित्‌ शिष्ट साहित्य का यह एक प्रकार होगा | अतः दलपत- 
राम ने भी ऐसी शिष्टता लाने का सरस प्रयत्न॑ ऐसी .कविताशओं में 
किया है। 


कवि दलपतराम इस समग्र हमें तो कवि की अपेक्षा एक बढ़े-बूढ़े- 


जंसे--शिक्षा देते हुए, सममराते हुए, धीरे-धीरे हमारी हठों को दूर करते 
हुए और कभी-कभी विनोद भी कराते हों--ऐसे अधिक लगते हैं| और 
लोगों की श्रद्धा कवि दलपतराम पर थी वह बहुत अंशों में इसीलिए थी । 
इनकी कविता में खामियाँ थीं या नहीं यह देखने की बात कदाचित्‌ ही 
किसी के मन में उठती हो । 

कि को प्रेरणा तथा उत्साह देकर टिकाये रखने वाले फार्बस साहब 
थे | इन दोनों का संबंध, कवि और दूप जैसा--मित्रता का था। कवि 
नमेंद के साथ विग्रह के कारण इनमें आग्रह तथा धारणा शक्ति उत्तन्‍न 
हो गई | फार्बस साहब ने इनकी अमिलापाशं को अपनी इच्छानुसार मोड़ 
कर जल-सिंचन किया तथा आश्रय दिया |! फार्बस साहन् न होते तो कवि 
दुलपत राम यदि रहते भी तो कवीश्वर की पदवी को न पहुँचते । इन्होंने 
भी 'फार्बंस-विलास! ओर 'फार्बंस-विरह! रंचकर अपनी कृतज्ञता का पूरा- 
पूरी प्रदर्शन किया है | 

इनके जीवन में और काव्य में तूफान नहीं--आया ही नहीं--यह 
कह तो अनुचित न होगा | बुद्धिमान दलपतराम में हमें प्रराचीनों द्वारा 
कितने ही हज़ार वर्षों के अभ्यास से प्राप्त शांति ही दृश्गोचर होती है | 
नर्मद की तरह इन्होंने कमी भी प्लोमन तो जाना तक नहीं ओर इसी 
कारण इनको कभी मानमंग या गौरवमंग होने की या इनकी समता को 
हिला दे ऐसे आत्ममंथन करने का समय ही नहीं आया। कुलीनता, 
प्रतिष्ठा और बंश-प्रतिष्ठा का इन्होंने मृत्यु पर्येत अनुभव किया है। 

एक बात सहज ही मन में उठती है और वह यह कि यदि 
कविवर नर्मंद इस युग में पैदा हुए; होते तो क्या कबीश्वर दलपतराम में 

| “>१६६०- 


ना 


कवि दल्षपत राम 


प्राचीनता के प्रतिनिधित्व का इतना स्पष्ट स्फुरण होता ? इसी प्रकार 
क्या इनकी काव्य-सरिता का तट इतना विस्तृत हुआ होता ? नर्मदाशंकर 
के विरोधी भाव से उत्न्न इस प्रकार का प्रभाव दलपतराम पर कितना 
होगा यह तो कोई समर्थ काव्यशात्री ही खोज सकता है। इस प्रसंग में 
इस प्रकार की चर्चा अप्रासंगिक ही गिनी जायगी। 

कवि.द्लततराम ने अंग्रेजी का अभ्यास नहीं किया था, पर विधवा- 
विवाह के पक्ष में अपना मत प्रकट करने जितने प्रगतिशील विचार वे 
रखते थे | हास्य रस को भी इनकी कविता में उचित स्थान मिला है। 
इन्होंने अपनी कविता में किसी भी रस को निरंकुशता से नहीं बढ़ने 
दिया, परन्तु प्रत्येक रस का आवश्यकतानुसार जैसे तोल-जोख कर करते 
हों, ऐसा उपयोग किया है| अ्रपनी साहित्य प्रश्नत्ति उन्होंने शरद्धावस्था तक, 
नेत्र गंवा देने के बाद भी चालू रखी थी। गुजराती भाण के विकास में 
इनकी देन महान थी । 

एस एक प्राचीन काव्य-साहित्यिकों म॑ अंतिम परन्तु विचारों में था 
विस्तार में किसी तरह मी पीछे नहीं, ऐसे कवीश्बर को श्रद्धा और प्रेम 
की नम्न अ्रंजलि अर्पित करते हुए मन आनंदित होता है । 


कवि नर्म॑द 





महिलाओ तथा सज्जनो ! ४ 

नर्मद की नगरी की ओर से ता० १८ को सवेरे म॒झ्ले नर्मद के विषय 
में भाषण देने के लिए निमंत्रण पत्र मिला तब इतने थोड़े समय में इतना 
बड़ा काम मैं कैसे कर सकूँ गी इस विघय में म॒के संशय हुआ | घर में दो 
बालक बीमार, सिर पर लिये हुए दूसरें काम प्रतिदिन आशय दिन ले 
लेते और णहकार्य का मार न होने पर भी यहकार्य के रूप में न गिना 
जानेवाला, परंतु गहिएी के सिवाय किसी .दूसरे से न हो सके ऐसा 
समाज के साथ जुड़ा हुआ ग्रहतंत्र मी चलाना होता है; ऐसे समय पर 
एक अध्ययनपूर्णू सापण तैयार करना यह कितना कठिन कार्य है इसका 
अनुभव स्त्रियों के अतिरिक्त दूसरे बहुत थोड़े लोगों को होना संभव है | 

परन्तु ऐसे भावपूर्ण आमंत्रण को अस्वीकार भी कैसे किया जा 
सकता १ वथाशक्ति जहाँ तक हो सके कठिनाई सहकर भी स्नेह ओर 
सम्मान को वापस न लौयया जाय ऐसा हमारी पद्धति हे, इसलिए आपके 
भाव के वशीभूत होकर ही आज में आपके सामने उपस्थित हुई हूँ । थोड़े 
समय के कारण में कवि नर्मंद्र के जीवन या काव्य के विपय में गंभीर 
अध्ययन नहीं कर सकी | इसलिए कवि नर्मद के जीवन के विषय में 
थोड़ी सी बातें ही बता कर में संतुए हो जाऊँगी । आपको इतने से संतोष 
न हो तो उसका दोप स्वीकार करने के लिए में चँंधी नहीं हूँ। 

अऔँग्रेडी में एक कहावत है, 'कोई महापुरुष अपने देश ओर काल से 
पहले जन्म नहीं लेता ।! इसमें जिस प्रकार सत्य निहित है उसी प्रकार 


कवि नंद 


“कितने ही महापुरुष अ्रपने देश-काल का निर्माण करने के लिए पैदा हो 
हैं |? ऐसा सुधार कर कहें तो इस वात में भी कुछ कम सत्य नहीं। जिस 
प्रकार युग की शक्तियों को अहण कर ये अपने खमाव और चारित्य का 
निर्माण करते हं उसी प्रकार उनके स्वभाव और चारिव््य के विशिष्ट 
तत्व समाज में नवीन आंदोलन का प्रसार करते हैं | प्रजा की प्रगति का 
इतिहास ऐसे ही महापुरुषों द्वारा चलाये हुए आंदोलनों का इतिहास है । 
आज से छु:-सात पीढ़ियाँ पहले जब गुजरात प्रगति-पथ में पहला कदम 
ही रख रहा था तब जिस आंदोलन को नर्मंद ने जन्म दिया उससे इसका 
विकास कितना पास आर गया, यह बात तो तभी जानी जा सकती है जब 
उस समय की शक्तियों का अध्ययन करें | 
नमेद समय-मर्ति था, उससे भी अधिक समय का गढ़नेवाला था। 
गौरवशाली गुजरात--कभी मूर्ख समका जानेवाला गुजरात--में उस समग्र 
चहुत सी बातों का अभाव था | गुजराती भाषा का उस समय्र विकास न 
। हुआ था | गुजराती में पद्मशातत्र के अध्ययन करने के डस समय कुछ भी 
साधन न थे । गुजराती भाषा में विचारों को व्यक्त करने की सामब्य न 
थी | शब्दों को संग्रहीत करे ओर शब्दों का अर्थ बतलाये ऐसा एक भी 
शब्दकोीय न था। इस प्रकार के अभावों की पूर्ति के लिए ब्हुतों को 
आजीवन परिश्रम करना पड़ता है। साहित्ययरियद्‌ अनेक व्यक्तियों का 
सहयोग होने पर भी जो न कर सकी वह नर्मद ने अकेले ओर अर्किंचन 
अवस्था म॑ किया | उसने रस और अलंकार, पिंगल ओर छंद शान्त्र, पद्म- 
गद्य के विज्विध भावों को व्यक्त करनेवाले ओर विविध .रखों का पोफण 
करनेवाले प्रकार तथा सबका मुकुद-मणि, ऐसा एक कोप सुजरात को 
दिया । गुजरात के लिए अनेक ग्रांतों जीत ले ऐसे लड़ाकू होने की अपना 
इस प्रकार के भाषा रे अनेक क्षेद्ठों मं काम करने तथा गुजरी का सम ्दव 
करने वाले इस एक नरवीर की सेवा कुछ कम मृल्यवान है, वह छान 
कह सकता है ? 
बा ८ पट, 


रेखांचित्र 


- इस महाकवि का जन्म आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व ३० स० 
१८३३ में हुआ था | परिवार मध्यम स्थिति का तथा माता-पिता साधारण 
पंक्ति के थे । ऐसे घर में और ऐसे संयोग में पैदा हुए, नर्मदाशंकर में 
साहित्य के ऐसे ऊँचे संस्कार कहाँ से आये, यह संतृति-शास्त्र के नियमों < ९ 
के अंतर्गत आनेवाला प्रश्न है। बाल्यकाल में यह कवि डरपोक था ऐसा 
वह स्वयं स्वीकार करता है | स्वभाव का जो गुण या अवशुण बचपन में 
या बड़े होने पर मनुष्य की गति को रोके उसके प्रति उसे अत्यंत घुणा 
उत्पन्न हो जाती है और उसके विरुद्ध विद्रोह कर, उसके बिलकुल दूसरे 
छोर पर जा बैठता है| कवि नर्मदाशंकर को भी निडरता का गुण इस 
प्रकार और भी अच्छा लगने लगा हो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं | 

कवि नर्मदाशंकर का बचपन किन्हीं विशेष घटनाओं से भरपूर नहीं 
लगता | पर बंबई आने तथा कालेज में प्रवेश करने के बाद इन्होंने एक- 
दो मंडलियों की स्थापना की थी। उसमें कवि का सबसे पहला गद्य- 
भाषण 'मंडली के इकट्ठे होने से लाभ? पढ़ा गया था। कवि की भाषा में / 
उसी समय से प्रभावों की व्यापकता तथा वेग दिखाई देता है । 

यह समय कवि का यौवन काल था | उसके सन सें इस समय प्रेम 
तथा नाम प्राप्त करने की अनेक तरंगें उठतीं। इस समय के सेजोये हुए. 
सपने अंत तक उसके साथ रहे। प्रेम की भूख मित्रने के लिए उसने सुख 
और प्रतिष्ठा खो दी और दारिद्रथ बटोर लिया । नाम प्राप्त करने के लिए 
शौर्य दिखाने तथा शौर्य की प्रेरणा देनेवाले अनेक प्रतिस्पर्धी उसने खड़े 
किये और थोड़े से मित्र भी बनाये और अंत में दुश्ख, दर्द, दारिद्रथ 
ओर दुश्मनों से घिरा होने पर सी इस नरसिंह को धारणा अंत तक 
अडिग रही | 

कवि को काव्य लिखने की पहली प्रेरणा लगभग १८४४ में हुई । 
अपनी मनोदत्तियों के लिए विकास का साथन मिलने से उसको उस 
समय एक प्रकार का श्मशान वैराग्य हो गया था ओर इसी कारण उसके 


अल र ७0--+ 


हू, 
नर्मद 


हत/ 


कवि 


पहले पद धीरा भक्त की शैली पर 'बरत्रह्म जमकर्ता रे, स्मरोनी भाई हर 
घड़ी? और जीव तू गूरख समजे रे, कहूँ छु घेला फर्र-करी' ऐसे वैराग्य 
ओर भक्ति के ये । यह प्रवत्त अपनी इत्तियों को स्थिरता प्रदान करने 
ओर किसी वस्ठ में भी आनंद अनुभव न करनेवाले उ्व॑मुखी चित्त को 
थ्रानंद देने के लिए थे | कविता करने का व्यसन कुछ ऐसा-बैसा व्यसन 
न था। अपनी कविता में अपूर्णता का आभास हो और जिसमें रसानंद 
की कल्पना की हो उसमें कुछ क्षति जान पड़े, ऐसा कवि को रुखिकर नहीं 
था | उसने गुजराती भाषा में अलम्य ऐस पिंगल, छुंदरशात्र, अलंकारशास्त, 
रस-प्रवेश इत्यादि ग्रंथ, संस्कृत तथा अन्य भापाशरों से झ्त्यंत परिश्रमपृर्वेक 
ग्राव्त किये तथा उनका अध्ययन किया। इतना ही नहीं, वरन्‌ उन अध्ययन 
किये हुए विपयों को गुजराती भापा में भी रक््खा ओर इस दिशा में 
अभ्यास करने वाले बहुत से व्यक्तियों को सरलता करी | महापुरप केवल 
स्वयं जानकर अथवा प्राप्त कर अकेले ही संतोय नहीं मान लेते, ब्रल्कि 
अपने शान और अव्ययन से दूसरों को मार्ग दिखाने में ही उन्हें संतोय 
होता है, यह लक्षुण कवि नर्मदाशंकर में आरंभ से लक्षित होता है | 
लगभग सन्‌ १८४५४ से ४६ तक का समय कवि नर्मंदा्शकर ने अपने 
कवि-जीवन में उपयोगी हो, ऐसे अध्ययन में व्यतीत किया । काब्यशात्तर 
के ग्रंथ प्रात करने तथा उनका अध्ययन करने ओर उससे श्रम करने में 
उसने कोई कसर नहीं रखी और साथ ही उसकी काध्य-रचना के प्रंद्ध भी 
प्रकाशित होते रहे। इतने वर्गों की तपश्चर्या के बाद उसने माता सरस्वती 
की गोद में सिर रखने का संकल्प किया। कवि के अपने ही शब्दों में 
इस धन्य दिवस का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-- घर आकर लेखनी के 
सामने देख आँखों म॑ं आँवू भरफर उसने यार्थना की कि श्रव में तेरी 


हु 


शरण में आ गया हूँ,” जिस युग में वह पैदा हुआ उस युग में गुजराती 


की गोद में सिर रख कर ही जीने का संकल्प करनेवाले व्यक्ति में कितना 
चीरत्व होगा उसकी तो इस समय केवल कल्पना ही की जा सकती है, य 


रेखाचित्र 


कदाचित्‌ यह भी हो सकता है कि इस प्रकार की वीरता केवल उसी युग 
में सम्भव हो | इस समय तो यदि कोई ऐसी वीरता दिखाने भी जाव तो 
उसे याचकजत्ति जैसी दीनता में जीवन जिताना पड़ता है | 

नर्मद के युग में प्रमुख समझे जानेवाले दलपतराम और नर्मद दोनों ..«' 
जीवन में एक बार वाद-विवाद करने के लिए मिले थे, यह नर्मद के 
जीवन की एक उल्लेखनीय ध्रव्ना है। किस लिए १ शिक्षाश्रों से भरी 
हुई और प्रधानतया अलंकार और प्रास-अनुप्रास की गोँठों में ही उलकी 
हुई दलपत की कविता तथा प्रेम-शोर्ब के गीत गाती हुई नर्मद की कविता 
का मेल किस प्रकार संभव है ? दोनों की वाग्यारा जब परस्पर प्रवाहित 
हो उठी - होगी तव समा-रंजनी तथा वेगवती दो शैलियों के संगम, 
गर्मियों में छिंछुली पर बड़े विस्तार बाली सावरमती और प्रमाण में छोटी 
दिखाई देने पर भी सत्रको बहा ले जाय ऐसे वेगवाली हाथमती के नीर, 
दोनों एक साथ मिलें तब जैसी स्थिति हो, वैसी ही स्थिति कुछु-कुछु उस 
समय भी हुई होगी | है हा 

१८५६ का वर्ष दूसरे बहुत कारणों से कवि के जीवन में उल्लेखनीय 
है। उसने इस वर्ष से सुधारों के विषय में खूब लिखना आरंभ किया | 
कवि का हृदय अपने देश की दु्दशा और हानिकारक सामाजिक रीति- 
रिवाजों से खूब ही द्रवित होता और दुखता भी | विशेषकर विधवाओं 
की दशा देखकर उसे बहुत दुःख होता था। उसकी वाणी में भी गुजराती 
गद्य में न मिलने वाला वेग और तीक्ष्णता थी। ऐसे प्रतिपक्षी तक 
पहुँच न होने पर उसे तोड़ डालने का ढंग ( )४००-?४ए८०!७४ए ) 
समाज में--प्राचीन विचार वाले समाज के बहुत बड़े भाग में--खूब जोरों 
से फैला हुआ होगा । संसार के प्रत्येक महापुरुष को ऐसा काँटों का ताज 
पहनना पड़ता है और उसके कणों से य्पकता हुआ रुधिर जनता को शाप 
न देकर उसमें कल्याण की मावना जगा देता है | 

इसके बाद के वर्ष में सन्‌ १८६० ३० में आज जिसकी कल्पना भी 

न्लम, श्‌ ] २-- 


कवि नर्मद 


नकी जा सके ऐसा वीरत्व--उस समय तो युद्ध में जूमने जैसा 
वीरत्व--दिखाया और वह था यदुनाथ महाराज के साथ पुनवियाह 
संबंधी शालत्रार्थ करने जाना | शाज से सत्तर वर्ष पहले यदि पुनर्तियाह का 
नाम मी ले लो तो एक महान्‌ पाव--चौरासी लाख योनि में भी जिससे 
मुक्ति न मिले ऐसा पापय--माना जाता होगा | तत्र उस संबंध में श्रद्धालुओं 
के इस लोक के ईश्वर श्र परलोक के तारणहार समके बानेयाले 
बैप्णब महाराज, भक्ति रस में विमोर विधवा नारियों के साथ असहाय 
अवस्था और मानसिक दुर्वलताशों का लाभ उठाकर मन चाद्दे निगश्र 
व्यवहार करते हों, तो भी उनके साथ वाद-विवाद करने में तथा 
पुनविवाह से भक्तिमुग्ध दासियों को सुक्ति का मार्य दिखाने में अपने 
साहस और पुरुपार्थ की कितनी पराकाप्ठा कवि को दिखानी पड़ी होगी 
उसका चित्र तो केवल कहना द्वारा ही कुछ घुं धला-बु घला सा आँखों 
के सामने था खड़ा होता है । 

कवि के पिता का खर्गवास सन्‌ १८६६ में हुआ उस समय कवि का 
कीर्ति-सूर्व भी मव्याह पर पहुँच चुका था । इसी वर्ष कवि ने डांडीया' में 
बज्रप्रहार आरंभ किये, परंतु कि की श्रार्थिक विपततियाँ इसके बाद और 
अधिक बढ़ने लगीं। इस समय का करुण चित्र इनकी जीवन-कथा पढ़ने 
हुए हृदय पर गहरा प्रभाव डालता है | कबि का उदार स्वभाव, उनकी 
अपव्यथिता, सांसारिक और सामाजिक विपत्तियाँ और अर्थप्राति के लिए 
अनेक तरह के प्रचल, कभी-कभी चार आने के दूध-चौले खाकर रह 
जाना पड़े ऐसी स्थिति, और श्रन्त में जीवन भर निभाई प्रतिशञा तोड़ 
देना और उससे अनुभूत मानसिक व्यथा, थे सब कवि की महत्ता 
को बताते हूँ | इतना दुःख गुजराती के चहुत थोड़े उपासकों ने उठाया 
हांगा | 


चीच में एक उल्लेखनीय धव्ना रह गई। कवि ने १८६६-७० में 
एक विधवा-लत्री के साथ गुप्त रूप से पुनलंग्न कर लिया था। इस लम्म ने 


0 


रेखाचित्र 


उनके आंतरिक जीवन में क्या-क्या परिवततंन किये यह वात उनके जीवन- 
चरित्र में नहीं है। प्रेम की जीवनमर लालसा रखनेवाले कवि को 
इससे प्रेम की लालसा शांत हुई या नहीं इस प्रश्न का उत्तर किसी भावी 
जीवन-चरित्रकार के लिए; छोड़े देती हूँ । 8 
अपने साहित्य-मनवन्तर के मनु के जीवन की रूपरेखा इस प्रकार 
हम देख गये | इस जीवन का निर्माण करने वाली शक्तियाँ कौन-सी थीं 
इस पर भी हम थोड़ा विचार करेंगे | | 
नर्मद का युग हमारे देश में संक्रान्ति का युग था । पश्चिम की 
नवीन भावनाएँ और आचार-विचारों का निरीक्षण करनेवाले दृष्टिकोण 
भी इस भाषा के अध्ययन के साथ ही इस देश में आने लगे थे और 
अत्येक प्रश्ष पर विचार करने के दृष्टिकोण भी बदलने लगे थे। भाई 
ज्योतीद दवे ने इस समय का वर्णन लिखते हुए और नमेद पर उसका 
प्रभाव दिखाते हुए, इस युग-शक्ति के समस्त प्रमावों का एक सुन्दर 
चित्र इस प्रकार खींचा है। है 
“यह युग संक्रान्ति का था | द्रातःकाल के समीर की तरह आग्ल- 
विद्या ने शुजरात के जीवन में शनैः-शने; स्पष्ट संचार करना आरंभ कर 
दिया था। हमारी दशा--आरर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, वैसे ही साहित्यिक 
विलकुल अधमावस्था को पहुँच गई है, इसमें सुधार करना चाहिए, ऐसे 
विचार देशवासियों को उनकी निर्धारित कतंव्य-दिशा की श्रोर प्रेरित 
. कर रहे थे | मुसलमानी राज्य के कोलाहल में हमारी पुरातन संस्कृति 
' की प्रतिध्वनियोँ बहुत कुछ अंशों में दब गई थीं और उनमें नवीन 
संस्कृति और नवीन राज्य के सर्वप्रथम ही दर्शन हुए थे |” इसलिए 
लोग खामाविक रीति से उसके मोहक चमत्कार से आश्चयचकिंत 
रह गये | जगह-जगह समाज-सुधारक पश्चिम के रंग में रंग कर पूरे 
भारतवर्ष को इस रंग से रंग देने के लिए कट्बिद् हो गये । अनेक 
सभाओं की स्थापना हुईं | अनेक पत्र निकलने आरंभ हुए. । पुनर्विवाह 
+-+ ९ ७छ४ई--- 


कवि नंद 

शुभ सममे जाने लगे | सामाजिक विपयों पर निर्बंध लिखे जाने लगे और 
'सुधार संबंधी भाषण--गद्यमब भाषणों की परंपरा प्रारंभ हो गई | इन 
सभी प्रत्नत्तियों का केख-स्थल बंबई उस मंथन-काल का समुद्र इन गया। 

इसका प्रमाव सभी लोगों पर पड़ा, परन्तु सबसे अधिक नमेद का 
स्वभाव अ्रति उग्र होने के कारण वह इन नवीन संत्कारों का सत्नल उदथोपक 
बना। नर्मद अर्थात्‌ वातावरण में होनेवाले परिवर्तनों की यलना देने 
बाला अचूक “ब्रैरोमीट्र” परन्तु पारे की तरह उसकी समस्त भावनाएँ 
आसपास के वातावरश पर ही अवलंबित रहती हों, यह जात न थी । 
समग्र ने उसे बनाया ओर उसने अपने समय को बनाने में बहुत ऋल 
सहयोग दिया है । 

इस समय अंग्रेजी शिक्षा का आरंभ नया-नया था ) लोगों को अंग्रेजी 
के कवियों की मोहिनी प्रथम ही लगी जिससे साहित्य म॑ नवीन प्रेरक 
शक्तियाँ उत्नन्न हुईं। श्रोताओं के मनोरंजनार्थ लिखे गये व्याख्यान था 
राधाकृप्ण के नाम पर रचे गये छत्लरिक यीत प्राचीन गग्याली क्र 
बंधन बचत्वर्थ, वायरन और स्कॉट के निजी भावों का प्रत्यक्ष दर्शन कराने 
वाले गीतों के मोह के श्राग शिथिल हो गये और श्ााच्मलत्षी कविता का 
आरंभ हुआ | 

और आत्मलक्षी कविता के युग-द्वार खोलने के लिए नर्मद पृण॑तया 
योग्य था। ऊपर बताये गये नवीन संस्कारों का वह सब्रस सबइल 
उद्घोषक था। उसी प्रकार कविता लिखने का आरंभ भी उसने अपनी 
मनोव्यथा हलकी करने के लिए किया था। 'कविता कहिये कल्पना, जन- 
मन रंजन जान” कविता की व्याख्या उसने इस प्रकार नहीं की थी | 
उसे श्रोताओं को प्रसन्न नहीं करना या, दूसरों की पर्वाह-न थी। लोकमन 
का भय न था। मन में जब पद-रचना से आनंद होता हैं तो फ़िर 
मैं यही काम करूँगा ।? ऐसा उसका निश्चय था, इसलिए उसने अपने 
आनन्द के लिए काव्य लिखने आरंभ किये। इतिदृत्तात्मक कविता का 

22००-०० + 4 छपू---- 


हि 


रेखाचित्र 


उसमें अभाव था और उसके नाटक इस बात की साक्षी हैं। अपने को 
जैसा लगे फिर चाहे वह कड़वा हो या मीठा, योग्य हो या अयोग्य तो. 
भी कहना ही चाहिए. यह उसका स्वभाव था। जो जैसा हो उसको वैसा 
ही चित्रित करने की प्रेरणा से जो न लिखना था वह भी इसने लिख 
डाला | परदेश-गमन, विधवा-विवाह, जाति-बंधन, देशामिमान इत्यादि 
उस समग्र के सभी पुरुषों का मनोमंथन करने वाले अनेक प्रश्नों ने उसके 
हृदय का भी मंथन किया और मंथन का महाफल'*थी नर्मद की कविता | 
इसी कारण नर्मद की कविता इन सुधारों का बाइबल सममी 
जाती है ।” 

इस वर्णन में कवि नरमंद की युग-प्रेरणशा तथा उसकी कबिता का 
बड़ा ही प्रभावोत्यादक चित्र हमें मिलता है। नवीन भावों को ग्रहण 
करने और उसको व्यक्त करनेवाले नमेद का स्थान अ्पूर्व है । 

किसीने कहा है, 'न्मंद कवि के रूप में महान्‌ था, साहित्यिक रूप 
में उससे मी महान्‌ श्रौर सबसे महान्‌ तो वह मनुष्य रूप में था |? ऐसे 
कितने साहित्यिक हैं जिनकी मानवता की महत्ता इस प्रकार स्वीकृत , 
की जा सके ! 

इस काव्य में कवि नरमद की मानवता की महत्ता की उद्घोषणा है 
ओर मुझे भी लगता है कि नर्मद की वात्तविक महत्ता उसके कवि में 
नहीं, वह साहित्यकार था उसमें भी नहीं, पर 'वह मानव रूप में महान 
था इसमें है । 

समाज-सुधार का मभंडा उठाना उसकी धॉँधली नहीं थी, वल्कि 
उसकी मानवता से समाज में होनेवाले अन्याय न सहे गये, इसलिए, 
उठाया था | उसकी दृढ़ आत्मा को देशवासियों के दुःख, उनका पंग-पग 
पर. होनेवाली अपमान और उस अपमान के वे खय॑ कारण-भूत थे ओर 
थे उनके दुष्ट आचरण, ऐसा लगने लगा था । वाल-विवाह ओर विधवा-विवाह 
इन सब दुःखों के मूल-कारण थे और उसमें भी विधवाओं पर होने वाले 

ब्> र्‌ ७६-- 


कै 4 


वे नमंद 

अत्याचार और उनकी करंण दशा और इसकी बजह से समान के मृल 
सें गंभीर संक्रामक रोग था | थे हमारे देशवासियों की महान्‌ पीढ़ारथ हैं, 
इनसे उद्धार न हो तब्र तक हमारा श्र हमारे समाज का किसी तरह 
भी कल्याण नहीं होने बाला, यह भी वह निश्चय मानता था | 

उसने अपनी शक्तियाँ का ग्रविकांश व्यय समाज के इस कोड 
विरुद्ध आंदोलन चलाने में क्रिया | विशेषतः विधवा-विधाह छे प्रशट 
लिए. उसने जोर-शोर से श्रांदोलन थ्आारंभ किया | 

इस बात का महत्व आज हम पूरी तरह नहीं समझ सकते । आम 
से दस-पंद्रह वर्ष पहले विधवा-विवाह का पक्ष लेने ओर विवाह करने 
वाले को कितनी विपत्ति सहनी पड़ती थी इस वात पर जरा विचार करें, 
तो थ्राज से साठ-सत्तर वर्ष पहले इस प्रश्न को हल करनेवाले का 
समाज में जीना भी श्रशक्य था, ऐसी हमे पर्ण प्रतीति होती है। झौर 
श्री बदुनाथ महाराज से वबाद-विवाद करने के लिए. जब बचारा नर्मद 
असहाय थऑर श्रकेला वहाँ गया होगा ती भाइ दवे के कह्टे अनुसार हमकी 
मार्टीन लूथर को याद हो आती है । 

इस महापुरुष में अ्रहंभाव था, कई लोग कहते है। परतु बढ़ 
आअहंभाव भी कोई निरर्थक न था। सारे गुजरात में चार अन्तर पढ़-लिसख 


4 


की कमी थी और कायरता का अतिरेक जीवन-व्यवहार की निष्पाण 


रु हा है: "हे है ह 


५ नर्थि दे रहा था| उस समय एक महापुरुष--जंसन इतना खजन किया 


इतना युद्ध अकेल हाथों लड़ा ओर अनेक थात्रात केले, उस व्यसन को 
अपनी शक्तियों का भान हो, तो इसमे अहंभाव कैसा ? निर्वोध मठुप्व 
का अहंभाव उपहासास्पद हैं। शक्तिशाली मनुष्य तो सख्ं करता दे 
अपने में करने की शक्ति है, इस ज्ञान से ही अपनी कार्य-दिशाओं तथा 
क्रियाथों का विस्तार करता है। ओर नर्मद जैस समय पुदप को अपनों 
शक्तियों का भान न हो यह कैसे हो सकता है ? 

और जैसा यह शक्तिशाली था वेसा ही उद्दार नी। उसे अर्थ छे 


जलन. १4 ३ +-+> 
डर 


रेखानित्र 


लिए अत्यन्त श्रम करना पड़ा, फिर भी उसने अर्थ-पूजा के लिए अधथे- 
पूजा नहीं की | मित्र को पुस्तक थ्र्पणु कर उसकी सहायता द्वारा अपनी 
ठिनाइयाँ आसान करने का मनोरथ, मिन्र निर्धन होने से भंग हो गया 
फिर भी सहायता मिले, ऐसे किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी कविता-पुस्तक 
अपंण न करके अपने मित्र किसनदास को ही अर्पणु की । इस बात में 
मित्रों और संबंधियों को अव्यावह्वरिकता लगी, इससे कठिनाइयाँ अनेक 
गुनी बढ़ गई, पर उसकी आत्मा की महानुभावता इससे सहख गुना अधिक 
प्रकाश देती हुईं दिखाई देती है | 
नर्मद ने एक बार अधिक व्यव करके कदाचित्‌ यथाशक्ति धन 
व्यय करके कोट बनाया और कोई मित्र मिलने आया तो उसे वह दिख- 
लाया। मित्र ने प्रशंसा की तो ऐसा कोट पहनने की श्रपन्ती अशक्ति प्रकट 
कर यह तुम्हारे लिए ही बनवाया है? ऐसा कहकर बड़े प्रेम से बनवाया, 
हुआ कोट मित्र को दे डाला | एक सम्पन्न या अच्छी स्थिति वाले व्यक्ति 
की दृष्टि में इस बात का कदाचित्‌ कुछ मूल्य न हो, पर नमंद की स्थिति 
में एक पलभर यदि अरे को रखकर सोचें तो इस आदार्य के सुन्दर 
सखखूप के दर्शन हो सकते हैं। 
नर्मद में नीति-शैथिल्य था यह बहुत से लोग मानते हैं | परन्तु उसमें 
निज की अपेक्षा उस युग का अधिक दोब था। इस समय का चित्र 
खींचते हुए. श्री विनायक नन्द्शंकर महेता “नर्मदाशंकर जीवन-चरित्र! 


। में इस प्रकार कहते हैं, 'मदिरा को निषिद्ध सममनेवाले, मुसलमान से 
छू जाने पर अपनित्र हो जानेवाले, परन्तु वेश्या के हाथ की वीड़ी पीने 


में सम्मान सममनेवाले, गानेवाली सलाम करें तो--अपनी नानी के 

व्यंग्यात्मक शब्दों में कहूँ तो--वायसराब से हाथ मिलाने जितनी खुशी 

और महत्ता समझते और सलाम के बाद यदि कहीं वह हँस दी तब तो 

मनंकमल खिल उठे और मुख सस्मित, हो जाये।? ऐसे युग और 

वातावरण में जन्म लेने और जीनेवाले, हमारी आज की दृष्टि से कदा- 
2 ड़ '्ष्टः---- 


कवि नंद 


चित्‌ सक्रिय नीति से युक्त न दिखाई दे, परन्ठ इतना तो सत्य दे कि 
नर्मद की नीति-शिथिलता केबल भोग की लालसा से नहीं जन्मी किन्तु 
उसके रसिक स्वभाव की अतृष्त स्थिति में से उद्न्न हुई थी। उसके 
स्वमाव में ल्‍्ली के रसिक सहवास की ओर इसकी प्रेरणा की एक तीज 
ज्ञवा थी। ओर उस युग में रसिकता या बुद्धि के ऊँचे स्तर पर 
विवरण कर सके, एसी स्री मिननना कटिन था इसलिए अ्रसंतुष्ट मन 
केवल बुद्धि की ऊंची मूमिका पर न रहकर नीच फिसल गया | 

नर्मद के आद्श वाबरन और दवाराम थे और अपन शार्#ा 
भी दयाराम का साम्य देखनेवाला आयने सुगगों मे भी इन करबियों का 
अनुकरण करें--अनुकरण हो सके तो-- इसमे बहत आाहचर्य जैसी बात 
नहीं है | 

नर्मद का व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक हाना चाहिए, यह उसके विष 
में परिचित ही कह सकता है । आर था ही, ऐसा उसके झीवन-चरित्र- 
कार कहते हैं। उसका दिखाव प्रमाव-दर्शक, झतनी 
उच्च प्रकार की--वश में करने जसी थी; बातचीत के विययों में विबि- 
घता: उसका ज्ञान अनेक प्रदेशों को स्पर्श करने जसा और उसकी बुद्धि 
तीकुण थी | अपने आस-पास मनुप्यों को इकटठ्ठे करने तथा मंडली जमाने 
की उसमें अद्भुत शक्ति थी। किसी भी काल वा युग में ऐसा मनुप्य 
: पूजा जाय और महत्ता प्राव्त करे इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । 

परन्तु नर्मदाशंकर की ये सब्र शक्तियों उस समय के अडान- 
काल में कई तरह से लड़ने ओर वादविवाद करने में अम्रब्यय हो जाती 
थीं। अकेले योद्दा को ग्राबात करने तथा आावबात मेलने में जीवन की 
सार्थकता लगती थी। उसका आन्दोलन एक प्रकार का न था। अंधकार 
में दवे हुए शास्रों का अध्ययन कर उसने काव्य-शक्ति का विकास किया 
था और ऐसा करते हुए, प्राचीन काल से स्वीकृत और जड़ हुए आदशों 
--काव्य-प्रदेश के आदर्शो--में उस परिव्तंत करना था । उसे लोगों 


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को अंकधारगस्त मनोदशा से जागृत करना और सदियों के भयंकर 
अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह करना था। उसे लोगों की रगरग में प्रविष्ट 
हुई भव और कायरता को निकालकर बाहर करना था और जनता का 
उद्वोधन करना था | इतना सब करने में उसने छुल-प्रपंच या अप्रा- « 
माशिकता का प्रयोग नहीं किया, किस्तु अ्यनी वरदायिनी लेखनी को 
चारों ओर तलवार की-सी तीक्षणता से घुमाया है और उससे त्रस्त 
अत्यन्त निबेल लोगों का वैर-माव' उसको अंत तक खय्का है । 

उसने बृद्वावस्था में अपने विचार बदल दिये ओर '्र्म-विचार” ग्रंथ 
का प्रणयन किया। कितने आध्रात उसके हृदय को सहने पढ़े होंगे ! 
सुधारक-संगठनों का द्रोह उसमें कितने अ्ंशों में कारण-भूत होगा ! और 
प्राचीन संस्क्ृति का आह्वान कितना प्रवल हो गया होगा ? और अपयश 
की पर्वाह किये त्रिना अपने परिवर्तित विचारों को इतने खुले रूप में 
प्रदशित करनेवाला गुजराती, गांधीजी के अतिरिक्त कोई दूसरा कदाचित्‌ 
ही दिखाई देगा। 

इसी बात को दूसरे दृष्टिकोण से देखते हुए श्री मुन्शी कहते हैं, 
“तर्मद वीर था, उसने .समाज-सुधार के लिए संब्र्ष किया, बह तत्व-द्रश 
था और उसने स्वसंस्कारों में निहित रहस्य समझा हो, इतना ही नहीं 
बल्कि 'परसंस्कारों को भुलाकर ख्वसंस्कार को पुनर्जीवन देनेवाले 
महागुजरातियों की अनंतमाला जिस अनादि काल से चली आ रही है 
* उसका यह एक मनका बन गया ।! 
.... ऐसा यह वीर और प्रेमी, नवीन गुजराती गद्य ओर पद्म का आाद्य 
लेखक जीवन के साथ जीनेवाला ओर सब को नवजीवन का द्वार 
दिखानेवाला, आत्मलक्षी साहित्य का प्रथम सर्जक इस गुजराती महापुरुष 
को अपने श्रर्व्य की नम्न अ्रंजलि अ्रपित करते हुए. मुझे आनंद होता है । 


धारा-सभा में दो दिन 





[ यह विवरण वास्तव में पूना की अंतिम धारा-सभा के समय लिखा 
गया था। शेप कुछ समय बाद पूरा किया परन्ठु तब तक धारा-समा भंग 
हो गई और कुछ कारणों से गुजरात? के प्रकाशन में विलम्ब हुआ, 
इसलिए वह लेख छुपने से रह गया था। अब धारा सभा बंहई में फिर 
था गई है और साइमन कमीशन भी थ्रभी हमारे देश में घृम रहा है, 
इसलिए यह विपय बिलकुल अ्रपासंगिक नहीं यह सोचकर प्रकाश में ला 
रही हूँ |--लेखिका ] 

थोड़े दिन हुए एक महाशय्र ने मुझसे पूछा था, यों, तम पूना 
प्र दर्शनी देखने नहीं गयीं ?? 

आश्चर्य से मेरी ऑँलें ऊपर चढ़ गई, 'श्रदर्शनी कैसी ?* पूना में 
इस समय कोई प्रदर्शनी हो रही हो यह मुझे याद नहीं आ रहा था । 

“रे वाह, बंबई सरकार ने मनुप्य-प्राणियों का जो संग्रह स्थान इनाया 
है वह अ्र्र खोल दिया गया है, वही तो !” वे महाशय ओंखें व्मिव्मित 
हुए, जोर से हँस पढ़े ! 

एक मिनट विचार करने पर मुझे ख्याल आया कि ये महाशय 
हमारी धारा-समा की बैठक जो पूने में होने वाली हैं उसके विषय में कह 
रहे थे | ऐसी मोटी बुद्धि रखने के कारण मुझे अपने पर भी हँसी आई 
और बात वहों समाप्त हो गई । 

बंबई प्रांत की धारा-सभा यदि कोई पहले-पहल देखे तो कदाचित्‌ 
एक बार जैसा कि इन महाशय ने कहा या, कुछ वेसा ही ख्याल आये 
३ ४ मय इक 2 52072 


री मर ज््ट्राटे अअ 
पल ३०4>अी क अछा: 


रेखाचित्र 


बिना न रहे | प्रांत में कितनी जातियाँ और कितने मत हैं. इन सब्र की 
सरस से सरस माप केवल धारा-सभा को देखकर ही हो सकती है । 

इस समय की धारा-समा एक बहुत बड़ी यादगार हो गई है, बह 
कहा जा सकता है| बहुत बड़े-बड़े व्रिल इस समय समाप्त हो गये थे, 
बारडोली के ऐतिहासिक सत्याग्रह में उसने अंतिम प्रकरण का समावेश 
किया पर फिर भी साइमन कमेटी के विश्वास पर प्रजापक्ष ने मजबूत हार 
खाकर प्रजापक्षु मे कितनी फूट है इसका सुन्दर प्रदर्शन किया। बहुत से 
परस्पर विरोधी तत्व बाहर आये और बहुत से उस समय दबा दिये 
गये । इस समय प्रजापक्षु म॑ अंग्रेज़ी कहावत के अनुसार “जूता कहाँ 
काटता है? यह ठीक-टीक मालूम हो गया | 


इस समय धारा-समा में कितने ही पक्ष ओर पार्टियाँ हैं, वहाँ नावकों 
का भी कुछ पार नहीं ओर उन सब नाथकों के अनुयायी होने ही चाहिए 
ऐसा भी कुछ प्रमाण नहीं मिलता [ सिंधी मुसलमानों के भुत, खुर तथा 
नूरमुहमम्द; प्रेसीडेन्सी मुसलमानों में हुसेनभाई, केरवाडा, मन्सुरी; दलितों 
के आंवेडकर, सोलंकी, वोले और अ्राह्मणों में जाबब कंबली, अंगडी, 
चिकोड़ी , आसवले; दक्षिण्ियों के चंद्रचूड़, काले ओर स्व॒राजीस्टों में, 
बालुभाई, नरीमान से लगा कर जीवाभाई तक सभी--ओऔर प्िंधी पहाला- 
जानी, जरामदास ओर नारणदास वेचर ये तीन थे; कालेशन नेशनलिस्ट 
में लालनीभाई, दादूमाई मुन्शी ओर सुरत मेंवर्स ओर सरदारों मे अपने 
शरिस्पेक्रेए और नेचरल लीइरः की तरह माने जानेबाले सरदार 
: मजमूदार इत्यादि समी नायक थे । इनमें से प्रत्येक के अनुयाबियों के 
नाम गिनाने. का साहस तो बहुत निम्न कोटि का समझा जावेगा । 


इसके वाद वसंतराव डामोलकर जैसे नियुक्त ()०४०72760) , 


सदस्य और सरकार के तो सभी मेंवर अपने को लीडर! समझते होंगे 
यह अनुमान कोई भी सहज ही लगा सकता है। इनके नावक पद के 
-+टप्ा२--०- 


"4 


धारा-सभा मे दो ट्रिन 


हज] बे «., 


लिए शंका प्रकट करने का अधिकार किसी को है हूं अथवा नहीं, 
यह शंकास्पद विपयव होगा। 

इस महीने की पहली तारीख को इस धारा-समा में सरकार ने साव- 
मन कमेटी नियक्त करने का प्रस्ताव लाने का निश्चय किया था | द्रारहोनली 
के प्रश्न ने सायमन कमीशन के प्रत्ताव को विलद्नल दँक दिवाथा। नो 
भी धारा-सभा में तो गरमागरम वहस होगी ही बह सद्द ने सोच रखा था 
ओर इसी गझाशा से मुझे भी अन्त भें इस देखने का शोक हो आता | 

हम पहली तारीश को सबेर ट्रेन से रवाना हुए। ( हम! सर्दनान 
बहमानदर्शक था संपादक पद के अधिकार का नहीं पर वास्तविक बह 
हू । ) स्टशन पर स शुद्ध खादी का किनारीदार दुषद्म कंध पर शा 
हए सौराप्ट्र' के संपादक श्रीयुत अवृतलाल सेठ ओर भार्टश्राशाद्वी सादी 
पगढ़ी बादामी लंबा कीट और बृद माजों से सब्जिव श्री लालजी भाई 
तथा मितभावी ओर मीठी हँसी हँसनेवाले दा० गिल्डर भी साथ ही गये । 

इनमें श्री अमृतलाल सेठ काटियाबाड़ी हैं आर काटियाबाडी प्रज्ञा 
के पन्न में वे खूब जोर से आंदोलन चलाते है ओर राणपर की ब्रिद्िश 
सीमा में से सोराप्ट्र की रिय्रासतों पर अपने तीर कामठे चल्लाः 
हैं| एक बार सेठ बहुत ढाकग्रिय थ। आज नी हैं। पर्ल इन 


से 
ले 


पर 

विरोधी दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं, एँसा लगता है । बल े 
जैसी लोकप्रियता किसकी एकमत स्कि रुप? 

परन्तु सेटवी ने काई बड़ी स बड़ी भूल की है तो उन्होने इस लोछ- 


सख्त 


प्दिकी है जो उनकी 


प्रिवता की बालू पर अपनी '((काएटटा के भबन का निर्माण छिया है | 
इस कारग उसका संरक्ष॒ग सदेव डॉवाइल स्थिति मे रहे, यह संबनत्र 
है | वे सम को पहचानना जानने हैं, उससे लाभ उठाना नी 
ओर यही कारण है कि व सोराद्र को और अपने छो इतना ऊपर 
उठा सके हैं । 


5० ज् तीलाप >>, सच्चा स्ा। स्््रजडा और >7त >भ 
इनक स्वभाव ्र मं साखापन है; सित्रा असा हानकारक ता नहा 7« 


है ज- 2 
ट् न चु 
८ ब 


रेखाचित्र 


आदरख की तरह जरा मुँह जलाकर फिर रस लाये, ऐसा । और ऐसी 
ही तीखी और तमतमाती हुई अलंकारपूर्ण भाषा इनके 'सौराष्ट्र! पत्र का 
एक विशेष लक्षण है । 

इनका वेश श्री वल्लमभाई से मिलता है, पर अधिकतर सेठजी 
सफेद टोपी पहनते हैं और वल्लभभाई नहीं पहनते। इनमें गांभीय॑ 
होगा पर उससे अधिक इनमें अपने को फैलाने की शक्ति है। 

लालाजी भाई का व्यक्तित्व बिलकुल भिन्न प्रकार का है। ये 
महाशय पक्के राजनीतिज्ञ हैं, यह तो कोई भी कह सकता है। अपनी 
निर्धारित वस्तु को ये किसी के कहने से छोड़ नहीं देते। उदाहरणतः 
सन्‌ १६२१ में जब प्रिंस ऑफ वेल्स भारतवर्ष आये तो प्रजा ने उनका 
बायकाः करने का निर्श॑य किया पर ये अपने मत से ही डटे रहे और 
प्रजा को सहयोग नहीं दिया । 

इनका स्वभाव मीठा है, जहाँ तक हो सके किसी को अनावश्यक रूप 


से दुःख न पहुँचे, ऐसा है। ये मिजाज ब्िगाड़ना भी जानते होंगे," 


पर ऐसे प्रसंग ये बहुत थोड़े ही आने देते होंगे, जिससे इस शक्ति की 
आवश्यकता पड़े, पर प्रत्येक की चोटी अपने हाथ में रहे यह उन्हें अच्छा 
लगता है, पर इनकी सत्ताकांज्ा सहसा दूसरे भी समझ सके ऐसी 
बात नहीं है | 

ये स्वयं पक्के वैष्णव हैं और किसी के घर बा ट्रंन में पानी तक 
नहीं पीते | वहुत से राजा-रजवाड़ों को उनसे संबंध रखना उपयोगी सिद्ध 
होता होगा। इनमें आदर्शमयता नहीं है, पर सत्कार्य करने में इन्हें श्रद्धा 
है और कोई बाघा न पड़ती हो तो प्रत्येक की सहायता करना इन्हें 
अच्छा लगता है । 

धारा-सभा में इनका स्थान सम्मानपूर्ण है | ये वास्तव में प्रजा-पक्ष 
की ओर से बोलते हैं, पर सरकार पक्ष में मी इनकी अच्छी आवभगत 
है । आप को एलीशल नेशनलिस्ट--धारा-सभा में सबसे बड़ी प्रजापत्ष को 

नल ५२ टाई 


हल 


है। 


धारा-सभा में दो दिन 


पार्टी--के प्रमुख हूँ, इनकी ब्ृत्ति 'माडरेट? पक्षु से मिलती-जुलती है | 

डॉ० गील्डर बारडोली के लिए जो जॉँच-समिति नियुक्त हुई थी, 
ये उसके एक सदस्य ओर मेडिकल प्रेक्टीशनर हैं | ये महोदय अपने काम 
से खूब पैसा कमाते हैं और यथाशक्ति दूसरी बातों में छहुत माया नहीं 
मारते | स्वभाव से मीठे तथा बैयंशील लगते हैं। इनकी पत्नी भी इनके 
काम में इनकी सहायता करती है। सम्मान देना तथा प्राप्त करना इनका 
आदश लगता है। 

5० 

और ऐसे महत्वपूर्ण मनुष्य जहाँ जायें वहाँ प्रेस का भूत न हो, यह 
कैसे हो सकता है ? इसलिए. दादर तक तो ए० पी० का रिपोर्टर भी 
साथ था। दादर पर अहमदाबाद से महात्माजी से मंत्रणा करने के 
बाद आये हुए. नरीमान और सफेद दाढ़ीबाले श्री हरीमाई श्रमीन 
को ट्रेन में सवार होते देखकर वह उतर पड़ा। बह विशेष रूप से 
इन्हीं से मिलने आया था । उन्हीं के साथ गालों में गइट्रा डालकर हँसने 
वाले स्वामी आनंद भी वल्लमभाई के प्रतिनिधि रूप में ग्ाये थे । 

स्वामी आनंद के नाम से तो बुत से परिचित होंगे पर यह बाल्तव 
में कौन हू इस त्रिपय में बहुत थोड़े लोग ही जानते हैं। इन्हें स्वामी 
की उपाधि रामझृष्णु मिशन से संबंधित होने के कारण मिली है । पर 
ये भगवा कपड़े पहने हुए कोई बाबाजी होंगे यह समभने की भूल भी 
कदाचित्‌ कोई कर बैठे | मेने ऐसी भूल एक बार की थी । इनकी 
चेश-भूषा गांधीजी के सभी सिपाहियों की तरह शुद्ध सफेद खादी की 
है । ऐसा कहा जाता है कि इन्होंने यात्राएँ बहुत की ह। चोशीस घंटे 
में चाहे जिस बख्त तैयार हो सकें ऐसे सबल तन और मन इनमें 
है। वल्लमभाई और गांधीजी की गुप्त मंत्रणाओं की ये तिजोरी 
रूप हैँ। 'नवजीवन? के लिए इन्होंने रात-दिन चिंता और परिश्रम छिया 
है | अनुवाद करने में इनकी कुशलता की प्रशंसा की जाती ई और न 


 रेखाचित्र 


अधिक लम्बे और न बहुत ठिंगने ऐसे शरीर पर जिस प्रकार समुद्र के 
सेकत तट पर चिह्न पड़ जाते है उसी प्रकार हास्य चिह्नों से अंकित मुग्ब 
ओर हास्य की किरणें ब्िखेरने वाली दीपक जैसी दो आँखों से ये ठुरन्त 
ही पहचाने जा सकें, ऐसे हूं । 

श्री नरीमान का परिचय देने की कोई आवश्यकता ही नहीं | इनकी *< 
रात-दिन की प्रजा-सेवा और हारवे-नरीमान केस अ्रमी तो ताजा है। 
इनके क्कुरियोंदार मुँह पर कठोरता ओर कोमलता दोनों लिखी हुई हैं। 
कठिनाइयों के सामने ये चश्नन की तरह अडिंग और भावना के सामने 
ये विलकुल कोमल वन जाते हैं। इनके संपर्क में रहनेवाले की निर्दलता 
नष्ट हो जाती है। इनकी प्रामाशिकता और विनोद शत्रुओं पर भी प्रमाव 
डाले बिना नहीं रह सकती । ु 

श्री हरीमाई ग्रमीन इन दोनों से भिन्न प्रकार के दिखाई देते 
हैं | इनकी लंबी सफेद दाढ़ी ओर माथे पर सफेद वालों का जूड़ा और 
इनकी शुद्ध श्वेत पोशाक इनसे अपरिचित व्यक्ति को किसी संसार-त्यागी हि 
संन्यासी महात्मा का थ्राभास हो सकता है| पर सू्म दृष्टि से देखनेवाले # 
को इनका कोई भी अलंकार ये संसारी हैं ऐसा प्रकट किए हिना नहीं रह . 
सकता । इनकी बातें ओर विनोद सुनने के बाद तो यह तुरन्त कहा जा 
सकता है कि ये मरुची है| भरुची जल्दबाजी भी इनमें है | इनके हृदय 
में यथाशक्ति सत्र की मलाई करने की आकांत्षा प्रवल रूप से है । 

इन तीनों सब्जनों के आने से हमारा साथ बढ़ गया ओर हम 
बरहोली के विपय में बात करत हुए आगे बढ़े। वास्तव मेंट्रेन 
बढ़ी, हम नहीं, अथवा ट्रेन ओर हम सब्र आगे बढ़े | 

रास्ते भ॑ खबर मिली कि प्रेसीडेंट की गैलरी के पास तो नोन दिन 
पहले ही दे दिये गये थे इसलिए मुझे जगह मिलना कठिन जान पड़ा | 
अतः बारह बजे ट्रेत से उतरतें ही हम खीवे कौन्सिल हॉल की ओर 
गये | बात सच निकली इसलिए तुरन्त घर न जाकर 'विजिव्स गेलरी 

ध््डॉ 4 व्६---- 


धारा-समा में दो दिन 


के व्किट ले कर बैठ जाने में ही इृद्धिमानी जान पड़ी। चहों जगह ने 
मिलती तो शुबरात' के रिपोर्टर की तरह प्रेस गैलरी में बैठ जाने का 
विचार मन में आया था। जरा आनन्द भी आता पर वह सोमास्य तो 
ग्रात्त ही न हुआ । 

पर एक बात मजे की हुई | मिसेज गिल्डर को अपनी जगह सीपकर 
मुझे घर हो आने का मन हुआ ओर में वापस लोटी तो देखा सत्र दरब्ाते 
बंद और मेरी जगह भर गई है। सावमन कमेटी के प्रस्ताव के सम्मान 
में उस दिन गोरे और काले सियाहियों क्री एक छोटी-मी फ्रज यहां सी 
कर दी गई थी और दो बजे बाद न तो कोई बाहर से आ सकते ओर ने 
बाहर जा सके ऐसी स्थिति कर दी गई थी ओर उसपर भी सिशहियों 
का पहरा बैठा दिया गया था | सम्मत्र है, कालेज के लड़के ओर प्रेत्नक 
स्त्रियों विद्रोह कर दें तो किर वेचारें साबमन प्रस्ताव का क्‍या हो? 
पर सोॉभाग्य से प्रेसीडेंट की गैलरी से तीन बने दो तीन आदमी चले गये 
ओर मुझे जगह मिल गई | 


सें जब वहाँ पहुँची तो पहालाजानी बोल रहे थ। ये पहालाबानी 
सिंधी हूँ और सिंध के प्रतिनिधि ह। ओर बहुत से लीइरों में से ये नी 
एक लीडर औॉफ दी हाउस गिने जाते हैं। स्वभाव से अच्छे आदमी ई | 
बोलना इनके जीवन की मुख्य शआ्रावश्वकता ह। इनका भुकाव माटरेट 
पक्ष की ओर होगा पर एक्सेट्रीमिस्ों का इश्कोण भी कऋमी-कनी गप्दणग 
कर लेते हैं ओर सिक्‍सों नेसी दाढ़ी ओर स्नेहमबी मुलमंठ्रा से से 
आकरपंक लगने हैं । 

इनके बाद जो उठे उनका पूरा नाम खानवहाहुर आाइनद्राज स्य॑ 
भत्तो था। बड़ा लंबा-चो दा नाम है ओर अपने नाम को सार्थक करे ऐसा 
बोलते भी हैं | उनके भाषण का सारांश यह था कि हिन्दू मुललमान आउस 
में कटे-मरते हैं और यह विपपूर्ण लड़ाई जद होती ६ सत्र दोनों पक्का को 


न 


हि 


रेखाचित्र 


जितना अंग्रेडों में विश्वास होता है उतना अपने आस-पास के लोगों में 
नहीं होता, इसलिए अच्छा ही हुआ कि कमीशन ने किसी हिन्दुस्तानी 
को नहीं रक्खा । ये साहब कट्टर मुसलमान हैं और इनका वश चले तो 
ये संपूर्ण इथ्वी को हिन्दू-विहीन कर दें | सरकार के अतिरिक्त किसी 
दूसरे को अपना मत देने की तो इन्होंने कसम खा ली है और इनके 
अनुयायी भी इनका ही अनुकरण करते हैं । 

गैलरी में बैठे-बैठे खानवहादुर भरुत्तो (भुशे! भुतो १?) को 
सुनते हुए मुझे एक विचार आया | जब तक हिन्दुस्तान में भुत्ते, खरे 
और नूरमहम्मद रहने हैं तब तक खतंत्रता क्या कभी संभव है ! और 
खतंत्रता मिले ता किसे मिलेगी ! इन्हीं अकेलों को, हमें नहीं। आज मी 
जिसकी लाटी उसकी मैंस वाली बात सत्य है। लघु-मत के नाम पर 
मुसलमानों को बहुमत वाले अलग प्रान्त चाहिए तथा अधिक सीयदस 
चाहिए और जहाँ हिन्दुओं का बहुमत हो बैस प्रान्त अलग हो जायें तो 
मुसलमानों के प्रति अन्याय हो जाने का भय उठ खड़ा होता है। जबें?. 
हिन्दुश्रों में से हिस्ता बट्वाना हो तो “बूय॑ वर्य, व्य यूयं” * हो जाता है 
और जब अपने को कुछ करना पड़े तो बय॑ व्य और यूय॑ यूय! $ नीर- 
क्षीर की तरह अलग हो जाते हैँ | सरकार को जो अपना संत दे, वह 
सरकार की प्रिय प्रजा और क्या कहा जा सकता है ? 'राजा को शअ्रच्छी 
लगे वह रानी? नहीं तो भ्रुत्तो, खुरो और नूरमहम्मद जैसे व्यक्तियों पर 
प्रजा की मावी निर्भर रहती ! 

अब अपनी कथा आगे बढ़ने दें। 

श्री मरजवान --जामे जमशेद के अधिपति--ने इन भाई को ठीक 


* ुम हम और हम तुम? अर्थात्‌ हम तो एक ही हैं । 
+ हम हम और तुम ठुम' अर्थात्‌ हम और ठम बिलकुल अलंग- 
अलग हैं | 


धारा-समा में दो दिन 


जबात्र दिया | इन्होंने कहा कि बदि हिन्दू ओर मुसलमान इतने नालायक 
हूँ तो सारी कौन्सिल के लिये यूरोपियन सदस्यों को ही चुन लिया जावा 
करे तो इसमें क्या बुराई है ? थे लोग हिन्दुस्तानियों की मलाई के लिए 
> राज्य किया करेंगे | इनका दूसरा विरोध भारतवासियों को भंगी-चमार 
समझकर कमीशन से दूर रखने के संत्रंत म॑ था। 
गैलरी में मरे पास बैठे हुए एक पारसी भाई ने रुमसे पृद्धा, ' 
सूरता मबस हूं क्या ?? 
इसी समय श्री भीममाई दरवाजे से दाखिल हो रहे थे] उन 
ओर संकेत कर मेंने कहा, बह सूरती कीरमची पगझी पहिन छर दपद्ठा 


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हिलाते चले आ रहे हैं। सूरत के ये बहुत बड़े आदमी है, दूसरे 
शिवदासानी जो उस बेंच पर सफेद कोट पतलून में टढ़ी थाई लगाये 
त्ैठ हैं वे और तीसरे मि० दीक्षित यहाँ दिखायी नहीं देते | 
गुजरात के मंबरों को और उसमें मी विशपतया सूरत के इन तोव 
८ मेंबरों को गवर्नर ने इस समय बहुत दुखी कर डाला ह। जिस बात में 
इनकी सलाह उसने पहले नहीं मानी उस शरहोली के बरे में समस्या 
बहुत उलक गई और सारे गाँव का भार उसने इनर सर पर टाल 
दिया आर एकदम धमकी देते हुए गवर्नर ने भाषण दिया कि चोदह 
दिन में बारहोली का निर्णय यदि तुम न,कर नरे ओर शरडोली 
शरण में न आया तो में फिर सख्त कार्रवाई करूँगा। अरे माई, ये 
जब तुकसे कहने आये थे ओर त्याग-पत्र दे दिया था, तश न तो जचूने 
इनके साथ कोई फैसला किया और तेरे कर्मचारियों ने जब इननी दांत 
बढ़ा दी तो न तूने उनसे कुछु पूछा आर न उनकी सलाह शोर जद्द 
लड़नेबाले लड़ने के लिए. ओर मरनेवाले मरने के लिए. नयार हो 
तो बेचारे सूरती मेंचरों के सिर पर गाँव मर का भार रुखन 
तमे कहॉँ से सूकी १? पर यह उससे कहे कान ? ओर इतने चढ़े काद्रमी 
ने कहा इसलिए यूरती मंत्रस भी सत्र भार अपने सिर पर समककर फ 


724 ?॥ 
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रेखाचित्र 


लगे | पर इन मंबसों की कथा लंदी है। इनको भी खूब कसौटी पर 
कसा गया हैं और जो इन्होंने किया वह किसी से होता भी नहीं । इन्होंने 


वबारडोली के सेब्लमेंट! में यथाशक्ति जो परिश्रम किया उसकी प्रशंसा 


करने के शिक्षाचार का पालन करना हमारा धर्म है | 
समय श्री मरजबान अपना भाषण समाप्त कर चुके थे और 
श्री हुसनमाई बोल रहे थे। ये हुसैनमाई बंबई के हैं, जाति-मभेद की. 
भावना से रहित कुछ गिने-चुने मुसलमानों में से एक हैं; खराजिस्ट हैँ, 
हारवे-नारीमान केस के समय श्री नारीमान की इन्होंने खूब सहायता 
की थी। इस समय भी इनका अ्रभिप्राय प्रजापक्ष में, कमेटी .नियुक्त न 
करने के पक्क में था। | 

इसके बाद आये खाँसाहब मन्सुरी | आप अहमदाबाद के, देखने में 
मोटे, ठिगने ओर सॉवले हैं। इन्होंने कमीशन के पक्तु में मत देने के: 
लिए लिखा हुआ भाषण पढ़कर अपना दुःखदायक कतंव्य समाप्त किया 
आर उसके बाद श्री जाधव की पार्दी के कोई श्री नवल ने अत्राह्मणों को. 
भी इसी मार्ग से जाना टीक वतलावा । 

श्री जे० बी० पिटी- का भाषण अच्छा खासा और टीक था। इनके. 
लिए, कहा जाता है कि ये महाशय पंखे ओर आइस के ब्रिना जीवित 
नहीं रह सकते | हो सकता है, पर कॉन्सिल में भी ये गरम दल के 
प्रतिनिधि नहीं । गुजरात कदाचित्‌ इन्हें जाइजी पिटीठ के पति रूप में या: 
मीठी बहेन पीटी: के मोौसाजी के रूप में अधिक जानती होगी । चहुत 
अंशों में इन्डियन डेलीमेल”ः नामक पत्र इन्हीं की संपत्ति है। श्री 
नव्राजन इसके अधिपति हूँ। यह पत्र सुन्दर अक्षरों में छुपता है ओर 
हेरल्ड” तथा क्रानीकल” तो इसके आगे गरीबों जैसे दिखाई देते हूँ ॥ 
परन्त इसके लेख वास्तव में ऐसे होते हैँ कि नरम से नरम दल वालों 
के गले उतरें अथवा अंग्रेजों के दृष्टिकोश 'से लिखे गये हों | हो सकता 
है, यह धनिकों का प्रतिनिधि भी हो । 

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[४ ] 
पीटाट के बाद बोले शीवदासानी, प्रस्ताव था सायमन कमेटी का, 
परन्तु ये बोले वास्तव में बारदोली पर और उसके बाद बारी आई श्री 
स्वामीनारायण की | 
श्री स्वामीनाराबण को कोन नहीं जानता ? इनकी गोली और इनके 
बोलने की रीति, इनका वेश और इनके पहनने का दंग, इनके विचार 
और उन्हें प्रदर्शित करने की रीति, थे सब कुछु कवि के शह्दों में अनोस्े 
कहे जा सकते हैं। खेतिहर प्रदेश की संप्रर्ण संस्कृति छे आए प्रतीक 
समझे जाते हैं इससे ग्रधिक परिचय यदि किसी को चाहिये तो बह एक 
बार गणित के प्रोफेसर थर ओर जब्च कालज में थ तो नहाने की कोटठरी 
की दीवारें इनकी गणित-भक्ति का परिचय देतीं। विचारों भेंये गरम- 
दली हैं ओर ग्राजकल कोन्सिल मे खराम्य पत्क के प्रतिनिधि रूप से £ | 
श्री स्वामीनारायण को मेंने पहल-पहल अहमदाबाद में जब्र बे 
*$ द्यापीठ के प्रोफेसर थे, तो देना था | लंबे कोट में छिपी हुई खादी का 
छाटी ऊँची थोती पहने हुए. में रोज उन्हें पुल पर स जाने देखती भी 
आर कभी-कभी पुल पर विद्यार्थियों को एकत्रित कर भाषण भी देने ले 
जाते | किसी का कहना था कि ग्रेमानंद की तरह उन्हांन भी व्वराज्य न 
मिले तब तक आठ दिन में एक ही आर हजामत बनवाने की प्रतिश कर 
ली है | यह बात बहुत व५ पहले को है। प्रोफेसर महोदय ने अपना 
लाल इंडा सरकार पर आजमाना जारी खखा-पर हमेशा की तरह 
से नहीं--इसलिए इनके जैसे ही ग्राय मीरमहम्मद बलोच (खराजिस्ट 
साहब बैठने की जगह कितनी घरें इस विषय में मोालाना शोकत 
साथ भी सथा कर सके, ऐस। शरीर ओर इल रखने हे 
हिन्दुस्तानी में शेरचाजी के साथ लिखकर लावा हुआ मा' 
आरंभ किया औंर विनोदी वाक्यावलि के साथ पाक नसी 
देकर कॉन्सिल को हँसी से मुखरित कर दिया । 
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कोन्सिल इस समय खूब रंग में थी और मुझे तो विश्वास था कि 
ओ सा० दादूभाई अवश्य इस समय सरकार की पीठ भाड़ने उठेंगे पर 
उसके बदले उठे श्री जोग । ये क्या वोले यह कुछ सुनाई ही नहीं दिया । 

श्री दादृभाई कौन्सिल में एक जानने योग्य व्यक्ति हैं। वड़ी चित- _ 
कवरी मूँछे, खूखा हुआ शरीर ओर सफेद कोट तथा काली योपी--यह 
इनकी हमेशा की वेश-भूया है। धीरे बोलें, धीमे चलें ओर गिन-गिनकर 
अक्षर मुख से निकालें, १र रहते हैँ सब बातों में सावधान | समी बातों में 
प्रजापक्ष का साथ देनेवाले और सरकार की धूल माड़ने का मौका 
मिले तो कभी भी न चूकनेवाले हैं | 

एक वार बात करते-करते याद पड़ता है यूनीवर्सियी बिल के 
. बाद--उन्होंने श्री मुन्शी से जो कहा था वह अभी तक मुझे याद है | 
“इस सरकार ने हमारी क्‍या समस्वा हल की ! हम अलग-अलग कई 
डिवीजन चाहते थे उसकी जात अब तय होने पर आ गई तो भी इसने 
हमारे मत की क्या कदर की ?”? सच बात है | सरकार को तो भेड़ों की हे 
घैंसान चाहिये | 

इनके विषय में इस स्थान.पर अधिक नहीं लिखूँगी, क्योंकि यदि 
में कुछ लिखूँ भी तो कोन्सिल में ञ्रियों के विरुद्ध इन्होंने, मत देने की 
धमकी दी है । ऐसे काम के आदमी के मत के बिना ब्ल्रियों को रुकना 
पड़े यह तो कुछु ठीक नहीं जान पड़ता | 

कौन्सिल का कार्य आगे बढ़ा । श्री नरीमान अच्छा खासा बोले | पर 
चास्तव में मजा तो तव आया जब सरकार द्वारा नियुक्त समासद पर 
बसंतराव डामोलकर बोले | इनके सोमाग्य से गवर्नर उस समय खास 

(र से इनका भाषण सुनने के सिए मॉजूद था ओर इससे इनको इतना 
जोश आ गया कि भारतवासियों के विरुद्ध इन्होंने इतनी कड़ी गत कह 
दी। कड़ी क्या इतनी कड़ी कि ऐसी तो अंग्रेज मी हमारे विषय म॑ नहीं 
कहते | और कौन्सिलों के मेबरों ने वीच-बीच में इनको चिढ़ाया भी खूब। 
४४-१६ ३४३४६ 


हे 


धारा-सभा में दो दिन 


ऐसी मनोदशा वाले मनुष्य इस देश में यदि थोड़े से और हों तो स्वराष्य 
की आशा आझाकाश-कुसुमवत्‌ समझना निस्संदेह सत्य है | 

सिंध के मियाँ मि० नूरमहम्मद तो इस समय सरकार के साथ हों 
तो इसमें आश्चर्य ही क्या ? ये तो हमेशा ही इसके साथ रहते हैं। झेवल 
सरकार इनकी सेवाओं की कोई कदर न करके इन्हे जलाती रहनी है 
तो कमी-कभी गुस्से मे आकर प्रजापक्त में अपना मत दे देत हैं। इस 
सेशन्स में भी मौलबी रफीउद्दीन अहमद प्रधान बनकर सम्मान पा गे 
आर ये रह गये इसलिए इन्होंने पहली धार श्रयना पानी दिखाने &े लिए 
क्रेममंटेशन व्रिल के समग्र प्रजापक्ष में बोद दिया, परन्तु इन नसों का 
सरकार से अ्रधिक समय तक रूठे रहने में काम कैसे चल सकता है ! 

फिर शाये बोलेमहाराज--सरकार द्वारा नियुक्त तथा इडिप्रेड्ट 
क्लास के प्रतिनिधि | ग्रधिक परिचय्र चाहिए तो सायमन को स्टेश 
540०, 8078/४८ (7८ए०7 कहने बाले। हों, इन्होंने भाषण में 
अवश्य ज़ेर-शोर से कहा कि नहीं में घाटा िाएहाएट छा) 
कह कर नहीं थ्राया तो किसी ने कहा कि तो क्या 7700॥7 कह झाय 

श्री त्रोले के भाषण में हिंदुशों के प्रति विरोध स्पष्ट दिग्वाई 
रहा था। इन्होंने मुक्ति का एक ही द्वार बताया और वह था सायमन 
साथ सहयोग करने का; ओर वह उन्होंने किया भी । परिणामस्वरूप 
थे कमेटी में नियुक्त भी किये गये। ऐसे चूखे, हाइन्‍चाम के इमे 
दुबले-पतले, बोले महाराज कमेटी में बेठेंगे तो लंबे, ऊंचे-पूरे अंग्रेज 
की हृथि में कहीं रह न जाये, यह भय चना रहना है | 

बोले के बाद डॉ० सोलंकी (22०ए८5८० ८355) आर फेरखाडह़ छे 


न 
दर, 


ठाकुर ने पस्ताव का समर्थन किय्रा और कान्सिल द्सर 


[५४) 


स्थगित की गई | 
सायमन कमेटी का प्रस्ताव धारा-समा में दसरे दिन भी चला छा 


च् 


प्युः * कु 


के / 


* ५ | 


० 


+-+2 (5 २०--- 


3 


रेखाचित्र 


उसके दूसरे दिन की बैठक के समय भी प्रेज्कों की गैलरियोँ पूरी तरह 
भर गई थीं । 

शुरुआत में लाल पोशाकवाले चोदबदारों के बीच चंलते हुए दहेलवी 
साहव आये और अपने आसन पर बड़े रो के साथ बैठे और सभा का ... 
कार्यक्रम आरंभ किया | ह 

सबसे पहले प्रेसीडेन्ट साहब ने उठकर श्री चिकोड़ी ( अव्राह्मण, वेल- 
गाँव ) का धारा-समभा के ओेडजनमेंट मोशन का प्रस्ताव निकाल दिया ! 

यह प्रस्ताव वारडोली पर गवनेर ने जो माषण दिया था, उसके लिए ही 

रखा गया था ओर उसमें गवर्नर के भापण पर वाद-विवाद करने कीं 
स्वतंत्रता मॉँगी थी । देहलवी साहब ऐसी स्वतंत्रता क्यों देने लगे १ 

मि० देहलवी वोल-चाल में तथा स्व्रमाव में बहुत मीठे हैं। मिठास 
भी बड़ी पकक्‍की मिठास | सबत्रकों अ्रच्छा लगे ऐसा वोलना यह कला इन्होंने 
बहुत अच्छे रंग से साथ ली है । 

ये एक वार मिनिस्टर भी रह चुके हैं। निंदक उनकी उस समय की 3 
कारंवाही की ओर शंका की दृष्टि से संकेत करते हैं, पर इसमें कु छु सत्य 
नहीं । पाक कुरान शरीफ में पेगम्बर मुहम्मद के फरमानों का वे बहुधा 
अच्षुरशः पालन करते हैं । 

आ्राज की बैठक में अविकतर भाषण दो तरह के हुए ये | कुछ तो 
तोते की तरह सिखाये हुए थे और अधिकतर लिखकर तैयार किये गये 
आफिशियल व्लाक के और मुसलमानों तथा. अत्राह्मणों के, ओर दूसरी 
ओर से परिणाम पहले से ही जाना हुआ होने पर भी अपनी छोगी-मोटी 
आवाज सुनाने तथा प्रोटेस्ट के उल्लेख की आकांक्षावाले प्रजाकीय सद्स्पों 
में सबसे पहला शंखनाद अब्दुल-लतीफ-हाजी-हजरत-खाँ ने किया और 
एडीमेन ने उनके स्वर म॑ स्वर मलाया । 

फ़िर रा० व० काले--स्वमाव से कौन जाने पर विचारों में माइडरेट- 
उठे ओर उन्होंने अपना विरोधी मत प्रदर्शित किया। श्री काले, ओ० 

नाई ४-४ 


धारा-सभा में दो दिन 


मी० प्रधान (मिनिस्टर) के बहुत बड़े मित्र होते है, ऐसा सुना दे | 
खादी की मोदी थोती ओर खादी की सफेद टोपी पहने हुए श्री वामन 


मुकादम उठे और प्रेसीडेन्ट को नमस्कार कर बाहर चले गये । अरे ! ये 
कोन हैं ! अरे, ये कोन हैं ?? मेरे पास बैठी हुई एक बहिन ने (वा भाई 
ने ठीक याद नहीं) पूछा | 

उनका नाम वामन 'मुकादम है। वे गोबरा के रहनेवाले हैं ।! 
| 

थ बामन मुकादम--पहले-पहल बंबई मे भरे वहाँ एक बार भोवन 
पर आये थे तब मेने उनको देखा था आर सब्स पहले मेरा ध्यान टनकी--- 
हमलोगों में बहत कम देखने म॑ आती न्दर डैंगलियों की ओर 
गया था | इनमे विनोदपन भी रब हैं ओर बहुत तरह से उपयोगों 
बन सके ऐसी इनमें शक्ति है, पर इन्हांने अपनी उपयोगिता ऋषने प्रांत 
के और गाँव के राजनीतिक प्रडयंत्रों के कीचड़ म॑ फेसकर बुत अंश 


५ 
रे 


में कम कर दी है। श्री हरीलाल देसाई के ये गहरें मित्र ह। सशस्सत 
बहधा वे इन्हीं के बर ठहरते हैं और वयाशक्ति इनकी मदद भी करने 
हैं| श्री जयकर जब थारा-सभा में थे तब इन्होंने पार्ग के व्हीप' रुप में 
उनकी खूब मदद की थी | 

सोचती हूँ कि तब तक इन्होंने एक्सीट्रीमिस्ट के रुप मे राजकीय 
जीवन आरंभ कर दिया था। हिमालय से गंगा प्रब्वी पर आये उर्सी 
प्रकार वे धीरें-बीरे, अधिक आर अधिक माइरेव होते गये होंगे 2? ८ 
$8 800 25 3 सिलाते; ई0प्रातिव९ ३५ था। सगट्09- इसका 


पहला आधा वाक्य उनके लिए उचित है | 


मेने 


दा 


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ड़ 


श्री मुकादम के वर्णन में मि० रघु का भाषण रह 


भारत के शुभवितक या अधिकारी रूप से नहीं, इल्कि व्यक्तियत रबर 


ल्‍ जे 


से बिल का समर्थन किया | समर्थन करते ही, क्योंकि जस इनका विशोदर 


आह 
घर 


रेखाचित्र 


करना हमारा घमम है वैसे ही इनका समर्थन करना भी धर्म है ही, इस 
धर्म का पालन करें तो इसमें आश्चय की कौन सी बात नहीं ! 

र॒यु के बाद नंबर आया श्री मुन्शी का | यहम्स की ऑँखों में खय्के 
ऐसा भाषण इन्होंने दिया ओर अधिकारी वर्ग की आँखें भी जरा ऊपर. 
चढ़ गई | इनका मापण मुझे तो सबसे सुन्दर लगता ही | परन्तु इस 
विषय में लिखते हुए मुझे पक्षपाती समझे जाने का भव लगता है। 

मुन्शी के बाद सिंध के जैरामदास उठे और वह भी अच्छे बोले । 
इनके भाषण ने मि० गुलामहुसेन की धूल माड़ दी, और टाइम्स के 
कथनानुसार सर गुलामहुसैन को /3ए900०८८४८ 8६ आ गया 
था| पर यह वात फिर होगी | इससे पहले जैरामदास का परिचय देना 
यहाँ आवश्यक है | 

धाराप्समा में गोरे, लंवे, विशाल डील-डोलवाले खादी के को5- 
पतलून में सुसज्जित, ठुरन्त ध्यान आकर्षित करें ऐसे किसी आदमी को 
यदि आप प्रजापक्ष की बेंच पर ब्रैठा हुआ देखें तो उसका नाम जैरामदास '# 
दोलतराम है, यह आपको समझ लेना चाहिए.। बोलने की शक्ति इनमें ' 
अच्छी है ओर जब ये बोलते हैं तो सभी इन्हें ध्यानपूर्वक सुनते भी हैं । 

श्री जैरामदास बहुत अनुमवी, गंभीर और चतुर हैं। इनका खवदेश- 
ग्रेम बहुत शक्तिशाली है ओर वैसा ही तिस्तृत अध्ययन इन्होंने हिन्दू- 
मुस्लिम प्रश्नों का किया है। हिन्दुओं के साथ जहाँ-जहाँ ओर जब-नब 
अन्याय होता है तो उसे देखकर इनका हृदय जल उठता है ओर धारा- 
सभा में मी लाइले बेटे? की तरह पाले जानेवाले मुसलमान माई जब 
हिंदुओं को दबाने का प्रयज्ष करते हैं तो ये उनकी घ्ष्टता को प्रकट 
करने से कभी नहीं चृकतें । 

श्री जैरामदास को स्वर्य सत्ता लेना अच्छा नई लगता, पर सत्तावालों 
के साथ क्रीड़ा करने का शौक उन्हें अवश्य होगा | शतरंज के मोहरों 
की तरह मनुष्यों को व्यवस्थित करना इन्हें अच्छा लगता है, पर इनकी 

इता+4 ६ दूत + 


रू 


४ 


घारा-सभा मे दो दिन 


संस्कारिता इनको कभी गंदे पानी में नहीं गिरने देती। मोदी की खोज 
में वे गहरे पानी म॑ उतरत तो हैं, पर प्रत्येक पानी में मोती थोड़े ही 
निकलते है १ 
सिंध के विशेष जलवायु में इनके शरीर और मन का निर्माण हथ्ा 
है ओर सिंध के दृष्टिकोण से ही वे सब प्रश्नों पर मनन करते है। 
सिंधी मुसलमानों ने जो विषम जातिमेद धारान्सभा में ला दिया है 
उसका प्रत्याधात इनके मन पर हुआ है ओर जाने या अनजाने में जैस 
उनमे भी जाति-भावना आती गई है | 


परन्तु यह सब्र कुछ होने पर भी ये सरस ओर संस्कारी व्यक्ति है । 
[5३५] 

जरामदास दौलतराम के बोलने के बाद सर गुलामहसन उठे | शांत 
आर मीठा वोलनेबाले तथा एक समय्र के उत्ताद मिनित्टर महादव ने 
एक्रजिक्युटित कोन्सिलर के पद से पहला भायण देकर आपने वात्तविक 
स्वभाव का परिचय दे दिया | यशम्स के लिखे अनुसार इन्हें वात! का 
दौरा हो आया था और जब सब की चिंता समाव हो गई तो शअरना 
शुद्ध मुसलमानी रूप-प्रदर्श करने का मीका इन्हें मिला | इन्होंने व्वल 
पर घसे पछाड़े, अपने स्थूल शरीर के कारण बोलते-बोलते सोस चढ़ 
आई, मुह में से थूक उड़ने लगा थ्रार इनकी छोटी-डारी ओलों से 
इस्लामी चिनगारियों विशेषतः जरामदास की ओर आर सामान्व रीति से 
सभी हिंदुशोों की ओर उड़ी | परन्तु इस महान्‌ बच्ना का मृल्य किसी की 
सममभ में नहीं आया । कितने ही वाधक सदस्यों ने बीच में बोलने का 
महावाव किया और अंत में तुम मजाक करोगे तो उससे में डरनेयाला 
नहीं! इनको कहना ही पड़ा | पर ऐसे कठिन समय पर प्रेसीरेन्द दरेलर्नी 
इनकी गौरव की रक्षा के लिए दौड़े और इनके प्रति. कैसा सम्मान 
प्रदर्शित करना चाहिए इसका पाठ सब ऑनरेविल मेंबरों को पढ़ाया 

नल ६ ७४++- 


रेखाचित्र 


ऑओर-अंत में यह महात्‌ भाषण समाप्त कर सर गुलामहुसैन बैच पर 
धब्ब से बैठ गये | 

तुरन्त खड़े हुए मियाँ रफ़ीउद्दीन अहमद | ,नये मिनिस्टर--थोड़े 
समय में ही मिनिस्टर पद इन्हें खटकने. लगता है। कहा जाता है कि < 
किसी समय ये रानी विक्योरिया के मोलवी थे-। अंग्रेजी माई-बापों करे 
प्रति इनका सदभाव--अ्तिभाव--का उत्साह-बहुत समय से ज्ञात है, ओर 
उस भाव की कदर सरकार ने इनको मिनिस्टर पद देकर की है। 
इनके मस्तिष्क में मनुष्य जाति के लिए तीन खाने हैं | एक गोरी चमढ़ी- 
वाले महापुरुषों के जिनके प्रति इनके हृदय में अत्यंत मान है--दस रे पैगंघर 
मुहम्मद साहब के अनुयायी--पाक मुसलमान के और तीसरा जिनके 
लिए, इस दुनिया में कोई स्थान न होना चाहिए. ऐसे काफिरों के लिए | 
वेचारों का जन्म यदि इस युग में--कुसमय में--होने के वदले मुगलों के 
राज्य में हुआ होता तो एक-एक काफिर को ये मुसलमान बनाने का 
युस्योपार्जन कर पाते । है 

शतरंज के शौकीनों की तरह ये धारा-सभा के शौकीन थे ओर हैं 
ओर यथाशक्ति एक दिन भी गैरहाजिर न रहने के संकल्प का पालन 
करते हैं। ऐसा महान्‌ मिनिस्टर बोलने के लिए, खड़ा हो तो वह 
जातीय दृष्टिकोण के अतिरिक्त और क्या बोले ? पर 'एवन साहब? 
बोले तो कुछ सदस्यों ने गड़बड़ की । दहेलवी मियाँ को इनकी 
सहायता करनी पड़ी | 

रफ़ीउद्दीव अहमद के , बाद बालुभाई देसाई खड़े हुए। बालुभाई 
स्वभाव से तीखे ओर कड़वे हैँ वह सब मानते हें, पर हैं खराजिस्ट। 
धारा-सभा में बैठने लायक सहयोग देकर बाकी पूर्ण असहयोग करना 
इनकी नीति है। जैसे ही ये बोलने को उठे कि गांधीजी वारडोली गये! 
यह खबर गैलरी में पास बैठे हुए पड़ोसी की ओर से सुनकर में अखबार 
सेने के लिए नीचे चल दी । 


७४ 2 


धारा-सभा में दो दिन 


लीबी में इस सम थोड़े से सदत्व चार पी रहे थे, कुछ घर रद 
थे। मिलने पर प्रत्येक यही कहता यथा कि अत प्रस्ताव छा मसविध्य 
स0:7९2076 ८07टाप&07 है। कमेदी नियुक्त करने था सायमन- 
सहयोग की बातें करना व्यर्थ है | 

इस समय बेचारे जरामदास ( जरामदास दौलतराम नहीं, टादनाई 
के भाई ) टेनिस खेलने जाने का विचार कर रहे हों इस श्रद्धा 
मस्ती म॑ घूम रहे थे। इन्होंने मुझे कहीं से गांधीजी बारदोली गये 
की खब्ररवाला अखबार ला दिया शरीर फिर चले गये | 

ये जैरामदास नडिश्राद के जमींदार हईं और खेल के--विशेषत 
टेनिस के -खत् शौकीन है। देखने में अपटू्डेट, पर सखवभाव से बहुत 
अच्छे हैं। जमीदार होने के कारण इन्हें हर समय प्रजापत्ष में रहना 
मुश्किल हो जाता है, पर जहाँ तक हो सकता है, थे अपना मत प्रजाउत्त 
मे देते हैं ओर अंत मे यदि कुछु न हो सके तो तब्स्य रहने का प्रयक् 
करते है। 

इस समय ऑनरेवल सर चुन्नीलाल मह्देता चिंतातुर मुख ने झहर 
आये शरीर एक टेच्रल पर बैठे हुए कितने ही महाराष्ट्रीय सदस्यों का 
ध्यान बारदोली के झगड़े की ओर खींचा | 

श्री बल्लममाई को गुजरात के मेंवरों की ओर से थी दादुभाई ने 
उस दिन तार दे दिया था | सर चुन्नीलाल मदेता बारशेली समाधान 
के लिए बहुत प्रयक्णील थे। इनकी उस दिन की चिंता इहुन ही 
सकारण थी | सर चुन्नीलाज महेता का परिचव इस स्थान पर देना-- 
बारडोली सत्याग्रह में इनका क्या भाग रहा है, वह देखत हुए--सकारना[ 
है | फिर भी जो इनको न जानने हाँ ऐसे बहुत कम गुजराती होगे यह 
बात भी में जानती हूँ । सत्र जानते हैं कि सर चुन्नीलाल मदता ध्धिकारी 
थद पर न होते तो गुजरात रल-संकट के समय एक करोड़ रुपया कमी 
भी न मिलता श्र बारडोली प्रकरण में भी श्री हरिलाल देसाई ऊे सिर 

साय 


* - रेखासित्र: 


पर सुलह का. ताज पहिनाने की इनके मित्रोंने बहुत कोशिश की और 
बाद में यह समाधान इन्होंने. ही. किया | इस प्रकार जान-समाज. को” 
विश्वास दिलाने का प्रवत्ष करते हुए कूठा इतिहास रखना आरंभ किया, 
फिर भी समाधानी का श्रेय तो सर चुन्नीलाल को ही है। इस जमाने 
में उन्हें आवश्यक प्रचार करना न आया और फिर अपने पद 
पर उतरे तो जिस प्रकार एस्वीय के विषय में कहा जाता है कि 
जब बह प्रतान पद से उतरा तो इतने बढ़े आदमी के जाने पर एक 
पर के गिरने जितनी भी आवाज नहीं हुईं, उसी प्रकार लगभग इनके 
साथ भी हुआ । 
परन्तु उसमें इनका बहुत दोष नहीं | बंबई सरकार के अधान मंडल 
में अंदर दी अंदर इतनी ईव्या है--और उसमें भी जो व्यक्ति दूसरों 
से जरा श्रेष्ठ लगता हो तो उसे नीचे गिराने का इतना प्रयक्ष होता है--- 
कि इनके सहयोगी का संबोधन प्रयोग में लाऊँ तो इस “चुनिया? के लिए. 
ही थोड़ा बहुत स्नेह बदि दे सके तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं | 
सर चुन्नीलाल महेता चले गये तो किसी ने कहा कि 'लाल्जी- 
भाई गुलामहुसैन की धूल काड़ रहे हैं |” इसलिये में चाय पीने का 
विचार स्थगित कर तुरन्त ही इनको सुनने ऊपर गई। लालजीमाई ने 
गुलामहुसैन को खूब फटकारा, पर में जरा देर में पहुँची इसलिये मेंने 
: पूरा भाषण नहीं सुना | 
पक. [७५] 
 #: राव के बाद उठे, 'भज मिनिस्टर पद! का सतत जप करनेवाले 
+ जाधव महाराज | एक वार वे शिक्षा-विभाग के प्रधान ये और बआह्मण- 
, . अत्राह्मण की छुडी उन्होंने वहाँ खूब घुमायी थी। उस पद से हटने पर 
भी इस पद का मोह इन्हें अ्रमी तक नहीं छूथ और बिल्ली जिस प्रकार 
दध के कग्ररे की ओर निगाह गड़ाये रहे उसी प्रकार ये भी इस पद के 
लिए, ध्यानस्थ हो बैठे हैं | हरिलालभाई खिसके तो ठुरन्त उसे रपट 


ने 9 0+---+ 


जी सकल + > 
फ्र 


धारा-सभा में दो दिन 


लेने की इनकी तैयारी है । इस समय्र इनकी अपेन्षा मौलबी रफीउद्दीन 
सरकार को बहुत पसंद आये इसलिए इन्हें बहुत चुरा लगा | किन्तु यह 
समय नाराजगी दिखाने का नहीं है यह अच्छी तरह समझते है और 
- दूसरे कोएलीशन नेशनलिस्ट पार्य ने दो मिनिस्सें को धमकी दी थी, 
इनमें से कोई तो जायेगा ही ऐसी इनकी थ्राशा है इसलिए. सायमन के 
पक्त में इन्होंने भी अपनी राय दी | 
इस समय की सेशन्स में दूसरी एक बात इनके विपय में जानने 
योग्य है। अवश्य ही इस बात का इनसे संबंध नहीं, फिर भी स्त्रियों की 
बरासत का अधिकार छीन लेने का बिल इन महाशय ने ही पेश 
किया था और ख्नियों को 'बुद्धिहीन?, दूसरे के कहे अनुसार चलनेवाली 
ऐसे कई विशेषणों का प्रयोग किया था--वे सब तो मुझे याद नहीं, पर 
स्त्रियों को भविष्य में इनसे सचेत तो रहना ही चाहिए। समस्त ज्री जाति फे 
प्रति जिसका ऐसा अभिप्राय हो उसकी ओर से ज््री-प्रगति की कोई दूसरी 
“< आशा तो क्या की जा सकती है १ सौभाग्य से यह बिल सभी सदस्यों को 
ऐसा हास्थास्यद लगा कि किसी ने इसका समर्थन ही नहीं किया और 
परिणामस्व॒रूप इनको यह लोग लेना पड़ा | 
श्री जाधव के बाद एलीसन, एन्‍्डरसन फशापाओं 6३त८7 
सरदार मजमूदार, इत्यादि तथा .दूसरे कोई अव्राह्मण बोले। अब तो 
बड़ा बुरा लग रहा था। पर अंत में घंटी बजी और वोटिंग शुरू हुआ। 
मत गिनने पर***६४**“'विरुद्ध ४० मत से कमेटी नियुक्त करने का 


प्रस्ताव पास हो गया | रो 


-++-रे १ ह्‌ 2040० कक 





भाग तीसरा 


सर चिमनलाल सीतलवाड़ 





मनुष्य में बुद्धि अधिक हो ओर एक के बाद एक सत्ता की सीड़ियाँ 
चढ़ता जाय तो दुनिया की नजर में उसका जीवन सफल समम 
जाता है | पर भावनारहित बुद्धि संसार की तथाकथित सफलता के 
पार अ्रधिक नहीं जाती और सांसारी व्यक्ति विजब की चोटी पर अंत 
तक रह भी नहीं सकता। सर चिमनलाल सीतलवाड़ इस कथन फे 
जीवित उदाहरण है । 

सर चिमनलाल, सर फीरोजशाह मद्देता की राजनीतिक पाठशाला 
में लिख-पढ़कर बढ़े हुए हैं, ओर उस समग्र के संस्कारों की छाप इन 
पर इतनी अ्रधिक है कि उसके पार ये देख ही नहीं सकते । इनके समय 
का राजनीतिक जीवन अर्थात्‌ प्रार्थना-पत्रों की परंपरा ; सरकार कोई 
गलत कामून चलाये तो उसके लिए ग्रार्थना-पत्र; थोड़े अधिकार का 
टुकड़ा चाहते हों तो उसके लिए प्रार्थना-पन्न; प्रजा के दुश्खों का अंत 
करना हो तो उसके लिए प्रार्थना-पत्र श्रीर देश में या परदेश में भारत- 
वासियों का सम्मान लूय जा रहा हो तो उसके लिए भी प्रार्थना-पन् | उस 
समय की इंडियन नेशनल कांग्रेस भी प्रस्ताव पास करने तथा प्रार्थना-यत्रों 
का विवरण बनाने के अतिरिक्त और कुछ न करती थी। आज सन्‌ २६३० 
में भी सर चिमनलाल अ्रमी इस यार्थना-पत्र वाली मनोदशा से झुक्त 
नहीं हुए | हर तीसरे दिन वायसराय या गवर्नर या भारत छे मंत्री पर उनके 
अमिग्राय और यार्थना-पत्रों के विवरण अखबारों में छुपे हुए हम पढ़ते 
हैं । इनके मन हिन्दुस्तान का स्वराव्य लेने का (नहीं, में मूली होमिनिवन 

हलक र्‌ ७४---- 


डी 


रेखाचित्र 


स्टेट्स से एक कदम आगे बढ़ना भी यह अस्वीकार करते हैं.। ) .यह 
कान्टीय्यशनल मेथड है। कदाचित्‌ ये अरजियाँ श्री बिदुलमाई के कहने 
के अनुसार ऐसा न हो रह जायें? इस डर से भी इतनी जल्दी-जल्दी 
निकालते हों, या कदाचित्‌ इतनी गति से बढ़ती हुई दुनिया इनको 
बिलकुल भूल ही न जाय यह डर भी लगता हो। कुछ भी हो, पर इनके 
अभिप्राय और सरकार को दिए हुए तार प्रजा मोटे अक्षरों में लगभग हर 
तीसरे दिन छुपे हुए देखती है । पढ़ती है कि नहीं यह दूसरी बात है | 

इसका कारण यह भी हो सकता है कि चिमनलाल एक अच्छे घारा- 
शात्री हैं ओर वकालत करते-करते इनका मध्तिप्क मी एक तरफी हो: 
गया है। हाईकोट में चौंबीसों घंटे अर्जी लिखना तथा अपना एक तरफी- 
दृश्कीण विरोधी के गले में उतारना यह इनका जीवनभर का व्यवसाय 
है| हाईकोट में इनका यह व्यवसाय बहुत सुन्दर चलता है, क्योंकि तर्क 
करने में भी ये बहुत कुशल हैं और दूसरा कारण यह है कि हाईकोर्ट में 
न्याय नहीं मिलता, बल्कि पैसे ओर बुद्धि के बैर वेचे जाते हैं। इन्होंने 
भूल यह की कि ये वकील की मनोदशा लेकर ही राजनीतिक क्षेत्र में 
उतरे | वहाँ यदि धाराशालत्री की बुद्धि की सहायता लेकर भारत-माता 
के भविष्य को इन्होंने भावना की दृशि से देखा होता, तो बंबई ग्रांत में 
गांधीजी के वाद आज दूसरा स्थान इमका होता । परन्तु होता! और 
'तो? निकालना कोई आसान काम थोड़े ही है ? 

हाय ! भविष्य के इतिहास में अमर हो जाते ऐसे कितने ही अवसर 
इन्हें मिले पर इन्होंने गंवा दिये | फीरोजशाह जैसे नेता की छु्नछाया में 
इन्होंने जीवन आरंभ किया ओर बंबई के राजनीतिक जीवन में इन्होंने 
बहुत वर्षों तक राज्य भोगा, पर उस समय न तो इन्होंने प्रजा को आकर्षित . 
किया और न ही भारत के भत्रिष्य को एक कदम आगे बढ़ाया | गवनेर 
की घारा-सभा में पाँच- साल इन्होंने एकजीक्यूटिव कौन्सिल में जिताये 
ओर प्रजा के सिर पर लायड वैरेज और वेकवे की गठरियों रक््खी गईं. 

रे 68 ६--- 


का 


सर चिमनलाल सीतलवाड़ 


इनके समय में, इनके जानते हुए और इनकी सहायता से | आज तक 
इन दो विषयों में बंबई प्रांत का करोड़ों रुपया कहाँ जाता रहा यह किसी 
को खबर. नहीं | 

और बंबई यूनिवर्सिटी के वाइस चान्सलर के पद पर इन्होंने तेरह- 
तेरह वर्ष तक राज्य किया--ओऔर परिणाम? परिणाम यही कि 
यूनिवर्सिटी चल्ली ओर इन्होंने पसा क्‍्चाया। जहाँ लाखों मनुप्य ज्ञान लेने 
आते हों वहाँ यूनीवर्सिटी जैसी शिक्षण संस्था व्यवसाय के सिद्धांत पर 
चले ओर पेसा बचाय यह बात कहाँ तक टीक है ? बंगाल में एक आसुतोप 
मुकर्जी ने वाइस चान्सलर की तरह यूनिवर्सिटी शिक्षा की पूरी दिशा ही 
बदल डाली और घर-बर, गोंव-गॉँव इन्होंने शान-ग्रदीप का यथाशक्ति 
प्रकाश फैलाया । हाँ, कदाचित्‌ बंगाल की यूनिवर्सिटी इतनी पैसे बाली 
नहीं हुईं, उसका प्रदेश विस्तृत होता गवा और पैसे की कमी भी 
पड़ती गई | पर इस देश में शिक्षा के लिए सरकार ओर प्रजा के पास 
से अधिक से अधिक पैसा न ले सके वह वाइस चान्सलर किस काम 
का ? यूनिवर्सिटी केवल थोढ़े से लड़के-लड़कियों के पास करने का 
कास्खाना नहीं, यह तो प्रजा का ज्ञान-मंदिर है; और वाइस चान्सलर 
उसका मुख्य पुजारी है। इस मंदिर से प्रजा का अ्रधिक से अधिक 
भाग अपना मुक्ति-मंदिर प्रकाशित करने के लिए यदि ज्ञान-दीपक ने 
जला सके तो इस मंदिर की महत्ता कैसी ? सर चिमनलाल में बुद्धि 
है पर भविष्य में दृष्टि गड़ाने की शक्ति नहीं | प्रतिदिन का पुराना काम 
ये अच्छा करना जानते हैं; नवीम काम आरंम करना नहीं जानते और 
इसी कारण बंबई ग्रान्त को शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए 
इन्होंने वाइस चान्सलर रूप में कोई भी प्रभावशाली कदम नहीं उठाया | 
जो थोड़ा-बहुत हुआ भी हो तो उसका यश तो वर्षो से इस दिशा में काम 
करने वाले इधर-उधर के व्यक्तियों का है | 

और जब ये इस पद से अपदस्थ हुए तो इंहई सरकार ने नयी 


हि र्‌ 0909--- 


रेखाचित्र 


पसंदगी इनसे भी गिरती हुई की, इसलिए, लोगों को विशेष प्रसन्नता का 
कारण कोई नहीं मिला | बंबई सरकार के यहाँ तो मनुष्यों का दिवाला 
है | बंबई सरकार की कौन्सिल, वबंत्रर सरकार के प्रधान और बंबई 
सरकार द्वारा नियुक्त वाइस चान्तलर इस कथन के प्रत्यक्षु समर्थन हँ। 

ओर सरकार को प्रसन्न करने के इतने-इतने अ्रभिप्राय तथा इन्टर- 
व्यूज होने पर भी सरकार के वहाँ उनका क्या सम्मान है सरकार को 
इस समय जिसे अंग्रेजी में १४700ए 07८४४४४४ कहते हैं, करने के 
लिये थोड़े माइरेटरों की जरूरत है परन्तु /॥6 गाथा ज्ञ0 शा? 
तलाएडटए पीट. 80045 998 700. ए४४७८ 77 69 6ए८४. 
ओर सर चिमनलाल के अमिप्रायों के पीछे इनकी जाति के अ्रतिरिक्त 
या चार-पाँच सर कावसजी ओर जहाँगीर पीटीट जैसे माडरेटों के और 
किसका बल है? राउंडटठेब्रिल कान्फ्रेंस में जाकर ये छुछ भी कर 
आये तो इनकी स्वीकृत वातों को स्वीकार करने के लिये हिन्दुस्तान का 
आज एक भी मनुष्य तैयार है ? डोमिनियन स्टेट्स या इन्डेपेंडेंस आयेगी 
तो अत्याचारों के नीचे पिसे हुए लोगों के खून से आयेगी, न कि सर 
चिमनलाल सीतलवाड़ के इंय्रव्युज से । 

सर चिमनलाल से आज के लोगों को मनोदशा नहीं समझी जाती । 
इन्हें लोगों के आन्दोलन में वृफान के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही नहीं 
देता | प्रजा के हृदव में अन्यायों के विरुद्ध जो आग जलती है उसके 
कारणों में वे जान-बूककर गहरा उतरना नहीं चाहते | पर सच बात तो 
यह है कि सर चिमनलाल में हृदय की अपेक्षा मस्तिप्क बहुत विशाल 
है। वे खयं सुख में पले, सरकारी ओहदों पर रहे, इसलिए हजारों 
युवक -जो यदि दूसरे देशों में पेदा हुए होते तो देश के ओर राज्य के 
आमूषण होते--आज इस देश में अवसर न मिलने के कारण वेकार 
सड़ते हैं और मरते हैं, यह सूर॑ जैसी प्रत्यक्ष बात भी ये नहीं देख सकते । 
इनके पांस दूसरे का दुःख समझने वाला हृदब नहीं; . इनमें ब्रिटिश 

+>२े०८-- 


सर चिमनलाल श्षीतलवाढ़ 


एंम्पायर की भव्यता सममने का मस्तिष्क है ओर इनकी चुद्धि सदा ही 
इस भव्यता की तारीफ किया करती है। 


सर चिमनलाल में किसी को मित्र बनाने की शक्ति बहुत कम 
है। ये अपने दृदय में किसी को जगह देते नहीं और किसी के हृदथ में 
इनके लिए. जगह है नहीं। इनका स्वभाव मौजीला है और मजा करना 
इनको अच्छा लगता है। पर इनके अ्ंतःकारण का अहंकार केवल 
एक ज्ञण अ्रतिरिक्त अधिक देर तक नहीं टिक पाता | इनकी बुद्धि के प्रति 
श्हुतों के दृदय में सम्मान है; घाराशात्नी की तरह कानुन की गुत्यी 
सुलमाने में इनकी शक्ति के लिए भी दो मत नहीं; इनका वात करने का 
टंग श्रच्छा है और उसमें हमेशा विविधता रहती है | इनकी आनन्दोमादक 
संगति में ज्ञान और आनंद दोनों मिले बिना नहीं रहते । 
परन्तु इतना होने पर भी इनमें ओर सामान्य मनुष्यों के बीच एक 
बढ़ी दीवार है| इनका अस्पश्य॑ और अलग रहनेवाला खभाव केवल 
सम्मान का श्रधिकांरी है, प्रेम का नहीं । 
सर चिमनलाल व्यावहारिक दुनिया में चालब्राज समझे जाते हैं | 
किसी के सुख-दुःख का इनके वर्ष जैसे मस्तिष्क पर कदाचित्‌ ही सं 
होता हो और फिर भी ये हृदयहीन हैं, यह नहीं कहा जा सकता । और 
यह दृदय आसानी से किसी के सामने खुल सके यह बात भी नहीं है। 
जन्म मर अलग रहने के संस्कारों में पली हुईं इनकी दूर रहने की 
आदत आज किसीको इनका मित्र हो जाने दे, यह सम्भव नहीं। 
युवावस्था में और सत्ता के शिखर पर होने से कदाचित्‌ मित्रों की 
आवश्यकता न पड़ी हो | आज बुढ़ापे में--जीवन की ,संघ्वा के घूँ घले 
प्रकाश में---इनको बात करने के लिए, अपने को समझ सके ऐसे किसी 
मित्र की आवश्यकता इन्हें न पड़ती होगी | पड़नी चाहिये, यह में मानती 
हूँ । और अपने अंतःकरण का अकेलापन दूर करने के लिए सर 
चिमनलाल ने जीवन भर जो नहीं किया वह आज कर रहे हूँ । वे 
रे 9 ६--- 


रेखाचित्र 


प्रत्येक शनिवार को रेसेस में जाते हैं, खाने-पीनें पर मित्रों को निमंत्रित 
करते हैं | दुनिया के प्रति दिखाई देनेवाला निर्वेद इन्होंने थोड़ा-बहुत 
उतार डाला है। लोग इनमें केवल सर चिमनलाल के नवीन परिवर्तन 
के दर्शन करते हैं। मुझे इनमें केवल मानव-हृदय की मैत्री की खोज के 
अतिरिक्त ओर कुछ दिखाई नहीं देता। 

जितनी आसानी से सर चिमनलाल पैसा क्रमा सकते है उतनी ही 
आसानी से खर्च भी कर सकते हू या नहीं यह मेरे ज्ञान के बाहर की 
बात है | पर ऊँची-नीची तो इन्होंने भी देखी है और इनके अतिरिक्त 
कोई दूसरा मनुष्य हो तो हिम्मत हार जात, ऐसी गिरी हुई दशा के 
विरुद्ध भी बुढ़ापे में इन्होंने जिस बहादुरी से लड़ाई लड़ी है उसके लिए 
प्रशंसा के सिवाय और क्या कहा जा सकता ! 

इनका जीवन उज्ज्वल हो सकता है, पर महान्‌ नहीं | महान्‌ होने के 
इनमें सभी लक्षण थे; केवल इनकी इच्छा ही नहीं थी। केवल इसी 
उदासीनता के कारण इतनी सुन्दर सामग्री योंही व्यर्थ न.ट हो गई। ,. 
अनंत काले के पथ पर इनके कद्म-पड़े तो क्या--न पढ़े तो भी क्या ! 


आर रोड जेल, ता० २६-७-३० 


«““-२६०-- 


श्री एम० आर० जयकर 


हिन्दुस्तान के किसी दूसरे प्रांत से कोई परदेशी मेहमान आपसे 
मिलने झ्राये अथवा किसी मित्र के यहाँ मिले, अथवा हिन्दुस्तान के दूसरे 
प्रांतों में आप जायँ और वहाँ के किसी सज्जन का आतिथ्य स्वीकर करें, 
तो बातचीत का विप्रय भारतवर्ष के बढ़े आदमी होते हैं। जिस प्रमाण 
में अतिथि तथा आतियेय बढ़े आदमियों से परिचित होंगे उसी प्रमाण में 
बातचीत का विषय भी बढ़ जाता है। बड़ा किसे समझा जाय यह 
अतिथि तथा आतिथेय के दृष्टिकोश तथा सामाजिक स्थिति पर 
अवलंबित है । 

हिन्दुध्तान में बढ़े आदमी अनेक हैँ | उनमें श्री मुक्ुंद आर० जयकर 
का नाम बहुत ऊँचे स्वर में लिया जाता है। बातचीत भी प्रधानतः 
अंग्रेज़ी मापा में होती है; क्योंकि दूसरे प्रान्तों के बीच अभी हिन्दी भाषा 
का उपयोग संभव नहीं बन सका। बातन्ब्रात में एक व्यक्ति पूछे, 
#[00 एठए [दाठज च, है, है, ]8एम४7 २2? “४९०5, ॥९ 5 9 
ए८ए ८ए[पराते प्रक्वा, वश: ॥6 2??? यह उसका बहुत ठीक और 
हमेशा का उत्तर है | बहुत से लोगों के सिर पर श्मुक विशेष की 
छाप हमेशा ही पड़ी रहती है। श्री जयकर के लिए '८०॥पा९ते ग्राशाः 
की उपाधि का प्रयोग सभी श्रादमी बातचीत करते हुए करते हू | 

श्री जयकर वास्तव में संस्कारी मनुष्य हैँ मी । इनकी दूसरी शक्तियों 
के विषय में चादे मतभेद हों, पर भारत सरकार से लगाकर प्रजा-नीवन 
में प्रेम रखनेवाला एक साधारण ग्रेज्युएट तक श्री जयकर संस्कारी मनुष्य 
हैं, यह एक स्वर से स्वीकार करते ह। यद्यपि प्रत्येक की संस्कारिता 

“+२६(६९--- 


रेखाचित्न ह 


की व्याख्या अलग-श्रलग होती है। थारा-समा में सुन्दर बोलें, मिनिस्ट्से 
के ड्राइंग रुमों में सुन्दर और तेज बात कर सके, सरकार की 
आवश्यकता के समय उसका दृष्टिकोण समझ कर अपने मुद्दे पर अधिक 
जोर न दे, पार्टियों में सुन्दर आतियेव और आकर्षक अतिथि दोनों बन 
सके--इसका नाम है संस्कारी मनुष्य--यह सरकार की व्याख्या है। 
साधारण मनुष्य, इनकी बोलने की छुव पर, इनके संगीत-ग्रेम के विषय 
में सुनी हुईं बातों पर, इनके कल्पित सुन्दर स्वभाव पर और अपने 
पड़ोसी के अभिग्राय पर से अपनी संस्कारिता की व्याख्या का निर्माण 
करता है। मित्र इनके सहवास में आकर इनको संस्कारी मनुष्य गिनते 
हैं। सब दृष्टिकोण अलग होने पर भी, एक वात ठीक है कि श्री जयकर 
संस्कारी मनुष्य हैं| परन्तु यह वाक्य अलग श्रलग रूप में इतनी बार 
सुनने में आता है कि इसका वास्तविक अर्थ ऋहुधा खो जाता है। 

श्री जयकर जन्म से और स्वभाव से (278:00:७:) अमीर---वास्तव 
में इस शब्द का पूरा-पूरा अर नहीं बैठता हैं। इनमें प्राचीन वंश-परंपरा 
आर नवीन संस्कारिता दोनों का मिश्रण हो गया है। अपना धर, जैसे 
वह किला हो, उसे सनाने में इन्हें प्रसन्नता होती है ओर विन्‍्टेर रोड का 
बंगला इनके गर्व का खास विपय है। कोई भी मेहमान इनके चित्रों, 
* इनके डाइनिंग रूम इत्यादि की प्रशंसा किये बिना न रहेगा। इस बेंगले 


. : की प्रत्येक खूबी बताने और इसकी प्रशंसा का आनंद लेने में श्री जबकर 
' को विशेष आनंद आता है | 


संगीत से प्रेम होना यह संस्कारिता की विशेषता नहीं तों एक लक्षण 
अवश्य है और वह श्री जयकर में है | ये उस्ताद नहीं, पर उस्तादी को 
परख सकें इतने संगीत निष्णात हैं और बहुधा अपना काम छोड़कर मी 
संगीत सुनने के लिए ललचा जायें इतना इनका संगीत-प्रेम या संगीत- 
निरबंलता जो कहो, वह है | | 
उन्नीस सौ अट्ठाइस कीं दिसंबर में, कलकत्ते की एक रात मुझे याद 
“-२१२--- 


श्री एम० आर० जयकर 


थआा रही है । कलकत्ते में नीमलचंद्र ने संगीत पार्ट की योजना की थी 
ओर जयकर उस समय उनके अतिथि ये। एक और ऑल पार्टीज 
कान्फरेंस में हिन्दू-मुसलमान के प्रश्न पर विचार हो रहा था, ओर हिंदू 
महासमा के प्रमुख पद से दोपहर को, श्री जबकर ने जिन्‍्ना की बार्तो को 
जर्मीदोज किया था। रात में उसी पर गरमागरम बहस चल रही थी । 
हम सब ने सोचा था कि आज जयकर पार्टी में नहीं आर्येगे, पर साढ़े दस 
बजे कि दरवाजे में श्री अयकर दाखिल हुए । 

में समझती हूँ तब भी सुन्शी ने जबकर को संगीत का आनंद अच्छी 
तरह नहीं लेने दिया। त॒म्हारे त्रिना इस प्रश्न पर कोई प्रभावशाली व्यक्ति 
वहाँ नहीं है । त॒म्हें जाना ही चाहिए | 'जयकर इच्छा न होने पर भी गये |? 
कमला देवी (च्मेपाध्याय) ने कुछ हँसी और कुल क्रोध में कहा, मेरे और 
जयकर के भाग्य की कुछ ऐसी वात है कि में जहाँ-जहाँ जयकर से मिलने 
की सोचकर थ्ााती हूँ वहीं से खिपक जाते हैँ!” पर इनका राबनैतिक 
जीवन वाध्ष्वव में वेशीलाल महेता से भी कठोर है; वह इन्हें संगीत और 
कलाकारों की संगति का आनंद कभी-कभी ही पूरी तरह भोगने देता है | 

एक सज्जन के रूप में जबकर में अनेक शुण हैं ओर महत्ता के 
मार्ग पर आगे बढ़ने की सबसे बड़ी प्राकृतिक देन बक्तृत्व कला इनको 
मिली है, फिर भी न जाने क्यों वास्तविक महत्ता के बीच सर्देव चार 
अंगुल का अंतर रहता है! महत्ता का पात्र बिलकुल झोठ तक आा 
जाने पर भी पिया नहीं जा सका हो, ऐसा श्री जयकर के त्रिपय में कई बार 
हो चुका होगा। या तो इनमें महत्ता को कड़पने का पूरा-पूरा साहस नहीं 
है या महत्ता के बिलकुल समीप तक जाने की इनको शक्ति नहीं। इनसे 
महत्ता प्राप्त करने का एक मार्ग निश्चित नहीं हो पाता | किस प्रकार की 
महत्ता चाहते हैं यह भी कदाचित्‌ टीक-टीक इनके मत्तिप्क के सामने न 
आई हो | प्रजाकीय आंदोलन की ज्वाला जब मढ़क उठी तो उसकी लपटों 
की लहरों पर तैरते हुए नेता, लगभग अमानुपी महत्ता फे अधिकारी 

आहर ९६ १२४ 


रेखाचित्र 


किनारे के मनुष्य को.दिखाई दें और तैरने की पूरी-पूरी शक्ति का अनु- 
मान लगाये बिना ही, महत्ता प्राप्त करने के लिए समुद्र में कूद पड़ें और 
ड्बने लगें तो उसमें दो॥ किसका ? ओर राजमहल की दीवार के आगे 
सत्ता.की नदियों बहती हों ओर मिलमिलाती महल की रोशनी के ज्ञीण 
प्रकाश में अग्रार्थिव गंगाजी में तैरने का मन हो यह क्या स्वाभाविक नहीं 
है ! मनुष्य के लिए सत्ता लेने और महत्ता प्राप्त करने के .दो मार्य हैं । 
एक तो लहराते हुए मानव-सागर की अ्गाव शक्तियों का वेग केल कर 
बलवान होने का, दूसरा तोप श्रोर तलवार के बल पर राज्य करनेवाली 
सरकारी सत्ता के प्रतिनिधि होने का | दोनों मार्म एकलक्की भक्ति चाहते 
हैं। जो मनुष्य दोनों ओर आकर्षित हो उसके हाथ से वास्तव में दोनों 
मार्ग निकल जाते हैं । 
आज तक का श्री जयकर का यह अनुभव है--हो सकता है। 
भूतकाल का पाठ श्री जयकर ने आज याद कर रक्खा हो ऐसा 
लगता है । 
किखु इसमें श्रीज्यकर का अधिक दोप नहीं । सन्‌ १६२१ के महान्‌ 
आंदोलन के समय प्रेक्टिस छोड़कर सत्याग्रह में सम्मिलित हुए, यह एक 
आदर्श की सिद्धि के-लिए था । शिक्षा की एक प्रजाकीय महासंस्या बनाने का 
इनका आदर्श था| प्रेक्य्स छोड़े ओर सत्याग्रह में सम्मिलित हो जायें तो 
इस संस्था के लिए आवश्यक घन तिलक-स्वराज्य-फंड में से दे देने का 
_-.. कितने ही अमुख सत्याग्रहियों ने इन्हें वचन दे दिया था, ऐसा कहा जाता 
.  है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति धर्म-परिवर्तंत करनेवाला हो तब तक उसके 
जीवन के प्रति मिशनरियाँ रुचि रखतीं ओर बड़े-बढ़े वचन देती हैं, परंतु 
घर्म-परिवतंन के बाद उसकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखती, बेसा ही 
श्री जयकर के साथ सत्याग्रह के अवसर पर भी हुआ | धमं-परिवर्तन के 
बाद, अब कहा जाबगा, मिशीनरी की-सी मनोदशा उस समय कितने 
ही सत्याग्रहियों में भी थी | दूसरा जबरदस्त आदमी होता -तो इनके बीच 
"रे १ ४--- 





श्री एम० आर० जयकर 


रहता, इनके साथ. आवश्यकता पढ़ने पर लड़ता-मकरगढ़ता ओर अपने 
आदर्श की प्राप्ति अवश्य करता, परन्तु जयकर के सुकुमार, खानदानी 
स्वभाव में डेमोक्रेसी की मोटी लातें खाने ओर विरोधी को खिलाने की शक्ति 
नहीं है | इनकी सुरक्षित कोमल आत्मा कगढ़ा करने में सदेव कॉपती 
रहती है, "रानी गाली खाब तो महल में छिप जाय” के अनुसार सत्याग्रह 
की सत्याग्रही छावनी से अपने घर के किले में छिपकर जा बेठे हैं । 

श्री जयकर से आलोचना नहीं सही जाती । इस ग्रजामतबादी थुग 
में चाहे जैसा हलका मनुष्य, चाहे जैसे अच्छे से अच्छे व्यक्ति के अच्छे 
आशय से किये हुए कृत्य की हलके से हलके विशेषणों द्वारा थीका- 
व्पिणी करने का अधिकार रखता है। यह बात थे भूल जाते हैं। थका- 
टीपणी करनेबाला जितना श्रधिक हलका होगा, उतना ही उसको गलियाँ 
का जोर अ्रधिक होगा | गाली खानेबाला जितना अधिक अच्छा होगा 
उतने उसके प्रत्येक कृत्य में कलुपता को कल्पना करनेवाले अधिक होंगे । 
प्रजा बीवन में प्रत्येक को संतोप नहीं मिलता और भूल-चूक से रास्ता 
चलने वाला भी यदि नाराज हो गया तो उसके लिए भी समाचारनयत्रों 

7र खुला है। अच्छे आदमी को बदनाम किये बिना श्राज के समा- 
चार-पत्र जीवित नहीं रह सकते, यह एक प्रस्यज्ष सत्य है। इसका एक 
छोय-सा उदाहरण लें तो श्री जवकर पर टीका-स्पिणी करने में हरल्ड के 
कितने पृष्ठ और हार्ममिन के कितने घंटे बिगढ़े होंगे ! 

सन्‌ १६२१ का यह कड॒वा अनुभव श्री जबकर ने श्रत्र भी नहीं 
भुलाबा और दध का जला हथा छाक फूँक-फुक कर पीता है 
आज मी ये सस्याग्रही लड़ाकू जवानों को देखकर दर से ही भागने है 

श्री जयकर के जीवन में सोने की थाली म॑ यदि त मम 


तो वह उनके कितने ही विरोधी हैं। गांषोदो हता को तो किसी 
से स्पर्धा हो नहीं सकती, पर मोतीलालजी की ही पहुँच स्कें---ऐसकी 
महत्ता भी अभी किसी को नहीं मिली--सहसा मिल जाब यह भी सम्मद 


रेत 


रेखाचित्र 


नहीं, ऐसा श्री जबकर को नः लगता होगा ! और श्री जिन्‍ना की गर्व 
भरी छुय प्रतिस्पर्धी रूप में इन्हें न खब्के तो फिर ये मनुष्य कहलाने 
योग्य नहीं। बढ़ी-बड़ी बातें करने तथा लाई फॉकलैंड जैसे रोब से 
चलने की श्री जिन्‍ना में एक आदत है और मुसलमानों को पुचकारले, 
जनता की तथा सरकार की दोनों की नीति के कारण इन्हें और भी 
अधिक महत्ता मिल गई है । देश में जो स्‍थान आज मोतीलालजी का 
है और उनसे भी कितने हो नीचे व्यक्तियों का है, वह भी जयकर को 
प्रात नहीं | साधारण सभा में मोतीलालजी का दरजा, श्री विहलभाई 
की तीक्षण दृष्टि और श्री जिन्ना का मिजाज बहुधा जयकर को उत्तेजित 
कर देता होगा यह हम मान लें, तो इसमें कुछ भूल न होगी [ 
आज बड़ी धारा-सभा में श्री विद्वलमाई और पंडित मोतीलालजी की 
अनुपत्यिति में श्री जबकर को अपना सोचा हुआ स्थान मिल गया है और 
श्री जिन्ना का मिजाज दिन पर दिन पुराना होता जा रहा है इसलिए 
प्रतिसर्धी होने से श्री जबकर को लीडर ऑफ दी ऑपोजीशन' का 
स्थान मिला है, इससे यह उचित होता है कि अच दुश्मन जीत लिया 
गया ! हमेशा के लिए हो यह तो श्री जयकर के मित्र अवश्य चाहेँगे । 
राउंड टेबल कारन्फोस में तो भी जयकर अवश्य जायँगे; पर आज की संधि 
के संदेशवाहक के रूप में इनका काय सफल हो या न हो तो भी सरकार 
के नवीन प्रधान मंडल में श्री जयकर को बहुत दिनों से इच्छित स्थान 
*.. मिल जायगा, यदि हम ऐसा तक करें तो इसमें बहुत अधिक तकक- 
शक्ति की आवश्यकता है, यह मुझे नहीं लगता। 

श्री जयकर ने जीवन में बहुत से अवसर खोये हैं। हिन्दू महासभा 
के प्रेसीडेंट रूप में यदि जरा अधिक कल्पना और शर्किं से काम लिया 
होता तो मालवीयनी से भी बड़ा स्थान आज इनका होता | इतनी शक्ति 
और समृद्धि के साथ यदि इन्होंने एक दैनिक पत्र चलाया होता तो 
बहुत सी शंकाएँ ये दूर कर सकते थे और यदि थोड़ी सी और अधिक 

४55२१ ६ -++ 


श्री एम० आर० जयकर 


इच्छाशक्ति प्रयोग में लाई होती तो इन्हें जीवन में सुञ्नवसरों का थ्रभाव 
न रहता । जो इन्हें आज इतने वर्ष बाद मिलेगा वह आज से दस वर्ष 
पहले मिल गया होता, पर बीती हुई तिथि तो ब्रह्मा भी नहीं बोंचते, तो 
फिर हम क्यों बॉचें ! 

श्री जयकर मित्र की तरह बहुत अच्छे हैं, पर इनकी मिन्नता का 
प्रवाह एक धारा-प्रवाही ही नहीं | आज नहीं तो कल सही, ऐसी इनकी 
मनोदशा है | कदाचित्‌ इनकी मित्रता का अ्रनुचित लाम बहुतों ने उठाया 
हो और इसी से मूल स्वभाव निशछल होने पर भी कभी-कभी शंकालु 
हो जाता हो । परन्तु श्री जयकर को अपने भावों का प्रदर्शन अच्छा 
लगता है और प्रशंसा इनको श्रप्रिय नहीं । , 

श्री जयकर के जीवन पर इनकी माता का बहुत अधिक प्रभाव पढ़ा 
है। स्वभाव से ये बातों के शौकीन और छोटी-छोटी बातों में मदद करने 
के लिए हमेशा तत्र रहते हैं। इन्हें अपने श्रास-पास लोगों को इकट्ठ 
, करना ध्रच्छा लगता है। 

किन्तु सत्र कुछ कहने के बाद इतना अवश्य है कि श्री जयकर बढ़े 
आदमी हैं, पर महान्‌ व्यक्ति नहीं । 


>रे रै ७--- 


श्री मुहम्मदअली जिन्ना 





श्री मुहम्मरअली जिन्ना के विषय में कुछ भी लिखना बहुत कठिन 
काम है। पहले तो इसके नाम का प्रयोग कैसे किया जाय यह खोज 
निकालना आवश्यक है। देखने में पीने छुः फिट ऊँचे होने पर भी 
इनकी उपाधि (5077977८)-बिन्ना'है, लहके से बोला जाय तो जीइना 
है श्रथवा अंग्रेजी में रोब में नोला जाय तो मि० जिन्‍्हा है। इस देश में 
अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी उच्चारण भी अपना लेते हैं इसलिए 
असली नाम क्या था, बहुधा यह खोज निकालना भी कठिन पड़ जाता है। 
मेरी पंचगनी की एक पारसी पड़ोसिन की उपाधि “गांधी? है पर वह मिस 
गेंडी के नाम से परिचित है ओर कोई उसको गांधी कहकर बुलाएं तो 
बढ़े अपमान का अनुभव करती है। राय का रॉय ओर ठाकुर का टैगोर 
तो हमने कब्र का स्वीकार कर लिया है । एक बार उत्तरी भारत में यात्रा 
करते हुए रेलवे गाइड में मुझे मथुरा मिला ही नहीं । मत्ना या म॒त्रा' 
के उच्चारण से समर में नहीं आनेवाला एक नाम इसी के अंदर था, 
पर यही थी मथुरा | वह स्टेशन आया और चला मी गया, तब मेरी 
समर में आया था। पर इस समय इस नाम की माथापच्ची में न 
पड़कर सुविधा के लिए हम, जिन्ना स्वीकार किये लेते हैं | 

जिबा बहुत अकड़वाज और अहंकारी मतुष्य हैं यह तो सर्व 
स्वीकृत सद्य है। ये मिजाजी ओर अकड़ कर चलने बालें किसी की 
पर्वाह नहीं करते | स्वयं किसी के सुद्ष-दुःख में भाग लेते नहीं ओर 
न अपने सुख-दुःख- में किसी को भाग लेने देते हैं और किसी के साथ 
काम करते हुए जब॒तक अपनी सर्वोपरिता स्वीकृत न करा लें तब 


रे २ ट--- 





40, 


मुहम्मदअली जिन्ना 


तक उन्हें चैन नहीं पड़ता | अंग्रेजी में जिसे 'स्नोबः कहते है ऐसों के 
साथ इन्हें स्नोबः होना आता है । अपनी ओर सम्मान से देखनेवाले 
व्यक्ति की ओर ये हँसकर खुशमिजाजी से बातें करते है | 

जिन्ना को अपने गौरव का ख्याल बहुत है, यह अनुमान इनके 
व्यवहार से लगाया जा सकता है | वे स्वयं बहुत बड़े आदमी है इस बात 
को वे सहज ही नहीं भूल पाते। प्रति/पर््न को बोलने में मात देने 
पर वह कदाचित्‌ ही वाद-विवाद करता। सच तो वह है कि उनके बोलने 
की छुय से विरोधी पक्ष सहम जाता-इनके व्यवहार से, या स्पष्ट 
तिरस्कार से अथवा लाई ब्रकनहेड जैसी गर्मी से | हो सकता है, लाई 
बकनहेड की यह बहुत कोमल आशत्ति होगी, यह भी हम मान लें तो भी 
भारत में इस प्रकार के नमूनों का अ्रमाव होने से श्री जिन्ना का एक 
विशेष स्थान है। खुदा ने मेहरबानी को कि ये मुसलमानों में पैदा हुए 
इसलिए प्रजापक्ष इनके धामिक कट्टरता से रहित स्वतंत्र मिजाज को 
पुचकारता है| सरकार को यह दिखाता है कि ऐसे स्वतत्र मनुष्य 
उसके साथ हैं | 

'में> जिन्‍ना में पहले भज्ते ही जातीयता न हो पर इनमें घोड़े से 
पिछले वर्ण से जातीयता था जाने से इनमें इतना जानने की चत्राई तो 
है ही कि यदि घारासभाओं में जाना हो और मत लेने हों तो जातीय 
दृष्टिकोण अपने काय-क्रम में अपनाये बिना काम नहीं चलता। महात्मा गांधी 
के भारत में आने के बाद, आराम कुर्सियों पर वेठकर नमंब्रदारी करने- 
वाले राजनीतिक नेता स्वतंत्र प्रजापचु से अधिक मतों की आशा नहीं रत 
सकते ओर श्री जिनना से मला कहीं खादी पहिनकर गोंव-गोँव में समदक 
कर, साधारण लोगों की तरह रहा जा सकता है ? कांग्रेस के मेंडप में 
या कावसजी जहाँगीर हॉल में प्लेव्फाम॑ पर बैठे हुए मि० जिन्‍ना के 
भाषण सुनकर लोग प्रशंसा कर जायें वहों तक टीक है। पर इससे 
अधिक लोगों के साथ समागम में आना, ये नहीं चाहते । अमीरों श्रार 


नारे१६-- 


रेखाचित्र 


वाइसरायों तथा बढ़े आदमियों के साथ पार्टी खानेवाले मि० जिन्‍ना से 
इतने नीचे उतर आना संभव नहीं और इस कारण विवश होकर 
जिन्‍ना को जातीय दृष्टिकोश अपने राजनीतिक प्रोग्राम में लाना पड़ा। 
प्रत्येक कांग्रेस में तथा ऑल पार्टीज कान्क्रेंस में श्री जिन्‍ना अपने आप 
ही मुसलमानों के प्रतिनिधि बन गये | प्रेसीडेन्ट विल्सन की तरह इनके 
प्रख्यात चौदह जातीय मुद्दे अ्रमी पुराने नहीं हुए। और वाइसराय से 
भी अधिक रोब से, देर में आकर और बीच में बैठकर, प्रत्येक को 
अपने वड़प्पन का भान कराकर, बढ़े रोच्र से बोलते, हैं (७८०।]८छ४7६7 [ 
द0 ए०0एप छ270 ६0 ६४६९ (6 82८ए८७ ८70:65 ० )४७४४०४)- 
7278 जात ए0प 67 70६0 ? ॥ एठएप 00, ए७ए ० ६6॥, 
६८86 ६76 ६76 ६६075, रिशाला767, 46ए #76 8 प८ाए 
क्‍शर07क्वा एए07707, प३ौ९४४ ए0प 8/ए6 6६० #7 (4 
प6ए पका, एठछए ८क07 72ए९ 5णथ्धा॥? बस। जब तक कि 


जिन्ता का कथन पूरा नहीं हो जाता तब तक परमेश्वर चाहे स्वयं 


अबतार लें तो भी हिन्दुस्तान को स्वराज्य दिलाये बिना ही लौगना पड़े । 


बा 


लत 


ओर मुझे याद है कि उन्नीसी अकछ्ाइस की कलकत्ते की ऑल पार्टीज ' 


कान्फ्रेंस के समय यदि श्री जिन्‍ना का ऐसा मिजाज न होता तो मुसलमानों 
की बहुत सी वातें हिंदू मानने के लिए, तैयार थे। पर जिन्‍ना का मिजाज 
देखकर लगमग आधा माग जों पंडाल में इनके पक्ष में था वह भी 
विरोधी हो गया | खुदा, मेरे मित्रों से क्‍्चाओ? ऐसी प्रार्थना मुसलमान 
यदि किसी-दिन कहेंगे तो कोई आश्रय नहीं | 
श्री जिन्‍ना चाहे जैसे भी हों पर ध्यान आकर्षित करनेवाली मृत्ति 
हैं । इनके फैशनेवल कपड़े इनको--क्या खूबसूरत लगूँगा १? 'दिखा- 
वट ठीक रहेगी ।! जवानी में दिखा चुके “अब क्या !*--अच भी दिखा- 
बटीपन है, पर कुछ पक्का होता जा रहा है| इनका रोब, धारासभा 
में इनका स्थान, इनके जीवन की कितनी ही घव्नाएँ यह सब एक प्रकार 
“-+२२०-- 


मुहम्मदअली जिन्ना 


का निराला व्यक्तित्व श्री जिन्‍ना को दे देते है | हाइकोर्ट में भी थे धन 
कमाते हैं वह एक तो केस को ठीक तरह से सामने रखने की शक्ति से 
आर दसरें जज को प्रभावित करने की शक्ति से। कोट में केस चलाते 
- समय जैसे जजों पर मेहरत्नानी करते हों, देखनेवाले को ऐसा भान 
अवश्य होता है । ओर जज भले ही नवे-नये आर्ये पर सरकार और 
प्रजा के माननीय सदृध्य तो पुराने ही रहे। ऐसे माननीय व्यक्ति को 
सम्मान देना प्रत्येक जज का कत्त व्य हो जाता है। श्री जिन्‍ना को सम्मान 
देना यह प्राचीन रूढ़ि हो गई है, ओर रूढ़ि का भंग समाज में रहनेवाले 
बहुत थोड़े ही कर सकते हैं | 
श्री जिन्‍ना बहुत प्रामाणिक व्यक्ति हैं यह अश्वीकार नहीं किया जा 
सकता । पर वह्ञी सरकार के एक बड़े अ्रधिकारी व्यक्ति ने इस प्रामाणि- 
कता की व्याख्या इस प्रकार की यी, ८ 579 हइा्शधह। गोवा), 
000 72ए४०5९, 4९ ]॥:28 ए:प९, उप वैह 5 00 ए700त 
- ६0 १0 ए:0782. शब्द ठीक न हों पर भाव वही था, और बात टीक 
भी है। श्री जिन्‍ना खूब गविए थे, पर इनका गर्व इन्हें प्रलोभनों से बचा 
लेता था। में जिन्ता, कहीं ऐसा कर सकता हूँ ?? ऐसा प्रश्न कठिन समर 
आ जाने पर अपने मस्तिष्क से पूछते हैं और मस्तिष्क इन्कार कर देता. 
नहीं जिन्‍ना ! हो सकता है, लाभ हो, पर तुम्हारे खतंत्र मिजाज और 
ठुहारी प्रतिष्ठा को यह अच्छा नहीं लगता !? तो बस, फिर जिन्‍मा वह 
बात कभी नहीं करते ओर एक बार किसी जात पर मस्तिष्क बंद हो गया 
तो फिर वह आसनी से नहीं खुलता । 
साइमन कमीशन के बहिप्कार का आरंभ भी श्री जिनमा ओर दूसरे 
एक-दो व्यक्तियों के गवे पर आशत होने से ही हुआ था, ऐसी बार्ते उन 
दिनों हवा में उड़ती थीं, पर उनमें सत्य क्या या यह तो जिस्ना अपनी 
आत्मकथा किसी दिन लिखते तो मालूम होता | तब तक सत्र जिसे 
गुप्त बात समझते हैं उसे हम भी ऐसा ही समरकें, यह हमारा धर्म है। 
“+रे३२६-- 


रेखाचित्र 


सब अच्छे आंदमी अपने धर्म का पालन करते हैं ओर हम अच्छे आदमी 
हैं इसमें किसी को शंका हो ऐसा क्‍यों किया जाय ! 

इतने वर्षों में धारा-सभा में होने पर भी श्री जिन्‍ना प्रधान क्यों नहीं 
हुए इस शंका के लिए. तो अवकाश ही नहीं। जिन्‍ना बहुत आसानी 
से फुसला ये जा सकते यह सम्मव नहीं ओर सरकार को तो आसानी 
से फुसलाये जा सके ऐसे आदमी चाहिये, ओर जिन्‍ना जैसे व्यक्ति यदि 
प्रधान मंडल में होते तो आनकल सर बी० एल० मित्तर जैसे किसी भी 
राजनीतिक रंग से रहित मनुष्य की सहायता से जिस आसानी से राज्य 
कार्य हो रहा है वह केसे होता ? हमारे यहाँ शक्ति-सम्पन्न व्यक्तियों के 
जीवन की यह करुण कथा है। दूसरे देशों में पैदा हुए होते तो राज्य- 
स्तंभ होकर खड़े रहते | इस देश में पेदा होने से उन्हें घारा-सभा की 
कुसियों अपने आत्मसंतोष के लिए सुशोभित करने में ही इन शक्तियों 
की समाप्ति हो जाती है। जहाँ तक होने का प्रश्न है, यदि बंबई सरकार 
के प्रधान मंडल में सर गुलाम हुसैन की जगह श्री जिन्‍ना होते तो कोई ९ 
फेर न पड़ता १ पर श्री जिन्‍ना में वोटिंग हाथ में रखने की शक्ति नहीं 
इसलिए किस काम के ! ओर वे यदि प्रधान मंडल में होते तो क्या 
होता यह एक प्रश्न है। 6 फ०पात 88ए6 7८८० 28 0८80, 
>प्ञ: 9 726:0९ए०॥८०६ 06870६. 


श्री जिन्‍ना का विवाहित जीवन बहुत अछुखी रहा। परन्तु यह इनके 
व्यक्तिगत जीवन की वात है। श्री जिनना के रूखेपन या कठोरता पर 
इसने कुछ प्रमाव डाला ही होगा। मनुष्य के जीवन-पुष्प की अनेक 
पंखुड़ियों हैँ और एक पंखुड़ी कुम्हला जाय तो दूसरी बहुत देर तक 
हरी नहीं रह सकती। 

ओर सुख में या दुःख में मि० जिन्‍ना का गर्वीला स्वभाव किसी 
से सहानुभूति नहीं माँगता, किसी से फरियाद नहीं करता, किसी को 

शा ५ ९ 


महम्मद्अल्ली जिन्ना 


अपने जीवन में रस नहीं लेने देता | इनकी बृत्तियोँ और इनकी भावनाएँ: 
बंद पुस्तक के पृष्ठ हैं। बहुत थोड़े से मनुष्यों को ही इसमें क्या 
लिखा है यह अनुमान लगाने का भी अधिकार है। किसी ने इनके 

> विपय में जो कहा थावह मुझे इस समय भी याद है--76& 
गरढंणीलए 8 वाया ग07 प्रीप्रशाशा >पा. ॥6 5 0६ 
कैपागका, 'ने6 48 ॥00 [0 70ए 7857८.२ /)॥०ए ए8 90६ ॥0 5 
20 गराटाधधंगहु (ए9ए४ एण07ए अपतेएगाटु.? मैंने कहा था 
ओर आज भी में यही मानती हूँ। आज प्रजा-जीवन में जिन्‍ना का जोड़ 
मिलना असम्मव है। 


>र२२६३०--+ 





सर प्रभाशंकर पटणी 





एक दिन टाइम्स ऑफ इन्डिया में पढ़ा कि राउंड टेबल कान्फेंस में 
राजाश्रों के प्रतिनिधि रूप में जानेवालों की संशोधन लिस्ट में सर प्रभा- 
शंकर पटठणी का नाम भी लिया गया था। यह नाम लिया गया था इसमें 
आश्चर्य नहीं, बल्कि यह पहले रह क्यों गया था, इसमें या। ऐसे महत्व- 
पूर्ण प्रसंग पर सर प्रभाशंकर पठणी का नाम रह गया ? जहाँ हिन्दुस्तान 
को सब्सटैन्स आफ इंडिपेंडेंस वाला डोमिनियन स्टेट्स मिलने वाला था, 
वहाँ राजाओं के अधिकारों की रक्ता बहुत आवश्यक थी, ऐसी महत्वपूर्ण 
राउंड टेबल कान्क्रे नस में सर प्रमाशंकर पटणी का नाम न हो यह हो कैसे", 
सकता है ! पर सरकार बड़ी अच्छी है और सर पटणी जाण्त हैं इसलिए 
' भूल समय पर सुधर गई इसमें आभार किसका ! खुदा का ! 
इस समय की राउंड टेच्नल कान्फेस में राजाशों के अ्रधिकारों की 
रक्षा करने वाले दो गुजराती प्रधानों के नाम दिखाई देते हैं। एक सर 
मनुभाई महेता और दूसरे सर प्रभाशंकर पटणी | दोनों नागर हैं; दोनों 
सर ह। दोनों राजनीतिक क्रीड़ा में कुशल हैं; दोनों साधारण श्रेणी से 
अधान के पद को प्राप्त हुए और राजकारंण केवल सिखने के बदले कर 
दिखाया है । दोनों संत्रंध बढ़ाने में जबरदस्त हैं। दोनों अनुभवी, योग्य 
ओर चतुर खिलाड़ी हैं । 
किन्तु यह साहश्य यहीं समाप्त हो जाता है। दोनों देखने में एक 
दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं। मनुभाई पक्के हैं पर भले दिंखाई देते हैं, 
पटणी पक्के हैं और पक्के दिखाई देते हैं। मनुभाई से मिलने जाओ तो 


--र२३--- 





सर प्रमाशकर पटणी 


नये मिलने वाले की सम्रक में नहीं आता कि इनके साथ वात कैसे की 
जाय । आप जायें तो आपकी कुशल पूछुंगे िर आपको क्या कहना है यह 
सुननेंगे । जवाब देते समय आपके वाक्य का अंतिम शब्द दोहरायेंगे और यदि 
ऐसा न हो सके तो फिर बीच में हूँ? कर आपको बात आगे बढ़ाने की 
यूचना देंगे। आपको बातें करने में जया भी मदद न करेंगे | आपकी वार्चे 
अच्छी लग रही हैं या नहीं यह भी न मालूम होने देंगे | स्वर में भलमन- 
साहत का परिचय होगा--ओऔर परिणाम ? परिणाम कुछ नहीं। सर 
पट्णी के पास जायें तो कदाचित्‌ परिणाम एक ही सा आता होगा। 
उनकी वात करनी की रीति ब्रिलकुल भिन्न हे। आप जाकर मिलें, तो मानो 
कितने ही जन्म की जान-पहचान हो इस प्रकार आप से घुल-मिलकर बार्ते 
करेंगे; आपकी बातों को नवीन दिशा देंगे और कुछ नहीं तो अंत में 
चार्तालाप को अवश्य सरस बना देंगे | 


अग्रस्तुत होने पर भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न मेरे मन में इस समय आा 
उपस्थित होता है। ये दोनों प्रधान गुजराती हैं, देशी राज्यों फे नौकर 
हैं, दोनों महत्वाकांक्षी हैँ | दोनों के बीच कभी समानताता को मानसिक 
स्पर्धा चली होगी ? अरब भी चलती होगी ! 
इतना तो अवश्य है कि सर पथ्णी के पास मनुभाई की तरह योड़ा 
बोलकर बहुत कुछ प्राप्त कर लेने की कला नहीं है। सर मनुभाई पूरी 
तरह सरकारी हैं और सदेव सरकार का दृष्टिकोण सममत कर श्रपना 
बर्ताव उसी के श्रनुसार बना लेते ईं। सर ग्रभाशंकर में अभी कदाचित्‌ 
योड़ा-सा विद्रोही स्वभाव वाकी रह गया होगा इसीलिए वे विधाता- 
सी सरकार पूरा-पूरा बदला देने के लिए. तत्पर न हों। कुछ भी हो, 
सरकार माई-ब्राप के ये दोनों लाढ़ले बेटे हैं। किन्तु यह बात हम यहीं 
रहने देते दें । 
* सर प्रभाशंकर पटणी में आकर्षक व्यक्तित्व है श्रौर उसकौ साहछी 
ह --+२२५--- 


ह 58 | 


रेखाचित्र 


श्री चंद्रशंकर परडया--आजकल कई वर्षों से सर 'पठणी के भेहमान-- 
पूरी तरह दे सकेंगे | सर पटणी का बात करने का ढंग आकर्षक और 
वाणी मीठी है, परन्तु काठियावाड़ी जलवायु में ही ऐसी मीठी वाणी पैदा 
करने की शक्ति निहित है और उसमें भावनगरी, इसलिए पूछुना. ही . 
क्या ! सर पट्णी का व्यक्तित्व विविध-रंगी है और आसानी से समस्त में 
आ सके, ऐसा नहीं | आप इनके व्यक्तित्व का एक रंग देखें और दूसरे 
क्षण ही वह आसानी से- बदलता हुआ दिखाई देगा। अंग्रेजी में जिसे 
8॥|प४४८ 92८४४0790ए कहते हैं ऐसा $छ-कुछ इनमें कदाचित्‌ हो भी॥ 
इनमें महत्ता खोजने तथा प्राप्त करने की भी शक्ति है | जाति को जिमाने 
तथा अपने आस-पास लोगों को इकट्ठा करने की शक्ति है और साथ ही 
साथ, ,,कदाचित्‌ आप न माने ...इनमें कविता रचने की भी शक्ति है। 

अब फिर तुलना करने का समव आया--ओऔर इस बार दुनिया के 
महापुरुष के साथ । यह भी काठियावाड़ी हैं और इनमें भी काठियावाड़ी 
मीठी वाणी है। गांधीजी के लिए हम यह कह सकते हैं। उनमें संत - 
कहाँ समाप्त हो जाता है और राजनीतिक व्यक्ति कहाँ से आरंभ होता 
है यह कोई नहीं कह सकता। सर पर्णी अच्छे मित्र तथा प्रजा के 
पालनहार हैं, पर इनके विषय में भी यही कहा जा सकता है। इनकी 
निःल्वार्थता कहाँ समाप्त होती है ओर स्वार्थ कहों से आरंभ होता है, यह 
समझ में नहीं आता। 

सर पटणी की महापुरुषों के साथ समता यहीं समाप्त नहीं हो 
'जाती। भोरतवर्ष में दाढ़ीवाले तीन नेता हैं ओर उनमें से एक 
ये भी हैं। शेब रह गये श्री विट्लभाई पटेल और कवि रवीद्धनांय 
वैगोरं इनके अतिरिक्त तीनों व्यक्तियों की दाढ़ी भव्यता प्रदान करंती है 
पर कविवर टैगोर की दाढ़ी से कविता करती है, इसलिये इस कलामयब 
दाढ़ी की बात रहने दीजिये और साथ में यदि व्यंग भी जाने दें तो श्री 
विद्वलभाई और-सरं प्णी में- केवल दाढ़ी की ही नहीं, .. बल्कि अनेक 

४ +र8६-- 


सर प्रभाशंकर पथ्णी 


प्रकार का साम्य दिखाई देता 'है। दोनों व्यक्ति महत्याकांत्ती और 
सत्ताकांचछी हैँ, दोनों खब्पटी हैं, दोनों अपने मार्ग के बीच कोई हो तो 
सहन नहीं कर सकते; और महत्ता दोनों की श्वास और प्राण है। थाज 
बहुत अंशों में इन दोनों व्यक्तियों की महत्ता म्रजा को लाभदायक सिद्ध 
हुईं है। परन्तु सर पट्णी ने काठियावाड़ के बदले ब्रिथ्शि राज्य में अपना 
भाग्य आजमाया होता तो क्या होता, इस विचार से मन कोंप उठता है | 
हिन्दुस्तान के राजप्रकरण में यदि ये दोनों दाढ़ीवाले साथ-साथ होते 
तो इन दोनों को अपने में समा ले और संठ॒ष्ट कर दे ऐसा कोई स्थान 
नहीं, ओर इन दोनों योद्वाश्रों की लड़ाई में वेचारे हिन्दुस्तान का 
क्या होता ? आज श्री विद्वलभाई की सभी शाक्तियाँ प्रजापक्ष में लगी हुई 
ई और कुछ नहीं तो आखिर सर पठ्णी प्रजापक्ष से सहानुभूति 
तो रखते ही हैं। दोनों व्यक्ति साथ होते तो दोनों में से एक को तो 
सत्ताकांचा की संठुर्टि के लिए सरकार के पास जाना ही पढ़ता | पर जो 
भी होता हे वह अच्छे के लिए ही होता है, ऐसा बढ़े-बूढ़ों का कथन है [ 
परन्तु इससे कहीं ऐसा न हो कि सर प्रमाशंकर को डेमोकेसी अच्छी 
लगती है, यह मानने की भूल कर बैठे । हाँ, डेमोक्रेसी इन्हें अच्छी लगती 
तो है पर वह ब्रिव्शि सीमा में; भावनयर में नहीं। वहाँ तो ये प्रजा के 
माई-बाप हैँ और प्रजा को बच्चों की तरह फुसलाते दँ--केबल प्रजा 
को ही नहीं, वल्कि राजा को भी | सब्रके साथ ये मीठा चर्ताव करते ई 
श्रौर सब को ठंडा, मीठा रखने का इनमें गुण है । ओर ऐसे रामराज्य 
में प्रजा को अधिकार ओर डेमोक्रेसी का क्या करना हैं? भावनगर 
सुराज्य है, यह मान लें तो फिर उसे स्व॒राज्य की क्या आवश्यकता पढ़ी ! 
सर पटणी अपने को प्रजा का दास तथा राज्य का नींकर समझते है । 

मुझे याद है कि इन्होंने दो-एक जगह सब के सामने भी कहा या, में 
तो बैंधघा हुआ नौकर हूँ सतंत्र लोगों को क्या शिक्षा दे सकता 
हूँ !” आज बअिटिश सरकार भी अपने को प्रजा की दासी समझती दे, 

>+२२७४--- 


रेखाचित्र 


और अधिकारियों को प्रजा के नौकर, पर राजनीतिक डिक्शनरियों में 
नौकर अर्थात्‌ सेठ ऐसा अर्थ होता है--ऐसा। किसी ने कहा था, यह 
मुझे याद है। सर प्रभाशंकर की डिक्शनरी में नौकर अर्थात्‌ नौकर या 
नौकर श्र्थात्‌ सेठ लिखा होगा | इस बात की समस्या बहुत आसानी से -. 
नहीं सुलकाई जा सकती | 

जानने योग्य एक भी मनुष्य समस्त भारत में इनको न जानता हो 
क्या यह संभव है ! सर प्रभाशंकर राजाश्रों के पूर्ण रूप से मित्र होने पर 
भी प्रजा के मित्र होने का इनका दावा है। ये सरकार के भी मित्र हैं और 
गांधीजी के भी परम मित्र हैं'*“ “यह भी जाने दें, इनके मित्रों की 
सूची तो बहुत बड़ी है और यह सूची भ्री चंद्रशंकर पंड्या की तरह 
अच्छे ढंग से में नहीं बता सकती | 


ल्‍ा 


ओर मित्रों की बात याद आते ही एक मित्र के यहाँ हम एक रात 
भोजन के लिए इकट्ठे हुए थे, यह याद आता है। भोजन करते हुए - 
चहुत-सी बातें हुईं, पर एक बात मुझे खास याद रह गई है। सर 
अमाशंकर की अपनी कही हुई बात है। 


सर प्रभोशंकर के घर का अलिखित नियम है कि स््री“वर्ग को 
राजनीति में सिर नहीं मारना चाहिए और लेडी पट्णी को किसी की 
. सिफारिश लेकर सर प्रभमाशंकर के पास नहीं आना चाहिए। एक 
: वबृद्धा के पक्ष में एक बार श्रीमती पटणी ने यह नियम भंग किया । भोजन 
करते समय सर प्रमाशंकर को अति प्रसन्न देखकर इन्होंने बात छेड़ी, 
“इतना इस वाई का काम कर दो न (१? 
सर प्रभाशंकर मिठास से बोले, “तुम्हें इस विषय में बीच में पड़ने 
की आवश्यकता नहीं, मैंने जो भी किया होगा वह. सोच-विचार कर ही 
किया होगा ।” 


श्रीमती पटणी रोब में मरकर बोलीं, पचास वर्ष से मैंने कुछ भी 
“>> रे रप्प---- 


सर प्रमाशंकर पय्णी 


नहीं मॉगा | आज इतनी-सी मेरी कही वात नही करोगे १? 

श्रीमती पठणी को कैसे समझाया जाय इस विचार में सर प्रभाशंकर 
होंगे कि इन शब्दों ने उन्हें अबसर दिया | वे खिलखिलाकर हँस पढ़े । 
सोचे श्रतुसार श्रीमती पटणी ने कारण पूछा । | 

“तुम पचास वर्ष की बात बीच में लाती हो, पर इतने वर्षो में मी 
ठुम मुझे पूरी तरह नहीं समझ सकी इस विचार से मुझे हँसीन आय 
तो और क्या हो ! अ्रकारण ही तो मैंने इस बुढ़िया के साथ श्रन्याव 
किया न होगा १” 

श्रीमती पथणी लब्जित हो गई--कदाचित्‌ क्षमा भी मांगी होंगी शरीर 
फिर कभी उनकी राजनीति के बीच में न पड़ने का वचन दिया | 

सर प्रभाशंकर वात कर रहे थे कि मुझे बीच में बोलने का मन 
हो आया, और श्रीमती पटणी यह नहीं कह सकती थीं कि पचास वर्ष की 
मैत्री तो साधारण मनुष्यों को भी बहुत-सी बात॑ और मांगें पूरी करने का 
अधिकार दे देती हैं ? पत्रास वर्ष के वेबाहिक जीवन के बाद पत्नी को 
इतना करने योग्य भी न समझे वह पति कैसा १?”*“* पर सामने बैठे 
हुए लल्लू काका ने ( सर लल्लूभाई ) मेरे सामने ओंखें निक्यर्ली और 
मैंने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया । 

इतना तो है ही कि सर प्रमाशंकर में हँसने ओर हँसाने की--दोनों 
शर्तियाँ है | इनमें विनोदइत्ति खूम है और मनुष्य की सममाने की 
कला भी'। साथ ही साथ निश्छुलता भी है। इनकी तेज ओंस छात 
करते-करते मनुष्य को मापने का प्रयल्ल करती रहती हैं । 

किसी वैज्ञानिक ने अभी मनुप्य के गुण-दोप-परीक्षा का दक्षमदर्शझ 
यंत्र कहाँ आविप्कार किया दे ! यदि किया है, तो सर प्रभाशंकर के लिए 
ऐसी कोई माप निकाल सकेगा या नहीं ! भलाई पचास प्रतिशतनरिपकछता 
नब्बे प्रतिशत, मिठास पचानर्वे प्रतिशत, महत्वाकांत्षा/” “पर जच चेक 

-+२२६०-- 


- रेखाचित्र . 


ऐसा कोई यंत्र दिखाई न दे तब तक यह माथा-पच्ची क्यों करें ! 
'मुकसे सर प्रभाशंकर ने श्रपना रेखाचित्र लिखने का निषेध किया 
है | “देखो, यह सत्र कुछ रेखाचित्र में मत लिख डालना ।” 
क्या इसका यह अर्थ तो नहीं होता कि मुझे आपका रेखालित्र 
लिखना है १” उन्होंने इन्कार कर दिया। परंतु जो कहे, उससे 
उल्य न करे तो फिर उसका नाम सत्री कैसा ! और राजनीतिक शब्द 
कोष में नहीं का अर्थ हॉ? होता है क्या यह बात संसार प्रसिद्ध नहीं है ! 

. गआआथैर रोड जेल, 

२४-७-३ ० 


हर 


--१३०-- 


'पंडित मोंतीलाल नेहरुः 


संपूर्ण जंगल के राजा जैसे किसी बूढ़े सिंह की दहाड़ जब दूर से 
सुनाई दे तो कलेजा कॉप उठता है, शरीर शिथिल हो जाता है और 
दूर रहते हुए भी उसके पराक्रम के ज्ञान से मस्तिष्क आक्रान्त हो जाता 
है, परन्तु-ग्रही-सिंह यदि.पास से देखने को मिले, उसके शियिल गात 
और तीक्ष्ण शिकारी दॉँतों का श्रमाव उसमें दिखाई दे, तो क्या जिस 
कल्पना-भय से मस्तिष्क भरा हुआ था, उतना भय उस समय लगेगा ! 
तर्कशक्ति का प्रश्न है। 

उपमा छोड़कर यदि सच्ची बात पर आये तो पंडित मोतीलालजी को 
द्रेखकर मुझे कुछ-कुछ ऐसा ही भास हुआ या। पंडितजी के श्रधीर और 
गर्वीले खमाव के विपय में मैंने बहुत सुन रक्खा या । पंडितजी की तीक्ष्ण 
बुद्धि तो संसार-प्रसिद्ध है। श्राज तक महात्मा गांधी के बाद पंडित मोती- 
लालजी का स्थान सममा जाता है, वह व्यर्थ नहीं । 

पंडितजी को पास से देखने का प्रसंग तो उस समय मिला जब वे 
गिरफ़्तार होने से पहले बंबई पधारे थे और वह भी कांग्रेस वाइस प्रेसीडेंट- 
शिप के पद से बरायकाट कमेटी की ओर से मिल मालिकों के साथ 
विचार-विनिमय करना पड़ता था और मिल मालिक उनसे मिलने श्रार्व 
तो हाजिर रहना पड़ता था, इससे और मी मिला | 

सचमुच बुढ़ापे में भी पंडितजी म॑ एक प्रकार का ऊँचा व्यक्तित्व 
था । इनमें दिखावे का शौक है, पर साथ ही प्रसंग आने पर मीठेपन से 
काम लेना भी वे जानते हैँ | इनके माधुर्य का--हुछु अंशों में काव्यमव 
माधुर्य का--एक मुन्दर प्रसंग मुझे याद है। 

ज्-२३१-- 


रेखाचित्र 


7; 


मिल मालिकों के साथ मेरी बातचीत, श्री एफ० ई० दिनशा की 
मारफत चलती और जब मैंने बंबई के एक्सचेंज मार्केट के इस राजा को-- 
बिना ताज के राजा को-मिलने के लिये बुलाया तो ये दोनों किस तरह 
मिलेंगे, इस विषय में मुफे थोड़ी चिंता थी। पहली कठिनाई तो श्री ., 
दिनशा ने ही कम कर दी और पंडितजी को जहाँ अ्रनुकूल हो वहाँ मिलने 
के लिए कहा और श्री जाल नवरोजी के यहाँ पंडितजी के स्थान पर एक 
सवेरे मिलने का समय ठहराया । ह 

उस दिन सवेरे एस्पेलेनेड मैदान की संस्मरणीय रेली थी। उस 
दिन पंडितजी को सलामी देते हुए सैकड़ों के सिर फूटे और अनेक व्यक्ति 
: घायल हुए और इस कारण से निश्चित समय पर आने में पंडितजी को 
बहुत देर हो गई | श्री दिनशा, श्री एच० पी० मोदी और लालजीमाई 
पंडितजी की उस समय प्रतीक्षा कर रहे थे । 

पंडितजी आये | कपड़े बदलते-बदलते उन्होंने खूब प्रतीक्षा करवाई। 
मुझे लगा कि इन लोगों के थैये का अंत आ जायगा | अंत में पंडितजी * 
यके होने के कारण ऊपर नहीं आ सकेंगे इसलिए नीचे ही चले, आवें,? 
यह कहलाया गया और सत्र नीचे चले गये । श्री दिनशा के खभाव 
का मुझे कुछ अनुभव न होने के कारण सुनी हुई बातों पर से मुझे 
लगा कि कदाचित्‌ इनका मिजाज वात करने के लायक न रह गया होगा | 

परन्तु सत्र बैठ गये । पंडितजी दरवाजा खोल कर बाहर आये 


: और श्री दिनशा को देखते ही हँसते हुए सामने आकर मिले ओर कहा 


४ १)॥, ए०० 2 श्ञा०णए |! ९ 8पा ए्रशंगठ्ठ ०प८ *० ४6 
. ८6506. शब्द थोढ़े, सुन्दर और छोटे थे, पर अब वातावरण बिंगढ़ने 
का मेरा भय मिल गया था| ४. 

मोतीलालजी समर्थ धाराशात्री ये। खमाव से-बहुत उग्र | या तो 
वृद्धावस्था के कारण खमाव पककर मीठा हो गया हो या मूल रूप में 
उम्रता ही कम हो गई हो, पर-इस उम्रता के दर्शन इस समय- बंबई में 


“--२३६२--- 
हे 


पंडित मोतीलल नेहरू 


भाग्य से ही किसी की हुए हों। हाँ, इतना अ्रवश्य है कि मोतीलालजी 
फो तड़क-भड़क अच्छी लगती है, किन्तु वह कांग्रेस के प्रेसीइट हैं, यह 
बात वे कदाचित्‌ सोते समय भी नहीं भूल पाते | 

चाहे जो हो, इनमें गांधीजी जैसी परिक्वता नहीं और गांधीजी 
का-सा गांभीय भी नहीं । गांधीजी संत हैं परन्तु राजनीतिश भी पूरे- 
पूरे ! न किसी को अपने जाल में न फँँसाते हैं श्रीर न किसी की जाल 
में खयं फँसते हैं यह वात भी इतनी ही सच है | प्रत्येक बात में अंत में 
गांधीजी विजयी हुए और हिमालय जैसी भूल करे! तो उद्े खीकार 
करने में लजाते नहीं । 

मोतीलालजी की बात अलग है। इनमें मानवता है, मानवता की 
कमजोरियों भी । गांधीजी को तरह इनकी आवश्यकताएँ कम नहीं थीं 
आर आवश्यक वस्तुएँ न मिले तो काम चल जाये यह बात भी नहीं | 
फिर भी बृद्धल्व, दमा और अ्रशक्ति पर विजय पाकर यह बृद्ध इच्छा- 
शक्ति के बल पर इतना भार खींचता रहा। 

' मोतीलालजी की सबसे बड़ी प्राति जवाहरलाल नेहरू हैं। हिंदुस्तान 
के इतिहास में पिता-पुत्र की ऐसी जोड़ी अर असंभव है | दोनों दृढ़ मन 
के, दोनों मिन्न दृष्टिकोणों से देखनेवाले होने पर भी इनमें शतना 
स्नेह रहा, यह भी इतिहास में एक चेजोड़ बात होगी | मोतीलालजी का 
आदर्श लोक-सत्तावाद है. तो जवाहरलाल का आदर्श मजदूर-सत्तावाद 
है। 'काम करें वह खाये, किसी को दूसरे की कमाई पर जीवित रहने 
का अधिकार नहीं।! 'काम का करनेवाला नहीं, बल्कि काम की 
सृष्टि करनेवाला, उसकी योजना बनानेवाला महान्‌ है और चाहे कोई 
भी राज्य हो वह महान्‌ रहेगा ही, जब तक मस्तिप्क की शक्तियों में 
अंतर है तव॒ तक दुनिया में भी इस प्रकार के अंतर रहेंगे ही । 
दोनों मिन्‍न श्रादर्श और मिन्‍न विचार धारा में पैदा हुए, पर दोनों 
स्नेह की एक गांठ से बैंचे हुए हैं। और फिर भी मोतीलाल नेहरू के 

आाररे रे: 


हा 


रेखाचित्र 


स्वयं खभाव के वारिस जवाहरलाल नेहरू पर भी पिछली कांग्रेस: के 
अवसर पर क्या आपखुदी का आरोप नहीं लगाया गया या १, 
वेचारे मोतीलालजी ! अब तो बहुत-सी लड़ाइरयाँ लड़-लड़कर ये... 
जर्जरित हो गये हैं | इस लड़ाई का भार खींचते-खींचते अब तो इनको « 
यकान लगती हुई दिखाई देती है| क्या मनुष्य जीवन भर 'लड़ता ही... 
रहे ! लड़ता ही रहे ? कच्र तक ? किसी दिन भी वह विश्राम ले या 
नहीं ! पर जन्म से जिसे आदत पड़ गई हो वह विश्राम ले भी तो किस 
तरह १ पहली पंक्ति का लड़नेवाला यदि अपने स्थान .पर न खड़ा हो 
जाय तो पिछली पंक्ति की नवीन प्रजा का धक्का उसे कुचल न डालेगा ! 
या तो लड़ना और था अपने को पीछे आनेवाले जवानों से कुचलवाना, 
इससे तो लड़ते-लड़ते मर जाना क्या बुरा है! 
: कैसे जाना जा सकता है कि आज की लड़ाई मोतीलालजी इस विचार 
से न लड़ते होंगे ! जो इतने वर्षों से सबसे आगे रहकर लड़े, क्या अंत 
समय में इनसे शांतिमय अंधकार में विलीन हुआ जा सकता ? लड़ने के “: 
लिए, ,शरीर में शक्ति हों या न हो, तो भी इन्हें तो अ्रंत तक 
लड़ना ही है । ' 
ओर मनुष्य के जीवन में महत्ता के भी कितने ही छण होते हैं । 
मनुष्य बड़ा होने पर भी वह चोवीसों घंटे बड़ा नहीं रह सकता | जीवन के 
सामान्य व्यवहार तो प्रतिदिन उसे भी करने पड़ते हैं; प्रतिदिन मनुष्य जैसा 
मनुष्य, खाये-पिये और सोये तथा जीवन के दूसरे व्यवहार देखे-भाले । 
इसकी महत्ता की माप इन सत्र बातों में नहीं होती, पर इन सब को प्रज्वलित 
करनेवाले थोड़े से ही प्रकाश के छ्षणों में होती है। ऐसे क्षण मोतीलालजी 


£ के जीवन में बहुत आये होंगे, यह तो हम अवश्य मान लें। आज उनकी 


सब शक्तियाँ जिनका बहुत कुछ फल उन्हें देखने कों न मिला, ऐसी 

लड़ाई करने में नष्ट होती रही हों । खतंत्र देश में ये पैदा हुए होते तो 

प्रजा के शक्ति-सश्यय में इंनंकी शंक्ति व्यय होती । शुलाव के” फूल “जंगल 
>> रे र्‌४ड लिन 


पंडित मोतीलाल नेहरू 


में उगें तो कुम्हला जायें, किसी व्रिलासी के हाथ पड़े तो मसल दिये 
जाये, मंदिर में ले जाये जायें, तो देवता के सिर पर चढ़े | फूल की जाति 
एक-सी ही है। किस स्थान पर ये जा बैठे इसी पर इनकी महत्ता का 
आधार है। मोतीलालजी की शक्तियाँ भी लड़-लड़ कर व्यर्थ जा रही हैं | 
मोतीलालजी महान्‌ व्यक्ति ह पर उनकी महत्ता उनकी अपनी होने 
की अपेक्षा उनकी परिस्थितियों के बल पर अधिक है। कौन सी 
चन्य घड़ी थी जब ये गांधीजी के हाथों चढ़े और गांधीजी के साथ 
मिले । और दूसरी शुभ बड़ी में जवाहरलाल जैसा युत्रकों का नायक 
पुत्र इन्हें मिला। जो व्यक्ति में अपना जबरदस्त व्यक्ति और 
दूसरे दो जमरदस्त व्यक्तियों की उसे चौत्रीसों घंटे प्रेरणा ! साथ ही 
पैसा कमाने की शक्ति भी जबरदस्त और उससे मोतीलालजी जो आज हूँ 
वह इन सब्र संय्ोगों के परिणामस्वरूप | मोतीलालजी अ्रकेले होते तो 
आज जैसे जिनना, जयकर हूँ उनसे अ्रधिक ऊँचे न होते | धन, प्रतिष्ठा, 
महत्वाकांज्षा, मनुष्प को बहुत ऊँचे ले जा सकते हैं, पर देश का भावी 
निर्माण करने में तो मनुष्य को प्रेरणा तथा भावी में .दूर तक देखने की 
शक्ति दोनों ही काम आती हँ--दूसरी शक्तियाँ भले ही सहायता 
करती रहें | 
आज यरवदा जेल में भारतवर्ष के भविष्य का निर्माण हो रहा है 
ओर इसके निर्माण करनेवाले हैं मोतीलालनी | समय के यान पर क्या 
समाचार आयेगा यह तो समय ही बतायेगा, पर भेरे मन में जो एक 
चाक्य आया है, वह है मोतीलालजी ! मोतीलालजी !! तुम जा रहे हो--पीछे 
मुड़कर देखते तो जाओ क्या इसमें भविष्य की कुछ दूरदर्शिता होगी ?? 
आरयर रोड जेल, 


६४-घ८-३० 


हरे रेप 


भूलाभाई देसाई 





कारखाने में काम करनेवाले. मजदूर प्र आज सारी दुनिया दया 
दिखा रही है। ओर आजकल के वातावरण में से इसे ऊपर ले जाने के 
लिए,, इसका शरीर सुधारने के लिए, इसका मन ऊँचा करने के लिए, 
इसे काम करनेवाले यंत्र के बदले जीवित मनुष्य बनाने के लिए---संक्षेप 
में इसे जीवन में कुछ ध्येब देने के लिए दुनिया के दयालु घुरुष दुनिया- 
भर में कुछ न कुछ उपाय बता रहे हैं | पर जो मनुप्य शरीर से मजबूत 
हो, पैसे से सुखी हो, बुद्धि में तीव्र हो, लोगों में प्रतिष्ठित हो, और महत्ता 
को मापने की शक्ति जिसमें हो, पर फिर भी किसी कारण से आगे के 
बढ़ सकता हो, तो उसकी दशा और भी अधिक दयनीय है--बह तोः ये 
दयालु पुरुष मानते ही होंगे ! 

श्री भूलामाई देसाई में यह सब है और फिर भी महत्तों के और इनके 
चीच एक बढ़ी दीवार खड़ी हो, ऐसा लगता है | इन जैसे व्यक्तियों के लिए 
. अवसरों का अभाव नहीं होता, अभाव होता है तो केवल ध्येय का ही । 
! परन्तु इस समय तो मूलाभाई अपने पर लिपटी हुई राख को -माड़ 
देंगे, यह बहुतों को लग *रहा या। महात्मा गांधी दॉडी-यात्रा के लिए. 
अहमदाबाद से निकले तभी दुखी मन से मूलामाई को चुपचाप कोर्ट में फिरते 
देख बहुतों ने यह.भी मान लिया था कि राख झड़ जाने से अप्मि प्रज्यलित 
हो उठी है | पर बाद में इसका कारण मालूम हुआ कि भूलामाई की दाढ़ 
दुःख रही थी और राजकीय परिस्थिति से दाढ़ का दुःख उनके इस दुःख- 
अदर्शन के लिये अधिक कारणभूत था। परंतु फिर भी गांधीजी का 

#२३६-+७ 


&.+०००८----४४४-९:-..३... 


भूलाभाई देसाई 


डॉडी-प्रयाण इन पर त्रिलकुल ही निः्फत् नहीं गवा। इन्होंने वल्लभभाई 
की गिरफ्तारी रोकने के लिए धारा-शाह्निय्रों की एक सभा घुलायी और 
स्वदेशी लीग की स्थायना की | ग्रेब्युएटों को हिन्हुस्तान में बना हुआ 
स्वदेशी माल खरीदना चाहिये यह प्रस्ताव भी इन्होंने एक दूसरी सभा में 
पास किया | यह प्रस्ताव इन्हें भी पूरी तरह वन्धन में बँवता है या नहीं 
यही अमी मालूम नहीं हुआ | आम जनता कला परखने वालों की दृष्टि 
से भले ही आये, इनका भाषण सुनकर प्रशंसा कर जाय तो भी कुछ 
हानि नहीं | परन्छठ मारतवर्ष का स्त्रराज्य तो ययाशक्ति (!) त्वदेशी का 
प्रयोग कर ग्रेज्युएट ही लानेवाले हैं, यह भूलामाई को पक्का विश्यास 
है । किसी समय ये प्रोफेसर थे इसलिए वर्षों से भूली हुई कविताओं 
की कड़ियाँ यादकर ग्रेज्युए्लों के सामने बोल जायें तो भाषण और भी 
प्रमावोत्रादक बन जाता है, यह बात भी ये कभी नहीं भूल पाते । 

श्री भूलाभाई के मूल ख़माव में सदतत्व अधिक है, पर इन पर 
निरद्देश जीवन तथा पैसा कमाने की शक्ति ने बहुत से पर्त चढ़ा दिये है| 
ये पैसा कमाते हैं, केवल कमाने के लिए, जीवन में और कुछु करना नहीं 
ओर कमाने की पुरानी आदत है इसलिए ! आज भूलामाई पैसा 
कमाना बन्द कर दें, तो भी उनकी स्थिति में रतीमात्र भी अन्तर नहीं 
आनेवाला । धीरभाई के अतिरिक्त दूसरे बाल-बच्चों का जंजाल इनके साथ 
नहीं और आजकल के जमाने में खर्चीला समका जानेवाला पत्नी रूप 
प्राणी है नहीं, कि जिसके लिए. जीवन मर पसीना इहाकर पैसा कमाने की 
आवश्यकता पड़े । और इनके जैसे शक्तिसम्पन्न तथा साधन-सम्पन्न मनुष्य 
की देश को आवश्यकता नहीं है यह तो कौन कह सकता है ! 

व्यय करने पर भी समाप्त न हो, इतनी आमदनी में से परमार्थ के कामों 
के लिए कोई माँगने जाब तो खासकर कोई जान-पहचान का--ज्जी हो या 
पुरुष भूलाभाई अवश्य उसे कुछ न ऋछ देते हैँ । और पैसे खर्च करने 
पर मैं पैसा खर्च कर रहा हूँ यह भान सदेव बना रहता है। 

रे ३ ७ ---- 


रेखाचित्र 


भूलामाई पर बीरबल और बादशाह की पुर्रानी कहानी का कौन- 
सा उदाहरण लागू होता है यह कहना बहुत ऋठिन है। कहानी इस 
प्रकार है--- 

एक बार अ्रकवर बादशाह ने वीरचल से पूछा, “वीरनल, तुम में कितने 
गुण हे १७ 

बीरबल ने विचार कर जवाब .दिया, “जहॉपनाह ! मुझमें दो गुरु 
हैं और अट्वानवे दोब हैं ।” 

बादशाह बड़े खुश हुए और पूछा, “और मुझमें ।? 

“आली जहाँ, आप में अ्रद्टानवे गुण हैं ओर दो दोष हैं |” 

“बीरबल, तब तो में तुमसे कितना अच्छा हूँ १? 

“जहॉपनाह ! मुझ में जो दो गुण है, उनसे मेरे अट्ठानवे दोष ढक 
जाते हैं। आप में जो दो दोष हैं वे आपके अद्वानवे गुणों पर पानी फेर 
देते हैं ।?” 

ये दो गुण या दो दोग सारी दुनिया जानती है। .श्री मूलामाई पर 
यह वर्णन बहुत अँंशों में लागू होता है। 

भूलामाई सें एक अकार का अखर व्यक्तित्व है, वह बहुधा 
सूर्त् की तरह दूर से गर्मी देता है और पासवालीं को जलाता 
है | इसलिए इनके बहुत से पास रहनेवाले के व्यक्तित्व का श्रविकतित 
रह जाना अथवा सूख जाना संभव है ।अपने से भिन्न अमिप्राय शायद ही 
: इनसे सहा जाता हो । , 

हमारी आचीन कहावत के अनुसार जो मिले उसे. सिर दे, ऐसा 
इनका स्वमाव है | इनके लिए मध्यम मार्य नहीं | वा तो ये उसे चाहें 
अथवा धिक्कारें | भूलाभाई किसी तरफ भी तठस्थ नहीं. रह सक़ते और 
कोई इनकी ओर भी कदाचित्‌ ही तव्ध्य इत्ति रख सकता है | जो.ढुनिया 
इनके चारों ओर वर्तुलाकार नःफिरे वह इनके किसी काम की नहीं । पर 
वास्तव में ये सव बलवान: व्यक्तित्व के लवण हैँ, और भूलामाई का 

>त+ररैप--- 


न 


भूलाभाई देसाई 


व्यक्तित्व देखते हुए, इन्होंने यदि अपने आप ही अपने चारों ओर दीवारे 
खड़ी न की होतीं तो इस व्यक्तित्व का बल बहुत ऊँचे तक पहुँचता । 

परंतु ये दीवारे इन्होंने जान-बूककर खड़ी नहीं कीं, बल्कि विवेचन- 
प्रिय (८४४८४) मस्तिष्क का यह एक स्वाधाविक परिणाम है। वस्तु 
के गुण-दोष को ये बहुत गहराई तक देख सकंते है और प्रत्येक विचार 
भावना तथा कार्य की निरथ्थकता पर वे दर्शनशात्र के विश्लेष्णात्मक 
इृष्टिकोश से विचार करते हैं। दुनिया को सुधारने के आज तक चघनेकों 
प्रयत्न हुए, किसी एक से भी दुनिया तिलमर ऊपर उठी है ?? मान 
लो कि यह कर लिया गया तो फिर क्या होगा !? इनका मस्तिष्क हमेशा 
प्रत्येक विचार ओर कार्य के पहले यह प्रश्न पूछुता है और इसका उत्तर 
मिलता नहीं, इसलिए इसको करने भी आवश्यकता नहीं, ऐसा ये मानते हैं । 
अभी इनको कोई विचार या भावना इतनी महान्‌ दिखाई नहीं दी कि 
अपने प्रवाह में इनको बहा ले जाये | बहुधा इस प्रकार बह जाने तथा 
हमेशा की इस मस्तिष्क की श्रशांति से छुव्कारा पाने के डिपव में ये 
सोचते होंगे, परंतु उससे छुट्कारा पाने की इनमें शक्ति नहीं शै। और 
तक तथा शंका के पार जाकर किसी आदर्श या भावना की लहरे' जब 
तक इनको बहाकर नहीं ले जायेगी तत्र तक इस अ्रशांत मश्तिष्क से इन्हें 
मुक्ति मिलने वाली नहीं | 

भूलाभाई के मन में एक बड़ा भारी भय है। इस लोकमत- 
वाद के युग में चाहे जैसे बढ़े आदमी को चाहे जैसे छोटे आदमी: के साथ 
कंधे से कंधा मिलाकर काम करना पड़ता है ओर चाहे जैसे निरक्षुर 
चार्य को चाहे जैसे विद्वादु की आलोचना करने का अधिकार है, यह 
इनसे सहा जा सके, यह सम्भव नहीं | आज तक इन्होंने अपने चेंत्र मे 
चैठकर अपने आस-पास की दुनिया पर राज्य किया है। अपना स्वार्थ 
लेकर मुवक्किल के रूप में आनेवाले व्यक्तियों को धमका सक्रे', उन पर 
राज्य -कर सके, और स्वार्थ का मारा मनुप्प सब्र कुछु चुपचाप सुन भी 

---२१६६--- 


'रेखाचित्र 


ले, पर जिस घड़ी भी मनुष्य की मध्यस्थता मिट जाय और ये स्वयं काम 
करे तब इन्हें भला या घुरा दोनों करनेवाले इस दुनिया में हैं।और 
कोई भी मनुष्य स्वयं मुँह पर अपने कार्यों की टीका कर जाय, ऐसी 


स्थिति में वह पहुँच जाये, इस बात की भूलामाई कल्पना भी नहीं कर 


सकते । इनका मस्तिष्क अच्छा है; पर एकाधिकार सत्ता भोगनेवाले 


राजा जैसा मेंने तुम्हारे लिये यह भलाई की है, ठुम स्वीकार करो।? 


और कोई भी मनुष्य इस अच्छी निष्ठा से किये हुए. कार्य की ओर चाहे 
सकारण भी यदि बाधा उठाये तो इन्हें आश्चर्य होता है, और खीज उठते 
हैं। 'में लोगों की मलाई के लिए करता हूँ ओर लोग समम नहीं 
पाते !? मैं सर्वोपरि सत्ता हूँ, मेरे सामने बोलनेवाला कौन !? ऐसी 
राजा जैसी मनोग्त्ति हो जाना स्वाभाविक ही है। पर चाहे जैसी मली 
क्यों न हो पर आज का युग ऐसी एकाधिकार सत्ता का आदर नहीं 
करेगा, यह बात जैसे वह परोत्वकारी राजा मूल जाता है उसी प्रकार भूलामाई 
देसाई बुद्धि से यह बात समसते हैं, पर अपने स्वभाव के कारण इसे 
भूल जाते हैं । फिर ऐसे सामान्य व्यक्तियों के समूह में अपने गौरव और 
सम्मान की रक्षा नहीं हो सकती, यह भय भी इन्हें सदेव लगा रहता है | 
कदाचित्‌ पुरानी होमरूल लीग के दिन और अपनी निष्कलता का पाठ 
अभी ये भूले न हों, यह भी एक कारण हो सकता है। पर भूलामाई बन 
में घुसकर आधा बन पार कर जुके हैं, आज भी यदि ये ऐसा भय अपने 
मन से न निकालेंगे तो विलम्ब हो जायगा--हमें ऐसा भय लगे तो 
स्वाभाविक ही है। 

ओर जिनमें मनुष्य की उम्र बीत गई हो ऐसी अपनी रहन-सहन, 
अपनी आदते तथा अपना स्वभाव यह सत्र बदलना कहीं सहज है ! 
आज के स्वतंत्रता आंदोलन में शरीक होरऊँ, यह मन होने पर भी भूला- 
भाई से हो नहीं पाता | क्या यह इस बात का सबत्रसे बड़ा सबूत नहीं है ! 
मकड़ी की तरह निकाले हुए जाल में मनुष्य स्वयं बैंध जाता है और 

"+रे४०-- 


अनजजजज किलर कप जनक नज>ज> ७२००-०० ८ 


है 


कै: अन्‍> +००७०७०-। जे हा रे कं 
निकलता -5-- 


भूलाभाई देसाई 


शहुत योड़े मनुष्य ही इस बंधन को तोड़ने में सफल होते हैं। प्रश्येक 
अनुकूलता होनें पर भी यह बंधन थ्राज भूलाभाई से नहीं तोढ़ा 
गया। आनेवाले कल की वात ही क्या? और रात-दिन कचोसने- 
वाले अपने मस्तिष्क को शांत करने के लिए बंधन में रहकर भी 
यथाशक्ति करने के लिए क्या ये प्रयत्न नहीं करते ! इन्होंने बंगई ओर 
अहमदाबाद के बीच धक्के खाकर तथा अपने व्यवसाय को भुलाकर, 
अहमदाबाद के मिल मालिकों के साथ समझौता करने का प्रयत्न किया । 
देश-सेविका संघ की बहिनों को सलाह देने का पुण्योपार्जन किया। 
कपड़े के व्यापारियों को एक भी सोने की मृहर लिए बिना ही मुफ्त की 
सलाह दी । मकड़ी श्रपना जाला कब्र तोड़ेगी ! 

भूलाभाई के द्वारा काम निकालने वाले, इनके 'अश्रहं! से बहुधा डरा 
करते है | भूलाभाई की बुद्धि तीम है और धाराशालत्री की तरह इनकी 
बुद्धि बहुत गहराई तक पहुँचती है। भूल में भी यदि भूठा मुद्दा पकड़ 
लिया गया हो तो फिर ब्रह्मा भी क्यों न श्रा जाय, इस झूठे का सच 
'नहीं हो सकता | इन्हें श्पनी बुद्धि पर खूब विश्वास है । भूल हो जाने 
के बाद भी इन्होंने भूल की है, इनका 'शरहं! नींद में भी इस बात 
को स्त्रीकार नहीं कंरने देता । 

स्त्रियों के लिए भूलाभाई को आकर्षण है पर सन्मान नहीं। स्ियों 
में बहुत कुछ कर डालने की शक्ति होती है यह भी ये नहीं मानते । पर 
अपनी ऐसी धारणाये होने पर भी बंबई की पहली ल्ली बैरित्टर मिस्र 
थाय को पिता की तरह मदद करने का इन्होंने हमेशा प्रयत्न किया है, 
यह इनके लिए शोमनीय ही सममा जा सकता है | 

प्रत्येक मनुष्य गुण और दोष का भंडार है और भूलामाई में पोड़े 
गुण ओर थोड़े दोप दोनों का मिश्रण है। मनुष्य के उच्च देनुओओं की 
अपेद्ा उसके नीच देतु इनके ध्यान में पहले आते हैं । 

इन्हें ऊपरी शान-ब्रान तया महत्ता अ्च्दी लगती है, पर आयु के या 

- गण 
१६ 


रेखाचित्र 


स्वभाव के कारण ये एक सीमा से आगे जाने या खतरा उठाने के लिए 
तैयार नहीं | अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ये आपको सलाह दे", आपके कार्यों 
के हेतुओं का प्रथक्‍्करण करे, और आपको मार्ग बतावे' पर कार्य आपको 
करना होगा । भूलाभाई में पंडित मोतीलाल जी जितनी बुद्धि हो भी, पर 
पंडितजी जितने स्वार्थ-त्याग बिना तथा स्वयं काम किये बिना, इनको: 
ऐसा स्थान नहीं मिलने वाला, ऐसी स्पष्ट बात दुबारा कहने की क्या 
आवश्यकता है १ . ह 
सचमुच, भूलामाई इस समय एक वंधनग्रस्त आत्मा हैं। बुद्धि से 
भावना की पाँख देखते हैं, फिर भी भावना इनसे पकड़ी नहीं जाती । 
पिंजरे में रहकर पक्की के उड़ने की शक्ति कम हो जाती है, इस प्रकार 
आत्म-संतोष के पिंजरे में पड़ी हुई इनकी आत्मा महत्ता का विशाल व्योम 
देखती है फिर भी उससे उड़ा नहीं जाता । मूलामाई में सब कुछ है पर 
यह साहस कब आयेगा ! 
आज ये एक विजयी धारा-शात्त्री हैं। परन्तु भूलाभाई आज क्‍्या-, 
हैं? कया हो सकते थे ! सिद्धि के त्रिना आज ये सब संमावनाएँ मात्र हैं| 
आर्थर रोड जेल, 
दृ८--७--३ २ 


केनन»«»न». र्‌ ४२--- 


श्री नरसिहराव भोलानाथ 





कुछ वर्ष पहले एक दिन ब॑र में वेकार बैठे-बंठे कहीं से 'शाकुंतल' 
की एक प्रति मेरे हाथ लगी और बीच में से खोलकर पढ़ते हुए, दुर्वासा 
ऋषि शकुंतला को शाप देते हैं, यह थ्राध्याय पढ़ा । और पढ़ी हुई किताब 
को दुवारा पढ़ना न अच्छा लगने से सोफे पर श्ॉँख मंचकर बैठ गई 
थे दुर्वाता ऋषि कैसे होंगे ? लम्बी जय, विशाल चमकती हुई थ्रों खे' और 
क्रोध से लाल हुआ मुख ।? और एक विचार आबा--इन्दर की तरह 
दूसरी डाली पर मस्तिप्क ने छुलांग मरी--मुझे नरसिंहराव याद आये। 
क्या अनजाने भूत और वर्तमान की एक-सी मूर्तियों की समता श्रन्तर 
में सहज ही स्फुरित हो उठी होगी ? हो भी सकता है | 

नरसिंहराव भाई में बहुत से गुण तथा थोड़े से श्रवगुण हैं, और 
क्रोध उनमें सब्रसे प्रमुख है | इनको क्रोधित करने के लिए या स्वयं 
क्रोधित होने के लिए. छोटी से छोरी बात पर्बात होगी। कोई इनके शब्दों पर 
टीका करे, कोई इनके विचारों से सहमत न हो, कोई इनको दीमारी में 
देखने न जाय, किसी के शब्दों में इनका अ्रपमान करने का माव था 
ऐसी ये कल्पना करें, कोई इनकी श्रेष्ठटता पर आक्रमण करता हे 
ऐसा ये मान ले या कोई इनके गम्भीर संगीत-ज्ञान पर ल्वीकारोक्ति न दे 
तो इनका मिजाज अवश्य बिगड़ गया सममिये | ये सत्र वस्तुएँ एक साथ 
पूरी करनी चाहिए यह भी नहीं । इनमें से एक भी वस्तु के हाने की जरा 
सी शंका इन्हें हो जानी चाहिये, वही चहुत है । इसके परिणाम म॑ थोड़ी 
सादी शिक्षा सुनकर ही आपका छुट्कारा हो जाबगा या फिर लम्ध-लम्धी 

रेड ३--- 


रेखाचित्र 


आलोचनाएँ, उनके उत्तर और फिर उनके उत्तरों की लपेट में आप आा 
जायेंगे; और कभी बात इससे भी आगे बढ़ जाय तो क्या होगा, यह 
कल्पना करने का काम आपका है | 
नरसिंहराव से लड़ाई बड़ी असाधारण की होती है | इनकी अवस्था * 
का आपको सम्मान करना चाहिए यह आप मानेंगे और ये भी, इसलिए 
,कि जिस भाषा तथा जिन मुहावरों का ये प्रयोग करें वह आप नहीं कर 
सकते | ये यदि सरत और युक्तिपूर्वक्क आलोचना लिखें और आपकी 
इईँसी उड़ाने का प्रयत्ष करें तो यह उनकी विद्वत्ता तथा अवस्था के योग्य 
है, यह समस्तना होगा । उनकी भाषा के प्रभुत्व की प्रशंसा हो, और उनके 
प्रति उदीयमान विद्वानों की श्रद्धा और भी अधिक बढ़े | उनकी आलोचना 
यदि निरथेक और हँसी का मिथ्या भास कराती हो, तो उसे बृद्घावस्था 
की भूल समझ कर उसकी ओर ध्यान न दें । परन्चु नरसिहराव के प्रति- 
स्प्धी को इनमें से एक भी वस्तु सुलभ नहीं होती | वह विद्वानों में प्राचीन 
योगी (४७४: 7728767) न हो उसी प्रकार उसके ग्रति सम्मान प्रदर्शित * 
करने के लिये तप्तर न हों। उनके प्रति उद्धत या व्यंगाव्मक शैली का 
तो प्रयोग किया नहीं जा सकता, नहीं तो आजकल के छोकरों द्वारा 
बढ़े-बूढ़ों का अपमान कहा जायगा | ओर -यदि इन्होंने बहुत सुन्दर 
तथा युक्तिपूर्ण लिख “दिया “तो विेचारे बूढ़े: को खूब कह डाला, अब 
बुढ़ापे में उसे इस तरंह न छेड़ना चाहिए !? “इसके , अतिरिक्त प्रशंसा 
'का एक भी अक्षर सुनने कोन मिलेगा | बूढ़े -होमेः से जिस प्रकार 
असुविधाएँ बहुत बढ़े जाती हैं उसी प्रकार सुविधाएँ भी बहुत हैं। 


अपनी विनोदडेत्ति में यदि किसी को श्रद्धा हे तो वह श्री नंरतिह- 
राव को | सभी के संस्मरण ये अपने 'स्मरणमुकुर' में संग्रहीत करते हैँ, 
और इस मुकुर से विनोदी समझे जानेवांले वक्र किरणों ' के प्रतिविंष 
बाहर निकाल सकते हैं| इनका सुकुर संग्रहण भी अद्भुत है। श्री 
“भोलानोय सारामाई का कुठुम्ब इंसके मध्य भाग में 'है और इसका 


श्री नरत्िहराव भोलानाथ 


प्रतित्रिंव- बहुत सुन्दर रीति से उसमें पढ़ता है | शेप सभी इधर-उधर कोने 
में बैठे या स्मरण की अदभुत शक्ति से संग्रहीत हों, इस प्रकार ठेढ़े-मेढ़े. 
दिखाई देते हैँ। मुकुर-विनोद श्री नरसिंहराव स्व॒ग्रं करते हैं, किसी 
के घर दाल-मात नहीं. मिले, किसी का उ्च्चारण- शुद्ध बोल-चाल के 
मापदंड से देहाती था ये सत्र बातें इन्हें बहुत सुन्दर दंग से याद 
रहती हैं। विद्ता और संस्कार भोलानाथ साराभाई के परिवार के 
अतिरिक्त और कहीं मी उपलब्ध हो सकते हैं, यह तो नरतिंहराव 
मानते होंगे । 

परन्तु इन सब बातों के लिए नरसिंहराव अ्रकेली स्मरण-शकि पर 
ही निर्भर नहीं रहते | इनके 'रोजनामचे में अथवा इनकी धंठा डाबरी वा. 
मिनट डायरी जो कहो, उत्तमें अपने मस्तिप्क के चश्मे से देखी हुई 
प्रत्येक बात का उल्लेख होता है । और इसका उपयोग ये दीस या पश्चीकत 
वर्ष से किसी अ्रकस्मात्‌ बड़ी पर करते हैं, जब कि इस बात में भाग 
- लेनेवाले के मन से यह बात त्रिलकुल भूल गई होती हद या इस समय 
साक्षी या तो मर गये हों बा उनको यह बात बाद न थाती हो और 
नरसिंहराव की डायरी--यही एक लिखी हुई दस्तावेज--मिलतो हो, 
उस समय दूसरी दस्तावेजों की गैरहाजरी में, जो ये कह रहे हूँ बह भूठ 
है या सच, यह खोज निकालने का कोई भी साधन किसी के पास नहीं 
होता । और डायरी लिखते समय श्री नरसिंहराव किस क्षण किस मूड! 
में थे यह कौन कह सकता है ! 

श्री नरसिंहराव की विनोद-इत्ति का चश्मा पहनी हुई श्रॉंखों में 
एक खबी है । इनका विनोद दूसरे को हँसी उड़ाने में मजा लेता है, पर 
अपने पर होनेवाला विनोद सहन करने जितनी सहन-शक्ति प्रभु ने 
इन्हें नहीं दी । ;' 

किन्तु इनके कगढ़ालू खमाव से दवा हुआ एक कोमल हृदय भी 
है और गर्वीले मन के साथ-साथ एक प्रकार का गौरव मी इनमें दे। 


रेखाचित्र 


इनके शब्द---बहुधा गरमागरम मस्तिष्क से जल्दी में निकले हुए 
शब्द--कड़वे भले ही हों पर इनका उद्देश्य कदाचित्‌ ही कड़वा होता 
हो | इन्हें अपने गौरव का बहुत हलका भान है, और इस गौरव की 
आप रक्षा कर रहे हैं, इन्हें यह विश्वास हो जाय तो फिर ममता 
दिखाने में भी यह वृद्ध कसर नहीं करते । 
ओर अपनी प्रतिष्ठा सुरक्षित रखने की उन्हें इतनी अधिक चिंता है 
यह हम भी समम सकते हैं। जिस जमाने में ये पैदा हुए थे उसमें स्वातंत््य 
की बात शब्दों में करनेवाले बहुत होंगे, पर व्यवहार में खातंत्र्य की 
रक्षा करने और बड़े आदमियों की पर्वाह न करनेवाले खमाव के व्यक्ति 
थोड़े ही होंगे। श्री मोलानाथ साराभाई जैसे आदि सुधारक के यहाँ 
जन्म लेकर एक तो नरसिंहराव इस प्रांत के और बंगाल आदि दूसरे 
प्रांतों के सुधारकों के सम्पक-में आये। सर्वप्रथम बढ़े आदमी के पुत्र, 
फिर सरकारी नोकर और कलक्टर तक की पदवी तक पहुँचे हुए । 
कवि रूप में भी अपने समय में इनका जीवन यशखस्री रहा। और इन 
सबके मिश्रण से इनके मन में अपने गोरव का भान विशेष हलका हो 
गया हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ! और इस गौरव को कोई अनजान 
या अय्कलपच्चू विद्वान असावधानी में भंग न कर दे इस बात की चिंता 
इन्हें हो तो क्या यह खामाविक नहीं है ! 
ओर यह सब्र कुछ होने पर भी श्री नरसिंहराव में बालक की-सी 
सादगी है| इनका वात करने का ढंग कभी-कभी एक बढ़े बालक जैसा 
लगता है, ओर जब ये चिढ़ते हैं तो त्रिलकुल एक नन्‍हें बालक बन जाते 
हैं| शालक की तरह इनसे भी समका-फुसला कर काम निकालना 
पड़ता है। बालक जैसी इनमें जिद है ओर बालक जैसी इनमें आप-मति 
भी । पर जब पसन्न हो जायें तो फिर बालक जैसा मीठा बतांव भी करते 
हैं| कदाचित्‌ यह दृद्धावस्था दूसरा बचपन हो तो कोन जाने ! | 
. नरसिंहराव में सावधानी खूब है। प्रत्येक वस्तु के विपय में ये कुछ 
--२४६-- 


श्री नरसिंहराव भोलानाथ 


लिख लेते हैं । प्रत्येक लेख के पीछे ये उसकी जरा-जरा-सी बातें देखने 
का श्रम करते हैं। और इनके हकार! या 'सकार' शब्द के ह और 
से? कहीं ऐस। न हो कि प्रूफ में भी बदल जाये इसकी ये विशेष चिंता 
रखते हैं । 

स्पेलिंग के विषय में इन्हें आज भी बहुत युद्ध करना पढ़ा है| स्वयं 
योद्धा और उसमें भी यह स्पेलिंग का ज्षेत्र मिला। है ओर सता इनके 
दो सास मूलाज्षर हैं, और माल”, 'हिमनुँ', सकझु?, सके! इत्यादि 
इनके खास शब्द हैं ओर शुद्ध मुखिया के मोहल्ले के घर के 
उच्चारण जैसे 'कोंणी! के धदले 'कुहुणी! के साथ ऋतज्ञतापूर्वक आज 
भी दृढ़ हैं। ये बातें देखने में बहुत छोटी हैं पर इनके साहित्य में हुए 
परिणाम बहुत चिरस्यथायी हैं। और उसके लिये नरसिहराथ ने 
थ्रति उम्र तपश्चर्या भी की है। इसके लिए इन्होंने बहुत से गंभीर और 
विनोदी घाव भेले हैं, फिर भी आज तक इन्होंने बिलकुल सिर नहीं 
भुकाया--ओर भुकायेंगे भी नहीं । ह॒ 


नरसिंहराव सर्वोत्तम नहीं तो अच्छे कवि हैं, यह सब कोई मानेंगे, 
दलपत के वाद प्राचीन कविता का युग समाप्त हो गया और नमंद ने 
नवीन कविता का मार्य दिखाया और उनके बाद नवीन कविता के जो 
पॉँच-छः लेखक हुए. उनमें से महत्वपूर्ण स्थान नरसिंहरात्र का है । 
बढंखर्थ की तरह इनमें एक प्रकृत कवि के भी गुण हैं। कदाचित्‌ 
इनके प्रिय अंग्रेजी कवियों का अनुकरण भी हो । 'तारे!, चांद", मेत्र', 
ध्योमः जैसे प्रकृति के तत्त्र इन्हें खूब ग्राकर्थित करते ई श्रौर इनकी मानव 
दुःख से प्रेरित कविताओं में भी प्रकृति-वर्णन अवश्य आता हे । 


नरसिंहराव केवल कवि ही नहीं, वल्कि गुजराती के एक अच्छे गद्य 

लेखक भी हैं, और साथ ही मापा-शालत्री भी। विल्सन फाइलोजिक्स 

लेक्दर्स बहुत समय तक इनके संस्मरण रुप में सुरक्षित रहेंगे। १ 
>+-+२४७-- 


ना 


« + रेखांचित्र -:* 


“साथ ही ये संगीत-निपुण भी सममके. जाते हैं). नरसिंहरांव के; 
सभी गुण मुझे खीवकार हैं, पर, यह अंतिम नहीं। ये कवि, हैं यह में 
मानती हूँ, थे अच्छे गद्य-लेखक . हैं, यह भी में मानती हूँ; इनके भाषा- 
शासत्र के विषय में भी मुझे शंका नहीं, पर इनके संगीत विषयक शान 


से मैं वास्तव में घव्॒राती हूँ | जिन दो-तीम - अवसरों: पर मैंने इनका _ 


संगीत सुना है, उनमें इनका खर, लब, तान, ताल सब संगीत से विरुद्ध 
थे | संगीत-शात्र का ज्ञान और संगीत-शक्ति ये दो मिन्न बस्तुएँ होने 
से यह हो भी सक्रता: है, पर नरसिंहराव यह - बात कबूल कर लें, ऐसा 
मुझे विश्वास नहीं | 

नरसिंहराब के जीवन में सुशीला काकी का स्थान बहुत महत्वपूर्ण 
है। इनका मिजाज कस में रखने. की: शक्ति यदि किसी में है तो वह 
सुशीला काकी में [और सुशीला काकी एक ही वात में इनकी देख-भाल नहीं 
करतीं इनके रुप्ण शरीर की सुश्र.ष्रा करें, ये किसी पर वियड़ जायें और 
और उसे बुरा-मला कहने लगें तो इन्हें रोके, इनकी सभी आशाओं का 
का अनुसरण करे ओर इनकी प्रत्येक इच्छा को पहले से ही जान कर 
उसी के अनुसार अपना व्यवहार वंना ले, ये से गुण सुशीला काकी 
में ह। कुछ ही बड़े आदमी अपनी पत्नियों के विषय में इतने भाग्यशाली 
होते हैं। गांधीजी को कंत्तुस्वा मिलीं, नानालाल को माणिकवा मिली 
गोपालदास को भक्तिवा मिलीं, चंद्रशंकर को बसंतव्रा ओर सुधा मिलीं 
तथा नरसिंहराव को सुशीला । अ्रमी तो ओर बरहुत सी युगल जोड़ियाँ 
गिनायी जा सकतीं हैं, पर अभी इतना ही पर्यावं होगा । 

नरसिंहराव के स्नेह का एक दूंसरा स्थान है और वह है उनकी 
युत्री लवंग्रिका | देवयानी की तरह पिता-भक्ति लवंगिका के द्वदय में 


“लिखी है | यह पिता की प्रशंसा .करती, प्रिता- के आदर्शो पर जीवन 
“व्यतीत करती, पिता की रक्षा. का भार पिर.पर लेती और -पिता-मब ' 
: जीवन बितांती है। पिता की शक्तियों और खभाव का पैतृक भाग; भी 


- “शेष 


श्री नरसिंहराव मोलानाथ 


योड़ा-बहुत उसको मिला है । सो० लवंगिका नरसिंहराव की पुत्र सहश 
पुत्री है। ह॒ 

ओर ग्रेमल | बिना मौ-बाप का मातृहीन चालक ! दिस भाव से दादा- 
दादी उसका पालन-पोपण करते हैं उसमें सचमुच दिव्यता का अंश है । 

श्री नरसिंहराव में जितना छुन्दर हृदय दै, वेसी ही मीठी यदि 
बाणी होती, जितनी इनमें उदारता है, उतनी ही यदि इनके स्वभाव में 
शांति होती, तो आज जो ये हैं, उससे बहुत अधिक महान्‌ होते | कद्ृवी 
वाणी के कारण इनका खातंत्य-प्रेम- बहुधा उद्धताई का रुप ले लेता है, 
और अपने गौरव के प्रति इनकी चिंता, अपने को बढ़ा समझने के 
आरध्रर का भास कराने लगती है। खभाव से ये भावना-प्रधान हैं, 
और 'नर्वसः भी हैं | अ्रथ तो छोटी-छोटी बातों में भी ये बिगड़ जाते 
ओर आवेश में था जाते ६ | पर इससे क्या? खतंत्र खमाव के मनुष्यों 
का जब अभाव नहीं था उस युग में ये खतंत्र मन॒ुप्य थे । इन्होंने समाज- 
सुधारों के लिए. बहुत कुछ किया | गद्य-काव्य ओर भाषादेवी की भक्ति 
करने में इन्होंने रात-दिन अपना तन ओर मन खपाया और प्रगति के 
पंथ में एक लंबा मार्ग बना दिया था। यह बात इनके जीवन की सफलता 
सिद्ध करने के लिए बहुत है । 
' थ्रार्थ रोड जेल, 


१४-८-३० 


बा + ४९८२5 





श्रीखुशल शाह. , 


प्रथ्वी में जिस प्रकार गर्मी और पानी दोनों हैं, बर्फ जिस प्रकार 
ठंडा लगता है पर गुण में गम कहा जाता है, उसी प्रकार .प्रो० खुशाल 
तलकशी शाह भी विरोधी तत्वों के भंडार हैं । इनकी बुद्धि बहुत तीत्र है, 
पर हठ पर चढ़ जाय तो कभी-कभी बालक जितनी बुद्धि भी इनमें नहीं 
रहती | इनका खभाव उदार है, पर बहुधा ये हलकी से हलकी बात 
को भी याद रखते हैं | मित्र की तरह ये सर्वस्॒ दे देते हैं पर श्र 
रूप में कोई मी हथियार इनके लिये त्याज्य नहीं है | 

परन्तु खुशाल शाह बुरे आदमी नहीं | मूल रूप में तो ये वास्तव में 
अच्छे व्यक्ति हैं, पर इनके शरीर की तथा मस्तिष्क की शक्तियोँ एक 
दूसरे से विरोधी दिशाओं में चलती हैं ओर इस कारण इन दोनों के 
बीच संग्राम चला ही करता है | इनकी बुद्धि का लाभ उठानेवाले बहुत से 
मित्र इनके आस-पास आते-जाते हैं, पर अमिमानी खभाव के कारण 
दुश्मन बनाने में भी इन्हें देर नहीं लगती और इन जैसे जिद्ठी आदमी 
मिलने बहुत कठिन हैं। 

खुशाल शाह की बात करने की शक्ति विविधतामबी तथा आकर्षक 
है ओर उसमें साथ ही दूसरे तत्व लाकर ये बात को और भी अधिक 
सरस बना सकते हैँ । इनकी वाणी में अमृत और विष दोनों हैं ओर 
इन दोनों का उपयोग ये अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं। बुद्धि के ऊँचे 
से ऊँचे प्रदेश पर से निदा के गांभीये में दो-चार डृवकियाँ लगाकर फिर 
ये समतल पर आते हैं। कभी ये ड्बते हैं और कभी तैरते । सामनेवाले 
मनुष्य का तात्कालिक विश्वास खींचने की शक्ति इनमें है; परन्तु क्या 

+-२५० अल तन 


श्री खुशाल शाह 


यह विश्वास रलना इन्हें श्राता है ? अलग-अलग लोगों के अलग-अलग 
अनुभव हैं। 

संदुलन शाह के खमाव का विशेष गुण नहीं और अपनी बुद्धि का 
चहुत्त गर्व होने पर भी दूसरों से--विशेषकर ख्नियों से--ये आरक्षित बहुत 
होते हैं| शाह के हृदय में ब्ियों के प्रति सम्मान है और इन्हें स्ियों की 
संगति अच्छी लगती है। स्लरियों की संगति अच्छी लगती तो दे बहुतों 
को, पर शाह इस विषय में कोई बात गुप्त नहीं रखते और दूसरे रखते 
हैं। आज बंबई के बहुत से बुद्धिशाली मित्रों की ज्लरी-मित्र दे तो शाह के 
भी हैं और इसका कारण यह है कि शाह स्त्रियों को पुरुषों के साथ 
समानता की अविकारिणी समझते हैं। इनके आत्म-सम्पान का संसार 
में कई जगह से पहुँचनेवाले आधातों को ये मित्र जरा सहला आने हैं 
ओर इससे इनमें फिर से आत्मविश्वास पैदा हो जाता है। श्री शाह 
ह्लियों की अपनी बुद्धि से सहायता करते हैं और यह वृद्धि इन्हीं की है 
इसका अनुभव कराते हैं। श्री शाह ह्लियों को कभी भी उनके अधिकार 
नहीं भूलने देते, सदैव याद दिलाते रहते हैं और किसी जगह उद्धतपन भी 
हो तो उसे स्वतंत्रता का सुन्दर नाम देने में शाह को संकोच नहीं होता । 

शाह का स्वभाव जितना जुद्धि-प्रधान है उससे अधिक मावना-प्रधान 
है । जीवन में इन्हें क्री का साथ नहीं मिला, पर ख्लियों का सहवास 
इनका खमाव चाहता खूब है और जिस किसी स्त्री के सहवास में ये 
आते हूँ उसे पूर्णतया देखने की इनमें इच्छा या शक्ति नहीं। इनके 
स्वभाव या शरीर में दो एक प्रकार के लावण्य की शाह कह्पना करें 
ओर फिर शेष व्यक्तित्व जैसा इनको अच्छा लगे वैसा अपने मन में बना 
लेते हैं | इस कल्पना-मूर्ति और वास्तविक स्त्री से संत्रंध होना चाहिए 
यह बात भी नहीं । आचीन काल के फ्रेंच नाइट की तरह स्त्री-मित्रों का 
प्रत्येक काम करने के लिए शाह हर समय तत्पर रहते है । 

श्री शाद की दृष्टि सीमित है। अपने से दो हाय दूर झनेवाले व्यक्ति 

--२४१-- 


रेखाचित्र 


को:भी ये कदाचित्‌ हीं पहचान सके । यह शारीरिक कारण शाह को: 
कम दुःख नहीं देता और शाह के मानसिक भ्रम भी बहुत कुछ इसी 
से पैदा होते हैं.। मर्नुष्य के भ्रम जितने अधिक बढ़ते हैं उतनी.ही उनको 
नष्ट करने की संभावना कम होती जाती है और इस -प्रम से भरे हुए, 
अपार संसार समुद्र मथ्ये, निमजतो मां शरंणम्‌ किमस्ति १४ ह 
.. शाह के खभाव में 'जन॑लीज्मः मरा हुआ है | और अनेक दुःखों का 
वह कारण होने पर भी शाह उसे छोड़ नहीं पाते | युनिवर्सियी के 
प्रोफेसरों के विषय में इनकी धारणा है कि इनसे “जन॑लीज्मः हो नहींः 
सकता और समाचारुपत्रों में लेख भी नहीं लिखे जा सकते। कहा 
जांता है कि युनिवर्सिटी में रहकर अंतिम घड़ी तक शाह ने इस नियम 
का पालन नहीं किया और परिणामसरूप शाह आज युनिवर्सिटी के 
प्रोफेसर पद पर नहीं हैं | सतसे पहले शाह को युनिवर्सिटी में से निकालने 
का मूल कारण यही था। शाह से अपने अमिग्राय. प्रदर्शित किये बिना 
रहा नहीं जाता | क्रॉनीकल” के बहुत से संपादकीय और लेख शाह बिना 
नाम के ही लिखते हैँ, इस बात में निहित सत्य आज कदाचित्‌ ही 
किसी से छिपा हो | दूसरे वेलगाँववालों की मैत्री तथा बाम्बे क्रॉनीकल' 
के साथ इनका संत्रंध इनकी सत्ताकांच्ा को पोषितं करने का एक साधन 
है | इससे शाह की यह धारणा है कि वह जिसे चाहें चढ़ा सकते 
हैं और जिसे चाह गिरा सकते हैं | शांह से खयं तो ताज नहीं पहना 
जाता पर इनको 'किंग-मेकरः बनेने - की अदम्य लालसा है । वह पुतला 


. ब्लेनाये और इनकी मरजी के अनुसार वह नाचे तो' कैसा आनन्द 
. आयेगा !? पर शाह का पुतला अधिकतर शाह कीं इच्छा के अनुसार 


नहीं नाचता | श्रोर जिसे शाह पुत॑ला समसते हैं वह वास्तव में शाह को. 
अपना हथियार बनाना चाहता है । ह 


ु 





#इस संसार रूपी. अपार समुद्र में ड्रबते हुए मुझको कहाँ शरण है ! 
अतारिड ९: - 


श्री खुशाल शाह 


'शाह का अपने व्यक्तित्व के विपय में बहुत ऊँचा मत है | “व ब्वाग 
& 7678072ए? यदि कोई भूल जाय तो उसे कह मुनाते हैं । 
४00 [6 8 2 7८:४०72॥॥7ए 0 2 [घाशते? साधारण दुनिया में 
बहुत वार धोखा खाने के कारण इन्हें इस दुनिया पर बहुत विश्वास नहीं 
रहा फिर भी दुनिया का मोह इनसे नहीं छव्ता। बहुचरा कई दिनों तक 
इनकी आत्मा निराशा के गड़ढे में इत्रकियाँ लगाती रहती है, और उस 
समय इस कठोर दुनिया : में कहीं दूर चला जाने का मन होने लगता 
'है | उस समय किसी आदमी का मुंह इन्हें अच्छा नहीं लगता और 
फिर भी कोई आकर इनको इस दशा से छुड़ा ले, यह चाहे बिना इनका 
मन नहीं रहता । 
शाह में काम करने की शक्ति बहुत है और अपनी दुखी आत्मा का 
विश्राम वे काम में खोजते हैं | शाह को दुःख अनेक प्रकार के हैं। इनकी 
'महत्वाकांक्षा को संतुष्ट करे ऐसा कोई महान ज्षेत्र इन्हें दिखाई नहीं देता, 
'यह एक दुःख है। इनकी भावना-प्रधान आत्मा की झआकांत्ाएँ सर्देव 
'अपूर्ण रहेंगी यह भान, इनको निराशा के गडढें में दकेल दे इतना 
महान्‌ दुःख है। अपूर्ण आकांज्ाओं और वासनाओ्रों के भूत शाह 
के हुदय को व्यथित कर डालते ह और इनकी जलती-भुनती 
'चावली बनी हुई आत्मा शांति खोजने के लिए. नये-नये विपयों में डुबकी 
'लगाती है और जहाँ इनका अंतर इनका पीछा न कर सके, ऐसे काम 
में इन्हें डूब जाना पढ़ता है। पर विस्मृति की गंभीर शांति शाह के 
जीवन के लिए नहीं है-। इनकी इच्छात्रों के भूत सोते या जागते इन 
सामने ही खड़े रहते दे । फिर ये भूलें कैसे ? 
शक्तिशाली मनुष्य की शक्ति व्यर्थ हो जाय, यह एक खेद का 
: है और फिर भी शाह की बहुत सी शक्तियाँ ब्वर्थ चली जाती हैं इसमें 
किसी को शंका नहीं हो सकती.। सच बात तो यह ऐ कि इनकी मानवता 
“को पूर्ण कर दे ऐसी - इनके खष्नों की सुन्दरी इन्हें मिली नहीं, और 
““+-र२४२३०-- 


52 
2 


| 


लक चक-. पा मम २5 ४०५0४; ७ डकार 
३ न हज 27 5 | का आए ॥ काट आन का दबाल: कल यो, 


- हार: 


रेखाचित 


इसी कारण इनकी मानवता अधूरी रह गई है। घड़ीभर में श्रहंकारी 
और घमंडी, घड़ी भर में निराशामब, तो घढ़ीभर में उदार और 
संकुचित, घड़ीभर में उग्र और घड़ीमर में माया से भरपूर, पढ़ीभर में 


हल 


बिद्वता के भंडार और घड़ीमर में मूर्खता समभी जाय ऐसा पागलपन, 


'ये सब बादल के विविध रंगों की तरह शाह के खभाव के विविध रंग 


हैं। इन्हें किसी में भी संतोष नहीं मिलता | इनके असंतोत्र की सीमा 
नहीं। इनकी कल्नना तीत्र है और देवदूतों तथा भूतों के दर्शन ये 
वारी-बरी से किया करते हैं। इन जैसे भनुष्य पर दया दिखाने का 
अधिकार किसी को नहीं, पर फिर भी इनका दुःख हृदय में दया जगाये 
त्रिना नहीं रहता । 

शाह की बुद्धि सार-संग्रह करनेवाली है, नवीन का रंजन करनेबाली 
नहीं । विषयों का अभ्यास करनेवाली शक्ति विषयों को मस्तिष्क में रखने 
बाली शक्ति, विषयों का वर्गोकरण करनेवाली शक्ति इनमें बहुत है। किसी 
जादूगर के पिथरे की तरह बहुत सी सोची हुई चीजें इनके मस्तिष्क रूपी 
वियरी में मरी होती हैं और कभी-कमी कोई त्रिना सोचे निकल भी 
आती हैं । ये त्रिना सोची हुई वस्तुएँ नवीन हैं, अनजान व्यक्ति को यह 
भी लगेगा, पर सच बात तो यह है कि शाह को अपने मस्तिष्क में बहुत 
सी श्राकषित वस्तुएँ इकट्ठी कर रखने की आदत है । शाह की पुस्तकें 
तथा शाह की बातचीत यह इस संग्रह के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं| शाह जिनको 
अपनी सजनातव्मक कृतियाँ समझते है उन्हें साहित्य में स्थान नहीं मिला 
और इनमें भी जो अच्छी हूँ वे. संग्रहीत या दूसरी माषाश्रों से अनूदित 
होती हैँ, यह वात निर्विवाद है | ह 

सूजन और संग्रह के चीच भेद इतना .ही है. कि पढ़े हुए विचार 
अन्न की तरह पच जायें और उसके रक्त से नवीन, साहित्य बने वह्‌ 


. - यजन है और दूसरे गाँव से आया हुआ अन्न अपनी कोठी में रहे और 


उसे समय परं पकाकर एक नवीन .वस्तु बना लें वह संग्रह है । पर इस 
हल ४7 


श्री खुशाल शाह 


ध्याख्या में मुझे बहुत श्रद्धा नहीं। जंगल के निवासी कच्चा अन्न खार्ये और 
इसी अन्न का यदि एक नवीन खरूप किसी छुन्दर रसोई दारा बनावे 
तो क्या वह सजन नहीं है ! पर शाह का सजन तो इस प्रकार का भी 
नहीं । ये तो केवल संग्रह करते हैं, ओर योग्य स्थान पर उसका उपयोग 
करते हैं, उपयोग अच्छा कर सकते हैं इसी में इनके संग्रह की खड़ी दे । 

शाह को अपने गौरव की बहुत अधिक चिंता है ओर स्वभाव 
मगड़ालू है । इसका कारण यह है कि गरीबी से इस स्थिति में आने 
तक अपने भविष्य का शाह ने स्वयं ही निर्माण किया दे। अपनी स्थिति 
' का ऐसा न हो कि कोई लाभ उठाकर उनके गोरब को ठेस पहुँचा दे | 
“एन सभी मर्खा से में हजार थुना श्रधिक जानता हूँ, फिर किस लिए 
ये लोग इतना घमंड करते हैँ १” “थे लोग मुझे कहने वाले कौन होते 
हैं !” ऐसे-ऐसे भावों ने इनके कगढ़ाहु खमाव को जन्म दिया है । 
स्वयं अपने पर ओर अपने मस्तिप्क पर इनको आवश्यकता से अधिक 
विश्वास है। लोगों की--साथ में काम करनेवालों की--मूर्सता देखकर 
ये अधीर हो जाते हैं और इनकी सलाह तथा महत्ता स्वीकृत करने से 
यदि कोई इन्कार कर दे तो फिर इनके क्रोध का पार नहीं रहता। इनके 
क्रोध में भी एक प्रकार की उच्छद्ुलता है। छोय वालक गुत्ता हो जाय 
ओर बस मुझे तो यह चाहिए ही |? वही बात शाह में भी है | यदि इनकी 
सोची हुई वस्तु न मिले या न हो तो यह इनके खमाव से नहीं सहाय जाता; 
ओर उसमें भी बदि कहीं इनके गर्विए खभाव को आपात पहुँचा हो तो 
बस हो चुका | पागलपन और विद्वत्ता का एक अ्रद्धू त मिश्रण शाह में है । 

अच्छे और होशियार व्यक्ति हैं, पर मस्तिप्फ का संहुलन नहीं | 
गुलाब में कोँंयथ और कीचड़ भें कमल ! आह ! इस संसार की ऐसी 
रचना क्यों हुई ! दर सकी 

आथर रोद्द जेल, 
१७-६-३० 
“+रै४४---